सोमवार, 5 सितंबर 2022

प्रकरणसम प्रतिषेध

उभयसाधर्म्यात्प्रक्रियासिद्धेः प्रकरणसमः। ५.१.१६

दोनों से साधर्म्य से प्रकरण चालू रहने से प्रकरणसम प्रतिषेध होता है। 

जब प्रतिवादी वादी के पक्ष को खंडित करें ऐसा कोई कारण देने के बदले स्वयं के पक्ष की स्थापना ऐसे करता है जिससे वादी के पक्ष का भी साधर्म्य हो (अथवा दोनों का वैधर्म्य हो) दोनों पक्ष खडे रहते है और प्रकरण की समाप्ति नहीं होती अथवा तो वादी को खंडित करने के प्रयत्न में प्रतिवादी स्वयं के पक्ष का भी खंडन कर देता है। ऐसा उत्तर खंडन नहीं कर पता और यदि उसे खंडन के हेतु से दिया जाता है तब वह जाति बनता है।

इस के व्यावहारिक उदाहरण अभी खास सोच नहीं पा रही हूँ। पर एक उदाहरण हो सकता है। हम प्रायः यह दलील सुनते है की (चुनाव में) फलाने उम्मीदवार को मत मत दो क्योंकि वह भ्रष्ट है जब की दूसरा उम्मीदवार जिसका वादी विरोध कर रहा है वह भी भ्रष्ट ही होता है (और वादी उसकी दूसरी कोई खराबी के कारण विरोध कर रहा होता है)। (और प्रायः लोग ये स्वीकार करने से हिचकिचाते भी नहीं। वहां दलील यह होती है की कौन भ्रष्ट नहीं होता?)

यदि प्रतिवादी का यह हेतु मान लिया जाए की भ्रष्ट को मत नहीं देना चाहिए तो भी वादी का पक्ष सिद्ध होगा जिससे न प्रतिपक्ष रहेगा न प्रतिषेध बनेगा और यदि माने की भ्रष्ट तो सब होते है तब भी प्रतिपक्ष बनेगा नहीं।

कुछ पुस्तकों में इसे प्रकरणसम हेत्वाभास की भांति समझाया है जहां कारण विरुद्ध पर समान बल वाला होता है -जिनके ऐसा होने से प्रकरण का प्रारंभ हुआ था और फिर वही वस्तु हेतु के रूप में दे दी गई थी। (इस जाति के उदाहरण उसका subset बनेंगे पर वहाँ और प्रसंग भी हो सकते है जो इस जाति में नहीं लिए जा सकते)। पर मुझे ऊपर की व्याख्या तर्कसंगत लगी - इस सूत्र में साधर्म्य कहा भी गया है और उत्तर भी साधर्म्य वाले पक्ष में ठीक बैठता है।

उत्तर

प्रतिपक्षात्प्रकरणसिद्धेः प्रतिषेधानुपपत्तिः प्रतिपक्षोपपत्तेः। ५.१.१७

प्रतिपक्ष से प्रकरण की सिद्धि होने से (संशय बना रहने से) प्रतिपक्ष को स्वीकार किये जाने पर प्रतिषेध (वादी का खंडन) नहीं हो पाता।

क्योंकि प्रतिपक्ष अपनी स्थापना ऐसे धर्म को हेतु बनाकर कर रहा है जिसका प्रथम पक्ष से भी साधर्म्य (वैधर्म्य) है, यदि प्रतिवादी की बात स्वीकार कर ली जाए तो भी वादी का खंडन नहीं होता।

अब तक चर्चा में अधिकतर हम यही भाव से चले है की वादी प्रतिवादी दोनों में से एक का पक्ष सही है और एक का गलत। परंतु ऐसा भी हो सकता है की दोनों ही गलत हो। (और यह भी की दोनों ही सही हो? जैसे मानो कोई कुछ खरीदने के लिए कौन सा brand/model सही है यह निर्णय करना चाहता है। ऐसे में हो सकता है की उसकी आवश्यकता के लिए एक से अधिक models समान रूप से उपयुक्त हो।)। ऐसे दोनों सही/दोनों गलत वाले क्षेत्रों में यह जाति का प्रयोग मिलना अधिक संभव हो सकता है।

एक और बात ध्यान देने की है की जाति प्रयोग जल्प वितंडा में होता है। और जल्प में प्रयोग में आने वाली जातियाँ फिर भी तर्क का आधार लिए हुए लगती है पर जैसे जैसे प्रतिवादी वाद से जल्प और जल्प से वितंडा की और जाता है वहां तर्क से कुतर्क और तर्कहीनता दिखने लगती है।

साथ ही में प्रत्येक स्तर पर प्रतिवादी के लिए यह लाभदायक रहता है की वह स्वयं को जितना हो सके ऊंचा (सत्यप्रिय/तार्किक) दिखाए। इस दृष्टि से देखते हुए यह जाति वितंडा जल्प की सीमा पर खड़ी है। जातिवादी है तो वैतंडिक, उसका कोई पक्ष है ही नहीं, पर वह ऐसा दिखाने का प्रयत्न कर रहा है जैसे उसका कोई पक्ष है।