गुरुवार, 8 दिसंबर 2022

End of iteration One

न्यायदर्शन के अध्ययन का यह प्रथम iteration यहीं समाप्त करती हूँ। बाकी बचे सूत्र में से अधिकांश वर्तमान अध्ययन हेतु अधिक प्रासंगिक नहीं है और कुछ जो किसी मात्रा में प्रासंगिक हो सकते है मात्र उनको लेने से पूर्वापर संबंध नहीं बनने से उनको लेना व्यर्थ होगा।

जैसे की मैंने प्रथम प्रयास के प्रारंभ में कहा था, यह न तो न्यायदर्शन सीखाने का प्रयास था न ही जो मैंने सिखा है उसे बताने का। मेरा उसे सीखने के प्रथम प्रयास को अंकित करना मात्र था।

एक वस्तु जो इस प्रथम iteration में होनी चाहिए थी पर नहीं हो पाई वह है अधिक स्थानों में वर्तमान व्यवहार जगत से उदाहरण। आशा है की यह अपूर्णता द्वितीय iteration में पूरी हो पाएगी।

मेरे अध्ययन की अनियमितता ने posts के समय की नियमितता और उनकी लंबाई दोनों को कभी कभी प्रभावित किया। इस अध्ययन यात्रा में एक ऐसे handle से जुडने के लिए जो न तो प्रसिद्ध है न तो किसी प्रसिद्ध handle ने recommend किया हुआ, आप single digit सहपाठियों का में धन्यवाद करती हूँ।

So, what next? Second iteration of Nyay which is spaced more regularly, has better sized posts plus has attempted enrichment in content? Yes, but not just that.

Lets start first iteration of Yogdarshan as well in parallel. Okay, not right away. Give me two three weeks.

क्या आप इस शास्त्राध्ययन में अपने उन मित्रों को जिनकी इसमें रुचि हो सकती है उन्हें भी जुडने के लिए आमंत्रित करेंगे?

बुधवार, 23 नवंबर 2022

प्रमाण विभाग परीक्षा। (२.२.१-२)

सूत्र १.१. में सूत्रकार ने प्रमाण के चार विभाग बताए थे।

प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि। १.१.३ 

प्रत्यक्ष अनुमान उपमान शब्द प्रमाण है।
https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/04/1.1.3.html

इस पर पूर्वपक्षी का आक्षेप है की इन के उपरांत अन्य प्रमाण भी है जो विभाग में होने चाहिए थे।

न चतुष्ट्वमैतिह्यार्थापत्तिसम्भवाभावप्रामाण्यात्। २.२.१

ऐतिह्य अर्थापत्ति संभव और अभाव भी प्रमाण होने से प्रमाण चार ही नहीं है।

ऐतिह्य : "ऐसा कहा जाता है" करके जो बातें प्रचलन में है पर जिनके बारे में यह नहीं पता की किसने कहा है, ऐसी बातें, जिसे हम जनमानस का ज्ञान कह सकते है उसे ऐतिह्य कहा जाता है।

अर्थापत्ति : एक कही हुई बात से उससे संलग्न न कही बात को जान लेना अर्थापत्ति है।

संभव : एक वस्तु के प्रमाणित होने पर दूसरी वस्तु का होना जब सिद्ध हो जाता है उसे संभव कहते है।

अभाव : किसी कार्य के न होने पर (उसके अभाव से) कोई अन्य बाधक कारण की सत्ता को जानने को अभाव प्रमाण कहते है।

उत्तर :-

शब्द ऐतिह्यानर्थान्तरभावादनुमानेऽर्थापत्तिसम्भवाभावानर्थान्तरभावाच्चाप्रतिषेधः। २.२.२

शब्द में ऐतिह्य का अर्थ और अनुमान में अर्थापत्ति संभव और अभाव के अर्थ आ जाने से प्रतिषेध नहीं बनता।

ऐतिह्य यदि किसी आप्त ने कहा सत्य है (भले ही हमें अब बताने वाले का नाम न पता हो) तब वह शब्द प्रमाण है और यदि असत्य है तो प्रमाण नहीं है। अर्थापत्ति संभव और अभाव अनुमान से भिन्न नहीं है। इसलिए प्रमाणों की संख्या चार जो बताई गई है वह ठीक है।

इस के बाद दूसरे अध्याय के द्वितीय आह्निक में शब्द और पद के ऊपर चर्चा है जिसे छोड कर हम आगे चलेंगे।

बुधवार, 16 नवंबर 2022

शब्द प्रमाण परीक्षा (२.१.४७-५५)

शब्द प्रमाण का लक्षण हमने देखा था,

आप्तोपदेशः शब्दः। १.१.७ 
आप्त पुरुष का कथन शब्द प्रमाण कहलाता है।
https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/05/1.1.6-7.html

अब परीक्षा सूत्र देखते है।

संक्षेप में,

पूर्वपक्षी का कहना है की शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण से भिन्न नहीं है। क्योंकि,
१. जब हम शब्द प्रमाण से कुछ जानते है तब अर्थ का प्रत्यक्ष तो करते नहीं वह तो उनुपलब्ध ही रहता है जैसे अनुमान में।
२. दोनों में ज्ञान की प्रवृत्ति एक सी ही होती है।
३. जैसे अनुमान में अग्नि को धूम के साथ के संबंध से जानते है ऐसे अर्थ के शब्द के साथ के संबंध से शब्द प्रमाण में ज्ञान होता है।

उत्तर :-
१. शब्द प्रमाण में आप्त पुरुष के सामर्थ्य से शब्द के अर्थ का ज्ञान होता है। अनुमान में जैसे लिंग को जानकर व्याप्ति ज्ञान से लिंगी का ज्ञान होता है ऐसा यहाँ नहीं है।
२. अनुमान में लिंग के और व्याप्ति के प्रमाण होते है जिसके आधार पर अप्रत्यक्ष का ज्ञान होता है शब्द में ऐसे कोई प्रमाणों की उपलब्धि से नहीं अपितु आप्त के सामर्थ्य से ही अर्थ का ज्ञान होता है। (वैसे आप्त के शब्द भी आप्त के प्रत्यक्ष/अन्य प्रमाण से यथार्थ ज्ञान पर आधारित होते है पर जिसे शब्द प्रमाण से ज्ञान हो रहा है उसके पास अन्य प्रमाणों की उपलब्धि नहीं है।)
३. न ही जैसे आप (पूर्वपक्षी) कह रहे हो ऐसे अर्थ से संबंध। यदि शब्द का अर्थ से व्याप्ति संबंध होता तो पूरण जलन कहते ही मुख भर जाता, जल जाता।

पूर्वपक्षी :-  
शब्द और अर्थ जुडे हुए तो है आप उनके संबंध का निषेध नहीं कर सकते।

उत्तर :- 
उनका संबंध संकेत अर्थात् वाच्यवाचकभाव का है व्याप्ति का नहीं। 

उनके संबंध का अलग अलग जाती और देश में अलग अलग होने से भी देखा जाता है की कोई एक शब्द का कोई एक अर्थ के साथ नियमपूर्वक संबंध हो ऐसा नहीं है। (भिन्न भिन्न भाषाओं में एक ही शब्द भिन्न भिन्न अर्थों के लिए प्रयोग किए जाते है और एक अर्थ को कहने के लिए सब के भिन्न भिन्न शब्द भी होते है।)
  

सूत्र सहित 

पूर्वपक्षी :-

शब्दोऽनुमानमर्थस्यानुपलब्धेरनुमेयत्वात्। २.१.४७

शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण ही है। अर्थ की अनुपलब्धि होने से, अर्थ अनुमेय होने से।

जब हम शब्द प्रमाण से कुछ जानते है तब अर्थ का प्रत्यक्ष तो करते नहीं वह तो उनुपलब्ध ही रहता है जैसे अनुमान में। इसलिए शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण से भिन्न नहीं है।


उपलब्धेरद्विप्रवृत्तित्वात्। २.१.४८

ज्ञान की प्रवृत्ति एक सी होने से। (भी शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण से भिन्न नहीं है।) 

अनुमान प्रमाण से जैसा ज्ञान होता है ऐसा ही ज्ञान शब्द प्रमाण से भी होता है।

सम्बन्धाच्च। २.१.४९

और संबंध होने से भी। (शब्द और अर्थ का संबंध)

जैसे अनुमान में अग्नि को धूम के साथ के संबंध से जानते है ऐसे अर्थ के शब्द के साथ के संबंध से शब्द प्रमाण में ज्ञान होता है इसलिए शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण ही है।

उत्तर :-

आप्तोपदेशसामर्थ्याच्छब्दादर्थसम्प्रत्ययः। २.१.५०

आप्त पुरुष के सामर्थ्य से शब्द के अर्थ का ज्ञान होता है।

लिंग को जानकर व्याप्ति ज्ञान से लिंगी का ज्ञान जैसे अनुमान में होता है ऐसा यहाँ नहीं है।

प्रमाणतोऽनुपलब्धेः। २.१.५०

प्रमाणों से उपलब्धि न होने से।

अनुमान में लिंग के और व्याप्ति के प्रमाण होते है जिसके आधार पर अप्रत्यक्ष का ज्ञान होता है शब्द में ऐसे कोई प्रमाणों की उपलब्धि से नहीं अपितु आप्त के सामर्थ्य से ही अर्थ का ज्ञान होता है। (वैसे आप्त के शब्द भी आप्त के प्रत्यक्ष/अन्य प्रमाण से यथार्थ ज्ञान पर आधारित होते है पर जिसे शब्द प्रमाण से ज्ञान हो रहा है उसके पास अन्य प्रमाणों की उपलब्धि नहीं है।)

पूरणप्रदाहपाटनानुपलब्धेश्च सम्बन्धाभावः। २.१.५२

पूरण जलन पाटन (फटना) की उपलब्धि न होने से संबंध का अभाव है।

अनुमान की तरह यहाँ भी व्याप्ति है इस के उत्तर में यहाँ कहा है की पूरण जलन पाटन जैसे शब्द बोलते ही हमारा मुख भर नहीं जाता, जल नहीं जाता, फट नहीं जाता, अर्थात् उन शब्दों के साथ अर्थ की व्याप्ति नहीं है। 

और न ही जैसे आप (पूर्वपक्षी) कह रहे हो ऐसे अर्थ से संबंध। यदि शब्द का अर्थ से व्याप्ति संबंध होता तो पूरण जलन कहते ही मुख भर जाता, जल जाता।

पूर्वपक्षी :-  
शब्दार्थव्यवस्थानादप्रतिषेधः। २.१.५३

शब्द और अर्थ की व्यवस्था के कारण संबंध का निषेध नहीं कर सकते।

शब्द और अर्थ जुडे हुए तो है आप उनके संबंध का निषेध नहीं कर सकते।

उत्तर :-
न सामयिकत्वाच्छब्दार्थसम्प्रत्ययस्य। २.१.५४

नहीं (व्याप्ति संबंध नहीं है), संकेत व्यवस्था से शब्द से अर्थ का बोध होता है।

उनका संबंध संकेत अर्थात् वाच्यवाचकभाव का है व्याप्ति का नहीं। 
*संकेत, समय, शक्ति और वाच्यवाचकभाव यह सब न्याय में समानार्थी है।
  
जातिविशेषे चानियमात्। २.१.५५

उनके संबंध का अलग अलग जाती और देश में अलग अलग होने से भी देखा जाता है की कोई एक शब्द का कोई एक अर्थ के साथ नियमपूर्वक संबंध हो ऐसा नहीं है। (भिन्न भिन्न भाषाओं में एक ही शब्द भिन्न भिन्न अर्थों के लिए प्रयोग किए जाते है और एक अर्थ को कहने के लिए सब के भिन्न भिन्न शब्द भी होते है।)  

मंगलवार, 15 नवंबर 2022

उपमान प्रमाण परीक्षा (२.१.४२-२.१.४६)

उपमान प्रमाण का लक्षण सूत्र था,

प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम्। १.१.६
 
प्रसिद्ध वस्तु के जाने हुए समान धर्म से साध्य(जानने योग्य) वस्तु का ज्ञान कराने वाला साधन उपमान प्रमाण कहलाता है।
https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/05/1.1.6-7.html

अब उसके परीक्षा सूत्र देखते है।

पूर्वपक्षी :-

अत्यन्तप्रायैकदेशसाधर्म्यादुपमानासिद्धिः। २.१.४२

अत्यन्त प्रायः अथवा एकदेश के साधर्म्य से उपमान प्रमाण की सिद्धि नहीं होती।

साधर्म्य तीन कोटि का हो सकता है।
१। अत्यन्त अर्थात् एकदम समानता। ऐसे में उपमान की सिद्धि नहीं होती जैसे गाय जैसी गाय कहने से क्या लाभ?
२। प्रायः अर्थात् बहु समानता। बहु सामान्य होने पर भी एक से दूसरे को नहीं पहचान जाता। जैसा बैल ऐसा भैंसा ऐसा नहीं कहा जाता। 
३। एकदेश अर्थात् थोडी सी समानता। अल्प समानता से भी उपमान सिद्ध नहीं होता। हाथी और बिल्ली में भी कुछ समानता है पर जैसा हाथी ऐसी बिल्ली कहने से कुछ सिद्ध नहीं होता।

अर्थात् उपमान से कभी कुछ सिद्ध नहीं होता जिससे उपमान प्रमाण की सिद्धि नहीं होती।

उत्तर :-
प्रसिद्धसाधर्म्यादुपमानसिद्धेर्यथोक्तदोषानुपपत्तिः। २.१.४३

लोक में प्रसिद्ध साधर्म्य से उपमान की सिद्धि होने से ऊपर कहा गया दोष नहीं है।

जो साधर्म्य लोक में प्रसिद्ध है उनका उपयोग वस्तुएं जनाने के लिए होता ही है। शहर में रहने वाले को नीलगाय गाय जैसी होती है कहने से उसे नीलगाय प्रथम बार देखने पर वह नीलगाय है यह बोध हो जाता है। कवि भी कमल जैसी आँख, पल्लव जैसे कोमल हाथ ऐसी उपमाओं का प्रयोग करते है। इस लिए उपमान प्रमाण असिद्ध नहीं है। 
 
पूर्वपक्षी :-
प्रत्यक्षेणाप्रत्यक्षसिद्धेः। २.१.४४

प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की सिद्धि होती है इसलिए (उपमान प्रमाण वास्तव में अनुमान प्रमाण ही है।)

जैसे अनुमान में प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की सिद्धि होती है (धुएं से अग्नि की) ऐसे ही यहाँ (गौ से गवय की), इसलिए उपमान अनुमान ही है, अलग प्रमाण नहीं।
  
उत्तर :-
नाप्रत्यक्षे गवये प्रमाणार्थमुपमानस्य पश्यामः। २.१.४५
तथेत्युपसंहारादुपमानसिद्धेर्नाविशेषः। २.१.४६

अप्रत्यक्ष गवय (नीलगाय) में हम उपमान का फल नहीं देख पाते।
"तथा" कहकर उपसंहार होने से उपमान प्रमाण की सिद्धि होने से अविशेष नहीं है। (उपमान अनुमान प्रमाण से भिन्न है।)

उपमान का फल शब्द और प्रत्यक्ष के संबंध को जानना है। जब नीलगाय प्रत्यक्ष हो तब यह जानना की यह नीलगाय है वह उपमान का फल होगा। अप्रत्यक्ष नीलगाय में उपमान का फल नहीं होता। न ही गाय और नीलगाय के बीच धुएं और अग्नि की भांति कोई व्याप्ति संबंध है। अनुमान स्वार्थ और परार्थ दोनों में होता है, उपमान मात्र परार्थ ही होता है। 

उपमान का उपसंहार साध्य साधन की समानता दिखाते होता है। जैसी गौ ऐसी गवय। अनुमान में ऐसा नहीं है। अर्थात् उपमान प्रमाण अनुमान प्रमाण से भिन्न ही है।

गुरुवार, 10 नवंबर 2022

अनुमान प्रमाण परीक्षा (२.१.३५-२.१.४१)

पूर्वपक्षी :-

रोधोपघातसादृश्येभ्यो व्यभिचारादनुमानमप्रमाणम्। २.१.३५

रोध उपघात तथा सादृश्य के कारण अनुमान गलत होने से अनुमान प्रमाण नहीं है।  

कभी कोई कारण आ जाने से अनुमानित कार्य जो अन्यथा होता वह बाधित हो जाता है, कभी कोई कारण आ जाने से कोई कार्य जिसके न होने का अनुमान हो वह वह हो जाता है अथवा कारण/कार्य के सादृश्य से कार्य/कारण का अनुमान गलत हो सकता है ऐसे में अनुमान को प्रमाण अर्थात् निश्चित ज्ञान कराने वाला नहीं कह सकते।

जैसे खूब काले बादल उमड आने पर कोई वर्षा होगी ऐसा अनुमान करता है परंतु वायु बादलों को उडा ले जाता है और वर्षा नहीं होती, नदी में खूब पानी आने से कोई ऊपर वर्षा हुई होगी यह अनुमान करता है परंतु पानी ऊपर बांध टूटने से अथवा हिम पिघलने से आया हो सकता है, चींटीयों को अपना घर बदलते देख कुछ दिनों में वर्षा होने का अनुमान करते हो परंतु वह उनके वर्तमान घर पर अन्य कोई आपत्ति के कारण स्थानांतरण कर रही हो यह हो सकता है, मनुष्य द्वारा मोर जैसी ध्वनि करने पर कोई उससे मोर का अनुमान कर सकता है। ऐसे प्रसंगों से पता चलता है की अनुमान निश्चित ज्ञान नहीं है और इसलिए उसे प्रमाण नहीं कहा जा सकता।

उत्तर :-   
नैकदेशत्राससादृश्येभ्योऽर्थान्तरभावात्। २.१.३६

एक देश त्रास तथा सादृश्य के कारण भिन्न अनुमान होने से अनुमान प्रमाण असिद्ध नहीं होता।

गलत अनुमान का कारण कार्य कारण में से कोई एक देश मात्र को देखकर अथवा अन्य कारणों की उपेक्षा अथवा कार्य कारण को यथायोग्य न समझना है। परिस्थिति को समग्रता से देखकर उसके अनुसार व्याप्ति विचार करते हुए किए गये अनुमानमें गलती नहीं होने से वह पूरी परिस्थिति को ठीक से समझे बिना किए गए अनुमान से भिन्न है और अप्रमाण नहीं है।

जैसे ऊपर वर्षा होने पर आई हुई बाढ में पेड पत्ते मिट्टी वगैरह होते है जो बिना वर्षा के आए पानी में नहीं होते, चींटियाँ यदि बिना भूमि की गर्मी और वर्षा अनुकूल वातावरण के अथवा अन्य विपत्ति के दिखते हुए घर बदल रही है तब उन परिस्थितियों की उपेक्षा करके अनुमान करना गलत होगा। ऐसे ही मोर की ध्वनि सुनकर मोर का अनुमान होता है मनुष्य के स्वर को मोर का समझना वह प्रमाण प्रयोग करने वाले की गलती है। मानो कोई धूल के बादल को धुआँ समझकर आग का अनुमान कर ले तो उससे धुएं और आग की व्याप्ति खंडित नहीं होती।

सूत्र २.१.३७-४१ के विस्तार में न जाते हुए आगे चलते है। सूत्र और अर्थ नीचे दिए है।

पूर्वपक्षी :-
वर्तमानाभावः पततः पतितपतितव्यकालोपपत्तेः। २.१.३७
गिरते हुए के संबंध में गिरा अथवा गिरेगा ऐसा भूतकाल अथवा भविष्यकाल का ही बोध होता है इसलिए वर्तमानकाल का अभाव है।

पूर्वपक्षी का कहना है की अनुमान का प्रयोग मात्र भूत और भविष्य के लिए ही हो सकता है जैसे गिरती हुई वस्तु को देखकर वह गिर गई अथवा गिरेगी यही अनुमान हो सकता है अर्थात् वर्तमान का अभाव है।


उत्तर :-

तयोरप्यभावो वर्तमानाभावे तदपेक्षत्वात्। २.१.३८
वर्तमान के अभाव में भूत भविष्य का भी अभाव मानना पडेगा क्योंकि उन दोनों को वर्तमान की अपेक्षा है।

नातीतानागतयोरितरेतरापेक्षासिद्धिः। २.१.३९
भूत भविष्य की एक दूसरे की अपेक्षा से सिद्धि नहीं होती।

वर्तमानाभावे सर्वाग्रहणम्प्रत्यक्षानुपपत्तेः। २.१.४०
वर्तमान के अभाव में प्रत्यक्ष की सिद्धि न हो पाने से कोई भी ज्ञान नहीं हो पाएगा। (क्योंकि बाकी प्रमाण प्रत्यक्ष मूलक होते है।)

कृतताकर्तव्यतोपपत्तेस्तूभयथा ग्रहणम्। २.१.४१
वर्तमानकाल में भूत भविष्य की भी सिद्धि हो पाने से दोनों प्रकार से ग्रहण होता है।

जो क्रिया अभी चल रही है उसके उल्लेख में तीनों कालों का ग्रहण हो जाता है, क्रिया के आरंभ से लेकर वर्तमान तक के भूत, वर्तमान और वर्तमान से क्रिया के अंत तक के भविष्य। वर्तमान का प्रयोग इस तरह से भी होता है।

रविवार, 6 नवंबर 2022

प्रत्यक्ष प्रमाण परीक्षा (२.१.२८-३४)

प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि। १.१.३ 
प्रत्यक्ष अनुमान उपमान शब्द प्रमाण है। 

यह प्रमाणों का विभाग दर्शाता सूत्र है। इस पर पूर्वपक्षी कहता है की प्रत्यक्ष प्रमाण वास्तव में अनुमान प्रमाण के अंतर्गत ही आ जाता है।

प्रत्यक्षमनुमानमेकदेशग्रहणादुपलब्धेः। २.१.२८
प्रत्यक्ष अनुमान ही है एक देश के ग्रहण से ज्ञान के उत्पन्न होने से।  

जिसे आप प्रत्यक्ष कह रहे हो वह वास्तव में अनुमान प्रमाण ही है क्योंकि प्रत्यक्ष (इन्द्रिय अर्थ का सन्निकर्ष) तो किसी वस्तु के एक देश का कर रहे हो और उस वस्तु के बाकी देशों को अनुमान से जान रहे हो। जैसे जिसे आप वृक्ष का प्रत्यक्ष कह रहे हो उसमें वृक्ष का आगे के भाग (और उसकी भी ऊपरी सतह) से ही चक्षु इन्द्रिय का सन्निकर्ष (प्रत्यक्ष) हो रहा है, उसके बाकी के अवयवों का उस अल्प प्रत्यक्ष के आधार पर अनुमान हो रहा है। इस लिए वृक्ष का अनुमान हो रहा है प्रत्यक्ष नहीं।

न प्रत्यक्षेण यावत्तावदप्युपलम्भात्। २.१.२९
जितना हुआ उतना पर प्रत्यक्ष से हुआ ज्ञान होने पर उसे अनुमान नहीं कह सकते।

वृक्ष के आगे के भाग का ज्ञान जो इन्द्रिय से प्राप्त हुआ है उसे जब आप स्वयं ही प्रत्यक्ष मन रहे हो तो प्रत्यक्ष प्रमाण के निषेध की आपकी प्रतिज्ञा वहीं भंग हो जाति है। 

और फिर अनुमान (व्याप्ति ज्ञान) प्रत्यक्ष पूर्वक ही होता है यदि प्रत्यक्ष की सत्ता को ही नकार दोगे तो अनुमान भी कैसे हो पाएगा? 

पूर्वपक्षी का विरोध गुणों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) के प्रत्यक्ष* में तो बनता ही नहीं क्योंकि वहाँ आगे पीछे के भाग का प्रश्न नहीं उठता।
 
* गुण द्रव्य में रहता है। (शब्द को छोड कर,) गुण का प्रत्यक्ष गौण रूप से होता है जब हम द्रव्य का प्रत्यक्ष करते है। जैसे हम गौ को देखते है तब उसके रंग (रूप) का, उसकी दौडने की क्रिया (कर्म) का, उसके गोत्व (जाति) का भी गौण रूप से प्रत्यक्ष करते है पर हम मुख्य रूप से यही कहेंगे की हमने गौ का प्रत्यक्ष किया।

यद्यपि प्रत्यक्ष प्रमाण की सत्ता को ही अस्वीकार करने वाले पूर्वपक्षी के आरोप का खंडन यहाँ हो जाता है, उस आरोप के पीछे पूर्वपक्षी और सिद्धांती के सिद्धांतों में अवयव अवयवी को लेकर भिन्नता कारणभूत है।

पूर्वपक्षी (बौद्ध) वस्तुओं को अवयवसमूह मानता है (समुदायवाद) जब की सिद्धांती अवयवी की स्वतंत्र सत्ता को स्वीकार करता है (उत्पत्तिवाद अथवा आरंभवाद)। नैयायिक उपदान(=समवायी) कारण में से अवयवी रूप कार्य की उत्पत्ति मानते है। इसलिए घडा पूर्वपक्षी के लिए मिट्टी के कणों का समूह मात्र है जो घडा नाम धारण करता है तो नैयायिक के लिए वह घडा उत्पन्न हुआ कार्य द्रव्य है जो मिट्टी के कणों के साथ समवाय संबंध से रहता है।

इस लिए पूर्वपक्षी के मत में वृक्ष के कुछ अवयवों का प्रत्यक्ष हुआ है, सभी अवयवों का नहीं। जब की सिद्धांती जो वृक्ष को एक इकाई के रूप में देखता है जड, तना, पत्ते के समूह मात्र के रूप में नहीं उसके लिए उसने किया प्रत्यक्ष वृक्ष का ही है। (पूर्वपक्षी के अपने सिद्धांत के हिसाब से भी वह वृक्ष का ज्ञान अनुमान से हुआ नहीं कह सकता क्योंकि जैसे कुछ अवयवों के प्रत्यक्ष से सम्पूर्ण अवयवसमूह का प्रत्यक्ष वह नहीं मानता ऐसे ही कुछ अवयवों के अनुमान से सम्पूर्ण अवयवसमूह का अनुमान भी नहीं मान सकता।)

सूत्रकार अब अवयव का प्रत्यक्ष अवयवी का प्रत्यक्ष ही है यह बताते है।

न चैकदेशोपलब्धिरवयविसद्भावात्। २.१.३०
और, अवयवी की सत्ता होने से उसके एक भाग की ही उपलब्धि है ऐसा नहीं कह सकते।

जैसे हम किसी मनुष्य को देखते है तब उसकी त्वचा का प्रत्यक्ष हुआ ऐसा नहीं परंतु उस मनुष्य का प्रत्यक्ष हुआ यह कहते है (ऐसे ही कहना उचित है।) क्योंकि उसके जीतने रूप का प्रत्यक्ष हुआ उससे हमें उस व्यक्ति के होने का ज्ञान हुआ है। अवयव और अवयवों में समवाय संबंध से रहने वाले अवयवी दोनों का ज्ञान अवयव के प्रत्यक्ष से हो जाता है।

जिज्ञासु जिसने समुदायवाद और उत्पत्तिवाद दोनों को सुन रखा है उसे वो विपरीत बातें सुनकर संदेह होता है की अवयवी है की नहीं। उसका प्रश्न।

साध्यत्वादवयविनि संदेहः। २.१.३१
अवयवी ही साध्य कोटि में होने से (अभी प्रमाणित न होने से) संदेह बना रहता है।

क्या अवयवी होता है अथवा अवयवसमूह मात्र होते है। यदि अवयवी ही न हो तो उसका प्रत्यक्ष होने का प्रश्न ही नहीं उठेगा। मात्र अवयवों का ही प्रत्यक्ष / अनुमान हो पाएगा।

उत्तर

सर्वाग्रहणमवयव्यसिद्धेः। २.१.३२
अवयवी न होने पर किसी भी वस्तु का प्रत्यक्ष नहीं हो पाएगा।

परमाणु* तो इंद्रियग्राह्य नहीं है तो यदि अनेक परमाणु से बना अवयवी न हो और मात्र अवयवों का ही प्रत्यक्ष हो सकता हो तो किसी भी वस्तु का प्रत्यक्ष नहीं हो पाएगा। 
*परमाणु = परम अणु। सबसे छोटा पदार्थ। जो खंडित न हो सके और दूसरे पदार्थों से (अवयवों से) न बना हो। (क्योंकि नहीं तो उसके खंड / अवयव उससे छोटे बन जाएंगे।)

धारणाकर्षणोपपत्तेश्च। २.१.३३
और धारण तथा आकर्षण से भी अवयवी होने का पता चलता है।

अवयवों के बीच में धारण तथा आकर्षण से भी अवयवी का पता चलता है। अवयवसमूह मात्र होने से एक अवयव को धारण करने, खींचने से अन्य अवयवों पर प्रभाव नहीं पडता जैसे गेहूँ के ढेर में से एक गेहूँ उठाते है तो अन्य गेहूँ भी उसके साथ खींच कर नहीं आते।

अवयवी को न मानने वालों को स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए की जो मुझे यह एक वस्तु है ऐसा ज्ञान हो रहा है वह एक वस्तु क्या है। समुदाय अनेक वस्तुओं से बनता है अनेक में एक का ज्ञान नहीं हो सकता वह मिथ्या ज्ञान कहलाएगा।

सेनावनवद्ग्रहणमिति चेन्नातीन्द्रियत्वादणूनाम्। २.१.३४
सेना तथा वन के लिए जैसा ज्ञान है ऐसा कहो तो वह गलत है परमाणुओं के अतीन्द्रिय होने से।

जैसे अनेक सैनिकों से एक सेना और अनेक वृक्षों से एक वन बनता है ऐसा कहो तो वह गलत उदाहरण होगा। वहाँ एक एक सैनिक और वृक्ष की पृथकता का ज्ञान समीप से देखने से होता है, दूर से देखने से एक सेना वन का ज्ञान जो होता है वह गौण ज्ञान है। यह उदाहरण परमाणु समूह जैसा नहीं है क्योंकि परमाणु अतेंद्रिय है उनको पृथक पृथक देख ही नहीं पाने से और मात्र अवयवी का ही प्रत्यक्ष हो पाने से मुख्य गौण का अवसर ही प्राप्त नहीं होता।

और अवयवसमूह पक्ष में तो सेना और वन वैसे भी एक सिद्ध नहीं है तो जो स्वयं सिद्ध नहीं है उसे उदाहरण नहीं बनाया जा सकता।

गुरुवार, 3 नवंबर 2022

प्रमाण सामान्य, प्रत्यक्ष लक्षण परीक्षा (२.१.१७-२७)

प्रमाणतः सिद्धेः प्रमाणानां प्रमाणान्तरसिद्धिप्रसङ्गः। २.१.१७
तद्विनिवृत्तेर्वा प्रमाणसिद्धिवत्प्रमेयसिद्धिः। २.१.१८
न प्रदीपप्रकाशसिद्धिवत्तत्सिद्धेः। २.१.१९
क्वचिन्निवृत्तिदर्शनादनिवृत्तिदर्शनाच्च क्वचिदनेकान्तः। २.१.२०

सूत्र १६ में कहा गया था की प्रमाण प्रसंग के अनुरूप प्रमेय भी बन सकते है, तुला की भांति। तो पूर्वपक्षी कहता है यदि प्रमाणों की परीक्षा अन्य प्रमाणों से करनी हो तो जो प्रत्यक्ष आदि जो चार प्रमाण कहे है उनसे अतिरिक्त और प्रमाण लाने होंगे। और यदि बिना अतिरिक्त प्रमाण लाए ही उनकी सिद्धि मान ली जाति है तो फिर उसी तरह प्रमेय की भी सिद्धि मान सकते है, प्रमाणों की आवश्यकता ही क्या है।

इन दो प्रश्नों का उत्तर देते हुए सूत्रकार कहते है की इन प्रमाणों की सिद्धि बिना प्रमाण के नहीं है और इनको प्रमाणित करने के लिए अन्य प्रमाणों की आवश्यकता भी नहीं है। दीपक के प्रकाश के समान। दीपक का प्रकाश प्रमाण है यह अंधकार में दीपक के होने पर वस्तुओं के दिखने और न होने पर न दिखने से अनुमान प्रमाण से सिद्ध होता है और दीपक के प्रकाश से वस्तुएं दिखेगी ऐसा अन्य के कहने पर शब्द प्रमाण से भी। और यहाँ प्रमाण से प्रमाण का ज्ञान होना नहीं कहेंगे, प्रमाण से प्रमेय का ज्ञान होना ही कहेंगे। जिसकी परीक्षा की जा रही है वह प्रमेय है भले ही किसी अन्य समय वह प्रमाण का काम करता हो।

सूत्र २.१.१७-२० को इतना ही रखते हुए आगे चलते है।


प्रत्यक्ष लक्षण परीक्षा

प्रथम अध्याय के चौथे सूत्र में प्रत्यक्ष का लक्षण दिया गया है वहाँ परीक्षा प्रकरण के सूत्रों का विषय भाष्य के अंतर्गत लिया गया था। दोनों जगह का भाष्य मुझे विसंगतता पूर्ण, बात को मात्र लंबी, जटिल बनाता हुआ और तर्क रहित लगा।

जिसने श्रद्धा के साथ अध्ययन अभी प्रारंभ ही किया था उसके लिए चौथे ही सूत्र में ऐसे भाष्य का सामना होना अत्यंत आघात और निराशा जनक था और मैंने तब भी अपना दृष्टिकोण रखा था। भाष्यकार के उत्तर और मेरे उन उत्तर के प्रतिकार को छोड दे तो मेरा पक्ष संक्षेप में यह था।
 
लक्षण सूत्र :-
इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्। १.१.४

इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न हुआ वह ज्ञान जो अव्यपदेश्य, अव्यभिचारी तथा व्यवसायात्मक हो उसको प्रत्यक्ष कहते है।

पूर्वपक्षी :-
आत्मा-मन, मन-इन्द्रिय के सन्निकर्ष को लक्षण में क्यों नहीं कहा।

मेरा पक्ष :-
उत्पन्न हुआ ज्ञान = नया अर्थ जो मन ने ग्रहण करके आत्मा तक पहुंचाया है।

जब हम सूत्र में कहे गए 'उत्पन्न हुए ज्ञान' की अनदेखी नहीं करेंगे तो आत्मा-मन, मन-इन्द्रिय सन्निकर्ष के न कहे जाने का प्रश्न ही नहीं बनेगा। और यदि फिर भी कोई यह प्रश्न पूछे तो इनको यह स्पष्ट करना चाहिए की सूत्रकार के शब्द उत्पनं ज्ञानम् का अर्थ क्या है? क्या मन के अर्थ को ग्रहण करके आत्मा तक पहुंचाने से ही आत्मा को ज्ञान नहीं होता? क्या कोई और पद्धति से भी ज्ञान उत्पन्न हो जाता है? यदि नहीं तो सूत्रकार ने एक ही बात दो बार क्यों नहीं कही ऐसी आपत्ति क्यों?

पूरी चर्चा के लिए १.१.४ की posts देख सकते है। (यह उन्हीं के के लिए उपयोगी होगा जिन्होंने पहले भाष्य के अनुरूप विषय को समझ रखा है। जिनको unlearn करने की आवश्यकता नहीं है उनके लिए नहीं।)
https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/04/1.1.4update.html
https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/04/1.1.4.html


अब परीक्षा प्रकरण के सूत्र देखते है।

भाष्य के पीछे न जाते हुए मैंने यहां जो लिखा है वह सीधे सूत्र के आधार पर लिखा है। (पुस्तक में से सूत्र के पदार्थ की मदद से।)

पूर्वपक्षी :-
प्रत्यक्षलक्षणानुपपत्तिरसमग्रवचनात्। २.१.२०

प्रत्यक्ष के सभी लक्षण नहीं देने से लक्षण सिद्धि नहीं हो सकती।

पूर्वपक्षी :-
नात्ममनसोः संनिकर्षाभावे प्रत्यक्षोत्पत्तिः। २.१.२१

आत्मा और मन के संयोग के अभाव में प्रत्यक्ष नहीं हो सकता।

पूर्वपक्षी :-
दिग्देशकालाकाशेष्वप्येवं प्रसङ्गः। २.१.२२

दिशा देश काल आकाश के विषय में भी ऐसा ही है (उनको भी नहीं कहा गया जब की उनके बिना प्रत्यक्ष नहीं हो सकता।)

उत्तर :-
ज्ञानलिङ्गत्वादात्मनो नानवरोधः। २.१.२३

ज्ञान आत्मा का गुण होने से आत्मा का अग्रहण नहीं है। (जब ज्ञान कहा तो आत्मा को हुआ ज्ञान ही अर्थ होता है।) 

उत्तर :-
तदयौगपद्यलिङ्गत्वाच्च न मनसः। २.१.२४

एक समय में एक ही ज्ञान उत्पन्न करना (एक साथ अनेक ज्ञान उत्पन्न न करना) यह मन का धर्म होने से मन का भी अग्रहण नहीं है।

(एक साथ सभी इंद्रियाँ ज्ञान उत्पन्न नहीं करती इससे मन की सिद्धि होती है और ज्ञान उत्पन्न होने में मन की अनिवार्यता सिद्ध करती है। अर्थात् ज्ञान के उत्पन्न होने में जैसे अनिवार्य रूप से आत्मा ग्रहण हो जाता है ऐसे ही मन भी।)

उत्तर :-
तैश्चापदेशो ज्ञानविशेषाणाम्। २.१.२५

ज्ञान विशेष का (अर्थ का) व्यवहार इंद्रियों से होता है। (दिशा देश काल आकाश का नहीं। इस लिए अर्थ और इन्द्रिय का सन्निकर्ष लक्षण है और दिशा देश काल आकाश का होना/उनसे सन्निकर्ष का होना नहीं है।) 

पूर्वपक्षी :-
व्याहतत्वादहेतुः। २.१.२६

व्याघात होने से यह हेतु ठीक नहीं है। (अर्थ जिसका ज्ञान हो रहा है वह तो आपके लक्षण में है परंतु दिशा देश काल आकाश के भी होने और उनके ज्ञान के होने पर आपने उन्हें प्रत्यक्ष लक्षण में नहीं लिया।)

उत्तर :-
नार्थविशेषप्राबल्यात्। २.१.२७

(व्याघात) नहीं है। ज्ञान में अर्थ विशेष की ही मुख्यता रहती है।  (प्रत्यक्ष में अर्थ - शब्द स्पर्श रूप रस गंध की ही प्रमुखता रहती है दिशा देश काल आकाश की नहीं इस लिए अर्थ को लक्षण में कहना और दिशा देश काल आकाश को न कहना इसमें व्याघात दोष नहीं है।)

नीचे के दो सूत्र कुछ पुस्तक में है कुछ में नहीं। जिन पुस्तकों में वह नहीं है वह पुस्तक overall भी अधिक तर्कसंगत लगते है और यह सूत्र भाष्यकार ने किए विचित्र अर्थों को बल देने के लिए डाले हो ऐसे लगते है तो मैंने भी उन्हें नहीं लिया है।

प्रत्यक्षनिमित्तत्वाच्चेन्द्रियार्थयोः संनिकर्षस्य स्वशब्देन वचनम्। २.१.२६ 
सुप्तव्यासक्तमनसां चेन्द्रियार्थयोः संनिकर्षनिमित्तत्वात्। २.१.२७ 

शनिवार, 29 अक्टूबर 2022

प्रमाण सामान्य परीक्षा २.१.८-१५

प्रमाण का सामान्य लक्षण "उपलब्धिसाधनं प्रमाणम्"*, जो सत्य ज्ञान का साधन है वह प्रमाण है किया गया है।

*सूत्रकार ने प्रमाण सामान्य का कोई लक्षण सूत्र नहीं दिया है। भाष्यकार ने प्रमाण के निर्वाचन से ही यह अर्थ निकलता है ऐसा प्रमाणों के विभाग के सूत्र (१.१.३) की चर्चा में कहा था। https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/04/1.1.3.html 

इस पर लगाए गए आरोप, जो शून्यवादी बौद्धों के माने जाते है उन्हें सूत्रकार २.१.८-११ सूत्रों में देते है।

प्रत्यक्षादीनामप्रामाण्यं त्रैकाल्यासिद्धेः। २.१.८
पूर्वं हि प्रमाणसिद्धौ नेन्द्रियार्थसंनिकर्षात्प्रत्यक्षोत्पत्तिः। २.१.९
पश्चात्सिद्धौ न प्रमाणेभ्यः प्रमेयसिद्धिः। २.१.१०
युगपत्सिद्धौ प्रत्यर्थनियतत्वात्क्रमवृत्तित्वाभावो बुद्धीनाम्। २.१.११

यह आरोप हमें विचित्र लग सकते है। कहा यह जा रहा है की प्रत्यक्ष आदि सभी प्रमाण किसी भी काल में अर्थ को सिद्ध नहीं कर सकते। अर्थात् प्रमाण की सत्ता को ही नकारा जा रहा है। पूर्वपक्षी कहता है की साधन-साध्य में क्रम रहता है जबकि प्रमाण प्रमेय के बीच में क्रम नहीं बन सकता। प्रमाण को पहले मानेंगे तो बिना प्रमेय के इन्द्रिय का सन्निकर्ष अर्थ के साथ कैसे होगा? प्रमाण को बाद में मानेंगे तो बिना प्रमाण के प्रमेय में पहले प्रमेयत्व नहीं होगा और एक साथ दोनों हो नहीं सकते क्योंकि मन एक बार में एक ही ज्ञान उत्पन्न कर सकता है।

उत्तर

त्रैकाल्यासिद्धेः प्रतिषेधानुपपत्तिः। २.१.१२
सर्वप्रमाणप्रतिषेधाच्च प्रतिषेधानुपपत्तिः। २.१.१३
तत्प्रामाण्ये वा न सर्वप्रमाणविप्रतिषेधः। २.१.१४
त्रैकाल्याप्रतिषेधश्च शब्दादातोद्यसिद्धिवत्तत्सिद्धेः। २.१.१५
प्रमेया च तुलाप्रामाण्यवत्। २.१.१६

सूत्र १२-१४ में सूत्रकार कहते है,
तुम्हारी त्रिकाल में प्रमाण की असिद्धि के हेतु के हिसाब से तो तुम्हारा प्रतिषेध ही नहीं टिक पाएगा। (तुम जिसका प्रतिषेध कर रहे हो वह प्रतिषेध से प्रथम है , पश्चात है अथवा साथ में है?)
जब तुम प्रमाणों को ही नहीं मान रहे हो तो तुम्हारा प्रतिषेध प्रामाणिक है अथवा अप्रामाणिक? यदि अपने प्रतिषेध में प्रामाण्य मानते हो तो प्रमाण मात्र का प्रतिषेध नहीं होगा।

इस प्रकार पूर्वपक्षी के प्रतिषेध उसके स्वसिद्धांत तथा स्वहेतु से ही पराजित होते है यह दिखाने के पश्चात सूत्रकार यह स्पष्ट करते है की प्रमाण और प्रमेय की उत्पत्ति भिन्न काल में होने पर भी प्रमाण प्रमेय का ज्ञान करा सकता है। जैसे बाद में उत्पन्न हुआ शब्द उस वाद्य का ज्ञान करा सकता है जिसने उसे उत्पन्न किया है। और कोई वस्तु को प्रमाण अथवा प्रमेय ही मान लेना भी ठीक नहीं क्योंकि परिस्थिति के हिसाब से कभी कोई वस्तु प्रमाण बनती है तो फिर कभी वही वस्तु प्रमेय। जैसे तुला अन्य पदार्थों को तोलते समय प्रमाण है पर जब उसकी ही परीक्षा की जा रही है तब प्रमेय।

(प्रमाण शब्द को ज्ञान के बाह्य साधन जैसे तुला, बाट, दिया, प्रकाश के लिए, इंद्रियां, जो भी ज्ञान के साधन है उन के लिए, उत्पन्न हुए ज्ञान के लिए अथवा वस्तु के ज्ञान से उत्पन्न उस वस्तु को प्राप्त करने / छोडने की बुद्धि के लिए भी प्रयोग में लाया जाता है। सूत्रकार ने जो प्रमाण के लक्षण दिए है उससे अंतिम दो अर्थ होंगे पर प्रथम दो अर्थ में भी उनका प्रयोग होता है, जैसे यहां।) 

पिछली post में मैंने कहा था की कुछ प्रश्नों को, जो हमारे लिए उपयोगी न लगे उन्हें छोड दूँगी और ऊपर के प्रश्न उसी प्रकार के है। फिर भी उनका उल्लेख करने के पीछे दो कारण है।
 
१. उत्तर अथवा कहो उत्तर का प्रकार

पूर्वपक्षी के आरोप स्वसिद्धांत और स्वहेतु के ही विपरीत थे ऐसे में उसका उत्तर देते समय उन्होंने जो प्रश्न ही गलत थे उनका उत्तर देना/उनसे स्वयं की रक्षा करना नहीं प्रारंभ कर दिया। पहले उन्होंने पूर्वपक्षी के स्वसिद्धांत विरुद्ध कथन को ही उजागर किया। हमने वाद/निग्रहस्थान के लक्षण देखते समय देखा था की स्वसिद्धांत विरुद्ध कथन यह गलती सबसे अधिक अक्षम्य है। - this emphasis is mine.

जब सामने वाले का प्रश्न ही गलत हो तब यदि हम प्रश्न की व्यर्थता दिखाने के बदले प्रश्न का उत्तर देने लगते है तब हम उसके प्रश्न को योग्य स्वीकार करने के दोषी बनते है और उसकी गलती न पकडने से स्वयं निग्रहस्थान में आएंगे सो अलग।

पूर्वपक्षी के खंडन के उपरांत सूत्रकार ने जवाब भी दिया है, जिसको मैं पूर्वपक्षी को दिया गया जवाब नहीं (क्योंकि हार के पश्चात अब वह प्रतिपक्ष के रूप में है ही नहीं) अपितु शास्त्राध्ययन कर रहे जिज्ञासुओं के लिए है ऐसे देखती हूँ।

२। आरोप की गुणवत्ता

जो कारण सूत्रों को छोडने का हो सकता था वही उनको न छोडने का है। यह दिखाने के लिए की संस्कृत में लिखी गई हर बात सही अथवा उच्च गुणवत्ता वाली नहीं होती। (यहाँ ये पूर्वपक्षी के आरोप है पर अन्य कहीं पूर्वपक्षी के लिखे ग्रंथों में वह सिद्धांत के रूप में भी हो सकते है।) संस्कृत एक भाषा है जो सही गलत, अच्छे बुरे, बुद्धिमान कुतर्की, विद्वान सामान्य हर प्रकार के लोगों ने उपयोग की है। ऐसा तो था नहीं की अच्छे अच्छे बुद्धिमान परोपकारी आप्तजन तो संस्कृत में अपनी बात कहते थे और ज अभी सत्य तक नहीं पहुंचे है अथवा असत्य की और ही चल पडे है आदि कोई अन्य भाषा का प्रयोग करते थे।

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2022

द्वितीय अध्याय प्रथम आह्निक : संशय परीक्षा २.१.१-७

प्रथम अध्याय में हमने प्रथम सूत्र में दर्शाये गए १६ पदार्थों के विभाग तथा लक्षण देखें थे। सूत्रकार अब उन पदार्थों की परीक्षा प्रारंभ करते है। परीक्षा से तात्पर्य है की जो लक्षण कहे गए है वह योग्य है अथवा नहीं, उनमें कोई त्रुटि तो नहीं रह गई यह देखना। इसके लिए सूत्रकार स्वयं प्रश्न उठाकर (ऐसे संशय जो जिज्ञासु को हो सकते है अथवा वह आरोप जो अन्य मत के मानने वाले उनके समय में लगाते हो।) उनका समाधान देंगे।

यहाँ कई प्रश्न सूत्रकार के समय के अन्य प्रचलित मतों की मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए उठाए गए है (खास करके बौद्ध), उनमें से अधिकतर प्रश्न मैं यहाँ सम्मिलित न करूँ यह हो सकता है। यदि हम प्रश्न को ही समझ न पाए/योग्य लगे/जो प्रश्न हमें स्वयं को न हो उसे ले कर हम अध्ययन की जटिलता ही बढाएंगे और ऐसा करने से इस स्तर पर मुझे कोई लाभ प्रतीत नहीं होता। यह भी हो सकता है की लक्षण सूत्र को समझाते समय भाष्यकार ने कुछ प्रश्न प्रथम अध्याय में ही उठा लिए हो, ऐसे प्रश्न जिसके उत्तर हम देख चुके है उनको भी यहां नहीं लेंगे/विस्तार से नहीं लेंगे।

संशय परीक्षा

प्रमाण तक पहुँचने की प्रक्रिया संशय से प्रारंभ होती है। यदि संशय ही न हो तो न उसे निवृत्त करने की इच्छा होगी न प्रमाणों का प्रयोग होगा। तो सर्वप्रथम परीक्षा संशय की की गई है।  

परीक्षा सूत्र को देखने से पहले एक बार हमने प्रथम अध्याय में संशय से संबंध में जो पढा था उसे याद कर लेते है।

प्रथम सूत्र में संशय उन १६ पदार्थों में गिनाया गया है जिनके तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।

प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः। १.१.१

प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अवयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास छल जाति और निग्रहस्थान इन के तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।

संशय के लक्षण का सूत्र हमने इस प्रकार देखा था।
(इस पर पूरी चर्चा यहाँ देखें, https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/06/1.1.23.html
संक्षेप में,)

समानानेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः। १.१.२३

समान धर्म के ज्ञान से अथवा विशेष धर्म के ज्ञान से अथवा परस्पर विरोधी ज्ञान से अथवा उपलब्धि की अव्यवस्था से अथवा अनुपलब्धि की अव्यवस्था से विशेष ज्ञान की अपेक्षा रखने वाला द्विकोटिक ज्ञान संशय(विमर्श) कहलाता है।

प्रत्येक ऐसी अवस्था में जहां किसी वस्तु का निश्चय न हो रहा हो वहां संशय उभरेगा यह नहीं कह सकते। यदि निश्चय करने की इच्छा भी हो तब संशय उभरेगा। जब वर्तमान ज्ञान से निश्चय नहीं हो पा रहा हो और निश्चय पर पहुंचने की इच्छा हो तब धर्मी (प्रमेय) के विशेष धर्म को जानने की इच्छा होगी जिससे निश्चय हो सके। इस लिए विशेष की अपेक्षा रखने वाला ज्ञान इसको विमर्श का विशेषण बनाया है।

सूत्र में संशय उत्पन्न होने की पाँच अवस्था बतायी है।
१। समानधर्मोंपपत्ति अर्थात् दो भिन्न वस्तुओं के समान धर्मों का किसी वस्तु में दिखना।
२। अनेकधर्मोंपपत्ति अर्थात् अनेक (विशेष) धर्म का दिखना : कोई ऐसा धर्म दिखना जो कहीं और नहीं दिख रहा हो और उस धर्म के आधार पर वस्तु का वर्गीकरण न हो पा रहा हो।
३। विप्रतिपत्ति अर्थात् विरोधी धर्मों का दिखना। एक ही धर्मी के लिए एक साथ सच न हो सके ऐसी विरोधी बातों का सामने आना।
४। उपलब्धि अव्यवस्था : जहां वस्तु मिल रही है पर यह निश्चय नहीं हो पा रहा है की वह वहां होते हुए उपलब्ध हो रही है अथवा न होते हुए। (जैसे रण में पानी है अथवा मृगमरीचिका)
५। अनुपलब्धि अव्यवस्था : जहां वस्तु की उपलब्धि नहीं हो रही है पर यह निश्चय नहीं हो पा रहा है की वह वहां न होते हुए अनुपलब्ध हो रही है अथवा होते हुए। (जैसे भूगर्भजल)

परीक्षा प्रकरण में सूत्रकार पूर्वपक्षी की तरफ से नीचे के प्रश्न उठाते है।

समानानेकधर्माध्यवसायादन्यतरधर्माध्यवसायाद्वा न संशयः। २.१.१
विप्रतिपत्त्यव्यवस्थाध्यवसायाच्च। २.१.२
विप्रतिपत्तौ च सम्प्रतिपत्तेः। २.१.३
अव्यवस्थात्मनि व्यवस्थितत्वाच्चाव्यवस्थायाः। २.१.४
तथात्यन्तसंशयस्तद्धर्मसातत्योपपत्तेः। २.१.५

जिसका उत्तर छठे सूत्र में देते है।
यथोक्ताध्यवसायादेव तद्विशेषापेक्षात्संशयेनासंशयो नात्यन्तसंशयो वा। २.१.६

इन प्रश्नों को संक्षेप में ऐसे समझ सकते है की पूर्वपक्षी यह कह रहा है की संशय के जो पाँच कारण गिनाए गए है वहाँ अलग अलग प्रकार के ज्ञान हो रहे है (समान/विशेष/विरुद्ध धर्म) और ज्ञान का होना संशय उत्पन्न नहीं करता। 

उत्तर : पूर्वपक्षी ने विशेष की अपेक्षा हो तब संशय होता है इस भाग को अनदेखा कर दिया है। ऐसा/इतना ज्ञान होना जिससे किसी वस्तु का निश्चयात्मक ज्ञान न हो मात्र संशय उत्पन्न नहीं करेगा यदि निश्चयात्मक ज्ञान तक पहुँचने की इच्छा ही न हो पर ऐसी इच्छा होने पर ऐसा ज्ञान संशय उत्पन्न करने का कारण बनेगा।

पूर्वपक्षी यह भी कहता है की जो ज्ञान संशय का कारण बना है वह हमेशा बने रहने से संशय भी हमेशा बना रहेगा।

उत्तर : संशय उत्पन्न करने वाले ज्ञान के उपरांत जब संशय का निवारण करने वाले प्रमाण को भी प्रमाता जान लेता है तब संशय का निवारण हो जाता है। जैसे सामने पडी वस्तु में अभी भी वह समान धर्म है जो रज्जु और सांप दोनों में रहते है पर उसके विशेष धर्म से जब निश्चय हो जाता है की वह रज्जु है अथवा सांप तब संशय नहीं बना रहता।

आगे सूत्रकार कहते है, 
यत्र संशयस्तत्रैवमुत्तरोत्तरप्रसङ्गः। २.१.७

जहां संशय उठाया जाए वहाँ इस प्रकार उक्ति प्रत्युक्ति से उसका निराकरण करना चाहिए।

आगे अन्य पदार्थों में उठाए गए संशय का भी पूर्वपक्षी के आरोप सिद्धांती के उत्तर के माध्यम से निराकरण किया जाएगा।

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2022

निग्रहस्थान : विक्षेप मतानुज्ञा पर्यनुयोज्योपेक्षण निरनुयोज्यानुयोग अपसिद्धान्त हेत्वाभास

विक्षेप

कार्यव्यासङ्गात्कथाविच्छेदो विक्षेपः। ५.२.१९

किसी अन्य कार्य के बहाने कथा का भंग करना विक्षेप निग्रहस्थान है।
(बात उत्तर से बचने के लिए ही कही गई हो तभी बहाना कहलाता है।)  


मतानुज्ञा

स्वपक्षे दोषाभ्युपगमात्परपक्षे दोषप्रसङ्गो मतानुज्ञा। ५.२.२०

स्वपक्षमें दोष को मानकर परपक्ष में भी वह दोष है ऐसी आपत्ति करना मतानुज्ञा निग्रहस्थान है।

जब स्वयं के पक्ष में दोष मन लिया तो हार वहीं हो जाति है।


पर्यनुयोज्योपेक्षण

निग्रहस्थानप्राप्तस्यानिग्रहः पर्यनुयोज्योपेक्षणम्। ५.२.२१

प्रतिपक्ष के निग्रहस्थान में आने पर भी उसका निग्रह न करना पर्यनुयोज्योपेक्षण (प्रश्न करने योग्य की उपेक्षा करना)  निग्रहस्थान है।

क्योंकि निग्रहस्थान में आया हुआ पक्ष स्वयं ऐसा नहीं कहेगा की प्रतिपक्षी ने उसको हराने का अवसर जाने दिया, यह निग्रहस्थान तब प्रकाश में आएगा जब सभा में से कोई यह प्रकाशित करेगा। ऐसे में एक पक्ष मूलतः निग्रहस्थान में आने से और दूसरा पक्ष पर्यनुयोज्योपेक्षण निग्रहस्थान में आने से पराजित हो जाएगा।


निरनुयोज्यानुयोग

अनिग्रहस्थाने निग्रहस्थानाभियोगो निरनुयोज्यानुयोगः। ५.२.२२

जहां निग्रहस्थान नहीं हो वहां निग्रहस्थान दिखाना निरनुयोज्यानुयोग निग्रहस्थान है।

पाँचवे अध्याय के प्रथम आह्निक में हम ने जो २४ प्रकार की जातियाँ देखी थी वह सारी इस निग्रहस्थान के अंतर्गत आयेगी।
 
[ऊपर के दो निग्रहस्थान आज के समय के controlled opposition के सिद्धांत के समान है जहां सत्ताधारी पक्ष के "प्रतिपक्ष" वास्तव में controlled opposition होते है। इसमें प्रतिपक्ष जहां निग्रहस्थान हो वहाँ प्रश्न नहीं करके पक्ष को हार से बचाता है और जहां निग्रहस्थान नहीं हो वहां प्रश्न करके उसे जिताने में मदद करता है।

वैसे ऐसा भी हो सकता है की किसी एक को controlled opposition कहना उपयुक्त न हो। यह भी हो सकता है की कब कौन से पक्ष को जिताना है उस पर निर्भर रहे की कौन सा पक्ष कब controlled opposition की भूमिका निभाये। ऐसा तब हो सकता है जब पक्ष प्रतिपक्ष दोनों ही controlled हो और सत्ता किसी और ही के पास हो।]


अपसिद्धान्त

सिद्धान्तमभ्युपेत्यानियमात्कथाप्रसङ्गोऽपसिद्धान्तः। ५.२.२३

सिद्धान्त को स्वीकार करके उसीके नियम को तोडकर कथा में प्रसंग उपस्थित करना अपसिद्धान्त निग्रहस्थान है।

जिस सिद्धांत को स्वीकार करके एक पक्ष चर्चा कर रहा है उसी सिद्धांत के कोई नियम विरुद्ध की बात वो पक्ष करें तो वो अपसिद्धान्त निग्रहस्थान में आता है।

निग्रहस्थानों का प्रयोग वाद में नहीं होता क्योंकि वहाँ हार जीत के उद्देश्य से चर्चा नहीं हो रही होती। इस कारण से यदि गलती हो भी तो उसे दिखाकर उसे सुधारने का अवसर दिया जाता है। परंतु जो सिद्धांत विरुद्ध बात कहे वह वाद में प्रवृत्त नहीं होता। अर्थात् अपसिद्धान्त का प्रसंग वाद में बनेगा ही नहीं और जहां बनेगा उसे वाद नहीं कहेंगे। इस का अर्थ यह होगा की सिद्धांत विरुद्ध कथन से आगे (कथन सिद्धांत विरुद्ध है यह स्पष्ट करने के पश्चात) कोई भी चर्चा अयोग्य है।


हेत्वाभास

हेत्वाभासाश्च यथोक्ताः। ५.२.२४

और हेत्वाभास जो पहले कहे जा चुके है वह भी निग्रहस्थान है।


इस के साथ पाँचवें अध्याय का द्वितीय आह्निक समाप्त होता है।

न्यायदर्शन की यहां समाप्ति होती है परंतु हमने क्योंकि क्रम तोडते हुए प्रथम अध्याय के पश्चात पाँचवां अध्याय ले लिया था, आगे हम २-४ अध्यायों में से हमारे लिए अधिक उपयुक्त अंश देखेंगे।

निग्रहस्थान : अपार्थक अप्राप्तकाल न्यून अधिक पुनरुक्त अननुभाषण अज्ञान अप्रतिभा

अपार्थक

पौर्वापर्यायोगादप्रतिसम्बद्धार्थमपार्थकम्। ५.२.१०

जिस वाक्य समुदाय के पूर्वापर वाक्यों के बीच कोई संबंध न हो, अर्थात वाक्य समुदाय का कोई अर्थ न निकलता हो, ऐसे उच्चारण से अपार्थक निग्रहस्थान बनता है।

(जहां वाक्य ही अर्थ रहित हो वह पूर्व देखा हुआ निरर्थक निग्रहस्थान है, जहां वाक्यसमूह अर्थ रहित हो वह अपार्थक निग्रहस्थान है।)


अप्राप्तकाल

अवयवविपर्यासवचनमप्राप्तकालम्। ५.२.११

अनुमान प्रमाण के अवयवों (प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन) को उलट पुलट क्रम में कहना (उनकी प्राप्ति का क्रम न होते हुए कहना) अप्राप्तकाल निग्रहस्थान है।

चर्चा में वादी प्रतिवादी के बोलने का भी एक क्रम है। वादी को पहले प्रतिज्ञा दे कर उसके लिए हेत्वाभास से मुक्त हेतु देना चाहिए, फिर प्रतिवादी को वादी के हेतु का खंडन करके स्वयं की प्रतिज्ञा और हेतु रखने चाहिए। वादी फिर स्वयं का हेत्वाभास के आरोप से उद्धार कर के प्रतिवादी का खंडन कर सकता है यह प्रक्रिया निर्णय होने तक चलेगी। इस क्रम को तोडते हुए बोलना भी अप्राप्तकाल निग्रहस्थान है।


न्यून

हीनमन्यतमेनाप्यवयवेन न्यूनम्। ५.२.१२

पाँच अवयवों में से किसी का प्रयोग न करने से न्यून निग्रहस्थान बनता है। (वैसे यह formal setting में होगा, informal चर्चा जो वाद रूप में हो रही हो उसमें तीन अवयव से काम चल सकता है।)

अधिक

हेतूदाहरणाधिकमधिकम्। ५.२.१३

एक से अधिक हेतु अथवा उदाहरण देना अधिक निग्रहस्थान है।

चर्चा के प्रारंभ में एक से अधिक हेतु उदाहरण दे सकते है की नहीं उस के लिए नियम बनाकर उसके अनुरूप अधिक निग्रहस्थान की प्राप्ति हो रही है अथवा नहीं यह देख सकते है। यदि एक से अधिक हेतु उदाहरण का निषेध न किया गया हो तो उसको निग्रहस्थान नहीं मानेंगे।


पुनरुक्त
 
शब्दार्थयोः पुनर्वचनं पुनरुक्तमन्यत्रानुवादात्। ५.२.१४

प्रयोजन सहित के पुनःकथन रूप अनुवाद को छोडकर एक ही शब्द को एक ही अर्थ कहने के लिए फिर से कहना पुनरुक्त निग्रहस्थान है।

एक बार कहने से अर्थ समझ में आ जाने पर भी वही अर्थ को पुनः कहने का चर्चा में कोई औचित्य नहीं है। 'शब्द अनित्य है। शब्द अनित्य है।' कहना पुनरुक्त निग्रहस्थान में ले जाएगा (और 'शब्द अनित्य है। ध्वनि विनाश धर्म वाला है।' कहना भी)। परंतु एक ही शब्दों को प्रतिज्ञा और निगमन में दोहराना निग्रहस्थान नहीं बनेगा। क्योंकि वहाँ प्रयोजन भिन्न भिन्न है। प्रतिज्ञा में जहां वह सिद्धांत रखा जा रहा है जिसे सिद्ध करना है, निगमन में वह सिद्धांत है जो सिद्ध किया गया है।

पुनरुक्त निग्रहस्थान का दूसरा प्रकार अगले सूत्र में,

अर्थादापन्नस्य स्वशब्देन पुनर्वचनं पुनरुक्तम्। ५.२.१५

प्राप्त अर्थ को शब्द से पुनः कहना भी पुनरुक्त निग्रहस्थान है।

शब्दों का प्रयोजन अर्थ की प्राप्ति करवाना होता है। चर्चा में जब कोई अर्थ अन्य बातों से स्पष्ट हो ही चुका हो तब उस अर्थ को पुनः शब्दों से कहना भी पुनरुक्त निग्रहस्थान बनेगा।


अननुभाषण

विज्ञातस्य परिषदा त्रिरभिहितस्याप्यप्रत्युच्चारणमननुभाषणम्। ५.२.१६

परिषदने जाना हुआ तीन बार कहे हुए विषय का भी कोई उत्तर न देना अननुभाषण निग्रहस्थान है।

प्रतिवादी ने अपने पक्ष की स्थापना की है जो परिषद को समझ में आई है, उत्तर न मिलने पर प्रतिवादीने अपनी बात तीन बार कही है फिर भी यदि वादी (जो बात को समझ पा रहा है पर) उसका कोई उत्तर देता ही नहीं है तो उसे अननुभाषण कहेंगे। 


अज्ञान

अविज्ञातं चाज्ञानम्। ५.२.१७

और विषय को समझ ही न पाना अज्ञान निग्रहस्थान है।

प्रतिवादी ने अपने पक्ष की स्थापना की है जो परिषद को समझ में आई है, प्रतिवादी ने अपनी बात तीन बार कही है फिर भी यदि वादी बात को समझ ही नहीं पा रहा है तब वह अज्ञान निग्रहस्थान में आयेगा।

अप्रतिभा

उत्तरस्याप्रतिपत्तिरप्रतिभा। ५.२.१८

उत्तर का न सूझना अप्रतिभा निग्रहस्थान है।

प्रतिवादी ने क्या कहा है वह समझने और अपनी समझ ठीक है यह दिखाते हुए प्रतिवादी के पक्ष को दोहराने के बाद (जिसे अनुवाद कहते है। सामने वाले का खंडन करते समय पहले उसके पक्ष को दोहराते है जिससे उसके पक्ष को सही समझे है वह स्पष्ट हो।) उसका कोई उत्तर (खंडन) न सूझने से वादी अप्रतिभा निग्रहस्थान में आ जाता है।

रविवार, 9 अक्टूबर 2022

निग्रहस्थान : प्रतिज्ञाहानि प्रतिज्ञान्तरं प्रतिज्ञाविरोध प्रतिज्ञासंन्यास हेत्वन्तर अर्थान्तर निरर्थक अविज्ञातार्थ

पाँचवें अध्याय के दूसरे आह्निक में अब हम सोलह पदार्थों में से अंतिम निग्रहस्थान देखेंगे। निग्रहस्थान वह स्थान है जहां पराजय होता है (जहां प्रतिपक्ष निग्रहस्थान में पहुँचने वाले पक्ष को अपनी पकड में ले लेता है।)

प्रथम अध्याय में हमने निग्रहस्थान का लक्षण देखा था।

विप्रतिपत्तिरप्रतिपत्तिश्च निग्रहस्थानम्। १.२.१९

(विप्रतिपत्ति) विरुद्धज्ञान से कथन कर देना (अनुचित/गलत/नियम विरुद्ध कथन करना) अथवा (अप्रतिपत्ति) अज्ञानता वश चुप रह जाना (बात को समझ न पाना/ समझा न पाना) निग्रहस्थान है।


निग्रहस्थानों के २२ विभाग है जो प्रथम सूत्र में कहें है।

प्रतिज्ञाहानिः प्रतिज्ञान्तरं प्रतिज्ञाविरोधः प्रतिज्ञासंन्यासो हेत्वन्तरमर्थान्तरं निरर्थकमविज्ञातार्थमपार्थकमप्राप्तकालं न्यूनमधिकं पुनरुक्तमननुभाषणमज्ञानमप्रतिभा विक्षेपो मतानुज्ञा पर्यनुयोज्योपेक्षणं निरनुयोज्यानुयोगोऽपसिद्धान्तो हेत्वाभासाश्च निग्रहस्थानानि। ५.२.१

प्रतिज्ञाहानि प्रतिज्ञान्तरं प्रतिज्ञाविरोध प्रतिज्ञासंन्यास हेत्वन्तर अर्थान्तर निरर्थक अविज्ञातार्थ अपार्थक अप्राप्तकाल  न्यून अधिक पुनरुक्त अननुभाषण अज्ञान अप्रतिभा विक्षेप मतानुज्ञा पर्यनुयोज्योपेक्षण निरनुयोज्यानुयोग अपसिद्धान्त  हेत्वाभास ये निग्रहस्थान है।


नीचे निग्रहस्थानों का अर्थ मात्र दिया है। वर्तमान उदाहरण, जहां मिल सकेंगे वहाँ हम सभी के अर्थ देखने के बाद देखेंगे।

प्रतिज्ञाहानि
प्रतिदृष्टान्तधर्माभ्यनुज्ञा स्वदृष्टान्ते प्रतिज्ञाहानिः। ५.२.२
स्वपक्ष में परपक्ष के (साध्य)धर्म का स्वीकार प्रतिज्ञाहानि नाम का निग्रहस्थान है।

प्रतिज्ञान्तर
प्रतिज्ञातार्थप्रतिषेधे धर्मविकल्पात्तदर्थनिर्देशः प्रतिज्ञान्तरम्। ५.२.३
प्रतिज्ञा के अर्थ के प्रतिषेध के उपरांत खंडित हुई प्रतिज्ञा में कोई विशेषण जोडकर अन्य अर्थ प्रस्तुत करना प्रतिज्ञान्तर निग्रहस्थान है।

प्रतिज्ञाविरोध
प्रतिज्ञाहेत्वोर्विरोधः प्रतिज्ञाविरोधः। ५.२.४
प्रतिज्ञा तथा हेतु का परस्पर विरोध होने से प्रतिज्ञाविरोध निग्रहस्थान बनता है।

प्रतिज्ञासंन्यास
पक्षप्रतिषेधे प्रतिज्ञातार्थापनयनं प्रतिज्ञासंन्यासः। ५.२.५
प्रतिज्ञा के प्रतिषेध के उपरांत खंडित हुई प्रतिज्ञा को छिपाना प्रतिज्ञासंन्यास है।

हेत्वन्तर
अविशेषोक्ते हेतौ प्रतिषिद्धे विशेषमिच्छतो हेत्वन्तरम्। ५.२.६
अविशेष हेतु के खंडित होने पर हेतु में विशेषण देने का प्रयत्न हेत्वन्तर निग्रहस्थान है।

अर्थान्तर
प्रकृतादर्थादप्रतिसम्बद्धार्थमर्थान्तरम्। ५.२.७
प्रकृत अर्थ की उपेक्षा कर के असंबद्ध अर्थ का कथन अर्थान्तर निग्रहस्थान है।

निरर्थक
वर्णक्रमनिर्देशवन्निरर्थकम्। ५.२.८
वर्णक्रम का उच्चारण जैसे कोई अर्थ को लिए हुए नहीं होता ऐसे निरर्थक प्रलाप करना निरर्थक निग्रहस्थान है।

अविज्ञातार्थ
परिषत्प्रतिवादिभ्यां त्रिरभिहितमप्यविज्ञातमविज्ञातार्थम्। ५.२.९
तीन बार बोलने पर भी यदि परिषद अथवा प्रतिवादी क्या कहा है न समझ पाए (उनको समझ या सके ऐसे स्पष्ट, प्रसिद्ध शब्दों में बोलने में तीन प्रयत्न पर भी असफल रहें) तब बोलने वाला अविज्ञातार्थ निग्रहस्थान में आता है। (अपनी बात कहने के लिए अप्रसिद्ध, क्लिष्ट अथवा अस्पष्ट शब्द जो किसी को समझ न आए का उपयोग bug है feature नहीं)

गुरुवार, 22 सितंबर 2022

५.१.३२-५.१.४३

अंतिम तीन जाति प्रयोगों के नीचे मात्र अर्थ दिए है। उन तीनों को भी हम वितंडा में प्रयोग हो सकने वाले प्रयोग के रूप में देख सकते है जहां जातिवादी स्वयं का कोई पक्ष स्थापित नहीं कर रहा मात्र वादी के खंडन का प्रयत्न कर रहा है। 

अनित्यसम प्रतिषेध
साधर्म्यात्तुल्यधर्मोपपत्तेः सर्वानित्यत्वप्रसङ्गादनित्यसमः। ५.१.३२ 

साधर्म्य से यदि तुल्य धर्म की सिद्धि होती हो तो सब (सभी व्याप्ति के?) अनित्य होनेका प्रसंग बनेगा कहना अनित्यसम प्रतिषेध है।

उत्तर

साधर्म्यादसिद्धेः प्रतिषेधासिद्धिः प्रतिषेध्यसाधर्म्यात्च। ५.१.३३ 

साधर्म्य से असिद्धि होती हो प्रतिषेध की भी असिद्धि होगी प्रतिषेध्य के साथ कोई न कोई साधर्म्य होने से।

दृष्टान्ते च साध्यसाधनभावेन प्रज्ञातस्य धर्मस्य हेतुत्वात्तस्य चोभयथाभावान्नाविशेषः। ५.१.३४ 

दृष्टान्तमें साध्यसाधनभावसे ज्ञात धर्मके साधर्म्य अथवा वैधर्म्य से हेतुत्व होने से वह अविशेष नहीं है।
(साधर्म्य अथवा वैधर्म्य से सिद्धि मात्र वहाँ होती है जहां साध्यसाधनभाव व्याप्ति ज्ञात है इस लिए उसमें हेतुत्व है। कोई भी दो धर्मों के समान वह नहीं है।)

नित्यसम प्रतिषेध

नित्यमनित्यभावादनित्ये नित्यत्वोपपत्तेर्नित्यसमः। ५.१.३५ 

अनित्यमें अनित्यत्व नित्य होने से नित्य की सिद्धि होती है कहना नित्यसम प्रतिषेध है। / नित्य में अनित्यत्व की अथवा अनित्य में नित्यत्व की भावना करना नित्यसम प्रतिषेध है।

उत्तर

प्रतिषेध्ये नित्यमनित्यभावादनित्येऽनित्यत्वोपपत्तेः प्रतिषेधाभावः। ५.१.३६ 
जिसका प्रतिषेध किया जा रहा है उसमें नित्य अनित्यत्व है (वह हमेशा अनित्य है) कहने से उसके अनित्यत्व की सिद्धि होती है।
 
कार्यसम

प्रयत्नकार्यानेकत्वात्कार्यसमः। ५.१.३७ 
प्रयत्न से अनेक प्रकार के कार्य होते है ऐसा कहना कार्यसम प्रतिषेध है।

उत्तर

कार्यान्यत्वे प्रयत्नाहेतुत्वमनुपलब्धिकारणोपपत्तेः। ५.१.३८ 
प्रयत्न से अन्य कार्य हो सकने पर भी प्रयत्न का हेतुत्व सिद्ध होता है (प्रयत्न के अभाव में कार्य की) अनुपलब्धि का कोई कारण न होने से।



यदि एक पक्ष ने असत् तर्क दे भी दिया तो भी चर्चा में अन्य पक्ष को हमेशा सत् उत्तर ही देना चाहिए नहीं तो चर्चा निरर्थक हो जाएगी और अनेक पक्ष उत्पन्न हो जाएंगे यह समझाते हुए नीचे के सूत्र है।
 
प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः। ५.१.३९ 
सर्वत्रैवम्। ५.१.४० 
प्रतिषेधविप्रतिषेधे प्रतिषेधदोषवद्दोषः। ५.१.४१ 
प्रतिषेधं सदोषमभ्युपेत्य प्रतिषेधविप्रतिषेधे समानो दोषप्रसङ्गो मतानुज्ञा। ५.१.४२ 
स्वपक्षलक्षणापेक्षोपपत्त्युपसंहारे हेतुनिर्देशे परपक्षदोषाभ्युपगमात्समानो दोषः। ५.१.४३ 


यदि प्रतिवादी जाति प्रयोग करें तब भी चर्चा ऐसे चलनी चाहिए।

प्रथम पक्ष : सद् हेतु द्वारा स्थापना
द्वितीय पक्ष : जाति प्रयोग
प्रथम पक्ष :  जाति प्रयोग को दिखाकर स्वयं के पक्ष का रक्षण

न की ऐसे।

प्रथम पक्ष : स्थापना
द्वितीय पक्ष : जाति प्रयोग
प्रथम पक्ष :  जाति प्रयोग का उत्तर अन्य जाति प्रयोग से (तृतीय पक्ष)
द्वितीय पक्ष : तृतीय पक्ष जाति प्रयोग है ऐसा विरोध (चतुर्थ पक्ष)
प्रथम पक्ष : स्वयं के पक्ष में जो दोष है वही दूसरे में दिखाना मतानुज्ञा निग्रहस्थान है ऐसा बताना। (पाँचवा पक्ष)
द्वितीय पक्ष : प्रथम पक्ष ने भी जब दोषपूर्ण उत्तर दिया है (तृतीय पक्ष में) तब यही बात उसे भी लागू होती है। (छठा पक्ष)

ऐसे असत् उत्तर का भी सत् उत्तर द्वारा निराकरण करने के बदले यदि असत् उत्तर से जवाब दिया जाए तो बात उलझ जाएगी और कोई निष्कर्ष नहीं निकलेगा।


इस के साथ पाँचवें अध्याय का प्रथम आह्निक समाप्त होता है।

अनुपलब्धिसम

तदनुपलब्धेरनुपलम्भादभावसिद्धौ तद्विपरीतोपपत्तेरनुपलब्धिसमः। ५.१.२९

अनुपलब्धि की प्राप्ति न होने से उससे विरुद्ध की सिद्धि होती है ऐसा कथन अनुपलब्धिसम प्रतिषेध है।

प्रतिवादी वादी से कहता है की आप का कहना है की कोई वस्तु नहीं है तो उसकी अनुपलब्धि दिखाओ। यदि अनुपलब्धि की प्राप्ति नहीं दिखा सकते तो सिद्ध होता है की वह है।

उत्तर

अनुपलम्भात्मकत्वादनुपलब्धेरहेतुः। ५.१.३०

अभाव की अनुपलब्धि ही होती है। किसी वस्तु का अस्तित्व और नास्तित्व दोनों साथ में नहीं हो सकते।

ज्ञानविकल्पानां च भावाभावसंवेदनादध्यात्मम्। ५.१.३१ 

किसी विषय के ज्ञान का होना न होना आत्मा को मन के द्वारा प्रत्यक्ष होता है।

इस जाति को सीधे सीधे व्यवहार में लाना क्लिष्ट लग सकता है पर थोडी पूर्व तैयारी के साथ खेल खेल जाए तो आधी दुनिया को आर्थिक सामाजिक शासकीय परितापों से बचने के लिए जातिवादी का उत्पाद अभाव की प्राप्ति को दिखाने के लिए उपयोग करने पर बाध्य किया जा सकता है यह हमें अब प्रत्यक्ष है।


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पीछे मैंने यह तर्क रखा था।

"जाति प्रयोग तर्क के वह प्रयोग है जो प्रमाण तक नहीं पहुंचाते। तर्क के प्रमाण तक न पहुंचा पाने के पीछे अपूर्ण तर्क, प्रमाणों से विसंगतता, अप्राप्त प्रमाण जैसे कारण रहते है जो जाति प्रयोगों में देखने मिलते है। परंतु जाति प्रयोग का अस्तित्व उस बात का सूचक है की वे सद् उत्तर जैसे लग सकते है। यदि उनके सफल होने की कोई संभावना ही न होती तो वह प्रयोग में ही न आते। क्योंकि जो तर्क कभी भी सद् उत्तर न बन पाए वह सद् उत्तर जैसा कभी लग भी नहीं सकता। इससे हम स्वयं की जाति समझ की एक परीक्षा कर सकते है। क्या हम ऐसे उदाहरण देख सकते है जहां जाति लक्षण (जिस तर्क को जाति का लक्षण बताया गया है) वादी की व्याप्ति का खंडन करता हो। (P.S. जाति प्रकरण के अंत में इसे संशोधित करेंगे। क्योंकि इस तर्क में त्रुटि, अपूर्णता है।)"

जब मैंने यह तर्क रखा था तब मेरी धारणा यह थी की जातिवादी के सिवाय अन्य सभी सत्यनिष्ठ और स्वाध्यायशील अधिक नहीं तो कम अंश में तो है ही। अर्थात वो स्वयं का हित देखने के लिए यथा शक्ति पुरुषार्थ करेंगे। परंतु मेरी वह धारणा वास्तविकता से मेल नहीं खाती यह स्पष्ट है। और यह उन जाति प्रयोगों के निरंतर बने रहने से भी स्पष्ट है जिसमें सत्य तक पहुंचाने का दिखवा मात्र भी नहीं है - जो वितंडा में प्रयोग में लाए जाने वाले प्रयोग अधिक लगते है। ऐसे प्रयोग सफल इस लिए नहीं होते क्योंकि उन जैसे प्रयोग अन्यत्र सत्य तक पहुंचाने की क्षमता रखते है अपितु इस लिए होते है की वह सामने वाले की अस्वाध्यायशीलता और अन्य निर्बलताओ का दक्षता से उपयोग करते है।
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गुरुवार, 15 सितंबर 2022

उपलब्धिसम

निर्दिष्टकारणाभावेऽप्युपलम्भादुपलब्धिसमः। ५.१.२७

निर्दिष्ट कारण के अभाव में भी कार्य होता है ऐसी त्रुटि दिखना उपलब्धिसम प्रतिषेध है।

उत्तर
कारणान्तरादपि तद्धर्मोपपत्तेरप्रतिषेधः। ५.१.२८

यदि अन्य कोई कारण से भी कार्य होता है तो वह निर्दिष्ट कारण से नहीं होता यह सिद्ध नहीं करता।

निर्दिष्ट कारण से कार्य नहीं नहीं हो रहा यह दिखाने के लिए जहां निर्दिष्ट कारण नहीं है तब भी कार्य की प्राप्ति हो रही है ऐसा तब दिखाना संभव होता है जब अन्य कारणों से भी वह कार्य होता है।

इस जाति का प्रयोग उन प्रसंगों में अधिक सरल रहता है जहां कार्य न मात्र एक से अधिक कारणों से सम्पन्न हो सकता हो पर कोई भी कारण अकेले अथवा अबाधित रूप से कार्य न करता हो अथवा कारण कार्य के साथ ही हमेशा स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो ऐसा अनिवार्य न हो। जिससे कौन से कारण से कार्य हुआ है उसमें संदेह उत्पन्न करना कुछ सरल रहे।

यह परिस्थितियाँ कुछ ऐसी ही है जैसी परिस्थितियों में अहेतुसम का प्रयोग सरल था। अन्य कारणों की भी कार्य के साथ की व्याप्ति अथवा व्याप्ति की संभावना जातिवादी का काम सरल बनाती है।

ध्यान देने की बात यह है की यहाँ जातिवादी का प्रयत्न अन्य कोई कारण की सिद्धि के लिए नहीं है, वह अन्य कारणों के होने की संभावना (=निर्दिष्ट कारण के अभाव में कार्य का होना) निर्दिष्ट कारण के खंडन के लिए मात्र आगे कर रहा है। उसका स्वयं का कोई ऐसा पक्ष नहीं है की कार्य किस कारण से हो रहा है।

व्यवहार में कोई कार्य के अनेक कारणों (कुछ सत्य, कुछ काल्पनिक) का प्रचार करके और वादी के निर्दिष्ट कारण को जितना हो सके उस कोलाहल में दबा देने से जन सामान्य को स्वयं ही इस जाति प्रयोग के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

अविशेषसम उपपत्तिसम

एकधर्मोपपत्तेरविशेषे सर्वाविशेषप्रसङ्गात्सद्भावोपपत्तेरविशेषसमः। ५.१.२३ 

साध्य और दृष्टांत में एक धर्म (साधन धर्म) होने से साध्य धर्म की सिद्धि होती हो तो सत्ता (होना) धर्म तो सब में है इस लिए सब में साध्य धर्म की सिद्धि होती है ऐसा प्रतिषेध अविशेषसम प्रतिषेध है।

उत्तर

क्वचित्तद्धर्मोपपत्तेः क्वचिच्चानुपपत्तेः प्रतिषेधाभावः। ५.१.२४
 
साथ में दिखने वाले प्रत्येक दो धर्म व्याप्ति लिए हुए नहीं होते। कोई दो धर्म के बीच व्याप्ति होती है तो कोई के बीच नहीं होती।

सुतर्क जैसे लगने वाले अपूर्ण तर्क, कुतर्क, तर्कहीनता से होते होते हम इसके पूर्व की जाति में almost बकवास कहा जा सके ऐसी दलील तक पहुँच गए थे। इसके नीचे क्या हो सकता है?

.. जहां होना मात्र साधन धर्म का काम करता है?

जो विद्यार्थी पाठ्यक्रम को समझे है वो उत्तीर्ण होंगे। -> सारे बच्चे उत्तीर्ण होंगे।

जो विषय को बहुत अच्छे से समझे है वे उच्च श्रेणी में उत्तीर्ण होंगे। -> सब उच्च श्रेणी में उत्तीर्ण होंगे।

काम के अनुरूप वेतन मिलेगा। -> कोई भी काम हो एक सा वेतन। -> काम करो न करो वेतन।

रोगी के अनुसार दवा होगी। -> सभी रोगी को एक ही दवा। -> सभी को (रोगी हो न हो) एक ही 'दवा'।

(उपचार के लिए) आतुर का परीक्षण, उपचार। -> सांस लेती हुई प्रत्येक वस्तु का 'परीक्षण, उपचार'।


उपपत्तिसमा जाति
 
उभयकारणोपपत्तेरुपपत्तिसमः। ५.१.२५

दोनों के कारणों की उपपत्ति है ऐसी दलील उपपत्तिसमा जाति है।

आपकी बात सच है पर मेरी बात (जो आपकी बात से विपरीत है वह) भी सत्य है ऐसी दलील उपपत्तिसमा जाति है।

उत्तर

उपपत्तिकारणाभ्यनुज्ञानादप्रतिषेधः। ५.१.२६

वादी के कहे गए उपपत्ति के कारण को मान लेने पर उसका खंडन नहीं होता। (जब सामने वाले की बात सत्य स्वीकार कर ली गई है तो न तो उसका खंडन होता है न उसको स्वीकार करने वाले विरोधी की बात की सिद्धि।)

इसके विस्तार की कोई आवश्यकता नहीं है पर इस पर ध्यान आकर्षित करना चाहूँगी की परस्पर विरोधी बातों का समर्थन करने वाले को न्यायदर्शनकार ने इस क्रम पर रखा है।

मंगलवार, 6 सितंबर 2022

जाति प्रयोग सफल क्यों/कब होते है?, अर्थापत्तिसमा जाति

प्रश्न फिर से यही रहता है की ये कुतर्क अथवा उससे भी बुरी परिस्थिति, जहां दलील तर्क जैसी लगनी भी कम हो गई है, ऐसे सारे उत्तर अस्तित्व में बनें क्यों रहते है? इतनी हद तक की वे गौतम ऋषि के समय से पहले भी इतने प्रचलित थे की उन्होंने इस शास्त्र में स्थान पाया और आज भी हम आपने आस पास इन्हीं का राज चलते देख सकते है।

इसका जवाब ढूंढना है तो हमें जातिवादी से ध्यान हटाकर उनपर केंद्रित करना होगा जिन्हें जातिवादी प्रभावित करना चाह रहा है (उसका प्रतिवादी, न्यायाधीश अथवा श्रोतागण, जन सामान्य)। यह देखना सरल ही है की वो लोग जितने सत्यग्राही, स्वाध्यायशील, विद्यावान और सजग होंगे उतना ही कुतर्कों का चलना असंभव सा होने लगता है तो ऐसी दलीलें जहां तर्क का दूर दूर तक कोई लेना देना ही न हो वह तो एक क्षण भी नहीं टिकेंगे। और फिर भी कुतर्क और तर्कहीनता चलती है, चलती ही रहती है। इसका अर्थ यह है की जब समाज अथवा व्यक्ति का पतन होता है तब उनके सोचने की शक्ति और रीति में आने वाले बदलाव हमेशा से एक से रहे है (ऐसा होना expected भी है)। और यह की हम आज के समय को कितना ही भला बुरा कहें, ईश्वर की इस दुनिया में कोई वस्तु पहली बार नहीं होती।

अब मैं यहां समाज और व्यक्ति के behavioural patterns पर कोई चर्चा प्रारंभ करना नहीं चाहती, न ही मेरी कोई योग्यता है ऐसी कोई चर्चा के लिए, पर देखने का प्रयत्न करते है की पिछली दो और अर्थापत्तिसमा जाति का प्रयोग क्यों व्यवहार में बना रहता है? कौन इसे सच मान सकते है? तात्पर्य यहां यह नहीं है की इनका प्रत्येक प्रयोग चलता है अथवा सभी पर चलता है। इन के शिकंजे में फंसने वाले भी न तो सभी जातियों में फँसते है न किसी जाति के प्रत्येक प्रयोग में। पर इन जातियों को इतना खुराक कहीं न कहीं मिलता रहता है की वे बनी रहे।

प्रकरणसम : यह वितंडा में प्रवेश करने वाली पहली जाति थी। पक्ष न होते हुए (स्वयं के पक्ष की स्थापना का सामर्थ्य न रखते हुए) भी वैतंडिक ने अभी तर्क का दिखावा नहीं छोडा है। इसमें फँसने वाले लोग सोच सकते है की वादी के पक्ष में वो धर्म नहीं होगा तभी तो प्रतिपक्ष स्वयं के पक्ष में दिखा रहा है अथवा वादी के पक्ष में कोई धर्म होगा तभी तो प्रतिपक्ष स्वयं के पक्ष में उसका न होना बता रहा है। इतना सोच कर यदि वो इतने स्वाध्यायशील नहीं है की प्रमाणों को देखे तो जातिवादी की बातों में आ सकते है। और व्यवहार में यदि कोई वांछनीय धर्म बिना पुरुषार्थ से, मात्र जातिवादी को सिद्ध मान कर मिल जाता है (ऐसा लगता है की मिल जाता है) तो क्यों नहीं? 

अहेतूसम : यहां वैतंडिक ने वैतंडिक न दिखने का प्रयत्न भी छोड दिया है। कोई हेतु ही नहीं इसलिए तुम गलत हो कह कर बैठ गया है। फिर भी यह उत्तर न्यायदर्शनकार के समय से ले कर आज तक चलता आ रहा है। यह मुझे मुख्य तीन प्रकार से काम करता लगता है।

१) "बिना हेतु के तो कार्य होता नहीं, अर्थात् जब हेतु ही नहीं है तो कार्य भी नहीं है।" ऐसा सोचकर लोग कार्य की असिद्धि समझ ले। जैसे बहुत से समाचार को हम fake news इस लिए कहते है की हमें निश्चय है की त्रिकाल में इस का कोई हेतु ही नहीं है। (और फिर "कार्य है तो कारण तो होगा ही" का उपयोग करने के लिए fake news होते भी है। अर्थात् गो की सिद्धि गोत्व से ही होगी, कूबड़, सिंग से नहीं। कौन से news fake है और कौन से नहीं उसका निश्चय उनकी सत्यता जानकार ही होगा, बिना प्रमाणों के तर्क/साधर्म्य मात्र से नहीं।)

२) बिना हेतु के तो कार्य होता नहीं, अर्थात् वादी का दिया हेतु है ही नहीं तो अन्य कोई हेतु होगा। और इससे वादी का खंडन तो होता ही है। (ध्यान रहे की प्रतिवादी ने अन्य कोई हेतु नहीं रखा है, पर जाति के शिकार होने वाले ने गलत अर्थापत्ति से यह अर्थ निकाला है।)

३) जातिवादी की विजय में जाति के शिकार को अपना कोई न कोई लाभ दिखता है तो वे उस बात को मानने के लिए ज्यादा उत्सुक रहते है न की क्यों मनानी है/सच क्या है यह सोचने में।

अर्थापत्तिसम : अर्थापत्तिसमा जाति क्यों व्यवहार में बनी रहती है यह देखने से पहले देखते है वह जाति है क्या।

अर्थापत्तितः प्रतिपक्षसिद्धेरर्थापत्तिसमः। ५.१.२१

अर्थापत्ति के आभास से ही प्रतिपक्ष की सिद्धि (पक्ष का खंडन) मानने से अर्थापत्तिसम प्रतिषेध बनता है। 

किसी वस्तु के कथन से न कही हुई वस्तु का भी अर्थ निकल आ सकता है। जैसे किसी ने कहा आज राम को ऑफिस में बहुत देर तक बैठना पडा। इस में से यह अर्थ भी निकलता है की प्रतिदिन उसे इतनी देर तक नहीं बैठना पड़ता। पर जब कोई किसी के कथन से मनचाहा अर्थ निकालने लगे और यह जताये की अर्थापत्ति से यह सिद्ध होता है तब वह अर्थापत्तिसम प्रतिषेध बनता है।

जैसे उपर के उदाहरण में कोई कहे की आप के कथन अनुसार राम को छोड़कर दुनिया में आज किसी को ऑफिस में देर तक बैठना नहीं पडा तब ऐसी तोड मरोड के बनाई गई अर्थापत्ति से कोई खंडन नहीं होता।

यदि अहेतुसम शुद्ध वितंडा लगा था क्योंकि जातिवादी ने स्वयं के पक्ष की स्थापना का कोई प्रयत्न भी नहीं किया था तो यह तो उससे भी एक कदम आगे है। वहां कम से कम विरोध तो किया था, यहां तो वादी के पक्ष में से ही मनचाहा  अर्थ निकाल लिया।

इस का current real life उदाहरण फिर कभी। वैसे इस समय में कौन उससे अपरिचित होगा? 

उत्तर

अनुक्तस्यार्थापत्तेः पक्षहानेरुपपत्तिरनुक्तत्वादनैकान्तिकत्वाच्चार्थापत्तेः। ५.१.२२ 

न कहे गए का कोई भी अर्थ निकालने से यदि अर्थापत्ति होती तो अनेक विभिन्न अर्थ निकल सकते है (अनैकांतिक बन सकता है) और कोई भी पक्ष का खंडन उपलब्ध होने लगेगा।

अब वह सवाल की ये जाति प्रचलन में रहती कैसे है? जो पहली वस्तु दिमाग में आती है वह यह है की बिना सोचने की जहमत लिए यदि कोई क्लिष्ट विषय को भी समझने का दावा करने मिलता है तो मुफ़्त के पांडित्य को ना न कह पाने वाले बहुत से लोग मिल जाएंगे। वैसे और भी कारण होंगे, सोच पाने पर फिर लिखूँगी।

ऊपर जो उदाहरण मैंने अनकहा छोड दिया था उसमें तो कम से कम यही मुख्य कारण लगा मुझे। जहां एक और अति गंभीर अध्ययन करने वाला प्रामाणिक विशेषज्ञ (वादी) यह कर रहा था की जब वह हमारे शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र कैसे काम करता है उसके बारे में सोचता है तो उसके रोंगटे खडे हो जाते है उतना अद्भुत वह लगता है, वहीं एक सामान्य मनुष्य ने (जातिवादी के शिकार ने) उस प्रतिरक्षा तंत्र को उस दुश्मन के सामने भी, जिसको वह हरा चुका है, सर्वथा सामर्थ्यहीन सिद्ध कर दिया था। यह कहकर की "antibody" ३-४ महीने से ज्यादा नहीं टिकते। (अर्थापत्ति यह थी की वे ३-४ महीने दिखते है इस का अर्थ है उसके बाद तंत्र का कोई सामर्थ्य नहीं रहा।)

सोमवार, 5 सितंबर 2022

अहेतुसम प्रतिषेध

अहेतुसम प्रतिषेध

त्रैकाल्यानुपपत्तेर्हेतोरहेतुसमः। ५.१.१८

तीनों काल में कहीं हेतु की सिद्धि नहीं है ऐसा प्रतिषेध अहेतुसम प्रतिषेध है।

okay, इस जाति का अर्थ समझने में मैंने देखते ही हार सी मान ली थी। ऐसा कैसा जवाब? त्रिकाल में कोई हेतु नहीं है? ऐसे कैसे कोई हाथ खडे कर सकता है? और तभी कुछ ऐसी दलीलें जो वस्तुतः यही कहती हो की इस कार्य का हेतु तो त्रिकाल और त्रिलोक कहीं भी नहीं मिलेगा कान में गूंजने लगी।

आप को ये मधुमेह उच्च रक्तचाप जैसे रोग हुए है जिनका कारण जीवनशैली होती है।
- पर इन का कोई हेतु ही नहीं है। हमारे आहार विहार में तो इतनी भी गड़बड़ कभी भी नहीं रही। हम तो इतने जागरूक और व्यवस्थित है।

आप का बेटा इतनी छोटी आयु में इतना बिगड़ गया है। कहीं न कहीं उसके संस्कार में चूक रह गई है।
- पर हमने तो हमारे बेटे को हमेशा सर्वश्रेष्ठ संस्कार दिए है और सब प्रकार से उसे उच्च वातावरण ही प्रदान किया है। उसके बिगड़ने का तो त्रिकाल में कोई हेतु ही नहीं है।

और वो बंदूक ने किसी को मारा (अर्थात् किसी ने नहीं मारा) जैसे अनेक woke world जवाब।


यह प्रतिषेध हमें वहां मिलता है जहां जातिवादी स्वयं के पक्ष की कोई accountability fix नहीं होने देना चाहता।

यह वितंडा का शुद्ध स्वरूप है। वैतंडिक वादी को खंडित तो करना चाहता है पर कोई अन्य हेतु बताना भी नहीं चाहता, नहीं तो फिर उसे सिद्ध करने की झंझट गले पडेगी।

उत्तर 

न हेतुतः साध्यसिद्धेस्त्रैकाल्यासिद्धिः। ५.१.१९

साध्य की सिद्धि हेतु से ही होने के कारण त्रिकाल में उसकी असिद्धि नहीं हो सकती। 

प्रतिषेधानुपपत्तेश्च प्रतिषेद्धव्याप्रतिषेधः। ५.१.२०

प्रतिषेध की उत्पत्ति नहीं होने से प्रतिषेध योग्य का भी प्रतिषेध नहीं हो पाएगा।

अब तक के सारे उत्तरों में मुझे यह उत्तर सब से ज्यादा पसंद आए। basically, गौतम ऋषि ने जातिवादी को दिए जाने योग्य जवाब दिए है वो यह है।
१) (बकवास बंध करो,) हेतु का न होना नहीं होता।
२) हेतु है ही नहीं यह  कहोगे तो (तुम्हारे ऊपर सारे संभावित आरोप लग जायेंगे और उन में से किसी का भी स्वीकार नहीं करने से) तुम किसी भी आरोप का प्रतिषेध करने के लायक नहीं रहोगे।

वैसे जातिवादी भी यह जानता है और जहां उसे ऐसा वादी मिले जो इतना मूर्ख न हो जो बिना हेतु के कार्य हो गया मान ले तो किसी न किसी ऐसे हेतु को सर पर responsibility transfer करने का प्रयत्न करता है जिससे अपनी गलती न दिखे। जैसे जीवनशैली में दूसरों के द्वारा उत्पन्न तनाव मुख्य रहता है और बच्चे के बिगड़ने में समाज, मित्र, फिल्में जैसी वस्तुएं।

यदि एक वस्तु जो मुझे सबसे अधिक उपयोगी लगती है तो वो है 'यथा ब्रह्मांडे तथा पिण्डे' / 'यथा पिण्डे तथा ब्रह्मांडे'। इससे हम जाति के बाह्य प्रयोग को समझकर उसके आंतरिक प्रयोग को भी समझ सकते है और उससे बच सकते है। यदि हम अवांछनीय परिस्थिति में स्वयं को पाते है तो सत्य कारण तक पहुँचने के लिए प्रत्येक प्रयास करें और यदि वह कारण ऐसा मिलता दिखे की जिसको स्वीकार करने में हमें किसी भी कारण से कष्ट हो रहा है तो वह कारण (जिससे कष्ट हो रहा है उस) का प्रतिषेध करें, न की अवांछनीय परिस्थिति के हेतु का।

और यदि ऐसा करने में कठिनाई आ रही है तो गौतम ऋषि ने दिए हुए उत्तर याद करें। हमारे न मानने से कुछ नहीं होगा, यदि कार्य है तो कारण तो है ही। और यदि उसे नहीं मानेंगे तो तो उसका प्रतिषेध (सुधार के प्रयत्न) कैसे करेंगे? जो कार्य हो चुका है उसके हेतु का त्रिकाल में न होना सिद्ध करना भले ही असंभव हो पर वह वर्तमान तथा भविष्य दो काल में वह न रहें उसके प्रयत्न करने की शक्ति हम स्वयं से न छीने।

मेरी दृष्टि में सूत्र में त्रिकाल शब्द का उपयोग गौतम ऋषि की हमारे प्रति की अपार करुणा की और संकेत करता है। हम कभी इतना नीचे भी गिर जाए की स्वयं से वाद करने के स्थान पर जल्प भी नहीं वितंडा पर उतर आए तब भी, वो हमें याद दिलाते है की हेतु का त्रिकाल में निषेध नहीं हो सकता और हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करते है की क्या दो अथवा एक काल में ऐसा हो सकता है? क्या हम हेतु को स्वीकार कर, उसे मिटाकर परिस्थिति बदल सकते है?

प्रकरणसम प्रतिषेध

उभयसाधर्म्यात्प्रक्रियासिद्धेः प्रकरणसमः। ५.१.१६

दोनों से साधर्म्य से प्रकरण चालू रहने से प्रकरणसम प्रतिषेध होता है। 

जब प्रतिवादी वादी के पक्ष को खंडित करें ऐसा कोई कारण देने के बदले स्वयं के पक्ष की स्थापना ऐसे करता है जिससे वादी के पक्ष का भी साधर्म्य हो (अथवा दोनों का वैधर्म्य हो) दोनों पक्ष खडे रहते है और प्रकरण की समाप्ति नहीं होती अथवा तो वादी को खंडित करने के प्रयत्न में प्रतिवादी स्वयं के पक्ष का भी खंडन कर देता है। ऐसा उत्तर खंडन नहीं कर पता और यदि उसे खंडन के हेतु से दिया जाता है तब वह जाति बनता है।

इस के व्यावहारिक उदाहरण अभी खास सोच नहीं पा रही हूँ। पर एक उदाहरण हो सकता है। हम प्रायः यह दलील सुनते है की (चुनाव में) फलाने उम्मीदवार को मत मत दो क्योंकि वह भ्रष्ट है जब की दूसरा उम्मीदवार जिसका वादी विरोध कर रहा है वह भी भ्रष्ट ही होता है (और वादी उसकी दूसरी कोई खराबी के कारण विरोध कर रहा होता है)। (और प्रायः लोग ये स्वीकार करने से हिचकिचाते भी नहीं। वहां दलील यह होती है की कौन भ्रष्ट नहीं होता?)

यदि प्रतिवादी का यह हेतु मान लिया जाए की भ्रष्ट को मत नहीं देना चाहिए तो भी वादी का पक्ष सिद्ध होगा जिससे न प्रतिपक्ष रहेगा न प्रतिषेध बनेगा और यदि माने की भ्रष्ट तो सब होते है तब भी प्रतिपक्ष बनेगा नहीं।

कुछ पुस्तकों में इसे प्रकरणसम हेत्वाभास की भांति समझाया है जहां कारण विरुद्ध पर समान बल वाला होता है -जिनके ऐसा होने से प्रकरण का प्रारंभ हुआ था और फिर वही वस्तु हेतु के रूप में दे दी गई थी। (इस जाति के उदाहरण उसका subset बनेंगे पर वहाँ और प्रसंग भी हो सकते है जो इस जाति में नहीं लिए जा सकते)। पर मुझे ऊपर की व्याख्या तर्कसंगत लगी - इस सूत्र में साधर्म्य कहा भी गया है और उत्तर भी साधर्म्य वाले पक्ष में ठीक बैठता है।

उत्तर

प्रतिपक्षात्प्रकरणसिद्धेः प्रतिषेधानुपपत्तिः प्रतिपक्षोपपत्तेः। ५.१.१७

प्रतिपक्ष से प्रकरण की सिद्धि होने से (संशय बना रहने से) प्रतिपक्ष को स्वीकार किये जाने पर प्रतिषेध (वादी का खंडन) नहीं हो पाता।

क्योंकि प्रतिपक्ष अपनी स्थापना ऐसे धर्म को हेतु बनाकर कर रहा है जिसका प्रथम पक्ष से भी साधर्म्य (वैधर्म्य) है, यदि प्रतिवादी की बात स्वीकार कर ली जाए तो भी वादी का खंडन नहीं होता।

अब तक चर्चा में अधिकतर हम यही भाव से चले है की वादी प्रतिवादी दोनों में से एक का पक्ष सही है और एक का गलत। परंतु ऐसा भी हो सकता है की दोनों ही गलत हो। (और यह भी की दोनों ही सही हो? जैसे मानो कोई कुछ खरीदने के लिए कौन सा brand/model सही है यह निर्णय करना चाहता है। ऐसे में हो सकता है की उसकी आवश्यकता के लिए एक से अधिक models समान रूप से उपयुक्त हो।)। ऐसे दोनों सही/दोनों गलत वाले क्षेत्रों में यह जाति का प्रयोग मिलना अधिक संभव हो सकता है।

एक और बात ध्यान देने की है की जाति प्रयोग जल्प वितंडा में होता है। और जल्प में प्रयोग में आने वाली जातियाँ फिर भी तर्क का आधार लिए हुए लगती है पर जैसे जैसे प्रतिवादी वाद से जल्प और जल्प से वितंडा की और जाता है वहां तर्क से कुतर्क और तर्कहीनता दिखने लगती है।

साथ ही में प्रत्येक स्तर पर प्रतिवादी के लिए यह लाभदायक रहता है की वह स्वयं को जितना हो सके ऊंचा (सत्यप्रिय/तार्किक) दिखाए। इस दृष्टि से देखते हुए यह जाति वितंडा जल्प की सीमा पर खड़ी है। जातिवादी है तो वैतंडिक, उसका कोई पक्ष है ही नहीं, पर वह ऐसा दिखाने का प्रयत्न कर रहा है जैसे उसका कोई पक्ष है।

रविवार, 4 सितंबर 2022

संशयसम प्रतिषेध

सामान्यदृष्टान्तयोरैन्द्रियकत्वे समाने नित्यानित्यसाधर्म्यात् संशयसमः। ५.१.१४

सामान्य (दृष्टांत की जाति) और दृष्टांत के समान रूप से इंद्रियग्राह्य होने पर नित्य जाति और अनित्य दृष्टांत के समान धर्मों के कारण किया गया प्रतिषेध संशयसम प्रतिषेध है।

पहले की भांति नीचे का विस्तार मेरा किया है। भाष्य से मेल नहीं खाता।

सामान्य उसे कहते है जो विशेष (यहां हमारे दृष्टांत) की जाति हो। जैसे यदि दृष्टांत गौरी गाय है तो जाति गौ हुई। 

अब अनेक प्रसंगों में, जब हम कोई जाति से परिचित न हो तब यह होता है की हमें उन जाति के सारे सदस्य एक से लगे परंतु जो उनसे चिरपरिचित है उन्हें प्रत्येक सदस्य की भिन्नता अपने आप दृष्टिगोचर होगी। (कभी सोचा है की ये सारे चिनी जापानी लोग एक से तो लगते है उनमें से कौन कौन है यह कैसे कोई पहचानता होगा और उनसे पूछो तो वे भी हमें देखकर ऐसा ही कहते होंगे संभवतः)

अब जाति के सब सदस्यों में जाति के अनुरूप समान धर्म होते हुए भी प्रत्येक के विशेष धर्म भी होते है। पर जो विशेषज्ञ नहीं है उसके लिए उन विशेष धर्मों को देख पाना कभी कभी असंभव सा हो सकता है। (आप ने कभी पक्षीयों के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जनाने के स्तर पर रहते हुए उन में से अनेक की जाति (species) जनाने का प्रयत्न किया होगा तो आप से अधिक इस बात को किस ने भुगता, अर्थात् जाना होगा?)

यह बात medical imaging reports में भी देख सकते है। हमें सारे चित्र एक से लगेंगे जब की विशेषज्ञ उससे विशेष की सिद्धि कर सकता है। यहां तक की (कोई भी क्षेत्र में, मात्र मेडिकल क्षेत्र में नहीं) यदि विशेषज्ञ कहलाने वाला सच में सूक्ष्म ज्ञान नहीं रखता तो विशेष को सामान्य (normal) अथवा ऐसा विशेष जो वह नहीं है ऐसा समझ सकता है। ऐसे में प्रतिवादी को यदि दृष्टांत में मात्र सामान्य धर्म ही दिख रहे है तो उसका यह विरोध करना की विशेष सिद्ध नहीं होता अतार्किक नहीं लगता। परंतु इसी बात का लाभ जब विशेष धर्म दिख रहे हो तब भी यह सोचकर उठाने का प्रयत्न करना की वादी उसे नहीं दिखा पाएगा वह जाति प्रयोग बनेगा।

उत्तर
साधर्म्यात्संशये न संशयो वैधर्म्यादुभयथा वा संशयेऽत्यन्तसंशयप्रसङ्गो नित्यत्वानभ्युपगमाच्च सामान्यस्याप्रतिषेधः। ५.१.१४

समान धर्मों के कारण संशय होने पर भी वैधर्म्य के कारण संशय नहीं रहता। यदि जहां साधर्म्य और वैधर्म्य दोनों हो तब भी संशय किया जाए तब तो संशय नित्य बना रहेगा। (पर विशेष धर्म की उपस्थिति में भी मात्र) समान धर्मों के कारण संशय नहीं माना जाता इसलिए यह संशयसम प्रतिषेध खंडन करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

वादी को वह विशेष धर्म जो दृष्टांत (और साध्य) में है उन्हें दिखाकर इस का उत्तर देना चाहिए।

अनुत्पत्तिसम प्रतिषेध

अनुत्पत्तिसम प्रतिषेध

प्रागुत्पत्तेः कारणाभावादनुत्पत्तिसमः। ५.१.१२

(कार्य की) उत्पत्ति से पहले कारणों का अभाव था ऐसा आधार बनाकर जो (अयोग्य) प्रतिषेध किया जाता है वह अनुत्पत्तिसम प्रतिषेध है।

तथाभावादुत्पन्नस्य कारणोपपत्तेर्न कारणप्रतिषेधः। ५.१.१३ 

वैसा होने से उत्पन्न हुए के कारण की सिद्धि होने से कारण का प्रतिषेध नहीं हो सकता। 

भाष्य और पुस्तकें पूरी तरह एक तरफ रखकर मात्र सूत्र के आधार पर मैंने जो समझने का प्रयत्न किया है वह नीचे दिया है।

जहां कारण का संचय अनिश्चित काल तक होता है/वह सुषुप्त अवस्था में अनिश्चित काल तक/प्रत्यक्ष न होते हुए रह सकता है, और फिर कार्य दिखता है वहां इस जाति के प्रयोग के लिए सरलता बनती है।

ऐसे में जब कार्य दिखता है तब कार्य के निश्चित पूर्व में कारण उत्पन्न हुआ नहीं दिखता (जैसे ढोल बजाने से शब्द उत्पन्न होता है तब कारण-हाथों का ढोल से संयोग होना दिखता है) और वह जब संचित होता रहता है तब कार्य की निष्पत्ति नहीं होने से हो सकता है वह बिलकुल ही न दिखे अथवा उसे कारण के रूप में देख पाना कठिन हो सकता है।

इस परिस्थिति का लाभ उठाते हुए जातिवादी कारण के कारण होने का ऐसे खंडन कर सकता है की यदि वह कारण कार्य की उत्पत्ति से पहले भी था तब तो कार्य भी पहले होना चाहिए था। कार्य पहले नहीं था वह सिद्ध करता है की कारण भी पहले नहीं था। (जैसे कोई धीरे धीरे अपथ्य के कारण अपने शरीर में आम का संचय करता है। अब एक दिन बीमारी के दिखने पर हो सकता जो वो आम संचय न देख पाए और कार्य के तुरंत पहले के समय में कोई कारण को ढूँढने का प्रयास करने लगे।)

उत्तर
कार्य का उत्पन्न होना कारण के होने को सिद्ध करता है उसे कार्य से पहले कारण नहीं था यह सिद्ध करने के लिए प्रमाण नहीं बना सकते। (यदि कारण की कार्य के साथ की व्याप्ति सही हो तो)

उदाहरण १
वैद्य : रात्रि को खट्टे दही का सेवन तुम्हें बंध करना होगा, तुम्हारी acidity उससे हुई है। रात्रि को खट्टे दही का सेवन पित्त कफ के प्रकोप करता है इसलिए।
रोगी : acidity तो मुझे १५-२० दिन से ही हो रही है जब की रात्रि को खट्टे दही का सेवन तो मैं पिछले ३ महीने से कर रहा हूँ। जब acidity नहीं थी तो उसका कारण भी नहीं होगा (परंतु दहीं का सेवन तो तब भी था) अर्थात् खट्टे दही का acidity से कोई लेना देना नहीं है।

उदाहरण २
वादी : राम अपने १५ वर्ष के कठिन पुरुषार्थ के कारण आज इस सफलता को प्राप्त हुआ है।
जातिवादी : पुरुषार्थ से कुछ नहीं होता। एक वर्ष पहले तक तो उसे सफलता मिली नहीं थी जो वर्ष भर पहले तक सफलता के कारण का अभाव का सूचक है। पुरुषार्थ से कुछ होना होता तो १५ वर्ष पहले ही हो जाता।

जाति प्रयोग तर्क के वह प्रयोग है जो प्रमाण तक नहीं पहुंचाते। तर्क के प्रमाण तक न पहुंचा पाने के पीछे अपूर्ण तर्क, प्रमाणों से विसंगतता, अप्राप्त प्रमाण जैसे कारण रहते है जो जाति प्रयोगों में देखने मिलते है। परंतु जाति प्रयोग का अस्तित्व उस बात का सूचक है की वे सद् उत्तर जैसे लग सकते है। यदि उनके सफल होने की कोई संभावना ही न होती तो वह प्रयोग में ही न आते। क्योंकि जो तर्क कभी भी सद् उत्तर न बन पाए वह सद् उत्तर जैसा कभी लग भी नहीं सकता। इससे हम स्वयं की जाति समझ की एक परीक्षा कर सकते है। क्या हम ऐसे उदाहरण देख सकते है जहां जाति लक्षण (जिस तर्क को जाति का लक्षण बताया गया है) वादी की व्याप्ति का खंडन करता हो। (P.S. जाति प्रकरण के अंत में इसे संशोधित करेंगे। क्योंकि इस तर्क में त्रुटि, अपूर्णता है।)

एक उदाहरण जो सत्य हो सकता है (हमेशा ऐसा होता है ऐसा कहने का तात्पर्य नहीं है।)

वादी : तुम मेरी यह बात का विरोध नहीं कर सकते। क्योंकि तुम तो आज तक मेरी कही प्रत्येक बात का समर्थन करते आए हो। (व्याप्ति: वादी की बात -> प्रतिवादी का समर्थन)

प्रतिवादी : मैंने आज तक जो भी बात का समर्थन किया वह बात के योग्य लगने से किया था, आप ने कही है इसलिए नहीं। पर यह बात मुझे योग्य नहीं लग रही है तो मैं उसका विरोध कर रहा हूँ। (वादी की व्याप्ति का खंडन यह कहते हुए की जब कार्य (विरोध) नहीं था तब उसका कारण (अयोग्य बात) भी नहीं था।)

शुक्रवार, 2 सितंबर 2022

प्रसङ्गसमा, दृष्टान्तसमा जाति

प्रसङ्गसमा, दृष्टान्तसमा

दृष्टान्तस्य कारणानपदेशात्प्रत्यवस्थानाच्च प्रतिदृष्टान्तेन प्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तसमौ। ५.१.९

दृष्टान्त के कारण का कथन न करने से किया गया प्रतिषेध प्रसङ्गसम तथा प्रतिदृष्टान्त से किया गया (अयोग्य) प्रतिषेध दृष्टान्तसम प्रतिषेध है।

प्रसङ्गसमा
पंचावयव में जब दृष्टांत दिया गया है (और दृष्टांत वही बनता है जो पहले से सिद्ध हो) तब जातिवादी यह कहता है की आपने दृष्टांत सिद्ध करने के लिए हेतु तो दिया ही नहीं और बिना हेतु सिद्धि थोडी होती है। ऐसे हेतु/दृष्टांत के भी हेतु/दृष्टांत मांग मांग कर प्रसंग को बनाए रखने के प्रयत्न को प्रसङ्गसमा जाति कहते है।

प्रसङ्गसमा का उत्तर
प्रदीपोपादानप्रसङ्गविनिवृत्तिवत्तद्विनिवृत्तिः। ५.१.१०

प्रदीप को देखने के लिए जैसे अन्य प्रदीप की आवश्यकता नहीं होती ऐसे ही दृष्टांत (जो पहले से सिद्ध है) को सिद्ध करने के लिए अन्य हेतु/दृष्टांत की आवश्यकता नहीं होती।

दृष्टान्तसमा
प्रतिदृष्टान्त से किया गया (अयोग्य) प्रतिषेध दृष्टान्तसम प्रतिषेध है।

दृष्टान्तसमा का उत्तर
प्रतिदृष्टान्तहेतुत्वे च नाहेतुर्दृष्टान्तः। ५.१.११ 
प्रतिदृष्टांत के प्रमाण होते हुए भी दृष्टांत अप्रमाण नहीं होता।
 

नीचे प्रसङ्गसमा, दृष्टान्तसमा और उनके उत्तर का मेरी समझ से किया गया विस्तार है। एक बार फिर पुस्तकों में दिया गया वर्णन मुझे संतोष जनक नहीं लगा।

इन दोनों जाति को हम उन जटिल प्रणालियों में जहां अनेक कारण/बाधक कारण मिलकर कोई कार्य सम्पन्न करते है अथवा नहीं होने देते अधिक सरलता से प्रयोग में लाये जाने वाली जाति के रूप में समझ सकते है। (अथवा उन प्रणालियों में जिनको अनेक कारणों वाला जटिल बना दिया गया है/जटिल होते हुए भी सरल दिखाया गया है इस उद्देश्य से की इन जातियों का प्रयोग हो सके।)

(जितनी वास्तविक जटिलता अधिक उतना ही वहां मात्र व्याप्तिज्ञान ही मुख्य बनता जाएगा, दृष्टांत का अधिक महत्व नहीं रह जाएगा। कार्य के पीछे की कारणों की विविधता से कोई भी दो कार्य एकदम समान कारणों के बल से सम्पन्न नहीं होंगे। और वैसे भी व्याप्तिज्ञान प्रत्यक्ष हो तो उदाहरण से क्या अंतर आएगा।)

पहले दृष्टान्तसमा समझते है।

वादी के दिए हुए दृष्टांत से विरुद्ध लगने वाले दृष्टांत को प्रतिदृष्टांत के रुप में प्रस्तुत करना जब की वह प्रतिदृष्टांत हेतु का खंडन न कर पाता हो वह दृष्टान्तसमा जाति है।

यहां यह याद रखना महत्वपूर्ण है की जाति का प्रयोग ऐसे प्रतिषेध को कहते है जिसमें उसे प्रयोग करने वाला पक्ष अपने उस प्रतिषेध से प्रतिपक्ष का खंडन और स्वयं की विजय हुई है यह सिद्ध करना चाहता हो। यही बात यदि जिज्ञासा के रूप में, चर्चा में स्पष्टता लाने के लिए अथवा प्रतिवादी का ध्यान खींचते हुए की यहां आप की बात ढीली लग रही है तो आपको इसका जवाब देना चाहिए नहीं तो आप के खंडन का भय है इस रीति से कही जाने पर उसे जाति नहीं कहेंगे। यह नीचे जब उदाहरण देखेंगे तब स्पष्ट होगा।
 
यदि प्रतिदृष्टांत पूर्णतया योग्य हो, जो हेतु को व्यभिचारी/अनैकांतिक सिद्ध करता हो तब तो वह वादी के हेतु/व्याप्ति को खंडित करने में सफल होगा और सद् उत्तर बनेगा अर्थात जाति नहीं कहा जाएगा। जब सूत्रकार प्रतिदृष्टांत का उल्लेख जाति में करते है तब वह प्रतिदृष्टांतसम है, हेतु खंडित करने वाला प्रतिदृष्टांत नहीं है यह स्पष्ट है। पुस्तकों से इसका विस्तार नहीं समझ पाने से फिर एक बार हम व्यवहार जगत की और दृष्टि करते है।

व्यवहार में हम अनेक बार ऐसे प्रतिदृष्टांत दिए जाते हुए देखते है जो सही लगते हुए भी हेतु को खंडित नहीं करते। जैसे,

(मुझे जो प्रथम दृष्टि में उदाहरण दिखे उस के आधार पर यह लिखा है। हो सकता है यह उदाहरण पूरे योग्य न हो अथवा पंचावयव में त्रुटियाँ हो। पर अभी तो यही समझ में आ रहा है। आगे चलकर त्रुटियाँ दिखी तो उसे दूर करूंगी।)
 
१। वादी : राजू को शाकभाजी बेचना छोडकर मजदूरी करनी पड रही है उसका कारण हफ्ता वसूली है। हफ्ता वसूली ने उसके स्वरोजगार की लाभदायकता नष्ट कर दी इसलिए। जैसे रामू फलवाले के साथ भी हुआ था। (साधन : हफ्ता वसूली  साध्य : स्वरोजगार की लाभदायकता में कमी)

प्रतिवादी : पर बल्लू तो अभी भी फलसब्जी बेच रहा है जब की हफ्ते तो उसे भी देने पड रहे है। इस से आप का खंडन होता है। (यही बात वह पंचावयव के रूप में भी कह सकता है।) - यह जाति प्रयोग है।

प्रतिवादी यदि अपनी बात ऐसे कहता की "पर बल्लू तो अभी भी फलसब्जी बेच रहा है जब की हफ्ते तो उसे भी देने पड रहे है। यह उदाहरण तो आप के हेतु का खंडन करता दिखाई देता है। आप इस विसंगतता को कैसे स्पष्ट करेंगे।" तब उसे जाति नहीं परंतु चर्चा का एक स्वीकार्य भाग माना जाता। 

(चर्चा में अनेक वस्तु में पक्ष प्रतिपक्ष का बुद्धिसाम्य है ऐसा पक्ष प्रतिपक्ष मान के चलते है जैसे यहां वादी को लगा की प्रतिपक्ष ये देख पाएगा की स्वरोजगार में प्रवृत्त सभी एक सा लाभ अर्जित नहीं करते न ही सब की टिक पाने की क्षमता एक सी होती है इससे अन्याय के कारण सभी एक ही साथ नष्ट नहीं होते। पर यदि यह बात प्रतिपक्ष स्वयं नहीं देख पाया तो वह प्रश्न पूछ ही सकता है।)

२। वादी :  मेरा स्वास्थ्य खराब होने का कारण सिगरेट सेवन है। प्रतिदिन १०-१२ सिगरेट सेवन करता था और सिगरेट सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। मेरे मित्र के साथ भी यही हुआ था। (साधन धर्म : सिगरेट का सेवन साध्य धर्म : स्वयं के स्वास्थ्य की खराबी)

सिगरेट बेचने वाला (प्रतिवादी) : ये देखो मेरा दूसरा ग्राहक यहीं खडा है उसका स्वास्थ्य तो इतनी ही सिगरेट पीने पर भी ठीक ही है।

यहां ऐसा नहीं है की प्रतिदृष्टांत में सिगरेट सेवन से होने वाली हानि के अपना कार्य नहीं किया परंतु स्वास्थ्य सैकड़ों कारणों से निर्णीत होता है जिसमें से अन्य कोई कारण ने उस हानि को मिटाने का काम किया है।

हाँ यदि यह देखने में आता हो की अन्य सारे कारण एकदम एक से होने पर भी (जो की मनुष्य स्वास्थ्य जैसे विषय में तो शक्य ही नहीं है पर जहां शक्य हो वहां। और यहां जितना हो सके उतना) किसी को तो सिगरेट पीने पर स्वास्थ्य हानि दिखाई देती है किसी को लाभ और किसी को कोई असर नहीं तब तो ऐसा प्रतिदृष्टांत व्याप्ति का उस हद तक खंडन कर पाएगा जिस हद तक अन्य कारणों की समानता निश्चित की जा सकी है।
 
इन प्रसंगों में एक कारण से एक कार्य का सम्बद्ध न होते हुए अनेक कारण/बाधक कारण से कार्य का संबंध है। कितने कारण/बाधक कारण मिलकर कार्य करते है/बाधित करते है उस की जटिलता पर इसका भी आधार है की कारण (जो साधन धर्म है) उसके होते हुए कार्य की निष्पत्ति (साध्य) में कितनी विविधता आती है।

जब साधन-साध्य की व्याप्ति सही हो तब सही लगने वाला प्रतिदृष्टांत अन्य कारणों अथवा बाधक कारणों के दृष्टांत से वैधर्म्य के कारण कार्य में विविधता की प्राप्ति कराता हुआ होता है, जिससे साधन धर्म और साध्य धर्म के बीच की व्याप्ति खंडित नहीं होती।

एक दृष्टि से देखे तो इन सारे उदाहरणों में वादी अपनी स्थापना को ऐसी विस्तृत और सर्व/बहु ग्राही बना सकता है जिसका सही लगने वाला प्रतिदृष्टांत देना कठिन बनता जाए। जैसे,

"राजू, जो की बहुत कम पूंजी और साधनों से भी शाकभाजी बेचकर थोडे से पैसे कमाता था, जिसमें अपने काम की इतनी योग्यता तो थी की वह न्यायपूर्ण market forces के सामने टिक पाए पर ऐसी असाधारण प्रतिभा नहीं थी की अन्यायपूर्ण वातावरण में भी टिक जाए उसे अब हफ्ता वसूली के कारण स्वरोजगार छोडकर मजदूरी करनी पड रही है। हफ्ता वसूली ने उसके स्वरोजगार की लाभदायकता नष्ट कर दी इसलिए। जैसे रामू फलवाले के साथ भी हुआ था।"

यह देख पाना कठिन नहीं है की व्यवहार में सामान्यतः कोई स्वयं के पक्ष की स्थापना ऐसे क्यों नहीं करता। और फिर यह तो अधिकतम कारणों/ बाधक कारणों की जटिलता वाला उदाहरण भी नहीं है। और फिर चर्चा का उद्देश्य स्वरोजगार में कैसे अधिक लाभ प्राप्त करें वह जानना नहीं अपितु हफ्ता वसूली (अन्यायपूर्ण वातावरण) से होने वाली हानि देखना है।

उदाहरण ३।
मान लो की घडे की मजबूती (कार्य-साध्य) तीन कारणों पर आधारित है।

मिट्टी का प्रकार
घडा बनाने की प्रक्रिया
घडा पकाने की प्रक्रिया

अब इन तीनों कारणों (प्रत्येक कारण भी अनेक कारणों से बना समूह है) का कार्य पर पडने वाला प्रभाव देख पाना विशेष ज्ञान का विषय है। जिससे यहां प्रसङ्गसमा और दृष्टान्तसमा दोनों के लिए जगह बन सकती है।

३। वादी : इस घडे की मजबूती का कारण उसका चिकनी मिट्टी* से बना होना (भी) है। चिकनी मिट्टी* घडे को मजबूती देती है इसलिए। जैसे वो घडे में जो हमने पिछले वर्ष लिया था। (साधन : चिकनी  मिट्टी साध्य : घडे की मजबूती) * यहां जो भी मिट्टी सर्वश्रेष्ठ हो मजबूती के लिए उसे समझ ले।

प्रसङ्गसमा
प्रतिवादी : पर चिकनी मिट्टी से घडा कैसे मजबूत बनता है यह तो आपने समझाया ही नहीं। 

यदि प्रतिवादी का उत्तर जाति के रूप में नहीं परंतु प्रश्न के रूप में हो तो इस के उत्तर में या तो वादी भिन्न भिन्न प्रकार की मिट्टी से मजबूती में अंतर कैसे आता है इस के विशेष ज्ञान से स्पष्टता करें (knowledge based answer) अथवा अन्य कारणों को स्थिर रखकर मात्र मिट्टी के प्रकार से क्या अंतर आता है इसके उदाहरणों से स्पष्टता करें। (जहां सीधा सीधा वस्तु के बारे में ज्ञान प्राप्त करने की योग्यता न हो वहां indirect, statistics based, जिसको evidence based approach कहा जाता है वह भी लिया जा सकता है, लिया जाता है। परंतु किसी वस्तु को मात्र उदाहरणों से समझना वस्तु को तत्वतः समझने के बराबर कभी नहीं हो सकता तो जहां तत्वतः समझना शक्य हो वहां वही करना चाहिए।

दृष्टान्तसमा
प्रतिवादी : कल जो हमने घडा देखा था वह भी चिकनी मिट्टी से बना था पर वो तो मजबूत नहीं था।*

इस के उत्तर में वादी से अपेक्षित है की वह अन्य कारण जो भी मजबूती पर प्रभाव दिखाते है उनके कारण से ऐसा था वह समझाए।

पर यदि प्रतिवादी, जो की वादी के सत्य पक्ष में दोष/अपूर्णता दिखा रहा है वह यह समझ ले की उस प्रथम दृष्ट्या दिखने वाला  दोष/अपूर्णता वादी का खंडन करने में और स्वयं को जीत दिलाने में समर्थ है और उस तरह प्रस्तुति करें जहां वादी से कोई उत्तर की अपेक्षा न हो तब वह जाति कहलाएगा।

*सही प्रतिदृष्टांत होगा मजबूत घडा जो मात्र अन्य कारणों से उतना मजबूत नहीं हो सकता था परंतु चिकनी मिट्टी से नहीं बना था।  - यदि ऐसा दृष्टांत मिलता है तब व्याप्ति असिद्ध बनेगी। 

यदि वादी यह कहता की अन्य कारणों को स्थिर रखें तो अन्य मिट्टी से बना घडा इतना मजबूत नहीं हो सकता तो अब इसका ऐसा प्रतिदृष्टांत नहीं बनेगा जो व्याप्ति को खंडित न करें।


व्यवहार में विस्तृत रणनीति के भाग रूप जाति प्रयोग

जातिवादी के लिए यह लाभदायक परिस्थिति होती है जब वह स्वयं को वाद में प्रवृत्त दिखा सके। इसका अर्थ यह भी है की उसके लिए यह लाभकर है की वह वादी के पक्ष का खंडन स्पष्टता की अपेक्षा से किया गया प्रश्न हो ऐसे करें न की चर्चा जीतने के दावे की भांति। परंतु ऐसा करने से वादी उत्तर दे देगा और बात वहीं के वहीं आ जाएगी। तो जातिवादी के लिए जो प्रक्रिया जितनी जटिल है उससे उसको अधिक जटिल बना देना/कम जटिल दिखना इन जातियों का प्रयोग करने की (अथवा हेत्वाभास से स्थापना करने की) पूर्व तैयारी का कार्य है।

जातिवादी प्रक्रिया को जितनी अधिक जटिल दिखाने में सफल होगा उतना ही वादी को हेतु के हेतु में खिंचता जाएगा। ऐसे ही जटिल प्रणाली को ऐसी सरल दिखाना जैसी वह है नहीं उससे दृष्टांतसमा के प्रयोग में सरलता होगी।

व्यवहार में हम सीधी सरल बातों की ऐसी प्रस्तुति देखते ही है जहां अनेक व्याप्ति रहित कारणों और उनके काम करने की प्रक्रिया का एक जटिल जाल बुना जाता है और सटीक ज्ञान, सत्य, कार्य के साथ व्याप्ति रखने वाले कारणों को कोने में धकेल देने का प्रयत्न होता है।  



तो दूसरी तरफ असंख्य कारणों वाली जटिल प्रणालियों के अधिकतर कारणों को अनदेखा कर दिया जाता है और बाकी के कारणों का एक अल्प अंश पूर्ण के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है। (प्रतिरक्षा तंत्र उनकी दृष्टि से भी अत्यंत सशक्त और बहुआयामी प्रणाली है, पर सहूलियत के हिसाब से उसे antibody (जो रक्षा के बदले विध्वंस भी कर सकते है) में समेट लिया जाता है।)

और सोचो के यदि जातिवादी के लिए स्वयं को वादी दिखाना लाभदायक है तो वादी को जातिवादी दिखाना कितना लाभदायक होगा। इन दो जाति को हेतु का हेतु मांगते रहना और जटिल प्रक्रिया से होने वाला कार्य कोई एक ही कारण से होता है ऐसा कहना के रूप में पहचान लिया जाता है। अब यदि वह वादी को हेतु के हेतु मांगने पर अथवा जटिल लगने वाले कार्य को प्रतिदृष्टांत के बल पर असिद्ध करने के लिए प्रेरित करें तो? जैसे एक असत् हेतु को सत सिद्ध कर के उसके ऊपर अनेक अन्य हेतु की परतें चढा कर किया जा सकता है

जैसे कोई १ को गलत तरीके से सिद्ध घोषित कर दे। और १ को सिद्ध मानते हुए २ की सिद्धि करें, २ को मानते हुए ३ की, ३ को मानते हुए ४ की। यहां दोष १ की सिद्धि में ही है, २,३ ४ की सिद्धि की प्रक्रिया में नहीं (परंतु वे है तो उतने ही दोषपूर्ण जितना १ क्योंकि उसी पर आधारित है।)

अब जब पूर्वपक्षी ४ को सिद्ध करने के लिए अपने पक्ष की स्थापना करता है और ३ को हेतु के रूप में देता है तो वादी उस हेतु पर आपत्ति कर सकता है। पूर्वपक्षी ३ को २ और २ को १ से सिद्ध कर सकने की क्षमता रखता है और उस प्रक्रिया में वादी के ऊपर प्रसंगसमा जाति प्रयोग करने का आरोप लगा सकता है।

इसके उत्तर में वादी अभ्युपगम से सीधा १ पर प्रश्न कर सकता है अथवा १ प्रतिवादी के अधिकरण सिद्धांत में आता है यह दिखाकर उसे खंडित कर प्रतिवादी के हेतुओं की नींव तोड सकता है।
 
इसका एक उदाहरण हमें  money laundering में देखने को मिलता है।*


यहां एक चरण में गलत रीति से प्राप्त पैसे को योग्य रीति से प्राप्त किया हुआ सिद्ध कर दिया जाता है और फिर उसके ऊपर अनेक योग्य रीति के हस्तांतरण जैसा लगने वाली परतें चढा दी जाती है। बाद में अनेक परतों वाला सिद्धांत - की वह पैसे योग्य रीति से प्राप्त किए गए है सामने लाया जाता है।

* यह उदाहरण जातिवादी का अप्राप्यसमा का प्रयोग करने जैसा भी लग सकता है। मैंने उसे वादी को प्रसंगसमा का दोषी दिखाने के लिए किया गया प्रयोग इस दृष्टि से लिखा है की यहां बीच की परतें दिखाई देती है/उन्हें सिद्ध हेतुओं के रूप में प्रस्तुत किया जाता है न की छुपाई गई है/अप्राप्य कारणों के रूप में नहीं प्रस्तुत की गई। (परंतु हो सकता है यह अप्राप्यसमा का ही अधिक योग्य उदाहरण बनें क्योंकि एक तरह से यहां भी जो है (illegal money) उसके अभाव की ही सिद्धि है और कारणों के वैविध्य का आश्रय नहीं लिया मात्र कारण कार्य के बीच की प्राप्ति को धुंधला किया गया है।