शुक्रवार, 17 मार्च 2023

योगदर्शन १.६-८

हमने देखा की कुछ वृत्तियाँ दुख का कारण बनती है जो क्लिष्ट वृत्तियाँ है और कुछ दुख दूर होने (ज्ञान, मुक्ति) का कारण बनती है जो अक्लिष्ट वृत्तियाँ है। यह वृत्तियाँ (मन की प्रवृत्तियाँ) वैसे तो अनेक है पर उन्हें पांच प्रकार में विभाजित कर समझ सकते है। जो अगला सूत्र बता रहा है।

प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः। १.६

चित्त की वृत्तियाँ पांच प्रकार की है। प्रमाण विपर्यय विकल्प निद्रा स्मृति। प्रत्येक प्रकार के लिए आगे सूत्र दिए गए है तो उन्हें उन सूत्रों के अंतर्गत देखेंगे।

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि। १.७

प्रत्यक्ष अनुमान आगम प्रमाण है।

न्यायदर्शन में हमने प्रमाणों को विस्तार से देखा था यहाँ संक्षेप से,

प्रत्यक्ष : इंद्रियों के द्वारा चित्त का बाह्य विषय से उपराग होने पर विषय चित्त तक पहुँचने से चित्त बाह्य विषय से (उसके ज्ञान से) उपरक्त होगा (रंग जाएगा) जिसको प्रत्यक्ष कहते है। जिस वस्तु से इंद्रिय का संपर्क हो रहा है उसमें सामान्य तथा विशेष दोनों धर्म होंगे और दोनों का ज्ञान पहुंचेगा परंतु प्रत्यक्ष में विशेष धर्म की प्रधानता रहती है।

इंद्रिय बाह्य विषय के उसी गुण को ग्रहण करेगी जिसकी उसमें स्वयं में प्रधानता है। अर्थात् जिस द्रव्य की प्रधानता उसकी रचना में है उसके गुण को। चक्षु इंद्रिय में अग्नि की प्रधानता है वह रूप को ग्रहण करेगी, श्रोत्र में आकाश की वह शब्द को, रसना में जल की वह रस को तो स्पर्शन इंद्रिय में वायु की प्रधानता होने से वह स्पर्श को और घ्राण इंद्रिय में पृथ्वी की प्रधानता होने से वह गंध को ग्रहण करेगी। प्रत्येक इंद्रिय मात्र स्वयं का विषय ही ग्रहण कर सकती है अन्य कोई विषय नहीं जैसे आँख से सुन नहीं सकते, कान से चख नहीं सकते।

अनुमान : लिंग को जान कर लिंगी का ज्ञान होना अनुमान प्रमाण है। अनुमान प्रमाण में सामान्य ज्ञान की प्रधानता रहती है। वह निश्चित ज्ञान होने पर भी प्रत्यक्ष की भांति विशेष प्रधान नहीं होता।

आगम : आप्त के उपदेश को जो आप्त ने स्वयं के द्वारा जाना गया अर्थ दूसरे को जनाने के लिए किया है उसे सुन कर हुआ ज्ञान आगम (जो आगे से चला आया है) प्रमाण है। इसे शब्द प्रमाण भी कहते है।


विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्। १.८

विपर्यय मिथ्या ज्ञान है। वह पदार्थ के वास्तविक स्वरूप को प्रकाशित नहीं करता है।

यथार्थ ज्ञान प्रमाण है और मिथ्या विपर्यय। प्रमाण में प्रवृत्ति सामर्थ्य है, विपर्यय में नहीं। जैसे चक्षु से जल दिखने पर यदि वहाँ जा कर जल की प्राप्ति होती है तो वह प्रमाण है पर यदि नहीं (जैसे मृगजल में) तब वह इंद्रिय के द्वारा दिखाया गया होने पर भी मिथ्या ज्ञान अर्थात् विपर्यय है।

विपर्यय का खंडन प्रमाण से होता है। विपर्यय को अविद्या भी कहते है जो समस्त दुखों को उत्पन्न करने का कारण बनती है।

बुधवार, 8 मार्च 2023

मोक्ष पर चित्त आत्मा को छोडता है अथवा आत्मा चित्त को?

हमने पढ़ा था,

"चित्त जीवात्मा की संपत्ति है और चित्त और जीवात्मा का संबंध प्रवाह से अनादि है। यह संपत्ति परमात्मा ने जीवात्मा को भोग और अपवर्ग सम्पन्न करने के लिए अर्थात् धर्म अर्थ काम मोक्ष की प्राप्ति के लिए दी है। जब तक उसका काम समाप्त नहीं होता वह आत्मा को छोड कर नहीं जाएगा। मोक्ष पर उसका काम समाप्त हो जाता है और जीवनमुक्त का शरीर समाप्त होने पर चित्त जो प्रकृति से बना है उसका प्रकृतिलय हो जाता है। (i.e. its raw material is fully reclaimed in its pure form - सत्त्व रजस् तमस्)"

i.e. चित्त और आत्मा के संयोग को समझने के लिए ऐसे वाक्य प्रयोग किए गए थे,
"जब तक उसका काम समाप्त नहीं होता वह आत्मा को छोड कर नहीं जाएगा।"
"मोक्ष से पहले चित्त आत्मा को नहीं छोडेगा, उसका अधिकार समाप्त करना = मोक्ष प्राप्ति"

परंतु कुछ विचार करने पर मैं स्वयं इस संयोग को समझने के लिए इस तरह के शब्द प्रयोग नहीं करना चाहूँगी।

हम भले ही यह जानते है की चेतन आत्मा है और चित्त तो जड पदार्थ है और कर्तृत्व चेतन में ही होता है जड में नहीं, और हम यह भी समझते है की मोक्ष पर आत्मा को चित्त रूपी साधन की आवश्यकता नहीं रहेगी और इस आवश्यकता के अभाव के कारण संयोग समाप्त होगा। ऐसे में, "चित्त का अधिकार", "चित्त का आत्मा को छोड को जाना" एक आलंकारिक अथवा कहो सामान्य रीति से बोलचाल में प्रयोग होने वाली भाषा जिसका तात्पर्य हम समझते है (की कार्य जड नहीं कर रहा।) उस भांति का प्रयोग है। यह स्वीकार करते हुए भी की इसको आलंकारिक/बोलचाल वाले प्रयोग के रूप में समझना कठिन नहीं है, मुझे ऐसे वाक्य प्रयोग करने में फिर भी यह आपत्तियाँ है।

१) इंद्रियों का ऐसा प्रयोग जो ज्ञान से विपरीत हो प्रज्ञा अपराध कहा जाता है जो सर्व रोग, दुखों का कारण बनता है। तो यह जानते हुए की कर्तृत्व चेतन में है, वाणी से जड में उसका प्रयोग करने का कोई औचित्य नहीं है।

२) खास करके प्रारंभिक विद्यार्थी, जो अभी सिद्धांतों को पहेली बार सिख रहा है, आत्मसात कर रहा है, वहाँ यह उसके सर्वश्रेष्ठ साधन चित्त की कार्यक्षमता में बाधा उत्पन्न करेगा। आत्मा चेतन होने से वह ज्ञान को ग्रहण करेगा पर चित्त जड होने से उसमें मात्र जानकारियों का संग्रह होगा। चित्त रूपी साधन हमें न मात्र जानकारियों का संग्रह करने के काम आता है पर समय आने पर उन जानकारियों को उभारने (स्मृति), उनको नए प्रसंग के संदर्भ में जोडकर नए ज्ञान तक पहुँचने में सहायक होने (तर्क/अनुमान) के काम भी आता है।

ऐसे में, इतनी महत्वपूर्ण/मार्मिक जानकारी को 'जड कार्य कर रहा है परंतु याद रहे यह मात्र सामान्य भाषा प्रयोग है वास्तव में चेतन ही कार्य करता है।' इस रूप में संग्रह न करते हुए सीधे सीधे 'चेतन कार्य करता है' इस रूप में संग्रहीत करना हमारे आगे के ज्ञान प्राप्ति के प्रयत्नों में अधिक उपयोगी होगा। चित्त में गलत संस्कार और साथ में एक note की यह संस्कार गलत है डालने से अच्छा नहीं है की हम सही संस्कार ही डालें? और फिर संग्रहीत जानकारी के प्रयोग का अवसर आने पर हो सकता है की यह note कहीं मिले तो कहीं छूट भी जाए।

आत्मा का चित्त को छोड देना समझना सरल भी है। आत्मा हमेशा सुख प्राप्ति के उपाय करता रहता है। क्योंकि चित्त रूपी साधन उसे सुख प्राप्ति में सहायक बनता है वह उससे काम लेता रहता है। परंतु जब आत्मा स्वयं को उस लायक बना लेता है की चित्त के उपयोग से मिलने वाले सुख से भी अधिक सुख प्राप्त कर सके, चित्त का उसे तब कोई उपयोग नहीं रहता। तो अब चित्त रूपी inferior साधन से संयोग का (दुख रूपी) मूल्य चुकाने का कोई औचित्य भी नहीं बनता।

उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति के नेत्र ठीक न होने से उसे उपनेत्र लगाने की आवश्यकता पड़ती थी पर अब उसने अपने नेत्र को ठीक कर लिया है और बिना उपनेत्र के भी अच्छे से देख सकता है तब हम कहेंगे की उसके उपनेत्र छूट गए न की उसके उपनेत्र उसे छोड कर चले गए। ऐसे ही मोक्ष पर चित्त का छूटना है।

हाँ हो सकता है जब सारे सिद्धांत दृढ हो तब तो ऐसे शब्द प्रयोग से कोई नुकसान न हो जैसे हम सूर्य उगा कहते है पर हमारे मन में हमेशा यह स्पष्ट होता है की पृथ्वी घूमी है तब सूर्य क्षितिज पर दिख रहा है। ऐसे ही यहाँ विद्वानों को चित्त चला गया कहने पर कोई अंतर नहीं आएगा पर जब तक हम स्वयं को विद्वान की कोटि में न रखे तब तक कर्तृत्व का प्रयोग चेतन में ही करना उचित लगता है।