शुक्रवार, 2 सितंबर 2022

प्रसङ्गसमा, दृष्टान्तसमा जाति

प्रसङ्गसमा, दृष्टान्तसमा

दृष्टान्तस्य कारणानपदेशात्प्रत्यवस्थानाच्च प्रतिदृष्टान्तेन प्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तसमौ। ५.१.९

दृष्टान्त के कारण का कथन न करने से किया गया प्रतिषेध प्रसङ्गसम तथा प्रतिदृष्टान्त से किया गया (अयोग्य) प्रतिषेध दृष्टान्तसम प्रतिषेध है।

प्रसङ्गसमा
पंचावयव में जब दृष्टांत दिया गया है (और दृष्टांत वही बनता है जो पहले से सिद्ध हो) तब जातिवादी यह कहता है की आपने दृष्टांत सिद्ध करने के लिए हेतु तो दिया ही नहीं और बिना हेतु सिद्धि थोडी होती है। ऐसे हेतु/दृष्टांत के भी हेतु/दृष्टांत मांग मांग कर प्रसंग को बनाए रखने के प्रयत्न को प्रसङ्गसमा जाति कहते है।

प्रसङ्गसमा का उत्तर
प्रदीपोपादानप्रसङ्गविनिवृत्तिवत्तद्विनिवृत्तिः। ५.१.१०

प्रदीप को देखने के लिए जैसे अन्य प्रदीप की आवश्यकता नहीं होती ऐसे ही दृष्टांत (जो पहले से सिद्ध है) को सिद्ध करने के लिए अन्य हेतु/दृष्टांत की आवश्यकता नहीं होती।

दृष्टान्तसमा
प्रतिदृष्टान्त से किया गया (अयोग्य) प्रतिषेध दृष्टान्तसम प्रतिषेध है।

दृष्टान्तसमा का उत्तर
प्रतिदृष्टान्तहेतुत्वे च नाहेतुर्दृष्टान्तः। ५.१.११ 
प्रतिदृष्टांत के प्रमाण होते हुए भी दृष्टांत अप्रमाण नहीं होता।
 

नीचे प्रसङ्गसमा, दृष्टान्तसमा और उनके उत्तर का मेरी समझ से किया गया विस्तार है। एक बार फिर पुस्तकों में दिया गया वर्णन मुझे संतोष जनक नहीं लगा।

इन दोनों जाति को हम उन जटिल प्रणालियों में जहां अनेक कारण/बाधक कारण मिलकर कोई कार्य सम्पन्न करते है अथवा नहीं होने देते अधिक सरलता से प्रयोग में लाये जाने वाली जाति के रूप में समझ सकते है। (अथवा उन प्रणालियों में जिनको अनेक कारणों वाला जटिल बना दिया गया है/जटिल होते हुए भी सरल दिखाया गया है इस उद्देश्य से की इन जातियों का प्रयोग हो सके।)

(जितनी वास्तविक जटिलता अधिक उतना ही वहां मात्र व्याप्तिज्ञान ही मुख्य बनता जाएगा, दृष्टांत का अधिक महत्व नहीं रह जाएगा। कार्य के पीछे की कारणों की विविधता से कोई भी दो कार्य एकदम समान कारणों के बल से सम्पन्न नहीं होंगे। और वैसे भी व्याप्तिज्ञान प्रत्यक्ष हो तो उदाहरण से क्या अंतर आएगा।)

पहले दृष्टान्तसमा समझते है।

वादी के दिए हुए दृष्टांत से विरुद्ध लगने वाले दृष्टांत को प्रतिदृष्टांत के रुप में प्रस्तुत करना जब की वह प्रतिदृष्टांत हेतु का खंडन न कर पाता हो वह दृष्टान्तसमा जाति है।

यहां यह याद रखना महत्वपूर्ण है की जाति का प्रयोग ऐसे प्रतिषेध को कहते है जिसमें उसे प्रयोग करने वाला पक्ष अपने उस प्रतिषेध से प्रतिपक्ष का खंडन और स्वयं की विजय हुई है यह सिद्ध करना चाहता हो। यही बात यदि जिज्ञासा के रूप में, चर्चा में स्पष्टता लाने के लिए अथवा प्रतिवादी का ध्यान खींचते हुए की यहां आप की बात ढीली लग रही है तो आपको इसका जवाब देना चाहिए नहीं तो आप के खंडन का भय है इस रीति से कही जाने पर उसे जाति नहीं कहेंगे। यह नीचे जब उदाहरण देखेंगे तब स्पष्ट होगा।
 
यदि प्रतिदृष्टांत पूर्णतया योग्य हो, जो हेतु को व्यभिचारी/अनैकांतिक सिद्ध करता हो तब तो वह वादी के हेतु/व्याप्ति को खंडित करने में सफल होगा और सद् उत्तर बनेगा अर्थात जाति नहीं कहा जाएगा। जब सूत्रकार प्रतिदृष्टांत का उल्लेख जाति में करते है तब वह प्रतिदृष्टांतसम है, हेतु खंडित करने वाला प्रतिदृष्टांत नहीं है यह स्पष्ट है। पुस्तकों से इसका विस्तार नहीं समझ पाने से फिर एक बार हम व्यवहार जगत की और दृष्टि करते है।

व्यवहार में हम अनेक बार ऐसे प्रतिदृष्टांत दिए जाते हुए देखते है जो सही लगते हुए भी हेतु को खंडित नहीं करते। जैसे,

(मुझे जो प्रथम दृष्टि में उदाहरण दिखे उस के आधार पर यह लिखा है। हो सकता है यह उदाहरण पूरे योग्य न हो अथवा पंचावयव में त्रुटियाँ हो। पर अभी तो यही समझ में आ रहा है। आगे चलकर त्रुटियाँ दिखी तो उसे दूर करूंगी।)
 
१। वादी : राजू को शाकभाजी बेचना छोडकर मजदूरी करनी पड रही है उसका कारण हफ्ता वसूली है। हफ्ता वसूली ने उसके स्वरोजगार की लाभदायकता नष्ट कर दी इसलिए। जैसे रामू फलवाले के साथ भी हुआ था। (साधन : हफ्ता वसूली  साध्य : स्वरोजगार की लाभदायकता में कमी)

प्रतिवादी : पर बल्लू तो अभी भी फलसब्जी बेच रहा है जब की हफ्ते तो उसे भी देने पड रहे है। इस से आप का खंडन होता है। (यही बात वह पंचावयव के रूप में भी कह सकता है।) - यह जाति प्रयोग है।

प्रतिवादी यदि अपनी बात ऐसे कहता की "पर बल्लू तो अभी भी फलसब्जी बेच रहा है जब की हफ्ते तो उसे भी देने पड रहे है। यह उदाहरण तो आप के हेतु का खंडन करता दिखाई देता है। आप इस विसंगतता को कैसे स्पष्ट करेंगे।" तब उसे जाति नहीं परंतु चर्चा का एक स्वीकार्य भाग माना जाता। 

(चर्चा में अनेक वस्तु में पक्ष प्रतिपक्ष का बुद्धिसाम्य है ऐसा पक्ष प्रतिपक्ष मान के चलते है जैसे यहां वादी को लगा की प्रतिपक्ष ये देख पाएगा की स्वरोजगार में प्रवृत्त सभी एक सा लाभ अर्जित नहीं करते न ही सब की टिक पाने की क्षमता एक सी होती है इससे अन्याय के कारण सभी एक ही साथ नष्ट नहीं होते। पर यदि यह बात प्रतिपक्ष स्वयं नहीं देख पाया तो वह प्रश्न पूछ ही सकता है।)

२। वादी :  मेरा स्वास्थ्य खराब होने का कारण सिगरेट सेवन है। प्रतिदिन १०-१२ सिगरेट सेवन करता था और सिगरेट सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। मेरे मित्र के साथ भी यही हुआ था। (साधन धर्म : सिगरेट का सेवन साध्य धर्म : स्वयं के स्वास्थ्य की खराबी)

सिगरेट बेचने वाला (प्रतिवादी) : ये देखो मेरा दूसरा ग्राहक यहीं खडा है उसका स्वास्थ्य तो इतनी ही सिगरेट पीने पर भी ठीक ही है।

यहां ऐसा नहीं है की प्रतिदृष्टांत में सिगरेट सेवन से होने वाली हानि के अपना कार्य नहीं किया परंतु स्वास्थ्य सैकड़ों कारणों से निर्णीत होता है जिसमें से अन्य कोई कारण ने उस हानि को मिटाने का काम किया है।

हाँ यदि यह देखने में आता हो की अन्य सारे कारण एकदम एक से होने पर भी (जो की मनुष्य स्वास्थ्य जैसे विषय में तो शक्य ही नहीं है पर जहां शक्य हो वहां। और यहां जितना हो सके उतना) किसी को तो सिगरेट पीने पर स्वास्थ्य हानि दिखाई देती है किसी को लाभ और किसी को कोई असर नहीं तब तो ऐसा प्रतिदृष्टांत व्याप्ति का उस हद तक खंडन कर पाएगा जिस हद तक अन्य कारणों की समानता निश्चित की जा सकी है।
 
इन प्रसंगों में एक कारण से एक कार्य का सम्बद्ध न होते हुए अनेक कारण/बाधक कारण से कार्य का संबंध है। कितने कारण/बाधक कारण मिलकर कार्य करते है/बाधित करते है उस की जटिलता पर इसका भी आधार है की कारण (जो साधन धर्म है) उसके होते हुए कार्य की निष्पत्ति (साध्य) में कितनी विविधता आती है।

जब साधन-साध्य की व्याप्ति सही हो तब सही लगने वाला प्रतिदृष्टांत अन्य कारणों अथवा बाधक कारणों के दृष्टांत से वैधर्म्य के कारण कार्य में विविधता की प्राप्ति कराता हुआ होता है, जिससे साधन धर्म और साध्य धर्म के बीच की व्याप्ति खंडित नहीं होती।

एक दृष्टि से देखे तो इन सारे उदाहरणों में वादी अपनी स्थापना को ऐसी विस्तृत और सर्व/बहु ग्राही बना सकता है जिसका सही लगने वाला प्रतिदृष्टांत देना कठिन बनता जाए। जैसे,

"राजू, जो की बहुत कम पूंजी और साधनों से भी शाकभाजी बेचकर थोडे से पैसे कमाता था, जिसमें अपने काम की इतनी योग्यता तो थी की वह न्यायपूर्ण market forces के सामने टिक पाए पर ऐसी असाधारण प्रतिभा नहीं थी की अन्यायपूर्ण वातावरण में भी टिक जाए उसे अब हफ्ता वसूली के कारण स्वरोजगार छोडकर मजदूरी करनी पड रही है। हफ्ता वसूली ने उसके स्वरोजगार की लाभदायकता नष्ट कर दी इसलिए। जैसे रामू फलवाले के साथ भी हुआ था।"

यह देख पाना कठिन नहीं है की व्यवहार में सामान्यतः कोई स्वयं के पक्ष की स्थापना ऐसे क्यों नहीं करता। और फिर यह तो अधिकतम कारणों/ बाधक कारणों की जटिलता वाला उदाहरण भी नहीं है। और फिर चर्चा का उद्देश्य स्वरोजगार में कैसे अधिक लाभ प्राप्त करें वह जानना नहीं अपितु हफ्ता वसूली (अन्यायपूर्ण वातावरण) से होने वाली हानि देखना है।

उदाहरण ३।
मान लो की घडे की मजबूती (कार्य-साध्य) तीन कारणों पर आधारित है।

मिट्टी का प्रकार
घडा बनाने की प्रक्रिया
घडा पकाने की प्रक्रिया

अब इन तीनों कारणों (प्रत्येक कारण भी अनेक कारणों से बना समूह है) का कार्य पर पडने वाला प्रभाव देख पाना विशेष ज्ञान का विषय है। जिससे यहां प्रसङ्गसमा और दृष्टान्तसमा दोनों के लिए जगह बन सकती है।

३। वादी : इस घडे की मजबूती का कारण उसका चिकनी मिट्टी* से बना होना (भी) है। चिकनी मिट्टी* घडे को मजबूती देती है इसलिए। जैसे वो घडे में जो हमने पिछले वर्ष लिया था। (साधन : चिकनी  मिट्टी साध्य : घडे की मजबूती) * यहां जो भी मिट्टी सर्वश्रेष्ठ हो मजबूती के लिए उसे समझ ले।

प्रसङ्गसमा
प्रतिवादी : पर चिकनी मिट्टी से घडा कैसे मजबूत बनता है यह तो आपने समझाया ही नहीं। 

यदि प्रतिवादी का उत्तर जाति के रूप में नहीं परंतु प्रश्न के रूप में हो तो इस के उत्तर में या तो वादी भिन्न भिन्न प्रकार की मिट्टी से मजबूती में अंतर कैसे आता है इस के विशेष ज्ञान से स्पष्टता करें (knowledge based answer) अथवा अन्य कारणों को स्थिर रखकर मात्र मिट्टी के प्रकार से क्या अंतर आता है इसके उदाहरणों से स्पष्टता करें। (जहां सीधा सीधा वस्तु के बारे में ज्ञान प्राप्त करने की योग्यता न हो वहां indirect, statistics based, जिसको evidence based approach कहा जाता है वह भी लिया जा सकता है, लिया जाता है। परंतु किसी वस्तु को मात्र उदाहरणों से समझना वस्तु को तत्वतः समझने के बराबर कभी नहीं हो सकता तो जहां तत्वतः समझना शक्य हो वहां वही करना चाहिए।

दृष्टान्तसमा
प्रतिवादी : कल जो हमने घडा देखा था वह भी चिकनी मिट्टी से बना था पर वो तो मजबूत नहीं था।*

इस के उत्तर में वादी से अपेक्षित है की वह अन्य कारण जो भी मजबूती पर प्रभाव दिखाते है उनके कारण से ऐसा था वह समझाए।

पर यदि प्रतिवादी, जो की वादी के सत्य पक्ष में दोष/अपूर्णता दिखा रहा है वह यह समझ ले की उस प्रथम दृष्ट्या दिखने वाला  दोष/अपूर्णता वादी का खंडन करने में और स्वयं को जीत दिलाने में समर्थ है और उस तरह प्रस्तुति करें जहां वादी से कोई उत्तर की अपेक्षा न हो तब वह जाति कहलाएगा।

*सही प्रतिदृष्टांत होगा मजबूत घडा जो मात्र अन्य कारणों से उतना मजबूत नहीं हो सकता था परंतु चिकनी मिट्टी से नहीं बना था।  - यदि ऐसा दृष्टांत मिलता है तब व्याप्ति असिद्ध बनेगी। 

यदि वादी यह कहता की अन्य कारणों को स्थिर रखें तो अन्य मिट्टी से बना घडा इतना मजबूत नहीं हो सकता तो अब इसका ऐसा प्रतिदृष्टांत नहीं बनेगा जो व्याप्ति को खंडित न करें।


व्यवहार में विस्तृत रणनीति के भाग रूप जाति प्रयोग

जातिवादी के लिए यह लाभदायक परिस्थिति होती है जब वह स्वयं को वाद में प्रवृत्त दिखा सके। इसका अर्थ यह भी है की उसके लिए यह लाभकर है की वह वादी के पक्ष का खंडन स्पष्टता की अपेक्षा से किया गया प्रश्न हो ऐसे करें न की चर्चा जीतने के दावे की भांति। परंतु ऐसा करने से वादी उत्तर दे देगा और बात वहीं के वहीं आ जाएगी। तो जातिवादी के लिए जो प्रक्रिया जितनी जटिल है उससे उसको अधिक जटिल बना देना/कम जटिल दिखना इन जातियों का प्रयोग करने की (अथवा हेत्वाभास से स्थापना करने की) पूर्व तैयारी का कार्य है।

जातिवादी प्रक्रिया को जितनी अधिक जटिल दिखाने में सफल होगा उतना ही वादी को हेतु के हेतु में खिंचता जाएगा। ऐसे ही जटिल प्रणाली को ऐसी सरल दिखाना जैसी वह है नहीं उससे दृष्टांतसमा के प्रयोग में सरलता होगी।

व्यवहार में हम सीधी सरल बातों की ऐसी प्रस्तुति देखते ही है जहां अनेक व्याप्ति रहित कारणों और उनके काम करने की प्रक्रिया का एक जटिल जाल बुना जाता है और सटीक ज्ञान, सत्य, कार्य के साथ व्याप्ति रखने वाले कारणों को कोने में धकेल देने का प्रयत्न होता है।  



तो दूसरी तरफ असंख्य कारणों वाली जटिल प्रणालियों के अधिकतर कारणों को अनदेखा कर दिया जाता है और बाकी के कारणों का एक अल्प अंश पूर्ण के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है। (प्रतिरक्षा तंत्र उनकी दृष्टि से भी अत्यंत सशक्त और बहुआयामी प्रणाली है, पर सहूलियत के हिसाब से उसे antibody (जो रक्षा के बदले विध्वंस भी कर सकते है) में समेट लिया जाता है।)

और सोचो के यदि जातिवादी के लिए स्वयं को वादी दिखाना लाभदायक है तो वादी को जातिवादी दिखाना कितना लाभदायक होगा। इन दो जाति को हेतु का हेतु मांगते रहना और जटिल प्रक्रिया से होने वाला कार्य कोई एक ही कारण से होता है ऐसा कहना के रूप में पहचान लिया जाता है। अब यदि वह वादी को हेतु के हेतु मांगने पर अथवा जटिल लगने वाले कार्य को प्रतिदृष्टांत के बल पर असिद्ध करने के लिए प्रेरित करें तो? जैसे एक असत् हेतु को सत सिद्ध कर के उसके ऊपर अनेक अन्य हेतु की परतें चढा कर किया जा सकता है

जैसे कोई १ को गलत तरीके से सिद्ध घोषित कर दे। और १ को सिद्ध मानते हुए २ की सिद्धि करें, २ को मानते हुए ३ की, ३ को मानते हुए ४ की। यहां दोष १ की सिद्धि में ही है, २,३ ४ की सिद्धि की प्रक्रिया में नहीं (परंतु वे है तो उतने ही दोषपूर्ण जितना १ क्योंकि उसी पर आधारित है।)

अब जब पूर्वपक्षी ४ को सिद्ध करने के लिए अपने पक्ष की स्थापना करता है और ३ को हेतु के रूप में देता है तो वादी उस हेतु पर आपत्ति कर सकता है। पूर्वपक्षी ३ को २ और २ को १ से सिद्ध कर सकने की क्षमता रखता है और उस प्रक्रिया में वादी के ऊपर प्रसंगसमा जाति प्रयोग करने का आरोप लगा सकता है।

इसके उत्तर में वादी अभ्युपगम से सीधा १ पर प्रश्न कर सकता है अथवा १ प्रतिवादी के अधिकरण सिद्धांत में आता है यह दिखाकर उसे खंडित कर प्रतिवादी के हेतुओं की नींव तोड सकता है।
 
इसका एक उदाहरण हमें  money laundering में देखने को मिलता है।*


यहां एक चरण में गलत रीति से प्राप्त पैसे को योग्य रीति से प्राप्त किया हुआ सिद्ध कर दिया जाता है और फिर उसके ऊपर अनेक योग्य रीति के हस्तांतरण जैसा लगने वाली परतें चढा दी जाती है। बाद में अनेक परतों वाला सिद्धांत - की वह पैसे योग्य रीति से प्राप्त किए गए है सामने लाया जाता है।

* यह उदाहरण जातिवादी का अप्राप्यसमा का प्रयोग करने जैसा भी लग सकता है। मैंने उसे वादी को प्रसंगसमा का दोषी दिखाने के लिए किया गया प्रयोग इस दृष्टि से लिखा है की यहां बीच की परतें दिखाई देती है/उन्हें सिद्ध हेतुओं के रूप में प्रस्तुत किया जाता है न की छुपाई गई है/अप्राप्य कारणों के रूप में नहीं प्रस्तुत की गई। (परंतु हो सकता है यह अप्राप्यसमा का ही अधिक योग्य उदाहरण बनें क्योंकि एक तरह से यहां भी जो है (illegal money) उसके अभाव की ही सिद्धि है और कारणों के वैविध्य का आश्रय नहीं लिया मात्र कारण कार्य के बीच की प्राप्ति को धुंधला किया गया है।