निर्दिष्टकारणाभावेऽप्युपलम्भादुपलब्धिसमः। ५.१.२७
निर्दिष्ट कारण के अभाव में भी कार्य होता है ऐसी त्रुटि दिखना उपलब्धिसम प्रतिषेध है।
उत्तर
कारणान्तरादपि तद्धर्मोपपत्तेरप्रतिषेधः। ५.१.२८
कारणान्तरादपि तद्धर्मोपपत्तेरप्रतिषेधः। ५.१.२८
यदि अन्य कोई कारण से भी कार्य होता है तो वह निर्दिष्ट कारण से नहीं होता यह सिद्ध नहीं करता।
निर्दिष्ट कारण से कार्य नहीं नहीं हो रहा यह दिखाने के लिए जहां निर्दिष्ट कारण नहीं है तब भी कार्य की प्राप्ति हो रही है ऐसा तब दिखाना संभव होता है जब अन्य कारणों से भी वह कार्य होता है।
इस जाति का प्रयोग उन प्रसंगों में अधिक सरल रहता है जहां कार्य न मात्र एक से अधिक कारणों से सम्पन्न हो सकता हो पर कोई भी कारण अकेले अथवा अबाधित रूप से कार्य न करता हो अथवा कारण कार्य के साथ ही हमेशा स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो ऐसा अनिवार्य न हो। जिससे कौन से कारण से कार्य हुआ है उसमें संदेह उत्पन्न करना कुछ सरल रहे।
यह परिस्थितियाँ कुछ ऐसी ही है जैसी परिस्थितियों में अहेतुसम का प्रयोग सरल था। अन्य कारणों की भी कार्य के साथ की व्याप्ति अथवा व्याप्ति की संभावना जातिवादी का काम सरल बनाती है।
ध्यान देने की बात यह है की यहाँ जातिवादी का प्रयत्न अन्य कोई कारण की सिद्धि के लिए नहीं है, वह अन्य कारणों के होने की संभावना (=निर्दिष्ट कारण के अभाव में कार्य का होना) निर्दिष्ट कारण के खंडन के लिए मात्र आगे कर रहा है। उसका स्वयं का कोई ऐसा पक्ष नहीं है की कार्य किस कारण से हो रहा है।
व्यवहार में कोई कार्य के अनेक कारणों (कुछ सत्य, कुछ काल्पनिक) का प्रचार करके और वादी के निर्दिष्ट कारण को जितना हो सके उस कोलाहल में दबा देने से जन सामान्य को स्वयं ही इस जाति प्रयोग के लिए प्रेरित किया जा सकता है।