एकधर्मोपपत्तेरविशेषे सर्वाविशेषप्रसङ्गात्सद्भावोपपत्तेरविशेषसमः। ५.१.२३
साध्य और दृष्टांत में एक धर्म (साधन धर्म) होने से साध्य धर्म की सिद्धि होती हो तो सत्ता (होना) धर्म तो सब में है इस लिए सब में साध्य धर्म की सिद्धि होती है ऐसा प्रतिषेध अविशेषसम प्रतिषेध है।
उत्तर
क्वचित्तद्धर्मोपपत्तेः क्वचिच्चानुपपत्तेः प्रतिषेधाभावः। ५.१.२४
साथ में दिखने वाले प्रत्येक दो धर्म व्याप्ति लिए हुए नहीं होते। कोई दो धर्म के बीच व्याप्ति होती है तो कोई के बीच नहीं होती।
सुतर्क जैसे लगने वाले अपूर्ण तर्क, कुतर्क, तर्कहीनता से होते होते हम इसके पूर्व की जाति में almost बकवास कहा जा सके ऐसी दलील तक पहुँच गए थे। इसके नीचे क्या हो सकता है?
.. जहां होना मात्र साधन धर्म का काम करता है?
जो विद्यार्थी पाठ्यक्रम को समझे है वो उत्तीर्ण होंगे। -> सारे बच्चे उत्तीर्ण होंगे।
जो विषय को बहुत अच्छे से समझे है वे उच्च श्रेणी में उत्तीर्ण होंगे। -> सब उच्च श्रेणी में उत्तीर्ण होंगे।
काम के अनुरूप वेतन मिलेगा। -> कोई भी काम हो एक सा वेतन। -> काम करो न करो वेतन।
रोगी के अनुसार दवा होगी। -> सभी रोगी को एक ही दवा। -> सभी को (रोगी हो न हो) एक ही 'दवा'।
(उपचार के लिए) आतुर का परीक्षण, उपचार। -> सांस लेती हुई प्रत्येक वस्तु का 'परीक्षण, उपचार'।
उपपत्तिसमा जाति
उभयकारणोपपत्तेरुपपत्तिसमः। ५.१.२५
उपपत्तिसमा जाति
उभयकारणोपपत्तेरुपपत्तिसमः। ५.१.२५
दोनों के कारणों की उपपत्ति है ऐसी दलील उपपत्तिसमा जाति है।
आपकी बात सच है पर मेरी बात (जो आपकी बात से विपरीत है वह) भी सत्य है ऐसी दलील उपपत्तिसमा जाति है।
उत्तर
उपपत्तिकारणाभ्यनुज्ञानादप्रतिषेधः। ५.१.२६
वादी के कहे गए उपपत्ति के कारण को मान लेने पर उसका खंडन नहीं होता। (जब सामने वाले की बात सत्य स्वीकार कर ली गई है तो न तो उसका खंडन होता है न उसको स्वीकार करने वाले विरोधी की बात की सिद्धि।)
इसके विस्तार की कोई आवश्यकता नहीं है पर इस पर ध्यान आकर्षित करना चाहूँगी की परस्पर विरोधी बातों का समर्थन करने वाले को न्यायदर्शनकार ने इस क्रम पर रखा है।