सामान्यदृष्टान्तयोरैन्द्रियकत्वे समाने नित्यानित्यसाधर्म्यात् संशयसमः। ५.१.१४
सामान्य (दृष्टांत की जाति) और दृष्टांत के समान रूप से इंद्रियग्राह्य होने पर नित्य जाति और अनित्य दृष्टांत के समान धर्मों के कारण किया गया प्रतिषेध संशयसम प्रतिषेध है।
पहले की भांति नीचे का विस्तार मेरा किया है। भाष्य से मेल नहीं खाता।
सामान्य उसे कहते है जो विशेष (यहां हमारे दृष्टांत) की जाति हो। जैसे यदि दृष्टांत गौरी गाय है तो जाति गौ हुई।
अब अनेक प्रसंगों में, जब हम कोई जाति से परिचित न हो तब यह होता है की हमें उन जाति के सारे सदस्य एक से लगे परंतु जो उनसे चिरपरिचित है उन्हें प्रत्येक सदस्य की भिन्नता अपने आप दृष्टिगोचर होगी। (कभी सोचा है की ये सारे चिनी जापानी लोग एक से तो लगते है उनमें से कौन कौन है यह कैसे कोई पहचानता होगा और उनसे पूछो तो वे भी हमें देखकर ऐसा ही कहते होंगे संभवतः)
अब जाति के सब सदस्यों में जाति के अनुरूप समान धर्म होते हुए भी प्रत्येक के विशेष धर्म भी होते है। पर जो विशेषज्ञ नहीं है उसके लिए उन विशेष धर्मों को देख पाना कभी कभी असंभव सा हो सकता है। (आप ने कभी पक्षीयों के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जनाने के स्तर पर रहते हुए उन में से अनेक की जाति (species) जनाने का प्रयत्न किया होगा तो आप से अधिक इस बात को किस ने भुगता, अर्थात् जाना होगा?)
यह बात medical imaging reports में भी देख सकते है। हमें सारे चित्र एक से लगेंगे जब की विशेषज्ञ उससे विशेष की सिद्धि कर सकता है। यहां तक की (कोई भी क्षेत्र में, मात्र मेडिकल क्षेत्र में नहीं) यदि विशेषज्ञ कहलाने वाला सच में सूक्ष्म ज्ञान नहीं रखता तो विशेष को सामान्य (normal) अथवा ऐसा विशेष जो वह नहीं है ऐसा समझ सकता है। ऐसे में प्रतिवादी को यदि दृष्टांत में मात्र सामान्य धर्म ही दिख रहे है तो उसका यह विरोध करना की विशेष सिद्ध नहीं होता अतार्किक नहीं लगता। परंतु इसी बात का लाभ जब विशेष धर्म दिख रहे हो तब भी यह सोचकर उठाने का प्रयत्न करना की वादी उसे नहीं दिखा पाएगा वह जाति प्रयोग बनेगा।
उत्तर
साधर्म्यात्संशये न संशयो वैधर्म्यादुभयथा वा संशयेऽत्यन्तसंशयप्रसङ्गो नित्यत्वानभ्युपगमाच्च सामान्यस्याप्रतिषेधः। ५.१.१४
समान धर्मों के कारण संशय होने पर भी वैधर्म्य के कारण संशय नहीं रहता। यदि जहां साधर्म्य और वैधर्म्य दोनों हो तब भी संशय किया जाए तब तो संशय नित्य बना रहेगा। (पर विशेष धर्म की उपस्थिति में भी मात्र) समान धर्मों के कारण संशय नहीं माना जाता इसलिए यह संशयसम प्रतिषेध खंडन करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
वादी को वह विशेष धर्म जो दृष्टांत (और साध्य) में है उन्हें दिखाकर इस का उत्तर देना चाहिए।