गुरुवार, 20 अक्टूबर 2022

निग्रहस्थान : अपार्थक अप्राप्तकाल न्यून अधिक पुनरुक्त अननुभाषण अज्ञान अप्रतिभा

अपार्थक

पौर्वापर्यायोगादप्रतिसम्बद्धार्थमपार्थकम्। ५.२.१०

जिस वाक्य समुदाय के पूर्वापर वाक्यों के बीच कोई संबंध न हो, अर्थात वाक्य समुदाय का कोई अर्थ न निकलता हो, ऐसे उच्चारण से अपार्थक निग्रहस्थान बनता है।

(जहां वाक्य ही अर्थ रहित हो वह पूर्व देखा हुआ निरर्थक निग्रहस्थान है, जहां वाक्यसमूह अर्थ रहित हो वह अपार्थक निग्रहस्थान है।)


अप्राप्तकाल

अवयवविपर्यासवचनमप्राप्तकालम्। ५.२.११

अनुमान प्रमाण के अवयवों (प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन) को उलट पुलट क्रम में कहना (उनकी प्राप्ति का क्रम न होते हुए कहना) अप्राप्तकाल निग्रहस्थान है।

चर्चा में वादी प्रतिवादी के बोलने का भी एक क्रम है। वादी को पहले प्रतिज्ञा दे कर उसके लिए हेत्वाभास से मुक्त हेतु देना चाहिए, फिर प्रतिवादी को वादी के हेतु का खंडन करके स्वयं की प्रतिज्ञा और हेतु रखने चाहिए। वादी फिर स्वयं का हेत्वाभास के आरोप से उद्धार कर के प्रतिवादी का खंडन कर सकता है यह प्रक्रिया निर्णय होने तक चलेगी। इस क्रम को तोडते हुए बोलना भी अप्राप्तकाल निग्रहस्थान है।


न्यून

हीनमन्यतमेनाप्यवयवेन न्यूनम्। ५.२.१२

पाँच अवयवों में से किसी का प्रयोग न करने से न्यून निग्रहस्थान बनता है। (वैसे यह formal setting में होगा, informal चर्चा जो वाद रूप में हो रही हो उसमें तीन अवयव से काम चल सकता है।)

अधिक

हेतूदाहरणाधिकमधिकम्। ५.२.१३

एक से अधिक हेतु अथवा उदाहरण देना अधिक निग्रहस्थान है।

चर्चा के प्रारंभ में एक से अधिक हेतु उदाहरण दे सकते है की नहीं उस के लिए नियम बनाकर उसके अनुरूप अधिक निग्रहस्थान की प्राप्ति हो रही है अथवा नहीं यह देख सकते है। यदि एक से अधिक हेतु उदाहरण का निषेध न किया गया हो तो उसको निग्रहस्थान नहीं मानेंगे।


पुनरुक्त
 
शब्दार्थयोः पुनर्वचनं पुनरुक्तमन्यत्रानुवादात्। ५.२.१४

प्रयोजन सहित के पुनःकथन रूप अनुवाद को छोडकर एक ही शब्द को एक ही अर्थ कहने के लिए फिर से कहना पुनरुक्त निग्रहस्थान है।

एक बार कहने से अर्थ समझ में आ जाने पर भी वही अर्थ को पुनः कहने का चर्चा में कोई औचित्य नहीं है। 'शब्द अनित्य है। शब्द अनित्य है।' कहना पुनरुक्त निग्रहस्थान में ले जाएगा (और 'शब्द अनित्य है। ध्वनि विनाश धर्म वाला है।' कहना भी)। परंतु एक ही शब्दों को प्रतिज्ञा और निगमन में दोहराना निग्रहस्थान नहीं बनेगा। क्योंकि वहाँ प्रयोजन भिन्न भिन्न है। प्रतिज्ञा में जहां वह सिद्धांत रखा जा रहा है जिसे सिद्ध करना है, निगमन में वह सिद्धांत है जो सिद्ध किया गया है।

पुनरुक्त निग्रहस्थान का दूसरा प्रकार अगले सूत्र में,

अर्थादापन्नस्य स्वशब्देन पुनर्वचनं पुनरुक्तम्। ५.२.१५

प्राप्त अर्थ को शब्द से पुनः कहना भी पुनरुक्त निग्रहस्थान है।

शब्दों का प्रयोजन अर्थ की प्राप्ति करवाना होता है। चर्चा में जब कोई अर्थ अन्य बातों से स्पष्ट हो ही चुका हो तब उस अर्थ को पुनः शब्दों से कहना भी पुनरुक्त निग्रहस्थान बनेगा।


अननुभाषण

विज्ञातस्य परिषदा त्रिरभिहितस्याप्यप्रत्युच्चारणमननुभाषणम्। ५.२.१६

परिषदने जाना हुआ तीन बार कहे हुए विषय का भी कोई उत्तर न देना अननुभाषण निग्रहस्थान है।

प्रतिवादी ने अपने पक्ष की स्थापना की है जो परिषद को समझ में आई है, उत्तर न मिलने पर प्रतिवादीने अपनी बात तीन बार कही है फिर भी यदि वादी (जो बात को समझ पा रहा है पर) उसका कोई उत्तर देता ही नहीं है तो उसे अननुभाषण कहेंगे। 


अज्ञान

अविज्ञातं चाज्ञानम्। ५.२.१७

और विषय को समझ ही न पाना अज्ञान निग्रहस्थान है।

प्रतिवादी ने अपने पक्ष की स्थापना की है जो परिषद को समझ में आई है, प्रतिवादी ने अपनी बात तीन बार कही है फिर भी यदि वादी बात को समझ ही नहीं पा रहा है तब वह अज्ञान निग्रहस्थान में आयेगा।

अप्रतिभा

उत्तरस्याप्रतिपत्तिरप्रतिभा। ५.२.१८

उत्तर का न सूझना अप्रतिभा निग्रहस्थान है।

प्रतिवादी ने क्या कहा है वह समझने और अपनी समझ ठीक है यह दिखाते हुए प्रतिवादी के पक्ष को दोहराने के बाद (जिसे अनुवाद कहते है। सामने वाले का खंडन करते समय पहले उसके पक्ष को दोहराते है जिससे उसके पक्ष को सही समझे है वह स्पष्ट हो।) उसका कोई उत्तर (खंडन) न सूझने से वादी अप्रतिभा निग्रहस्थान में आ जाता है।