प्रथम अध्याय में हमने प्रथम सूत्र में दर्शाये गए १६ पदार्थों के विभाग तथा लक्षण देखें थे। सूत्रकार अब उन पदार्थों की परीक्षा प्रारंभ करते है। परीक्षा से तात्पर्य है की जो लक्षण कहे गए है वह योग्य है अथवा नहीं, उनमें कोई त्रुटि तो नहीं रह गई यह देखना। इसके लिए सूत्रकार स्वयं प्रश्न उठाकर (ऐसे संशय जो जिज्ञासु को हो सकते है अथवा वह आरोप जो अन्य मत के मानने वाले उनके समय में लगाते हो।) उनका समाधान देंगे।
यहाँ कई प्रश्न सूत्रकार के समय के अन्य प्रचलित मतों की मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए उठाए गए है (खास करके बौद्ध), उनमें से अधिकतर प्रश्न मैं यहाँ सम्मिलित न करूँ यह हो सकता है। यदि हम प्रश्न को ही समझ न पाए/योग्य लगे/जो प्रश्न हमें स्वयं को न हो उसे ले कर हम अध्ययन की जटिलता ही बढाएंगे और ऐसा करने से इस स्तर पर मुझे कोई लाभ प्रतीत नहीं होता। यह भी हो सकता है की लक्षण सूत्र को समझाते समय भाष्यकार ने कुछ प्रश्न प्रथम अध्याय में ही उठा लिए हो, ऐसे प्रश्न जिसके उत्तर हम देख चुके है उनको भी यहां नहीं लेंगे/विस्तार से नहीं लेंगे।
संशय परीक्षा
प्रमाण तक पहुँचने की प्रक्रिया संशय से प्रारंभ होती है। यदि संशय ही न हो तो न उसे निवृत्त करने की इच्छा होगी न प्रमाणों का प्रयोग होगा। तो सर्वप्रथम परीक्षा संशय की की गई है।
परीक्षा सूत्र को देखने से पहले एक बार हमने प्रथम अध्याय में संशय से संबंध में जो पढा था उसे याद कर लेते है।
प्रथम सूत्र में संशय उन १६ पदार्थों में गिनाया गया है जिनके तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।
प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः। १.१.१
प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अवयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास छल जाति और निग्रहस्थान इन के तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।
संशय के लक्षण का सूत्र हमने इस प्रकार देखा था।
(इस पर पूरी चर्चा यहाँ देखें, https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/06/1.1.23.html
(इस पर पूरी चर्चा यहाँ देखें, https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/06/1.1.23.html
संक्षेप में,)
समानानेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः। १.१.२३
समान धर्म के ज्ञान से अथवा विशेष धर्म के ज्ञान से अथवा परस्पर विरोधी ज्ञान से अथवा उपलब्धि की अव्यवस्था से अथवा अनुपलब्धि की अव्यवस्था से विशेष ज्ञान की अपेक्षा रखने वाला द्विकोटिक ज्ञान संशय(विमर्श) कहलाता है।
प्रत्येक ऐसी अवस्था में जहां किसी वस्तु का निश्चय न हो रहा हो वहां संशय उभरेगा यह नहीं कह सकते। यदि निश्चय करने की इच्छा भी हो तब संशय उभरेगा। जब वर्तमान ज्ञान से निश्चय नहीं हो पा रहा हो और निश्चय पर पहुंचने की इच्छा हो तब धर्मी (प्रमेय) के विशेष धर्म को जानने की इच्छा होगी जिससे निश्चय हो सके। इस लिए विशेष की अपेक्षा रखने वाला ज्ञान इसको विमर्श का विशेषण बनाया है।
सूत्र में संशय उत्पन्न होने की पाँच अवस्था बतायी है।
१। समानधर्मोंपपत्ति अर्थात् दो भिन्न वस्तुओं के समान धर्मों का किसी वस्तु में दिखना।
२। अनेकधर्मोंपपत्ति अर्थात् अनेक (विशेष) धर्म का दिखना : कोई ऐसा धर्म दिखना जो कहीं और नहीं दिख रहा हो और उस धर्म के आधार पर वस्तु का वर्गीकरण न हो पा रहा हो।
३। विप्रतिपत्ति अर्थात् विरोधी धर्मों का दिखना। एक ही धर्मी के लिए एक साथ सच न हो सके ऐसी विरोधी बातों का सामने आना।
४। उपलब्धि अव्यवस्था : जहां वस्तु मिल रही है पर यह निश्चय नहीं हो पा रहा है की वह वहां होते हुए उपलब्ध हो रही है अथवा न होते हुए। (जैसे रण में पानी है अथवा मृगमरीचिका)
५। अनुपलब्धि अव्यवस्था : जहां वस्तु की उपलब्धि नहीं हो रही है पर यह निश्चय नहीं हो पा रहा है की वह वहां न होते हुए अनुपलब्ध हो रही है अथवा होते हुए। (जैसे भूगर्भजल)
परीक्षा प्रकरण में सूत्रकार पूर्वपक्षी की तरफ से नीचे के प्रश्न उठाते है।
समानानेकधर्माध्यवसायादन्यतरधर्माध्यवसायाद्वा न संशयः। २.१.१
विप्रतिपत्त्यव्यवस्थाध्यवसायाच्च। २.१.२
विप्रतिपत्तौ च सम्प्रतिपत्तेः। २.१.३
अव्यवस्थात्मनि व्यवस्थितत्वाच्चाव्यवस्थायाः। २.१.४
तथात्यन्तसंशयस्तद्धर्मसातत्योपपत्तेः। २.१.५
विप्रतिपत्त्यव्यवस्थाध्यवसायाच्च। २.१.२
विप्रतिपत्तौ च सम्प्रतिपत्तेः। २.१.३
अव्यवस्थात्मनि व्यवस्थितत्वाच्चाव्यवस्थायाः। २.१.४
तथात्यन्तसंशयस्तद्धर्मसातत्योपपत्तेः। २.१.५
जिसका उत्तर छठे सूत्र में देते है।
यथोक्ताध्यवसायादेव तद्विशेषापेक्षात्संशयेनासंशयो नात्यन्तसंशयो वा। २.१.६
इन प्रश्नों को संक्षेप में ऐसे समझ सकते है की पूर्वपक्षी यह कह रहा है की संशय के जो पाँच कारण गिनाए गए है वहाँ अलग अलग प्रकार के ज्ञान हो रहे है (समान/विशेष/विरुद्ध धर्म) और ज्ञान का होना संशय उत्पन्न नहीं करता।
उत्तर : पूर्वपक्षी ने विशेष की अपेक्षा हो तब संशय होता है इस भाग को अनदेखा कर दिया है। ऐसा/इतना ज्ञान होना जिससे किसी वस्तु का निश्चयात्मक ज्ञान न हो मात्र संशय उत्पन्न नहीं करेगा यदि निश्चयात्मक ज्ञान तक पहुँचने की इच्छा ही न हो पर ऐसी इच्छा होने पर ऐसा ज्ञान संशय उत्पन्न करने का कारण बनेगा।
पूर्वपक्षी यह भी कहता है की जो ज्ञान संशय का कारण बना है वह हमेशा बने रहने से संशय भी हमेशा बना रहेगा।
उत्तर : संशय उत्पन्न करने वाले ज्ञान के उपरांत जब संशय का निवारण करने वाले प्रमाण को भी प्रमाता जान लेता है तब संशय का निवारण हो जाता है। जैसे सामने पडी वस्तु में अभी भी वह समान धर्म है जो रज्जु और सांप दोनों में रहते है पर उसके विशेष धर्म से जब निश्चय हो जाता है की वह रज्जु है अथवा सांप तब संशय नहीं बना रहता।
आगे सूत्रकार कहते है,
यत्र संशयस्तत्रैवमुत्तरोत्तरप्रसङ्गः। २.१.७
आगे सूत्रकार कहते है,
यत्र संशयस्तत्रैवमुत्तरोत्तरप्रसङ्गः। २.१.७
जहां संशय उठाया जाए वहाँ इस प्रकार उक्ति प्रत्युक्ति से उसका निराकरण करना चाहिए।
आगे अन्य पदार्थों में उठाए गए संशय का भी पूर्वपक्षी के आरोप सिद्धांती के उत्तर के माध्यम से निराकरण किया जाएगा।