प्रमाण का सामान्य लक्षण "उपलब्धिसाधनं प्रमाणम्"*, जो सत्य ज्ञान का साधन है वह प्रमाण है किया गया है।
*सूत्रकार ने प्रमाण सामान्य का कोई लक्षण सूत्र नहीं दिया है। भाष्यकार ने प्रमाण के निर्वाचन से ही यह अर्थ निकलता है ऐसा प्रमाणों के विभाग के सूत्र (१.१.३) की चर्चा में कहा था। https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/04/1.1.3.html
इस पर लगाए गए आरोप, जो शून्यवादी बौद्धों के माने जाते है उन्हें सूत्रकार २.१.८-११ सूत्रों में देते है।
प्रत्यक्षादीनामप्रामाण्यं त्रैकाल्यासिद्धेः। २.१.८
पूर्वं हि प्रमाणसिद्धौ नेन्द्रियार्थसंनिकर्षात्प्रत्यक्षोत्पत्तिः। २.१.९
पश्चात्सिद्धौ न प्रमाणेभ्यः प्रमेयसिद्धिः। २.१.१०
युगपत्सिद्धौ प्रत्यर्थनियतत्वात्क्रमवृत्तित्वाभावो बुद्धीनाम्। २.१.११
पूर्वं हि प्रमाणसिद्धौ नेन्द्रियार्थसंनिकर्षात्प्रत्यक्षोत्पत्तिः। २.१.९
पश्चात्सिद्धौ न प्रमाणेभ्यः प्रमेयसिद्धिः। २.१.१०
युगपत्सिद्धौ प्रत्यर्थनियतत्वात्क्रमवृत्तित्वाभावो बुद्धीनाम्। २.१.११
यह आरोप हमें विचित्र लग सकते है। कहा यह जा रहा है की प्रत्यक्ष आदि सभी प्रमाण किसी भी काल में अर्थ को सिद्ध नहीं कर सकते। अर्थात् प्रमाण की सत्ता को ही नकारा जा रहा है। पूर्वपक्षी कहता है की साधन-साध्य में क्रम रहता है जबकि प्रमाण प्रमेय के बीच में क्रम नहीं बन सकता। प्रमाण को पहले मानेंगे तो बिना प्रमेय के इन्द्रिय का सन्निकर्ष अर्थ के साथ कैसे होगा? प्रमाण को बाद में मानेंगे तो बिना प्रमाण के प्रमेय में पहले प्रमेयत्व नहीं होगा और एक साथ दोनों हो नहीं सकते क्योंकि मन एक बार में एक ही ज्ञान उत्पन्न कर सकता है।
उत्तर
त्रैकाल्यासिद्धेः प्रतिषेधानुपपत्तिः। २.१.१२
सर्वप्रमाणप्रतिषेधाच्च प्रतिषेधानुपपत्तिः। २.१.१३
तत्प्रामाण्ये वा न सर्वप्रमाणविप्रतिषेधः। २.१.१४
त्रैकाल्याप्रतिषेधश्च शब्दादातोद्यसिद्धिवत्तत्सिद्धेः। २.१.१५
प्रमेया च तुलाप्रामाण्यवत्। २.१.१६
सर्वप्रमाणप्रतिषेधाच्च प्रतिषेधानुपपत्तिः। २.१.१३
तत्प्रामाण्ये वा न सर्वप्रमाणविप्रतिषेधः। २.१.१४
त्रैकाल्याप्रतिषेधश्च शब्दादातोद्यसिद्धिवत्तत्सिद्धेः। २.१.१५
प्रमेया च तुलाप्रामाण्यवत्। २.१.१६
सूत्र १२-१४ में सूत्रकार कहते है,
तुम्हारी त्रिकाल में प्रमाण की असिद्धि के हेतु के हिसाब से तो तुम्हारा प्रतिषेध ही नहीं टिक पाएगा। (तुम जिसका प्रतिषेध कर रहे हो वह प्रतिषेध से प्रथम है , पश्चात है अथवा साथ में है?)
जब तुम प्रमाणों को ही नहीं मान रहे हो तो तुम्हारा प्रतिषेध प्रामाणिक है अथवा अप्रामाणिक? यदि अपने प्रतिषेध में प्रामाण्य मानते हो तो प्रमाण मात्र का प्रतिषेध नहीं होगा।
तुम्हारी त्रिकाल में प्रमाण की असिद्धि के हेतु के हिसाब से तो तुम्हारा प्रतिषेध ही नहीं टिक पाएगा। (तुम जिसका प्रतिषेध कर रहे हो वह प्रतिषेध से प्रथम है , पश्चात है अथवा साथ में है?)
जब तुम प्रमाणों को ही नहीं मान रहे हो तो तुम्हारा प्रतिषेध प्रामाणिक है अथवा अप्रामाणिक? यदि अपने प्रतिषेध में प्रामाण्य मानते हो तो प्रमाण मात्र का प्रतिषेध नहीं होगा।
इस प्रकार पूर्वपक्षी के प्रतिषेध उसके स्वसिद्धांत तथा स्वहेतु से ही पराजित होते है यह दिखाने के पश्चात सूत्रकार यह स्पष्ट करते है की प्रमाण और प्रमेय की उत्पत्ति भिन्न काल में होने पर भी प्रमाण प्रमेय का ज्ञान करा सकता है। जैसे बाद में उत्पन्न हुआ शब्द उस वाद्य का ज्ञान करा सकता है जिसने उसे उत्पन्न किया है। और कोई वस्तु को प्रमाण अथवा प्रमेय ही मान लेना भी ठीक नहीं क्योंकि परिस्थिति के हिसाब से कभी कोई वस्तु प्रमाण बनती है तो फिर कभी वही वस्तु प्रमेय। जैसे तुला अन्य पदार्थों को तोलते समय प्रमाण है पर जब उसकी ही परीक्षा की जा रही है तब प्रमेय।
(प्रमाण शब्द को ज्ञान के बाह्य साधन जैसे तुला, बाट, दिया, प्रकाश के लिए, इंद्रियां, जो भी ज्ञान के साधन है उन के लिए, उत्पन्न हुए ज्ञान के लिए अथवा वस्तु के ज्ञान से उत्पन्न उस वस्तु को प्राप्त करने / छोडने की बुद्धि के लिए भी प्रयोग में लाया जाता है। सूत्रकार ने जो प्रमाण के लक्षण दिए है उससे अंतिम दो अर्थ होंगे पर प्रथम दो अर्थ में भी उनका प्रयोग होता है, जैसे यहां।)
पिछली post में मैंने कहा था की कुछ प्रश्नों को, जो हमारे लिए उपयोगी न लगे उन्हें छोड दूँगी और ऊपर के प्रश्न उसी प्रकार के है। फिर भी उनका उल्लेख करने के पीछे दो कारण है।
१. उत्तर अथवा कहो उत्तर का प्रकार
पूर्वपक्षी के आरोप स्वसिद्धांत और स्वहेतु के ही विपरीत थे ऐसे में उसका उत्तर देते समय उन्होंने जो प्रश्न ही गलत थे उनका उत्तर देना/उनसे स्वयं की रक्षा करना नहीं प्रारंभ कर दिया। पहले उन्होंने पूर्वपक्षी के स्वसिद्धांत विरुद्ध कथन को ही उजागर किया। हमने वाद/निग्रहस्थान के लक्षण देखते समय देखा था की स्वसिद्धांत विरुद्ध कथन यह गलती सबसे अधिक अक्षम्य है। - this emphasis is mine.
जब सामने वाले का प्रश्न ही गलत हो तब यदि हम प्रश्न की व्यर्थता दिखाने के बदले प्रश्न का उत्तर देने लगते है तब हम उसके प्रश्न को योग्य स्वीकार करने के दोषी बनते है और उसकी गलती न पकडने से स्वयं निग्रहस्थान में आएंगे सो अलग।
पूर्वपक्षी के खंडन के उपरांत सूत्रकार ने जवाब भी दिया है, जिसको मैं पूर्वपक्षी को दिया गया जवाब नहीं (क्योंकि हार के पश्चात अब वह प्रतिपक्ष के रूप में है ही नहीं) अपितु शास्त्राध्ययन कर रहे जिज्ञासुओं के लिए है ऐसे देखती हूँ।
२। आरोप की गुणवत्ता
जो कारण सूत्रों को छोडने का हो सकता था वही उनको न छोडने का है। यह दिखाने के लिए की संस्कृत में लिखी गई हर बात सही अथवा उच्च गुणवत्ता वाली नहीं होती। (यहाँ ये पूर्वपक्षी के आरोप है पर अन्य कहीं पूर्वपक्षी के लिखे ग्रंथों में वह सिद्धांत के रूप में भी हो सकते है।) संस्कृत एक भाषा है जो सही गलत, अच्छे बुरे, बुद्धिमान कुतर्की, विद्वान सामान्य हर प्रकार के लोगों ने उपयोग की है। ऐसा तो था नहीं की अच्छे अच्छे बुद्धिमान परोपकारी आप्तजन तो संस्कृत में अपनी बात कहते थे और ज अभी सत्य तक नहीं पहुंचे है अथवा असत्य की और ही चल पडे है आदि कोई अन्य भाषा का प्रयोग करते थे।