शनिवार, 23 जुलाई 2022

साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानं जातिः। १.२.१८, विप्रतिपत्तिरप्रतिपत्तिश्च निग्रहस्थानम्। १.२.१९, १.२.२०

साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानं जातिः। १.२.१८

(व्याप्ति के अभाव में भी) केवल कुछ साधर्म्य अथवा वैधर्म्य को लेकर जो प्रत्यवस्थान (दोष निरूपण) किया जाता है वह जाति है। 

जैसे वादी ने यह कह कर अपने पक्ष की स्थापना की, "शब्द अनित्य है, उत्पत्ति धर्म वाला होने से, जो जो उत्पत्ति धर्म वाला होता है वह वह अनित्य होता है, जैसे स्थाली।" यहां वादी ने उत्पत्ति धर्म और नित्यत्व के बीच की व्याप्ति जो विद्यमान है उसके बल पर हेतु प्रस्तुत किया है और स्थाली को उदाहरण के रूप में इस लिए प्रस्तुत किया है क्योंकि वह इन दोनों धर्मों को लिए हुए है। अब यदि प्रतिवादी यह कहे की स्थाली को स्पर्श किया जा सकता है और वह अनित्य है तो शब्द जिसको स्पर्श नहीं किया जा सकता वह नित्य होना चाहिए तो यह जाति का प्रयोग होगा। उसने उदाहरण में से किसी धर्म को पकडा और उसे साध्य के साथ जोड दिया जब की उस धर्म की साध्य के साथ व्याप्ति बनती ही नहीं।

जाति क्योंकि गलत तरीके से किए गए खंडन का नाम है इस लिए वह हमेशा उत्तर देने के समय ही होगी। (मान लो कोई पक्ष स्थापना के समय स्थाली के स्पर्श धर्म से शब्द को नित्य सिद्ध करने का प्रयास कर रहा होता तब उसे जाति नहीं कहते परंतु वह हेत्वाभास कहा जाता।)

नव्य में असत् उत्तर को जाति कहा गया है।  

विप्रतिपत्तिरप्रतिपत्तिश्च निग्रहस्थानम्। १.२.१९

(विप्रतिपत्ति) विरुद्धज्ञान से कथन कर देना (अनुचित/गलत/नियम विरुद्ध कथन करना) अथवा (अप्रतिपत्ति) अज्ञानता वश चुप रह जाना (बात को समझ न पाना/ समझा न पाना) निग्रहस्थान है।

निग्रहस्थान पराजय के स्थान है। जहां पहुंचकर निंदा और हार का सामना करना पडे अर्थात् जिस स्थान पर प्रतिपक्षी दूसरे पक्ष को निश्चित रूप से पकड में ले लेता है वह निग्रहस्थान है। स्वयं के पक्ष में दिखाए गए दोषों के उद्धार में निष्फलता अथवा प्रतिपक्षी के स्थापित पक्ष का खंडन कर पाने की असमर्थता  (अप्रतिपत्ति) निग्रहस्थान में पहुंचाते है।

पूर्व के दो सूत्र में न्यायदर्शनकारने जाति तथा निग्रहस्थान के लक्षण बताए है पर विभाग नहीं। तो क्या इनके विभाग है ही नहीं (जैसे दृष्टांत के विभाग नहीं थे) अथवा है? इसका उत्तर सूत्रकार अगले सूत्र में देते है।

तद्विकल्पाज्जातिनिग्रहस्थानबहुत्वम्। १.२.२०

(तद्विकल्पात्) उनके (साधर्म्य,वैधर्म्य से खंडन के, विप्रतिपत्ति, अप्रतिपत्ति के) अनेक प्रकार होने से (जातिनिग्रहस्थानबहुत्वम्) जाति तथा निग्रहस्थान के अनेक भेद हो जाते है।

साधर्म्य तथा वैधर्म्य के विकल्प से जाति के २४ विभाग हो जाते है और विप्रतिपत्ति तथा अप्रतिपत्ति के विकल्प से निग्रहस्थान के २२।

न्यायदर्शन में वैसे तो पदार्थों को उद्देश लक्षण तथा परीक्षा क्रम से लिया गया है परंतु जाति तथा निग्रहस्थान के लिए ऊपर के एक एक उनके लक्षण के सामान्य सूत्र ही दिए गए है, अन्यों की भांति विभाग तथा उनके लक्षण यहां प्रथम अध्याय में नहीं दिए गए। इस के बाद द्वितीय अध्याय में परीक्षा प्रकरण प्रारंभ हो जाएगा और इन दोनों के विभागों को अंत में पाँचवें अध्याय में लिया गया है।

इस के साथ प्रथम अध्याय का द्वितीय आह्निक समाप्त होता है।


[मैं यहां से आगे क्रम तोडते हुए प्रथम अध्याय के पश्चात पाँचवें अध्याय को लेने का विचार रखती हूँ जिससे हम सारे सोलह पदार्थ को एक बार एक स्तर पर जान ले। वैसे भी भले ही वाद में प्रवृत्त तत्वज्ञानप्राप्ति के लिए प्रयासरत समूह के लिए जाति, निग्रहस्थान अल्प महत्व रखते है परंतु आज के परिप्रेक्ष्य में जहां हमारे चारों तरफ जल्प वितंडा अधिक और वाद कम ही दिखाई देता है, हमारे लिए इन की जानकारी इतना अल्प महत्व नहीं रखती सो उनको अंत में न लेते हुए, प्रथम १४ पदार्थ जिनके लक्षण हमने देख लिए है, उनके तुरंत बाद ही हम आगे देखेंगे।]

शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

सम्भवतोऽर्थस्यातिसामान्ययोगादसम्भूतार्थकल्पना सामान्यच्छलम्। १.२.१३, १.२.१४-१७

सम्भवतोऽर्थस्यातिसामान्ययोगादसम्भूतार्थकल्पना सामान्यच्छलम्। १.२.१३

(सम्भवतः) संभव हो सकने वाले (अर्थस्य) अर्थ का (अतिसामान्ययोगात्) अति सामान्य के साथ संबंध जोडकर (असम्भूतार्थकल्पना) असंभव अर्थ की कल्पना कर लेना (सामान्यच्छलम्) सामान्य छल है।

किसी के ऐसे वक्तव्य को जिसमें संभावना मात्र कही गई है उसको निश्चितता जताकर (संभावना को शत प्रतिशत के स्तर पर कल्पित कर कर) वक्ता खंडन करना यह सामान्य छल है।

जैसे किसी ने कहा की यह नवयुवक अत्यंत कार्यकुशल और प्रतिभावान है। तो दूसरे ने समर्थन में प्रशंसा के भाव से कहा की वह युवक ऐसा हो सकता है आईआईटी से जो पढा हुआ है। अब यदि कोई इस बात का खंडन यह कह कर करें की आईआईटी से पढकर निकालने वाला प्रत्येक नवयुवक ऐसा ही कार्यकुशल और प्रतिभावान होता है ऐसा आपका मन्तव्य प्रत्यक्ष से विरुद्ध होने से आप की बात जूठी है तब यह सामान्य छल का प्रयोग है। वक्ता ने आईआईटी से पढे और प्रतिभावान होने के बीच में साधन साध्य का संबंध नहीं कहा था मात्र उन दोनों धर्मों की सहचारिता की संभावना प्रशंसा के भाव से व्यक्त की थी।

दूसरा उदाहरण : किसी ने एक खेत को देखकर कहा की यहां अच्छा धान हो सकता है। अब यदि कोई इसका अर्थ यह निकालने लगे की वक्ता के अनुसार इस खेत में बिना बीज डाले ही धान उगेगा तो वह सामान्य छल का प्रयोग है।

एक विशिष्ट अर्थ में कही गई बात को जिस विशिष्ट वस्तु/व्यक्ति/संदर्भ में वह कही गई है उससे अलग कर अति सामान्य प्रत्येक वस्तु/व्यक्ति/संदर्भ के साथ जोड देना (जान बुझ कर असंभव अर्थ की कल्पना कर लेना) और फिर कहना की बात गलत है यह सामान्य छल है।


धर्मविकल्पनिर्देशेऽर्थसद्भावप्रतिषेध उपचारच्छलम्। १.२.१४

(धर्मविकल्पनिर्देशे) किसी एक अर्थ में कहे गए शब्द का (अर्थसद्भावप्रतिषेध) उससे विरुद्ध अर्थ को मानकर अर्थ की सत्ता का ही प्रतिषेध करना (उपचारच्छलम्) उपचार छल है।

शब्द कई बार उनके यथार्थ शब्दार्थ के उपरांत के अर्थ को कहने के लिए भी प्रयुक्त होते है। ऐसे भिन्न भिन्न उपयोग उस शब्द के धर्म विकल्प कहलायेंगे। अब वक्ता ने शब्द को कोई एक धर्म विकल्प में प्रयोग किया परंतु उन वैकल्पिक प्रयोग को अमान्य कर अर्थ की सत्ता हो ही नकार देना उपचार छल है।

जैसे कोई गाडी में जा रहे व्यक्ति ने कहा की दिल्ली आ गया है। और दूसरा कहे की आप की बात असत्य है। दिल्ली थोडा अपना स्थान बदलकर आता जाता है, हमारी गाडी दिल्ली या गई है। तो यह उपचार छल का प्रयोग है।

यह सत्य होते हुए भी की दिल्ली आता जाता नहीं है, क्योंकि व्यवहार में दिल्ली आ गया है कहा ही जाता है ऐसा कहने का शब्द के यथार्थ अर्थ का हवाला देते हुए खंडन करना उपचार छल बनेगा।

ऐसे ही किसी शब्द का आलंकारिक प्रयोग हुआ हो और निर्दिष्ट आलंकारिक अर्थ की सत्ता को शब्द के मूल अर्थ को लेकर अस्वीकार कर देना भी उपचार छल की कोटि में आएगा।

मुख्य बात यह है की वक्ता के तात्पर्य को अनदेखा कर शब्दों की चतुराई से खंडन पर उतर आना छल है।  

छल का उपयोग दोषपूर्ण तथा निंदनीय माना जाता है। ऐसे में हमें स्वयं ऐसे प्रयोगों से बचना चाहिए और यदि प्रतिपक्ष छल प्रयोग कर रहा है तो हमें हमारे तात्पर्य की स्पष्टता को सामने रखना चाहिए जिससे उसकी छल प्रवृत्ति सामने आ जाए।


छल परीक्षा 

न्यायदर्शन में प्रत्येक पदार्थ का पहले उद्देश किया गया है उसके पश्चात लक्षण तथा अंत में परीक्षा। पदार्थ के जो लक्षण किए है वह पूर्ण तथा त्रुटि रहित है अथवा नहीं इस की गहराई से जांच करना परीक्षा है। अब तक हम मात्र लक्षण को देखते आए है परीक्षा बाद में आएगी। परंतु छल के विषय में परीक्षा प्रकरण अत्यंत अल्प होने से सूत्रकार ने उसे छल के लक्षण के उपरांत ही ले लिया है। अगले तीन सूत्र छल परीक्षा के है।

सूत्रकार ने छल के तीन प्रकार बताए है उस पर शिष्य जिज्ञासा करता है (अगला सूत्र)।

वाक्छलमेवोपचारच्छलं तदविशेषात्। १.२.१५

वाक्छल ही उपचार छल है दोनों सामान होने के कारण। 

शिष्य का कहना है की वाक्छल और उपचार छल दोनों सामान ही है। दोनों में वक्ता शब्द का प्रयोग गौण अर्थ में करता है और प्रतिपक्षी उसका खंडन शब्द के अन्य अर्थ को ले कर करता है। तो उसे भिन्न प्रकार क्यों मना जाए? इन दोनों को एक ही मानना चाहिए।

सूत्रकार उत्तर देते है।

न तदर्थान्तरभावात्। १.२.१६

नहीं, उन दोनों में भेद होने के कारण।

दोनों छल में भिन्नता है। जहां वाक्छल में भिन्न अर्थ की कल्पना की जाती है, उपचार छल में अर्थ की सत्ता को ही नकार दिया जाता है।

आगे सूत्रकार कहते है, 

अविशेषे वा किञ्चित्साधर्म्यादेकच्छलप्रसङ्गः। १.२.१७

भेद को न मानने पर तो थोडी सी समानता से एक ही छल को मानने का प्रसंग प्राप्त हो जाएगा। 

यदि दो प्रकार में कुछ समानता होने से उनको एक मान लिया जाए तब तीनों में थोडी समानता होने से छल के दो भी प्रकार नहीं बनेंगे और मात्र एक प्रकार में ही सारे छल समाविष्ट हो जाएंगे।

विषय को ठीक समझने के लिए सूत्रकार ने तीन प्रकार उपयुक्त समझे है सो निर्दिष्ट किए है और उन सब में थोडी भिन्नता है तो उसे उसी तरह से समझना उपयोगी होगा।

रविवार, 17 जुलाई 2022

वचनविघातोऽर्थविकल्पोपपत्त्या छलम्। १.२.१०, १.२.११, १.२.१२

हेत्वाभास के लक्षण देखने के पश्चात हम क्रम प्राप्त पदार्थ छल के लक्षण देखेंगे।

वचनविघातोऽर्थविकल्पोपपत्त्या छलम्। १.२.१०

(वचनविघातः) अन्य की बात का विघात करना (काटना) (अर्थविकल्पोपपत्त्या) उसके तात्पर्य से विरुद्ध अर्थ में उसे ले कर  (छलम्) छल है।

जब कोई शब्द के वक्ता द्वारा निहित अर्थ को छोडकर अन्य ही कोई अर्थ का निरूपण उसके शब्दों में कर के फिर उस बात का खंडन करता है तब वह छल है।

चर्चा में जब कोई वाद छोडकर जीतने की इच्छा से ग्रसित हो जाता है और स्वपक्ष की रक्षा अथवा प्रतिपक्ष के खंडन का कोई सत्य मार्ग नहीं दिखता तब वह छल का आश्रय भी ले लेता है। यदि उसका छल पकडा नहीं जाता है तब वो चर्चा में बना रह सकता है परंतु छल के पकडे जाने पर वह निग्रहस्थान में आ जाएगा अर्थात् हार जाएगा।

अधिकतर छल का उपयोग प्रतिपक्ष के खंडन के लिए होता है पर उसे प्रतिपक्ष द्वारा किए गए स्वपक्ष के खंडन को काटने और स्वपक्ष की रक्षा के उपयोग में भी लाया जाता है।

छल के विभाग तथा उन विभागों के लक्षण के सूत्र आगे है तो उनको उदाहरण सहित उन सूत्रों के अंतर्गत देखेंगे। 

तत्त्रिविधं वाक्छलं सामान्यच्छलमुपचारच्छलं च। १.२.११

(तत्) वह छल (त्रिविधं) तीन प्रकार का है (वाक्छलम्) वाक् छल (सामान्यच्छलम्) सामान्य छल (च) तथा (उपचारच्छलम्) उपचार छल।   

वाक् छल का लक्षण अगले सूत्र में।

अविशेषाभिहितेऽर्थे वक्तुरभिप्रायादर्थान्तरकल्पना वाक्छलम्। १.२.१२

(अविशेषाभिहिते) सामान्य रूप से कहे गए (अर्थे) अर्थ में (वक्तुः) वक्ता के (अभिप्रायात्) अभिप्राय से (अर्थान्तरकल्पना) भिन्न अर्थ की कल्पना (वाक्छलम्) वाक् छल है।

वाक्य में कई बार कई शब्द ऐसे होते है जिनके एक से अधिक अर्थ होते है। ऐसे किसी शब्द का वह अर्थ करना जो वक्ता का अभिप्राय नहीं था (जो प्रसंग से पता चल जाता है) और फिर वह भिन्न अर्थ जो प्रसंग से मेल नहीं खाता उसे लेकर वक्ता का खंडन करना वाक् छल है।

जैसे की किसी ने कहा की यह बालक नवकम्बल वाला है (नवकम्बलोऽयं माणकः)। वक्ता का तात्पर्य है की इस बालक के पास नया कंबल है। अब कोई यह कह कर खंडन करे की आप गलत कह रहे हो इस बालक के पास तो एक ही कंबल है नव (नौ-९) कंबल कहाँ है? तब यह वाक् छल का प्रयोग है।

शुक्रवार, 15 जुलाई 2022

साध्याविशिष्टः साध्यत्वात्साध्यसमः। १.२.८, कालात्ययापदिष्टः कालातीतः। १.२.९

साध्याविशिष्टः साध्यत्वात्साध्यसमः। १.२.८

(साध्याविशिष्टः) जो साध्य से अविशिष्ट हो-साध्य के सामान हो ऐसा हेतु स्वयं (साध्यत्वात्) साध्य कोटि में होने से (साध्यसमः) साध्यसम नाम का हेत्वाभास है।

हेतु में साधन धर्म की साध्य धर्म के साथ व्याप्ति दिखा कर साध्य धर्म सिद्ध करना होता है। यहां साधन धर्म स्वयं पहले से सिद्ध होना चाहिए (दोनों पक्ष उसे सिद्ध मानते हो ऐसा होना चाहिए)। यदि ऐसा हेतु दे दिया जिसका आश्रय अथवा स्वयं (साधन) अथवा व्याप्ति जिसे आधार रूप में प्रस्तुत किया गया है वही अभी साध्य कोटि में है तब ऐसे हेतु से साध्य धर्म को सिद्ध करना तो दूर, पहले तो उस हेतु को ही सिद्ध करना पडेगा। इस लिए जो स्वयं असिद्ध हो ऐसा हेतु शुद्ध नहीं रहता। ऐसे हेतु को साध्यसम हेतु कहते है। नव्य में इसे असिद्ध हेत्वाभास नाम से जाना जाता है।

यह साध्यसम (असिद्ध) हेत्वाभास तीन प्रकार का है। 

आश्रयासिद्ध : जिसका आश्रय ही असिद्ध हो। अर्थात् साध्यधर्म की सिद्धि जिसमें करनी है वह साध्य (पक्ष) ही सिद्ध न हो। जैसे किसी ने कहा आकाशकमल में सुगंध होती है (प्रतिज्ञा), कमल होने से (हेतु), भूमि के कमल के समान (उदाहरण)। अब यहां सिद्ध करने चले है आकाशकमल में सुगंध परंतु पहले आकाशकमल तो सिद्ध हो। जब आकाशकमल का ही ठिकाना नहीं तो सुगंध किसमें सिद्ध करेंगे।

स्वरूपासिद्धि : जो हेतु स्वरूप से असिद्ध है ऐसा हेतु देना। जैसे यह कहना की सरोवर में आग लगी है, धुआँ होने से। और धुआँ ही नहीं दिखाई दे रहा है। 

अथवा कोई कहे की छाया द्रव्य है, उसमें गति होने से। तब छाया जो प्रकाश का अभाव मात्र है जो प्रकाश को आवृत्त करने वाले द्रव्य की गति के कारण भिन्न भिन्न स्थान पर होता है उसमें गति होना ही असिद्ध है। और जब छाया में गति होना ही असिद्ध है तब वह छाया को द्रव्य सिद्ध करने का साधन कैसे बनेगी?
  
व्याप्तत्वासिद्ध : यह वह हेत्वाभास है जहां व्याप्ति जिससे साधन धर्म द्वारा साध्य धर्म को सिद्ध किया जाता है वही असिद्ध है। अर्थात् दोनों पक्ष इसी बात पर सहमत नहीं है की व्याप्ति है (अव्याप्ति नहीं है) और वह अव्यभिचारी है (अनैकांतिक नहीं है)।

जैसे कोई कहे की पर्वत पर धुआँ है, वहां अग्नि होने से। तो जहां जहां अग्नि होती है वहां वहां धुआँ होता है यह व्याप्ति अग्नि का धुएं के साथ ऐकांतिक संबंध न होने से व्यभिचारी है। जब व्याप्ति ही असिद्ध है तो वह हेतु भी सद् हेतु न होकर दुष्ट हेतु बनेगा।

(नव्य में व्याप्तत्वासिद्ध का लक्षण ऐसी व्याप्ति कहा है जिसको पूरा करने के लिए उपाधि (जो साधन में वर्णित भी नहीं है) की आवश्यकता है - जैसे जहां जहां अग्नि और आर्द्र ईंधन का संयोग होता है वहां वहां धुआँ होता है। यहां "आर्द्र ईंधन का संयोग" उपाधि है जिसके बिना व्याप्ति व्यभिचारी होगी।)

जिस भी व्याप्ति का विरुद्ध उदाहरण मिले वह अनैकांतिक है। (जिस व्याप्ति का एक भी उदाहरण न मिले वह अव्याप्ति है पर क्योंकि उदाहरण पंचावयव में अनिवार्य है यदि ऐसी व्याप्ति हुई तो पंचावयव पूर्ण नहीं हो पाएगा।)

कालात्ययापदिष्टः कालातीतः। १.२.९

समय के बीत जाने पर कहा गया हेतु/समय ने जिस हेतु को नष्ट कर दिया है, वह कालातीत हेत्वाभास है।

जैसे किसी ने कहा की अग्नि शीतल होती है, द्रव्य होने से, मिट्टी के समान। तो प्रतिपक्षी ने वहीं के वहीं अग्नि उत्पन्न कर उसको दिखाया की देखो क्या अग्नि शीतल है अथवा उष्ण। अब यदि प्रथम पक्ष फिर भी अपने उस हेतु को जो सीधा सीधा प्रत्यक्ष के विपरीत जा रहा है पकड रखें तब वह कालातीत हेत्वाभास है।

एक और उदाहरण लेते है। किसी बच्चे ने ऐसा कार्य किया जिससे किसी की हानि होती है। अब इस समय यह संशय हो सकता है की बच्चे ने ऐसा काम गलती से बिना सोचे समझे/उसकी बुद्धि वह हानि को देख पाने जितनी नहीं थी इस लिए किया अथवा उसने जान बुझ के वह हानि पहुंचाई। इस समय यदि एक पक्ष (अथवा बच्चा स्वयं) यह कहे की उसने हानि को देख नहीं पाने से उस कार्य को किया है तो वह आगे विचारणीय विषय होगा परंतु मानो उस हानि को देखने के उपरांत भी यदि बच्चा उसी कार्य को पुनः पुनः करता ही जाता है और वही हेतु देता रहता है तब वह हेतु हेत्वाभास मात्र ही है। क्योंकि उस काल के उस खंड ने जब हानि प्रत्यक्ष थी उस हेतु को अमान्य बना दिया है।

नव्य में इस हेत्वाभास को बाधित कहा गया है। (दिए गए हेतु का प्रत्यक्ष आदि अन्य बलवान प्रमाणों से साध्यकाल में बाधित हो जाना।)

मंगलवार, 12 जुलाई 2022

सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरोधी विरुद्धः। १.२.६, यस्मात्प्रकरणचिन्ता स निर्णयार्थमपदिष्टः प्रकरणसमः। १.२.७

सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरोधी विरुद्धः। १.२.६

(सिद्धान्तम्) स्वयं के सिद्धांत को (अभ्युपेत्य) मानकर (तद्विरोधी) उसीका विरोध करने वाला हेतु (विरुद्धः) विरुद्ध नाम का हेत्वाभास है।

जब कोई ऐसा हेतु देता है जो स्वयं के ही पूर्व मान्य सिद्धांत को खंडित करता हो और वह हेतु देने वाले के पक्ष का वास्तव में समर्थन नहीं पर प्रतिषेध करता हो उसे विरुद्ध हेतु कहते है।

जैसे कोई सामने खडे पशु को गधा सिद्ध करना चाहता है। और हेतु देता है की "उसके सींग है इस लिए" तो यह विरुद्ध हेत्वाभास है।

विरुद्ध हेत्वाभास का एक उदाहरण मेरी तरफ से ..   
मान लीजिए की चौकीदार रखने से चोरी होने की संभावना निर्मूल हो जाती है यह किसी का एक पूर्व मान्य सिद्धांत है। उसने अथवा उसके आस पास में परंतु अब तक किसी ने चौकीदार रखा नहीं था न ही वहां चोरी होती थी। अब उसने एक बडी कीमत वाला चौकीदार रख लिया। चौकीदार रखने के बाद उसके वहां और आस पास में धड़ाधड़ चोरियाँ होने लगी।

अब यदि वह कहे की चौकीदार अच्छे से काम कर रहा है (प्रतिज्ञा), और हेतु दे की "इतनी चोरियाँ हुई की उसके घर में अब मात्र भारी सामान जैसे sofa, bed, table इत्यादि ही बचा हुआ है इस लिए।" तो यह विरुद्ध हेत्वाभास होगा।
(इस हेतु से उसका पक्ष सिद्ध भले ही ना हो पर उसे देखकर हम यह अनुमान कर सकते है की आगे वो ४-५ मुस्टंडे से और भी चौकीदार रखेगा बचे हुए भारी सामान की रक्षा के लिए।)


यस्मात्प्रकरणचिन्ता स निर्णयार्थमपदिष्टः प्रकरणसमः। १.२.७

(यस्मात्) जिस से-जिस संशय के कारण से (प्रकरणचिन्ता) प्रकरण पर चिंतन चल रहा है (सः) उसीको (निर्णयार्थम्) निर्णय के लिए हेतु रूप में (अपदिष्टः) प्रस्तुत कर देना (प्रकरणसमः) प्रकरणसम हेत्वाभास है।

जिस विषय से संशय उत्पन्न हुआ है और चिंतन चल रहा है वही विषय को हेतु के रूप में प्रस्तुत कर देना प्रकरणसम हेत्वाभास है। जैसे शब्द में नित्यता अथवा अनित्यता का निश्चय न हो पाने से चिंतन चल रहा हो और उसमें एक पक्ष कहे की वह नित्य है और हेतु दें की "उसमें अनित्य धर्म के न होने से" तो यह कोई हेतु नहीं बनेगा क्योंकि उसमें नित्यत्व है अथवा अनित्यत्व यही तो संशय है (दोनों में से एक भी धर्म की प्राप्ति न देख पाने से)। नहीं तो यहां प्रतिपक्ष सामने उसी तरह का हेतु दे कर अपना पक्ष भी सिद्ध कर सकता है की शब्द अनित्य है, हेतु "उसमें नित्य धर्म के न होने से"।

एक उदाहरण मेरी तरफ से..
किसी ने सुना की शतावरी मातृत्वकांक्षिणी स्त्री के लिए और स्तनपान करा रही माता के लिए आरोग्य वर्धक औषध है। परंतु इस विषय में अधिक ज्ञान नहीं होने से उसने यह निश्चित जानना चाहा की क्या शतावरी लाभप्रद होगी अथवा हानिकारक। इस प्रकरण पर एक पक्ष जो एक ऐसी पत्रिका चलाता है जिसमें उनके सहचरों द्वारा अनुमोदित प्रमाण* प्रस्तुत होते है, उसने कहा की "शतावरी हानिकारक है", हेतु "शतावरी हानिकारक नहीं है ऐसा कोई प्रमाण (हमारी पत्रिका में) नहीं होने से।
 
यह प्रकरणसम हेत्वाभास होगा क्योंकि जिस विषय (प्रकरण) के लिए प्रमाण की खोज हो रही है उसी के प्रमाण के अभाव को हेतु बनाया गया है। यहां प्रतिपक्ष उसी प्रमाण के अभाव को इस तरह प्रस्तुत कर सकता है की शतावरी लाभप्रद है/हानिकारक नहीं है, हेतु "उसके लाभप्रद न होने का / हानिकारक होने का कोई प्रमाण न होने से"

*यहां इस उदाहरण में जिज्ञासु उस पत्रिका को आप्त वचन मान रहा है ऐसा जानना चाहिए।

प्रकरणसम हेत्वाभास में इस तरह से प्रमाण के अभाव को हेतु बनाने से प्रमाण का अभाव प्रतिपक्ष को भी सिद्ध करता है इस लिए उसे नव्य न्याय में (न्यायदर्शन में से निकली न्याय की शाखाओं में से एक, जो बहुत प्राचीन नहीं है) इसे सत्प्रतिपक्ष हेत्वाभास नाम से कहा जाता है।

एक और उदाहरण जो पूर्व के समान ही है।
संशय है की factory में बनी कोई एक महेंगी वस्तु स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है अथवा नहीं। यहां पत्रिका पक्ष कहता है की वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं है, हेतु "वह वस्तु स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है ऐसा कोई प्रमाण न होने से"

(क्या आप देख सकते है की fact checkers सूत्रकार गौतम के समय से पूर्व भी अस्तित्व में थे।)

शनिवार, 9 जुलाई 2022

सव्यभिचारविरुद्धप्रकरणसमसाध्यसमकालातीता हेत्वाभासाः। १.२.४, अनैकान्तिकः सव्यभिचारः। १.२.५

सव्यभिचारविरुद्धप्रकरणसमसाध्यसमकालातीता हेत्वाभासाः। १.२.४

सव्यभिचार, विरुद्ध, प्रकरणसम, साध्यसम, कालातीत (यह पाँच प्रकार के) हेत्वाभास (जो हेतु जैसा आभास-प्रतीत हो रहा हो पर हेतु न हो) है।

इस सूत्र में हेत्वाभास के पाँच विभाग बताए गए है जिनके लक्षण आगे बताए जाएंगे और हेत्वाभास का मूल लक्षण शब्द के निर्वचन से ही पता चलता है। जो हेतु जैसा प्रतीत तो हो रहा हो पर हेतु के लक्षण से (साध्य को सिद्ध करने की साधकता-शक्ति से) रहित हो।

अनैकान्तिकः सव्यभिचारः। १.२.५

जो हेतु एक पक्ष में स्थिर न हो कर अनेक पक्षों की तरफ जाता है (अनेक अंत वाला होता है) उसे सव्यभिचार (व्यभिचार सहित) कहते है।

व्यभिचार = वि (विरुद्ध रूप से) अभी (चारों और से) चार (चर् धातु से, गति अर्थात् स्थिति का अभाव)। एक स्थिति, व्यवस्था में न टिक कर अव्यवस्थित रूप से यहां वहां गति व्यभिचार है। जिस हेतु में दर्शाया गया साधक धर्म मात्र साध्य धर्म के साथ ही नहीं परंतु (साध्य से विपरीत) अन्य धर्मों के साथ भी पाया जाता है वह हेतु जैसा लगता हुआ भी हेतु नहीं है क्योंकि वहां साधक धर्म मिलने पर यह नहीं कहा जा सकता की साध्य धर्म भी होगा ही (हो सकता है विरुद्ध धर्म भी हो)। यदि कोई पक्ष ऐसा हेतु प्रस्तुत करता है तब वह सव्यभिचार हेत्वाभास है।

जैसे कोई कहे की जहां आग है वहां आग होने से धुआँ भी है तो यह सव्यभिचार हेत्वाभास होगा क्योंकि जहां आग होती है वहां धुआँ हो भी सकता है अथवा नहीं भी हो सकता। उससे विपरीत जहां धुआँ होगा वहां आग भी होगी यह कहना दोष रहित हेतु होगा। 

ऐसे ही हमारे शब्द अनित्य है वाले उदाहरण में यदि कोई हेतु दें की "स्पर्श से रहित होने से" और उदाहरण दे "जैसे सुख दुख।" तो यह दुष्ट हेतु होगा क्योंकि भले ही,
१) शब्द अनित्य है,
२) सुख दुख भी अनित्य है,
३) शब्द और सुख दुख दोनों ही स्पर्श से रहित है,
यहां साधन साध्य धर्म के बीच की व्याप्ति त्रुटिपूर्ण है। स्पर्श गुण का अभाव अनित्य और नित्य दोनों प्रकार की वस्तु में देखा जा सकता है अर्थात् यहां दर्शाया गया साधन धर्म एकांतिक न होकर अनैकान्तिक, सव्यभिचार है। प्रतिपक्ष इस का खंडन विरुद्ध अंत वाले उदाहरण से कर सकता है जैसे आत्मा भी स्पर्श से रहित है पर वह नित्य है। प्रथम पक्ष को स्वयं के दिए गए हेतु के अनुसार अब शब्द को नित्य मानना पडेगा।

हेतु के लक्षण में कहा गया था की हेतु उदाहरण के साधर्म्य से साधन धर्म से साध्य धर्म की सिद्धि करने वाला होता है। यहां उदाहरण का अर्थ मात्र वह एक उदाहरण ही नहीं है जो पंचावयव में दिया जाता है। भले ही वहां मात्र एक उदाहरण दिया गया हो पर वह हेतु सारे शक्य उदाहरणों पर खरा उतरना चाहिए (अर्थात् महत्व व्याप्ति का है, एक उदाहरण का नहीं)। यदि एक भी अपवाद मिल गया तो हेतु दुष्ट कोटि में अर्थात् हेत्वाभास कोटि में आ जाएगा।

प्रश्न हो सकता है की तब फिर एक उदाहरण देने न देने से क्या अंतर आ जाएगा? तो वह आवश्यकता इस लिए बनाई है की कोई एकदम ही कल्पित हेतु न देने लगे (बेधडक गप हाँकने वाले हमेशा से प्रचुर मात्रा में मिलते होंगे) कम से कम एक उदाहरण तो हो। (और फिर उदाहरण से व्याप्ति को समझने में अधिक सुविधा भी रहती होगी कहीं कहीं।)

एक से अधिक उदाहरण क्यों नहीं? क्योंकि दो अथवा दस उदाहरण से भी फिर हेतु का वजन नहीं बढेगा क्योंकि उसे खंडित करने के लिए एक ही विरुद्ध उदाहरण पर्याप्त होगा।

मंगलवार, 5 जुलाई 2022

यथोक्तोपपन्नश्छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भो जल्पः। १.२.२, स प्रतिपक्षस्थापनाहीनो वितण्डा। १.२.३

यथोक्तोपपन्नश्छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भो जल्पः। १.२.२

(यथोक्तोपपन्नः) जैसा (वाद के लिए) कहा गया है उससे युक्त तथा (छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भः) जिसमें छल जाति निग्रहस्थान से स्व पक्ष का साधन तथा प्रतिपक्ष का प्रतिषेध होता है (जल्पः) वह जल्प है।

वाद के लिए कही गई बातें जल्प में भी है। यहां भी पक्ष प्रतिपक्ष पंचावयव से तथा तर्क तथा प्रमाणों के उपयोग से स्व पक्ष की सिद्धि और प्रतिपक्ष का खंडन करते है परंतु जल्प में वे छल जाति तथा निग्रहस्थान (जिनके लक्षण हम आगे देखेंगे)  का भी प्रयोग करते है जो वाद में नहीं होता। ऐसा इस लिए की जल्प में उद्देश्य हार जित का है सत्य तक पहुंचना नहीं। यहां न तो सामने वाले की त्रुटियाँ समझाई जाती है और न उसे वे त्रुटियाँ सुधारने का अवसर प्रदान किया जाता है। यदि उसकी त्रुटि पकडी गई तो उसे हारा हुआ घोषित कर दिया जाता है।

स प्रतिपक्षस्थापनाहीनो वितण्डा। १.२.३

(सः) वह जल्प (प्रतिपक्षस्थापनाहीनः) जब प्रतिपक्ष की स्थापना से रहित होता है तब (वितण्डा) वितण्डा कहा जाता है। 

जल्प में प्रवृत्त एक पक्ष यदि स्वयं के पक्ष की स्थापना किए बिना ही दूसरे पक्ष का खंडन किए जा रहा है तब उस कथा को वितण्डा कहेंगे। स्वयं के पक्ष की स्थापना (प्रतिज्ञा हेतु उदाहरण पूर्वक) न करने से वह उसके खंडन के लिए होने वाले आक्रमणों से स्वयं को बचाने का प्रयत्न करता है और स्वयं प्रतिपक्ष पर आक्रमण (छल आदि साधनों सहित) करने के लिए स्वतंत्र रहता है।

उसका स्वयं की पक्ष की स्थापना न करने का अर्थ यह नहीं है की उसका कोई पक्ष (सिद्धांत, प्रयोजन) नहीं है। प्रयोजन हीन तो कोई प्रवृत्ति होती नहीं। वह मात्र उसे सामने नहीं रखता जिससे स्वयं के सिद्धांत के खंडित होने से होने वाली हार से बचा जा सके। इस कारण से सूत्र में यह नहीं कहा की वितण्डा प्रतिपक्ष से रहित है परंतु यह कहा की वितण्डा प्रतिपक्ष की स्थापना से रहित है।

जल्प वितण्डा (और उसमें उपयोग में लिए जाने वाले छल आदि साधन) प्रयोग करने योग्य वस्तु नहीं है पर फिर भी इन का ज्ञान तत्वज्ञान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले और उसकी रक्षा करने वाले को होना आवश्यक है। एक तो, इनको जानकर यदि प्रतिपक्ष जल्प वितण्डा कर रहा है तो उसे समझकर उसके प्रहारों से सत्य और स्व पक्ष की रक्षा हो सकती है (तथा स्वयं प्रतिपक्ष के असत्य को सत्य मानने की भूल से बच सकते है) और यदि तत्वरक्षा करने का और कोई मार्ग न हो तो प्रतिपक्ष को उसके ही साधनों का उपयोग करते हुए परास्त किया जा सकता है।

[मेरे मत में यदि परिस्थिति उस हद तक खराब हुई मिले भी जहां सत्य की रक्षा के लिए सत्य पक्ष को जल्प वितण्डा का उपयोग करना पडे तो भी जीत के उपरांत प्रथम अवसर पर उसे वाद अनुकूल तर्कों और प्रमाणों से भी उसी सत्य को पुनः स्थापित (तथा प्रतिपक्ष को पुनः खंडित) करना चाहिए। जल्प वितण्डा से मिली विजय युद्ध के क्षण में तो कदाचित पराजय को रोक सकती है पर यदि उसे वाद अनुकूल तर्कों तथा प्रमाणों से सुदृढ नहीं किया गया तो वह क्षणिक जीत दीर्घकालीन हार में परिवर्तित हो जाएगी क्योंकि योग्य प्रमाणों के अभाव को (और जीते हुए पक्ष की जल्प प्रवृत्ति को) बाद में देख पाना सरल होगा और वह जीत और जीतने वाले के सिद्धांत पर से विश्वास को डिगाने वाला सिद्ध होगा। उस अविश्वास के बीच असत्य पक्ष के लिए पलटवार करना सरल होगा तथा सत्य प्रिय मनुष्य जो अभी स्वयं सत्य तक पूरा नहीं पहुँच पाए है उनके लिए सिद्ध पक्ष को अप्रामाणिक मानना स्वाभाविक होगा जिससे सत्य पक्ष की ही हानि होगी।]

शुक्रवार, 1 जुलाई 2022

प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चावयवोपपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वादः। १.२.१

जब अनुमान प्रमाण से किसी वस्तु के निर्णय पर पहुंचने के हेतु से चर्चा होती है उसे कथा (कथ वाक्यप्रबंधे) कहते है। यह कथा तीन प्रकार की होती है।
१। वाद जिसमें चर्चा का उद्देश्य सत्य तक पहुंचना है।
२। जल्प जिसमें हेतु चर्चा में स्वपक्ष के लिए विजय पाना मात्र है फिर चाहे वह सत्य तक पहुँचाए अथवा असत्य तक।
३। वितंडा जिसमें हेतु मात्र प्रतिपक्ष का खंडन है और स्वपक्ष की स्थापना भी नहीं करता वैतंडिक।

सूत्रकार वाद का लक्षण इस प्रकार करते है।

प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चावयवोपपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वादः। १.२.१

(प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः) प्रमाण तथा तर्क से जिसमें स्वपक्ष का समर्थन और प्रतिपक्ष का प्रतिषेध (उपालंभ) है, (सिद्धान्ताविरुद्धः) जिसमें स्व सिद्धांत के विरुद्ध बात नहीं कही जाती, (पञ्चावयवोपपन्नः) जो पंचावयव से युक्त है, (पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो) जिसमें परस्पर विरुद्ध सिद्धांतों को मानने वाले पक्ष तथा प्रतिपक्ष का ग्रहण किया गया है, (वादः) वह वाद नामक कथा है।

यहां परस्पर विरुद्ध सिद्धांतों को मानने वाले पक्ष प्रतिपक्ष है और दोनों ही स्वयं के पक्ष को स्थापित और प्रतिपक्ष को खंडित करने का प्रयास भी करते है पर यह प्रवृत्ति इस लिए है की दोनों ही स्वयं का पक्ष प्रामाणिक है ऐसा दृढता से मानते है और दोनों ही जो भी पक्ष प्रामाणिक हो वही सिद्ध होना चाहिए ऐसा मानते है। अर्थात् वाद की प्रक्रिया में उनमें से किसी को स्वयं के पक्ष में त्रुटियाँ ज्ञात हो जाए तो वे उन्हें सुधारने के लिए और प्रतिपक्ष की बात सत्य लगी तो उसे भी स्वीकार करने को तत्पर रहेंगे। स्वयं की  त्रुटियों को छुपाने और प्रतिपक्ष के पराजय के प्रयास कुतर्क, असत्य, छल पूर्वक नहीं करेंगे।

दोनों पक्ष स्वयं के पक्ष की सिद्धि एवं प्रतिपक्ष का खंडन करने के लिए प्रमाणों तथा तर्क का प्रयोग करेंगे। पूर्व निर्धारित नियमों के अनुसार चर्चा चलती है और दोनों पक्ष पंचावयव का उपयोग करेंगे। (जब वाद औपचारिक व्यवस्था के अंतर्गत सार्वजनिक रूप से / सभा में न चल रहा हो अपितु दो व्यक्ति जैसे गुरु शिष्य, पिता पुत्र, दो मित्र वगैरह आपस में चर्चा कर रहे हो तो पंचावयव का पालन करना अनिवार्य नहीं है।)

दोनों पक्ष सत्य की इच्छा रखते हुए भी क्योंकि परस्पर विरुद्ध सिद्धांत को लिए हुए है, कम से कम एक पक्ष तो अवश्य ही (यह भी हो सकता है दोनों ही पक्ष) असत्य मान्यता को सत्य माने हुए है। जब जिसका सिद्धांत असत्य है वह अपना पक्ष रखेगा अथवा सत्य सिद्धांत का खंडन करेगा तो स्वाभाविक है की उसके हेतु, उदाहरण, तर्कों, प्रमाणों की प्रस्तुति में त्रुटियाँ होगी। ऐसी त्रुटियाँ करना (जल्प वितंडा में) हार का कारण बनती है परंतु क्योंकि यहां वाद चल रहा है, कोई लडाई नहीं, तो ऐसी त्रुटियाँ होने पर भी उसे हारा हुआ घोषित न करके उसे उसकी त्रुटियाँ समझाई जाती है और सुधारने के अवसर दिए जाते है।

अब यहां क्योंकि जो पक्ष गलत भी है और त्रुटियाँ कर भी रहा है पर वह जान बुझ कर, छल पूर्वक ऐसा नहीं कर रहा है। ऐसे में एक गलती वाद में नहीं होती। वह है स्वयं के ही सिद्धांत के विरुद्ध की बात कहना। इस लिए सूत्र में सिद्धांत अविरुद्ध विशेषण दिया गया है।
[मेरे मत में यह त्रुटि इस लिए नहीं होती क्योंकि जिसके लिए सत्य ही सर्वोपरि हो वह जान बुझ कर तो स्वयं के सिद्धांत के विरुद्ध की बात नहीं ही करेगा (स्वयं का बचाव अथवा प्रतिपक्ष पर आक्रमण के लिए) पर वह अनजाने में भी ऐसा नहीं करेगा। क्योंकि दो विरोधी बात एक दूसरे को काटती है यह तो प्रत्यक्ष ही दिखता है और किसी को भूल से भी वह न दिखे उसका अर्थ तो यही है की उसकी आंखें सत्य को देखने के लिए खुली हुई ही नहीं है। अथवा उसका मन सत्य दिखने वाली आँखों से नहीं पर स्वपक्ष की सिद्धि के लोभ मोह से जुडा हुआ है भले ही वह स्वयं उसे (अपने लोभ मोह को) जान पाया हो अथवा नहीं।]

अर्थात् स्व सिद्धांत के विरोध में यदि कोई पक्ष बोलता है तो चर्चा फिर जल्प की श्रेणी में चली जाएगी जहां सिद्धांत विरुद्ध बात का प्रतिपक्ष द्वारा पकडा जाना उसके लिए हार का कारण बनेगा।

आगे जल्प और वितंडा के लक्षण देखेंगे।