शब्द प्रमाण का लक्षण हमने देखा था,
आप्तोपदेशः शब्दः। १.१.७
आप्त पुरुष का कथन शब्द प्रमाण कहलाता है।
https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/05/1.1.6-7.html
अब परीक्षा सूत्र देखते है।
संक्षेप में,
पूर्वपक्षी का कहना है की शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण से भिन्न नहीं है। क्योंकि,
१. जब हम शब्द प्रमाण से कुछ जानते है तब अर्थ का प्रत्यक्ष तो करते नहीं वह तो उनुपलब्ध ही रहता है जैसे अनुमान में।
२. दोनों में ज्ञान की प्रवृत्ति एक सी ही होती है।
३. जैसे अनुमान में अग्नि को धूम के साथ के संबंध से जानते है ऐसे अर्थ के शब्द के साथ के संबंध से शब्द प्रमाण में ज्ञान होता है।
उत्तर :-
१. शब्द प्रमाण में आप्त पुरुष के सामर्थ्य से शब्द के अर्थ का ज्ञान होता है। अनुमान में जैसे लिंग को जानकर व्याप्ति ज्ञान से लिंगी का ज्ञान होता है ऐसा यहाँ नहीं है।
२. अनुमान में लिंग के और व्याप्ति के प्रमाण होते है जिसके आधार पर अप्रत्यक्ष का ज्ञान होता है शब्द में ऐसे कोई प्रमाणों की उपलब्धि से नहीं अपितु आप्त के सामर्थ्य से ही अर्थ का ज्ञान होता है। (वैसे आप्त के शब्द भी आप्त के प्रत्यक्ष/अन्य प्रमाण से यथार्थ ज्ञान पर आधारित होते है पर जिसे शब्द प्रमाण से ज्ञान हो रहा है उसके पास अन्य प्रमाणों की उपलब्धि नहीं है।)
३. न ही जैसे आप (पूर्वपक्षी) कह रहे हो ऐसे अर्थ से संबंध। यदि शब्द का अर्थ से व्याप्ति संबंध होता तो पूरण जलन कहते ही मुख भर जाता, जल जाता।
पूर्वपक्षी :-
शब्द और अर्थ जुडे हुए तो है आप उनके संबंध का निषेध नहीं कर सकते।
उत्तर :-
उनका संबंध संकेत अर्थात् वाच्यवाचकभाव का है व्याप्ति का नहीं।
उनके संबंध का अलग अलग जाती और देश में अलग अलग होने से भी देखा जाता है की कोई एक शब्द का कोई एक अर्थ के साथ नियमपूर्वक संबंध हो ऐसा नहीं है। (भिन्न भिन्न भाषाओं में एक ही शब्द भिन्न भिन्न अर्थों के लिए प्रयोग किए जाते है और एक अर्थ को कहने के लिए सब के भिन्न भिन्न शब्द भी होते है।)
सूत्र सहित
पूर्वपक्षी :-
शब्दोऽनुमानमर्थस्यानुपलब्धेरनुमेयत्वात्। २.१.४७
शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण ही है। अर्थ की अनुपलब्धि होने से, अर्थ अनुमेय होने से।
जब हम शब्द प्रमाण से कुछ जानते है तब अर्थ का प्रत्यक्ष तो करते नहीं वह तो उनुपलब्ध ही रहता है जैसे अनुमान में। इसलिए शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण से भिन्न नहीं है।
उपलब्धेरद्विप्रवृत्तित्वात्। २.१.४८
ज्ञान की प्रवृत्ति एक सी होने से। (भी शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण से भिन्न नहीं है।)
अनुमान प्रमाण से जैसा ज्ञान होता है ऐसा ही ज्ञान शब्द प्रमाण से भी होता है।
सम्बन्धाच्च। २.१.४९
और संबंध होने से भी। (शब्द और अर्थ का संबंध)
जैसे अनुमान में अग्नि को धूम के साथ के संबंध से जानते है ऐसे अर्थ के शब्द के साथ के संबंध से शब्द प्रमाण में ज्ञान होता है इसलिए शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण ही है।
उत्तर :-
आप्तोपदेशसामर्थ्याच्छब्दादर्थसम्प्रत्ययः। २.१.५०
आप्त पुरुष के सामर्थ्य से शब्द के अर्थ का ज्ञान होता है।
लिंग को जानकर व्याप्ति ज्ञान से लिंगी का ज्ञान जैसे अनुमान में होता है ऐसा यहाँ नहीं है।
प्रमाणतोऽनुपलब्धेः। २.१.५०
प्रमाणों से उपलब्धि न होने से।
अनुमान में लिंग के और व्याप्ति के प्रमाण होते है जिसके आधार पर अप्रत्यक्ष का ज्ञान होता है शब्द में ऐसे कोई प्रमाणों की उपलब्धि से नहीं अपितु आप्त के सामर्थ्य से ही अर्थ का ज्ञान होता है। (वैसे आप्त के शब्द भी आप्त के प्रत्यक्ष/अन्य प्रमाण से यथार्थ ज्ञान पर आधारित होते है पर जिसे शब्द प्रमाण से ज्ञान हो रहा है उसके पास अन्य प्रमाणों की उपलब्धि नहीं है।)
पूरणप्रदाहपाटनानुपलब्धेश्च सम्बन्धाभावः। २.१.५२
पूरण जलन पाटन (फटना) की उपलब्धि न होने से संबंध का अभाव है।
अनुमान की तरह यहाँ भी व्याप्ति है इस के उत्तर में यहाँ कहा है की पूरण जलन पाटन जैसे शब्द बोलते ही हमारा मुख भर नहीं जाता, जल नहीं जाता, फट नहीं जाता, अर्थात् उन शब्दों के साथ अर्थ की व्याप्ति नहीं है।
और न ही जैसे आप (पूर्वपक्षी) कह रहे हो ऐसे अर्थ से संबंध। यदि शब्द का अर्थ से व्याप्ति संबंध होता तो पूरण जलन कहते ही मुख भर जाता, जल जाता।
पूर्वपक्षी :-
शब्दार्थव्यवस्थानादप्रतिषेधः। २.१.५३
शब्द और अर्थ की व्यवस्था के कारण संबंध का निषेध नहीं कर सकते।
शब्द और अर्थ जुडे हुए तो है आप उनके संबंध का निषेध नहीं कर सकते।
उत्तर :-
न सामयिकत्वाच्छब्दार्थसम्प्रत्ययस्य। २.१.५४
नहीं (व्याप्ति संबंध नहीं है), संकेत व्यवस्था से शब्द से अर्थ का बोध होता है।
उनका संबंध संकेत अर्थात् वाच्यवाचकभाव का है व्याप्ति का नहीं।
*संकेत, समय, शक्ति और वाच्यवाचकभाव यह सब न्याय में समानार्थी है।
जातिविशेषे चानियमात्। २.१.५५
उनके संबंध का अलग अलग जाती और देश में अलग अलग होने से भी देखा जाता है की कोई एक शब्द का कोई एक अर्थ के साथ नियमपूर्वक संबंध हो ऐसा नहीं है। (भिन्न भिन्न भाषाओं में एक ही शब्द भिन्न भिन्न अर्थों के लिए प्रयोग किए जाते है और एक अर्थ को कहने के लिए सब के भिन्न भिन्न शब्द भी होते है।)