हमने देखा की कुछ वृत्तियाँ दुख का कारण बनती है जो क्लिष्ट वृत्तियाँ है और कुछ दुख दूर होने (ज्ञान, मुक्ति) का कारण बनती है जो अक्लिष्ट वृत्तियाँ है। यह वृत्तियाँ (मन की प्रवृत्तियाँ) वैसे तो अनेक है पर उन्हें पांच प्रकार में विभाजित कर समझ सकते है। जो अगला सूत्र बता रहा है।
प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः। १.६
चित्त की वृत्तियाँ पांच प्रकार की है। प्रमाण विपर्यय विकल्प निद्रा स्मृति। प्रत्येक प्रकार के लिए आगे सूत्र दिए गए है तो उन्हें उन सूत्रों के अंतर्गत देखेंगे।
प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि। १.७
प्रत्यक्ष अनुमान आगम प्रमाण है।
न्यायदर्शन में हमने प्रमाणों को विस्तार से देखा था यहाँ संक्षेप से,
प्रत्यक्ष : इंद्रियों के द्वारा चित्त का बाह्य विषय से उपराग होने पर विषय चित्त तक पहुँचने से चित्त बाह्य विषय से (उसके ज्ञान से) उपरक्त होगा (रंग जाएगा) जिसको प्रत्यक्ष कहते है। जिस वस्तु से इंद्रिय का संपर्क हो रहा है उसमें सामान्य तथा विशेष दोनों धर्म होंगे और दोनों का ज्ञान पहुंचेगा परंतु प्रत्यक्ष में विशेष धर्म की प्रधानता रहती है।
इंद्रिय बाह्य विषय के उसी गुण को ग्रहण करेगी जिसकी उसमें स्वयं में प्रधानता है। अर्थात् जिस द्रव्य की प्रधानता उसकी रचना में है उसके गुण को। चक्षु इंद्रिय में अग्नि की प्रधानता है वह रूप को ग्रहण करेगी, श्रोत्र में आकाश की वह शब्द को, रसना में जल की वह रस को तो स्पर्शन इंद्रिय में वायु की प्रधानता होने से वह स्पर्श को और घ्राण इंद्रिय में पृथ्वी की प्रधानता होने से वह गंध को ग्रहण करेगी। प्रत्येक इंद्रिय मात्र स्वयं का विषय ही ग्रहण कर सकती है अन्य कोई विषय नहीं जैसे आँख से सुन नहीं सकते, कान से चख नहीं सकते।
अनुमान : लिंग को जान कर लिंगी का ज्ञान होना अनुमान प्रमाण है। अनुमान प्रमाण में सामान्य ज्ञान की प्रधानता रहती है। वह निश्चित ज्ञान होने पर भी प्रत्यक्ष की भांति विशेष प्रधान नहीं होता।
आगम : आप्त के उपदेश को जो आप्त ने स्वयं के द्वारा जाना गया अर्थ दूसरे को जनाने के लिए किया है उसे सुन कर हुआ ज्ञान आगम (जो आगे से चला आया है) प्रमाण है। इसे शब्द प्रमाण भी कहते है।
विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्। १.८
विपर्यय मिथ्या ज्ञान है। वह पदार्थ के वास्तविक स्वरूप को प्रकाशित नहीं करता है।
यथार्थ ज्ञान प्रमाण है और मिथ्या विपर्यय। प्रमाण में प्रवृत्ति सामर्थ्य है, विपर्यय में नहीं। जैसे चक्षु से जल दिखने पर यदि वहाँ जा कर जल की प्राप्ति होती है तो वह प्रमाण है पर यदि नहीं (जैसे मृगजल में) तब वह इंद्रिय के द्वारा दिखाया गया होने पर भी मिथ्या ज्ञान अर्थात् विपर्यय है।
विपर्यय का खंडन प्रमाण से होता है। विपर्यय को अविद्या भी कहते है जो समस्त दुखों को उत्पन्न करने का कारण बनती है।