सोमवार, 22 अगस्त 2022

प्राप्यसमा, अप्राप्यसमा जाति

प्राप्यसमा, अप्राप्यसमा जाति

प्राप्य साध्यमप्राप्य वा हेतोः प्राप्त्याविशिष्टत्वादप्राप्त्यासाधकत्वाच्च प्राप्त्यप्राप्तिसमौ। ५.१.७

साध्य को सिद्ध करने के लिए दिया गया हेतु यदि उसे प्राप्त करता है (साथ में होता है/संबंध रखता है) तो दोनों समान हो जाते है कौन किसको सिद्ध करेगा और यदि वह साध्य के साथ दिखता ही नहीं/संबंध नहीं रखता तब तो उससे साध्य की सिद्धि का प्रश्न ही नहीं उठता ऐसे उत्तर क्रम से प्राप्यसमा और अप्राप्यसमा जाति कहलाते है।

इन के लिए दिया जाने योग्य उत्तर।

घटादिनिष्पत्तिदर्शनात्पीडने चाव्यभिचारादप्रतिषेधः। ५.१.८

घट आदि कार्य की निष्पत्ति कारणों से कैसे होती है यह देख पाने से (प्राप्यसमा का उत्तर), अभिचार से शत्रु को हानि पहुँचाने के समान (अप्राप्यसमा का उत्तर)।
 
इन दो जाति तथा उसके उत्तर पर पुस्तकों में बहुत अधिक कोई चर्चा नहीं है। संस्कृत भाष्य में अभिचार से शत्रु को हानि पहुँचाना ही लिखा है। अभिचार को खोल नहीं गया, न कोई अन्य अर्थ दिया गया है और हिन्दी भाष्यकारों ने अभिचार का अर्थ शत्रु को हानि पहुँचने के लिए किया गया तंत्र मंत्र / जादू टोना किया है। अभिचार को यहां जादू टोने/तंत्र मंत्र के अर्थ में लेने के बदले मैं नीचे की चर्चा में लेना चाहूँगी।

ये दोनों जाति पुस्तकों से ज्यादा समझ नहीं आई थी और मैं भी संभवतः सूत्रकार ने ऐसी जाति क्यों गिनाई होगी ऐसा प्रश्न ले कर आगे निकल गई होती।

परंतु वर्तमान समय में इन दोनों जाति को समझाने के लिए बाहर का वह जगत जिसमें हम जी रहे है वह पर्याप्त है। वैसे भी न्याय व्यावहारिक शास्त्र है तो वह जैसे व्यवहार जगत को समझने में उपयोगी है ऐसे ही व्यवहार जगत भी उसे समझने में उपयोगी होना स्वाभाविक है।

प्राप्यसमा, अप्राप्यसमा जाति को समझने का मेरा प्रयास।

ये दोनों जाति को हम कारण कार्य को कैसे निष्पन्न करता है (Mechanism of action) इस जानकारी के अभाव को सिद्ध करने के तथा उस अभाव को वादी के खंडन के लिए प्रयोग करने के जातिवादी के प्रयास के रूप में देख सकते है।
 
प्राप्यसमा : यहां साधन साध्य की एक साथ प्राप्ति को जातिवादी भी अस्वीकार नहीं कर पाता तो उनके बीच की व्याप्ति को असिद्ध दिखाने लिए कार्य कारण संबंध की अप्राप्ति दिखाने का प्रयत्न करता है। ऐसा करने के लिए वह कारण से (अकेले अथवा अन्य कारणों से मिलकर) कार्य सम्पन्न कैसे होता है इस के बारे में ज्ञान के अभाव का आलंबन लेता है। यह कारण से कार्य निष्पन्न होने के ज्ञान का अभाव दिखाने का उसका प्रयत्न ऐसा ज्ञान स्पष्ट होते हुए भी हो सकता है और स्पष्ट न होते हुए भी। (प्राप्यसमा : Invoking "correlation is not causation" claiming that there is no mechanism of action and therefore cause-effect relationship doesn't exist (when it does exist))

उत्तर : घटादिनिष्पत्तिदर्शनात्
जहां साध्य तथा साधन का संबंध प्रत्यक्ष/ज्ञात है, जैसे घट आदि कार्य, वहां साधन साध्य को कैसे सिद्ध करता है/कारणों से कार्य की निष्पत्ति कैसे होती है वह भी देखा/समझा जाता है। तो वहां प्राप्यसमा जाति असत् उत्तर सिद्ध होती है और उससे वादी का खंडन नहीं हो पाता।

अप्राप्यसमा : यहां जातिवादी साधन साध्य एक साथ प्राप्त ही नहीं है, उनके बीच में संबंध ही नहीं है यह दिखाने का प्रयत्न करता है। और जब कार्य कारण में कोई संबंध ही नहीं होगा तो कारण कार्य को कैसे सिद्ध करेगा। (If Jativadi manages to claim lack of correlation itself, he wont have to invoke 'correlation is not causation', which is more difficult argument to win when two things are related and people can see it much more easily if correlation is not hidden.)

उत्तर :- पीडने अभिचारात्
जहां कार्य करने से पहले कार्य सिद्धि का उपाय सोचकर अत्यंत सुव्यवस्थित तैयारी करके* (और उस तैयारी/प्रक्रिया को सार्वजनिक न करते हुए/सब को समझ में आए ऐसी न होने पर भी) उसे किया जाता है तो वह जादू जैसा लगने पर भी कारण से सम्पन्न हुआ कार्य होता है। (cause-effect relationships can exist where link between cause and effect/mechanism of action stays unknown or are intentionally hidden by well thought out measures).

जैसे गुप्तचर द्वारा दुश्मन को हानि पहुंचाना (जिसमें हानि तो दिखती है पर गुप्तचर नहीं जिसने शत्रु को प्राप्त करके हानि पहुंचाई है। और जिसने हानि पहुंचाने का संकल्प किया है वह भी शत्रु को प्राप्त करता हुआ नहीं दिखता। अर्थात् शत्रु को हानि पहुंचाने की इच्छा करने वाले और शत्रु की हानि होने के कार्य के बीच कोई संबंध ही नहीं दिखता)

कारण और कार्य का एक समय/स्थल पर साथ में न दिखना अथवा कारण से कार्य की निष्पत्ति की प्रक्रिया की जानकारी का अभाव मात्र यह सिद्ध नहीं कर सकता की कार्य कारण संबंध है ही नहीं और वादी का खंडन करने में मात्र यह उत्तर असमर्थ है और अप्राप्यसमा जाति सिद्ध होता है।

* अभिचार = पुरश्चरण = कार्य के पहले उसके उपाय को सोचकर अत्यंत सुव्यवस्थित तैयारी के साथ कार्य करना। वर्तमान में व्यवहार में यह शब्द तंत्र मंत्र से शत्रु हानि के लिए रूढ है पर किसी शब्द का वर्तमान में रूढ प्रयोग उसके यौगिक अर्थ को असिद्ध नहीं करता जब की यौगिक अर्थ उपयुक्त भी हो। और फिर कार्य के पहले उसके उपाय को सोचकर अत्यंत सुव्यवस्थित तैयारी कर गुप्त रूप से उस कार्य की सिद्धि करने का शत्रु हानि से अधिक उपयुक्त उदाहरण क्या हो सकता है। तो उस शब्द का शत्रुहानि के साथ हानिकर्ता की प्राप्ति न होने दे ऐसे कार्य के लिए रूढ होना भी यौगिक अर्थ से सुसंगत ही है।

वैसे जनसामान्य का ज्ञानस्तर जब अति निम्न हो जाए तब तो विशेष ज्ञान से किए गए कार्य जादू से कम नहीं लगते भले ही उनके पीछे के ज्ञान को छुपाने के लिये कोई प्रयत्न न किया गया हो (लोग उन्हें शब्द प्रमाण से जादू टोना अथवा विज्ञान मान लेते है फिर)।

"Any sufficiently advanced technology is indistinguishable from magic." - Clarke's third law

यदि वादी कार्य कारण संबंध जिससे साधन धर्म से साध्य धर्म की सिद्धि होती है वह स्वयं समझने में अथवा समझाने में अथवा कम से कम इतना समझाने में की कार्य निष्पत्ति की पूरी प्रक्रिया सामने न होने पर भी कारण से ही कार्य हो रहा है वह स्पष्ट है, निष्फल रहता है तो जातिवादी सफल रहता है। 

कारण से कार्य की निष्पत्ति सिद्ध करना किन किन परिस्थितियों में कठिन रहता है उसे समझने का प्रयत्न करते है जिससे इस जाति का व्यवहार में कैसे उपयोग होता है वह समझने में सरलता रहे।

१) वह ज्ञान (mehcanism of action) तक अभी तक मनुष्य पहुँच ही नहीं पाया है / पूर्ण रूप से पहुँच नहीं पाया है। (परंतु अनुमान प्रमाण से कार्य कारण संबंध का होना ज्ञात होता है)

२) वह ज्ञान कुछ लोगों के पास है पर अभी वह अन्य तक पहुंचा नहीं है / उन्होंने अन्यों को नहीं बताया है। (जातिवादी इस आशा में है की उसका प्रतिवादी उन लोगों में से है जो कारण से कार्य कैसे निष्पन्न होता है वह नहीं समझ पाए है / नहीं समझा पाएंगे)

३) उस ज्ञान को प्रस्तुत करने में विविध प्रकार की बाधाएं खड़ी कर दी गई है। जिससे कार्य कारण संबंध को थोडा अथवा बहुत छुपाना संभव हो पाये।

४) उस ज्ञान तक कोई स्वयं पहुँच न पाए इस हेतु से उस प्रक्रिया से संलग्न विविध जानकारियों/प्रमाणों को दूषित करने का प्रयत्न किया गया है।

(सूत्र ५.१.८ में दिए गए दो उदाहरण mechanism of action के ज्ञात होने / न होने के दो छोर के उदाहरण है। घट आदि वह छोर का उदाहरण है जहां वह जन सामान्य को सहज प्रत्यक्ष है और अभिचार वह जहां उसे योजनाबद्ध रूप से प्रयत्नपूर्वक अप्रत्यक्ष किया गया है। इस के बीच में रहने वाली परिस्थितियाँ इन दो के उल्लेख से गृहीत हो जाती है ऐसा मुझे लगता है।)

इससे यह भी समझ में आता है की जब व्यवहार में जाति (अथवा हेत्वाभास/छल) का प्रयोग होता है तब वह प्रयोग एक विस्तृत रणनीति का एक भाग भी हो सकता है, उसी एक प्रयोग के बल पर जातिवादी (जल्प / वितंडा में प्रवृत्त पक्ष) विजय प्राप्ति की आशा लगाए रखा हो ऐसा नहीं।

प्रश्न यह उठ सकता है की यदि जूठ/बल से निर्णय प्रभावित हो सकता है तो फिर छल जाति हेत्वाभास की क्या आवश्यकता? परंतु मनुष्य स्वयं को सत्यग्राही देखना चाहता है तब भी जब उसकी प्रीति असत्य में हो। तब असत्य को छल जाति हेत्वाभास से उतना ढकने का प्रयत्न किया जाता है जिससे वह सत्य सा लगने लगे। और उनकी सहायता मिलने पर जूठ/बल प्रयोग पर कम मेहनत करनी पडे।

प्रारंभ में कहा गया "वैसे भी न्याय व्यावहारिक शास्त्र है तो वह जैसे व्यवहार जगत को समझने में उपयोगी है ऐसे ही व्यवहार जगत भी उसे समझने में उपयोगी होना स्वाभाविक है।" बाह्य व्यवहार जगत के लिए तो सत्य है ही पर हमारे आंतरिक जगत में भी लगभग ऐसी ही स्थितियाँ मिलती है (यथा ब्रह्मांडे तथा पिण्डे)।

हमारे अंदर भी हमारे दोष प्राप्त करने योग्य को छोडने योग्य और छोडने योग्य को प्राप्त करने योग्य सिद्ध करने के लिए जाति हेत्वाभास का प्रयोग करते ही रहते है तभी तो बाहरी तथ्य एक से होने पर भी हम सब अपने अपने दोषों के वैविध्य और न्यूनाधिकता के अनुसार भिन्न भिन्न विषयों में भिन्न भिन्न निर्णयों पर पहुंचते है। कोई व्यक्ति एक विषय का सत्य सरलता से देख पाता है तो दूसरा अन्य कोई विषय का। ऐसे ही हम त्रुटियाँ भी भिन्न भिन्न प्रकार की और भिन्न भिन्न मात्रा में करते है।

उन हेत्वाभासों, जातियों को, जो हम स्वयं के सामने ही प्रयोग करते है, उनको भी पकडकर उनपर विजय पाना न्यायशास्त्र हमें सिखा सकता है। और फिर किसी और के लिए सत्य सिद्ध करने से कहीं अधिक लाभदायक स्वयं सत्य जानना है क्योंकि जाति प्रयोगों में फंसकर हम स्वयं की हानि ही करते है यहां तक भी वह घातक भी हो सकता है।



शुक्रवार, 12 अगस्त 2022

उत्कर्षसमा अपकर्षसमा वर्ण्यसमा अवर्ण्यसमा विकल्पसमा साध्यसमा जाति (५.१.४-६)

अगला सूत्र छह जाति बताता है।

साध्यदृष्टान्तयोर्धर्मविकल्पादुभयसाध्यत्वाच्चोत्कर्षापकर्षवर्ण्यावर्ण्यविकल्पसाध्यसमाः। ५.१.४

साध्य तथा दृष्टान्त दोनों के धर्म विकल्प-विविधता से और दोनों के साध्य होने (की आपत्ति देने) से उत्कर्षसमा अपकर्षसमा वर्ण्यसमा अवर्ण्यसमा विकल्पसमा साध्यसमा जाति कही जाती है।

छह जाति का स्वरूप बताने के लिए दो हेतु सूत्र में दिए गए है। "साध्य तथा दृष्टान्त दोनों के धर्म विकल्प से" इस हेतु से प्रथम पाँच जाति तथा "(साध्य तथा दृष्टान्त) दोनों के साध्य होने से" अंतिम साध्यसमा जाति का वर्णन है।

उत्कर्षसमा : उदाहरण साधन धर्म और साध्य धर्म को लिए हुए होता है। अब यदि प्रतिवादी उदाहरण का कोई अन्य धर्म पकडकर उसे भी साध्य में आरोपित करने लगे तब वह उत्कर्षसमा जाति बनेगी।

जैसे वादी ने कहा शब्द अनित्य है, उत्पत्तिधर्म वाला होने से। जैसे स्थाली। अब यदि प्रतिवादी कहे की स्थाली में तो स्पर्श धर्म भी है। यदि स्थाली की तरह शब्द है तो उसे भी स्पर्श वाला होना चाहिए। यहाँ उदाहरण का स्पर्श धर्म साध्य में आरोपित किया जाना उत्कर्षसमा जाति है।

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P.S. आगे अनुत्पत्तिसम प्रतिषेध में मैंने यह लिखा है।

"जाति प्रयोग तर्क के वह प्रयोग है जो प्रमाण तक नहीं पहुंचाते। तर्क के प्रमाण तक न पहुंचा पाने के पीछे अपूर्ण तर्क, प्रमाणों से विसंगतता, अप्राप्त प्रमाण जैसे कारण रहते है जो जाति प्रयोगों में देखने मिलते है। परंतु जाति प्रयोग का अस्तित्व उस बात का सूचक है की वे सद् उत्तर जैसे लग सकते है। यदि उनके सफल होने की कोई संभावना ही न होती तो वह प्रयोग में ही न आते। क्योंकि जो तर्क कभी भी सद् उत्तर न बन पाए वह सद् उत्तर जैसा कभी लग भी नहीं सकता। इससे हम स्वयं की जाति समझ की एक परीक्षा कर सकते है। क्या हम ऐसे उदाहरण देख सकते है जहां जाति लक्षण (जिस तर्क को जाति का लक्षण बताया गया है) वादी की व्याप्ति का खंडन करता हो। (P.S. जाति प्रकरण के अंत में इसे संशोधित करेंगे। क्योंकि इस तर्क में त्रुटि, अपूर्णता है।)"

उत्कर्षसमा के प्रसंग में एक उदाहरण लेते है। वादी: वो दूर बैठा हुआ पक्षी कौवा है। काला होने से। जैसे यह पास बैठा हुआ कौवा। प्रतिवादी: पर ये कौवा तो का का बोलता है, वह पक्षी तो कू कू बोल रहा है।

अनेक बार कुछ धर्म एक दूसरे से जुडे रहते है ऐसे में प्रतिवादी का प्रश्न स्वाभाविक भी हो सकता है। तो उसे जाति कहने से पहले हमेशा देखे की १) उसकी व्याप्ति गलत है २) उसने खंडन के भाव से बात कही है)
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अपकर्षसमा : यदि प्रतिवादी उदाहरण में कोई धर्म का अभाव पकडकर उसे भी साध्य में से निकालने लगे तब वह अपकर्षसमा जाति बनेगी।

जैसे वादी ने कहा शब्द अनित्य है, उत्पत्तिधर्म वाला होने से। जैसे स्थाली। अब यदि प्रतिवादी कहे की स्थाली सुनाई नहीं देती है (स्थाली के संयोग विभाग से उत्पन्न हुआ शब्द तो सुनाई देगा पर स्थाली नहीं), यदि स्थाली की तरह शब्द है तो उसे भी नहीं सुनाई देना चाहिए। यहाँ उदाहरण में न मिलने वाले धर्म को साध्य में से भी निकाल देना अपकर्षसमा जाति है।

वर्ण्यसमा, अवर्ण्यसमा : साध्य को वर्ण्य (जिसका वर्णन करना है, जो पहले से ही वर्णित अर्थात् सिद्ध नहीं है) और उदाहरण को अवर्ण्य (जो पहले से ही वर्णित अर्थात् सिद्ध है, अब उसका वर्णन करने की आवश्यकता नहीं है।) कहते है। जब प्रतिवादी अवर्ण्य को वर्ण्य अथवा वर्ण्य को अवर्ण्य बताता है तब उसे वर्ण्यसमा अथवा अवर्ण्यसमा जाति कहते है।

जैसे यदि प्रतिवादी कहता है की यदि साध्य और उदाहरण समान है तब उदाहरण को भी साध्य के जैसे असिद्ध मना जाए (स्थाली के अनित्यत्व को भी असिद्ध - वर्ण्य माना जाए) और फिर ऐसा होने से उदाहरण जो स्वयं असिद्ध है वह क्या किसी और को सिद्ध करेगा? तब उसे वर्ण्यसमा जाति कहेंगे।

यदि वह कहता है की दोनों समान होने से शब्द का अनित्यत्व भी सिद्ध कोटि में आ जाएगा इस लिए वादी का उसे सिद्ध करने का प्रयत्न ही अर्थहीन है। (वह शब्द के अनित्यत्व को नहीं मान रहा, मात्र वादी के कार्य को आधारहीन बता रहा है यह कहकर की आपके हिसाब से तो यह सिद्ध ही है तो क्यों फिर इसे सिद्ध करने के पीछे पडे हो? अर्थात् आपकी प्रवृत्ति से तो यह सिद्ध होता है की साध्य उदाहरण के समान नहीं है तभी तो आपको उसे सिद्ध करने के लिए प्रयत्न करना पड रहा है। ) इसे अवर्ण्यसमा जाति कहेंगे।

विकल्पसमा जाति : पक्ष और दृष्टांत में धर्म के वैविध्य का आश्रय ले कर खंडन करना विकल्पसमा जाति है।

जैसे यदि प्रतिवादी कहता है की स्थाली और शब्द दोनों उत्पत्ति धर्मक होने पर भी स्थाली में तो गुरुता है पर शब्द में नहीं है ऐसे ही अन्य विभिन्न धर्मों के नित्य साहचर्य के अभाव को (व्यभिचार को) दिखा कर यह कहे की फिर उत्पत्ति धर्म और अनित्यत्व में भी तो व्यभिचार हो सकता है इसलिए शब्द का अनित्यत्व उसके उत्पत्ति धर्म से कैसे मान ले। यह विकल्पसमा जाति है। 

साध्यसमा जाति : यहां प्रतिवादी कहेगा की यदि स्थाली शब्द के समान है तब शब्द के समान ही स्थाली का अनित्यत्व भी साध्य कोटि में आएगा। तो पहले स्थाली के अनित्यत्व को तो सिद्ध करो।

साध्यसमा और वर्ण्यसमा में समानता प्रतीत होती है। पर वहां (वर्ण्यसमा में) दृष्टांत को ही नकारा जा रहा है क्योंकि वह साध्य के समान है और यहां साध्यसमा में यह कहा जा रहा है की दृष्टांत में साध्य धर्म है अथवा नहीं यह पहले सिद्ध करो।

अगले दो सूत्र में भाष्यकार इन जातिओ का उत्तर देते है।

किंचित्साधर्म्यादुपसंहारसिद्धेर्वैधर्म्यादप्रतिषेधः। ५.१.५

व्याप्तियुक्त विशेष धर्म से ही सिद्धि होने के कारण कोई भी व्याप्ति रहित धर्म के कारण प्रतिषेध नहीं हो सकता।

दृष्टांत और साध्य में अंतर होता ही है। दृष्टांत साधन साध्य धर्म के संबंध को समझने के लिए होता है साध्य और दृष्टांत की शत प्रतिशत समानता का सूचक नहीं होता। दृष्टांत के ऐसे कोई धर्म का जिसका साध्य से व्याप्ति संबंध नहीं है उपयोग प्रतिषेध के लिए करना असत् उत्तर अर्थात् जाति प्रयोग होगा। 

ऊपर का उत्तर सारी छह जाति के लिए है। उसके उपरांत सूत्रकार वर्ण्यसमा अवर्ण्यसमा तथा साध्यसमा इन तीन जाति के लिए एक और उत्तर देते है। 

साध्यातिदेशाच्च दृष्टान्तोपपत्तेः। ५.१.६

दृष्टांत में साध्य धर्म के प्रत्यक्ष गृहीत होने पर अथवा दृष्टांत युक्तियुक्त होने से।

वर्ण्यसमा अवर्ण्यसमा तथा साध्यसमा में दृष्टांत पर, उसे देने पर अथवा दृष्टांत में साध्य धर्म होने पर ही सवाल उठाए जाते है परंतु दृष्टांत वही बनता है जो प्रसिद्ध हो, जिसमें लौकिक तथा परीक्षक का बुद्धिसाम्य हो ऐसे सर्वमान्य दृष्टांत, जो पहले से सिद्ध है उसे साध्य कोटि में खिंचना अयोग्य खंडन होगा। (यहां योग्य दृष्टांत को अयोग्य बताना गलत है यही कहा जा रहा है। यदि दृष्टांत सच में अयोग्य अथवा असिद्ध हो तब तो उसे ऐसा कहना ही होगा)


गुरुवार, 4 अगस्त 2022

जाति लक्षण ५.१.१-३

प्रथम अध्याय में हमने न्यायदर्शन के सोलह पदार्थों में से चौदह पदार्थों के विभाग सहित लक्षण देखे। पांचवें अध्याय में अब हम बाकी की दो पदार्थ जाति और निग्रहस्थान के लक्षण देखेंगे।

जाति का सामान्य लक्षण हमने प्रथम अध्याय में इस प्रकार देखा था।

"साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानं जातिः। १.२.१८
(व्याप्ति के अभाव में भी) केवल कुछ साधर्म्य अथवा वैधर्म्य को लेकर जो प्रत्यवस्थान (दोष निरूपण) किया जाता है वह जाति है।"

और यह की उसके २४ भेद हो सकते है।

प्रथम सूत्र में इन २४ भेदों का उद्देश किया गया है।

साधर्म्यवैधर्म्योत्कर्षापकर्षवर्ण्यावर्ण्यविकल्पसाध्यप्राप्त्यप्राप्तिप्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तानुत्पत्तिसंशयप्रकरणहेत्वर्थापत्त्यविशेषोपपत्त्युपलब्ध्यनुपलब्धिनित्यानित्यकार्यसमाः। ५.१.१

साधर्म्यसमा वैधर्म्यसमा उत्कर्षसमा अपकर्षसमा वर्ण्यसमा अवर्ण्यसमा विकल्पसमा साध्यसमा प्राप्तिसमा अप्राप्तिसमा प्रसङ्गसमा प्रतिदृष्टान्तसमा अनुत्पत्तिसमा संशयसमा प्रकरणसमा हेतुसमा अर्थापत्तिसमा अविशेषसमा उपपत्तिसमा उपलब्धिसमा अनुपलब्धिसमा नित्यसमा अनित्यसमा कार्यसमा ये २४ जाति के भेद है। 

जाति स्त्रीलिंग शब्द होने से इन भेदों के नाम के साथ जाति जोडने पर इन्हें 'समा' कहा जाएगा पर यदि हम जाति के स्थान पर प्रतिषेध शब्द उपयोग में लाते है तब 'सम' जोडेंगे। साधर्म्यसम प्रतिषेध, वैधर्म्यसम प्रतिषेध ऐसे।

दूसरे सूत्र में प्रथम दो भेद साधर्म्यसमा तथा वैधर्म्यसमा के लक्षण दिए है। 

साधर्म्यवैधर्म्याभ्यामुपसंहारे तद्धर्मविपर्ययोपपत्तेः साधर्म्यवैधर्म्यसमौ। ५.१.२

साधर्म्य वैधर्म्य से वादी द्वारा उपसंहार करने पर साध्य धर्म से विरुद्ध धर्म के साधर्म्य वैधर्म्य मात्र से (व्याप्ति न होते हुए भी) साध्य का अभाव दिखाने का प्रयत्न साधर्म्यसमा तथा वैधर्म्यसमा जाति है।

इस को देखने से पहले हम प्रकरणसम हेत्वाभास (जिसे सत्प्रतिपक्ष भी कहा जाता है) को एक बार याद करते है।

वहां जिस प्रकरण के कारण अनिर्णय की स्थिति बनी हुई थी उसी को हेतु बनाकर प्रस्तुत करने का प्रयत्न था। जैसे यदि एक भी पक्ष को सिद्ध करने का प्रमाण न होने से संशय उत्पन्न हुआ हो और यह हेतु देना की प्रतिपक्ष असिद्ध है। ऐसे ही यह भी हो सकता है की दोनों पक्ष से कुछ कुछ (व्याप्ति रहित) साधर्म्य वैधर्म्य हो और संशय का कारण दोनों पक्ष के धर्म का दिखना हो। तब ऐसे धर्म को साधन धर्म नहीं बना सकते।

हमने पहले एक बार चमगादड़ का उदाहरण लिया था। उसमें पंख होने से नभचरों के साथ साधर्म्य था पर स्तनधारी होने से वैधर्म्य। अब इन्हीं धर्मों को उसके नभचर होने अथवा न होने के हेतु बनाने से निर्णय नहीं होगा। वह इस लिए की यदि एक को हेतु माने तब विरोधी धर्म को भी हेतु मानना पड़ेगा क्योंकि उसमें भी समान बल है। जिससे उसे सत्प्रतिपक्ष हेत्वाभास भी कहा था।

अब यदि यही गलती स्थापना समय पर नहीं अपितु उत्तर देने समय की जाती है तब उसे साधर्म्यसमा अथवा वैधर्म्यसमा जाति कहेंगे।

जैसे वादी ने कहा शब्द अनित्य है। उत्पत्ति धर्म वाला होने से। स्थाली के समान। अब यदि प्रतिवादी कहे की स्थाली में स्पर्श गुण है और वह अनित्य है तो शब्द स्पर्श गुण से रहित होने पर नित्य होना चाहिए। यहां उसका तात्पर्य है की कोई एक गुण के वैधर्म्य मात्र से निर्णय हो सकता है। पर उसकी ही बात के अनुसार फिर कोई अन्य गुण के साधर्म्य से भी निर्णय हो सकता है। प्रतिवादी के खंडन में कोई विशेष हेतु नहीं है।

यहां उदाहरण में वादी के स्थापना में जो हेतु प्रस्तुत किया है वह व्याप्ति सहित था। परंतु यदि वह हेतु अशुद्ध भी होता अर्थात् हेत्वाभास भी होता तब भी यदि प्रतिवादी उस हेत्वाभास को दिखाने के बदले खंडन में अपनी यही दलील प्रस्तुत करता तब वह जाति ही कहलाती। क्योंकि यदि वादी ने कोई गलत बात की है तो उसका खंडन उसकी गलती दिखाकर करना चाहिए ना कि स्वयं वही गलती दोहरा कर।

एक और उदाहरण लेते हैं। यद्यपि वह शास्त्रीय उदाहरण नहीं है परंतु हम इससे जाति को समझने का प्रयत्न कर सकते हैं।

मान लो कोई स्कूल की प्रबंधन सभा में इस बात को लेकर चर्चा हो रही है कि श्याम को प्रवेश मिलना चाहिए अथवा नहीं। अब एक सदस्य यह कहता है कि श्याम को प्रवेश मिलना चाहिए क्योंकि वह उसके मित्र का बेटा है, जैसे राम, जिसको प्रवेश मिला है और उसके पिता भी प्रथम सदस्य के मित्र है। तब दूसरा सदस्य यह कहकर प्रतिषेध करता है कि राम उसकी पत्नी द्वारा संचालित प्रशिक्षण वर्ग में जाता है और उसको प्रवेश मिला है पर श्याम उन वर्गों में नहीं जाता है तो उसको प्रवेश नहीं मिलना चाहिए। (अथवा तो ऐसा ही कोई अन्य कारण जैसे राम के पिता से तो उसकी मित्रता है पर श्याम के पिता से अनबन)

अब यहां यदि प्रतिवादी प्रथम सदस्य की बात को यह कह कर खंडित करता की बच्चे के पिता का सदस्य का मित्र होना कोई हेतु नहीं है तब तो प्रथम सदस्य की पराजय हो सकती थी। परंतु जब प्रतिवादी स्वयं बच्चे के पत्नी के classes में जाने को अथवा उसके पिता से अपने संबंध को बच्चे के प्रवेश के निर्णय का आधार बनाकर प्रस्तुत करता है तब वह प्रथम सदस्य की बात का भी एक प्रकार से अनुमोदन ही करता है (अर्थात् उसके प्रतिषेध में वादी के हेतु से भिन्न कोई विशेष हेतु नहीं है।) इसलिए अब उसका यह उत्तर जाति में आएगा।

ध्यान रहे कि दूसरे सदस्य का उत्तर जाति कहलायेगा या नहीं इसका आधार प्रथम सदस्य ने क्या कहा है उस पर नहीं है न ही इस बात पर की दूसरे सदस्य का साध्य वास्तव में सही है अथवा नहीं।

मान लो प्रथम सदस्य ने सद हेतु दिया होता जैसे कि बच्चे को प्रवेश मिलना चाहिए क्योंकि वह प्रवेश योग्यता के मापदंडों पर पूरा उतरता है उसके उत्तर में भी यदि प्रतिवादी ने प्रतिषेध में वह दलील दी होती जो उसने दी हैं तब भी वह उत्तर जाति कहलाता।

और मान लो श्याम प्रवेश योग्यता के मापदंडों पर खरा नहीं उतरता है अर्थात् उसको प्रवेश नहीं मिलना चाहिए। तब भी यदि प्रतिवादी की दलील योग्यता को छोडकर राम के अन्य कोई धर्म के वैधर्म्य पर आधारित है तो वह वैधर्म्यसमा जाति ही कहलाएगी।

ऐसे व्याप्ति रहित असत् प्रतिषेध जब उदाहरण के कोई धर्म के साधर्म्य से किया जाता है तब वह साधर्म्यसमा जाति और जब उदाहरण के कोई धर्म के वैधर्म्य से किया जाता है तब वह वैधर्म्यसमा जाति कहा जाता है।

साधर्म्यसमा वैधर्म्यसमा जाति का प्रतिवादी द्वारा उपयोग होने पर उसको दिखाने के लिए दिया जाने योग्य उत्तर तीसरे सूत्र में है। 

गोत्वाद्गोसिद्धिवत्तत्सिद्धिः। ५.१.३

(गोत्वादत्) गोत्वहेतुसे (गोसिद्धिवत्) गो की सिद्धि के समान (तत्सिद्धिः) साध्य की सिद्धि होती है। (अर्थात् केवल सद्हेतु से साध्य की सिद्धि होती है)

यह गौ है उसका निश्चय गौ प्राणी के गोत्व से होता है उसके सींग, सास्ना, कुबड आदि व्यभिचारी लक्षणों से नहीं। केवल कोई एक धर्म के समान होने से अन्य सारे धर्म समान नहीं हो जाते न ही एक धर्म के विपरीत होने से सारे विपरीत।

हमारे चमगादड वाले उदाहरण में भी उसके नभचर होने न होने का निश्चय उसकी नभचारिता (आशा रखती हूँ की यह शब्द है) / वह उडता है अथवा नहीं उस पर ही निर्भर है। या तो उसे प्रत्यक्ष उडता देखें, किसी ने देखा हो उससे जाने अथवा उसके ऐसे स्थानांतरण जो बिना उडे करना संभव न हो को देखकर अनुमान प्रमाण से जाने। मात्र उसके पंख अथवा उसके स्तनधारी होने से निश्चय नहीं होगा।

ऐसे ही शब्द का उत्पत्ति धर्म उसके अनित्यत्व को सिद्ध करेगा पर उसका स्पर्श रहित होना अथवा ऐसे ही कोई धर्म से साधर्म्य वैधर्म्य से नहीं जिसकी नित्यत्व अनित्यत्व के साथ व्याप्ति न बनती हो।