गुरुवार, 22 सितंबर 2022

५.१.३२-५.१.४३

अंतिम तीन जाति प्रयोगों के नीचे मात्र अर्थ दिए है। उन तीनों को भी हम वितंडा में प्रयोग हो सकने वाले प्रयोग के रूप में देख सकते है जहां जातिवादी स्वयं का कोई पक्ष स्थापित नहीं कर रहा मात्र वादी के खंडन का प्रयत्न कर रहा है। 

अनित्यसम प्रतिषेध
साधर्म्यात्तुल्यधर्मोपपत्तेः सर्वानित्यत्वप्रसङ्गादनित्यसमः। ५.१.३२ 

साधर्म्य से यदि तुल्य धर्म की सिद्धि होती हो तो सब (सभी व्याप्ति के?) अनित्य होनेका प्रसंग बनेगा कहना अनित्यसम प्रतिषेध है।

उत्तर

साधर्म्यादसिद्धेः प्रतिषेधासिद्धिः प्रतिषेध्यसाधर्म्यात्च। ५.१.३३ 

साधर्म्य से असिद्धि होती हो प्रतिषेध की भी असिद्धि होगी प्रतिषेध्य के साथ कोई न कोई साधर्म्य होने से।

दृष्टान्ते च साध्यसाधनभावेन प्रज्ञातस्य धर्मस्य हेतुत्वात्तस्य चोभयथाभावान्नाविशेषः। ५.१.३४ 

दृष्टान्तमें साध्यसाधनभावसे ज्ञात धर्मके साधर्म्य अथवा वैधर्म्य से हेतुत्व होने से वह अविशेष नहीं है।
(साधर्म्य अथवा वैधर्म्य से सिद्धि मात्र वहाँ होती है जहां साध्यसाधनभाव व्याप्ति ज्ञात है इस लिए उसमें हेतुत्व है। कोई भी दो धर्मों के समान वह नहीं है।)

नित्यसम प्रतिषेध

नित्यमनित्यभावादनित्ये नित्यत्वोपपत्तेर्नित्यसमः। ५.१.३५ 

अनित्यमें अनित्यत्व नित्य होने से नित्य की सिद्धि होती है कहना नित्यसम प्रतिषेध है। / नित्य में अनित्यत्व की अथवा अनित्य में नित्यत्व की भावना करना नित्यसम प्रतिषेध है।

उत्तर

प्रतिषेध्ये नित्यमनित्यभावादनित्येऽनित्यत्वोपपत्तेः प्रतिषेधाभावः। ५.१.३६ 
जिसका प्रतिषेध किया जा रहा है उसमें नित्य अनित्यत्व है (वह हमेशा अनित्य है) कहने से उसके अनित्यत्व की सिद्धि होती है।
 
कार्यसम

प्रयत्नकार्यानेकत्वात्कार्यसमः। ५.१.३७ 
प्रयत्न से अनेक प्रकार के कार्य होते है ऐसा कहना कार्यसम प्रतिषेध है।

उत्तर

कार्यान्यत्वे प्रयत्नाहेतुत्वमनुपलब्धिकारणोपपत्तेः। ५.१.३८ 
प्रयत्न से अन्य कार्य हो सकने पर भी प्रयत्न का हेतुत्व सिद्ध होता है (प्रयत्न के अभाव में कार्य की) अनुपलब्धि का कोई कारण न होने से।



यदि एक पक्ष ने असत् तर्क दे भी दिया तो भी चर्चा में अन्य पक्ष को हमेशा सत् उत्तर ही देना चाहिए नहीं तो चर्चा निरर्थक हो जाएगी और अनेक पक्ष उत्पन्न हो जाएंगे यह समझाते हुए नीचे के सूत्र है।
 
प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः। ५.१.३९ 
सर्वत्रैवम्। ५.१.४० 
प्रतिषेधविप्रतिषेधे प्रतिषेधदोषवद्दोषः। ५.१.४१ 
प्रतिषेधं सदोषमभ्युपेत्य प्रतिषेधविप्रतिषेधे समानो दोषप्रसङ्गो मतानुज्ञा। ५.१.४२ 
स्वपक्षलक्षणापेक्षोपपत्त्युपसंहारे हेतुनिर्देशे परपक्षदोषाभ्युपगमात्समानो दोषः। ५.१.४३ 


यदि प्रतिवादी जाति प्रयोग करें तब भी चर्चा ऐसे चलनी चाहिए।

प्रथम पक्ष : सद् हेतु द्वारा स्थापना
द्वितीय पक्ष : जाति प्रयोग
प्रथम पक्ष :  जाति प्रयोग को दिखाकर स्वयं के पक्ष का रक्षण

न की ऐसे।

प्रथम पक्ष : स्थापना
द्वितीय पक्ष : जाति प्रयोग
प्रथम पक्ष :  जाति प्रयोग का उत्तर अन्य जाति प्रयोग से (तृतीय पक्ष)
द्वितीय पक्ष : तृतीय पक्ष जाति प्रयोग है ऐसा विरोध (चतुर्थ पक्ष)
प्रथम पक्ष : स्वयं के पक्ष में जो दोष है वही दूसरे में दिखाना मतानुज्ञा निग्रहस्थान है ऐसा बताना। (पाँचवा पक्ष)
द्वितीय पक्ष : प्रथम पक्ष ने भी जब दोषपूर्ण उत्तर दिया है (तृतीय पक्ष में) तब यही बात उसे भी लागू होती है। (छठा पक्ष)

ऐसे असत् उत्तर का भी सत् उत्तर द्वारा निराकरण करने के बदले यदि असत् उत्तर से जवाब दिया जाए तो बात उलझ जाएगी और कोई निष्कर्ष नहीं निकलेगा।


इस के साथ पाँचवें अध्याय का प्रथम आह्निक समाप्त होता है।