गुरुवार, 3 नवंबर 2022

प्रमाण सामान्य, प्रत्यक्ष लक्षण परीक्षा (२.१.१७-२७)

प्रमाणतः सिद्धेः प्रमाणानां प्रमाणान्तरसिद्धिप्रसङ्गः। २.१.१७
तद्विनिवृत्तेर्वा प्रमाणसिद्धिवत्प्रमेयसिद्धिः। २.१.१८
न प्रदीपप्रकाशसिद्धिवत्तत्सिद्धेः। २.१.१९
क्वचिन्निवृत्तिदर्शनादनिवृत्तिदर्शनाच्च क्वचिदनेकान्तः। २.१.२०

सूत्र १६ में कहा गया था की प्रमाण प्रसंग के अनुरूप प्रमेय भी बन सकते है, तुला की भांति। तो पूर्वपक्षी कहता है यदि प्रमाणों की परीक्षा अन्य प्रमाणों से करनी हो तो जो प्रत्यक्ष आदि जो चार प्रमाण कहे है उनसे अतिरिक्त और प्रमाण लाने होंगे। और यदि बिना अतिरिक्त प्रमाण लाए ही उनकी सिद्धि मान ली जाति है तो फिर उसी तरह प्रमेय की भी सिद्धि मान सकते है, प्रमाणों की आवश्यकता ही क्या है।

इन दो प्रश्नों का उत्तर देते हुए सूत्रकार कहते है की इन प्रमाणों की सिद्धि बिना प्रमाण के नहीं है और इनको प्रमाणित करने के लिए अन्य प्रमाणों की आवश्यकता भी नहीं है। दीपक के प्रकाश के समान। दीपक का प्रकाश प्रमाण है यह अंधकार में दीपक के होने पर वस्तुओं के दिखने और न होने पर न दिखने से अनुमान प्रमाण से सिद्ध होता है और दीपक के प्रकाश से वस्तुएं दिखेगी ऐसा अन्य के कहने पर शब्द प्रमाण से भी। और यहाँ प्रमाण से प्रमाण का ज्ञान होना नहीं कहेंगे, प्रमाण से प्रमेय का ज्ञान होना ही कहेंगे। जिसकी परीक्षा की जा रही है वह प्रमेय है भले ही किसी अन्य समय वह प्रमाण का काम करता हो।

सूत्र २.१.१७-२० को इतना ही रखते हुए आगे चलते है।


प्रत्यक्ष लक्षण परीक्षा

प्रथम अध्याय के चौथे सूत्र में प्रत्यक्ष का लक्षण दिया गया है वहाँ परीक्षा प्रकरण के सूत्रों का विषय भाष्य के अंतर्गत लिया गया था। दोनों जगह का भाष्य मुझे विसंगतता पूर्ण, बात को मात्र लंबी, जटिल बनाता हुआ और तर्क रहित लगा।

जिसने श्रद्धा के साथ अध्ययन अभी प्रारंभ ही किया था उसके लिए चौथे ही सूत्र में ऐसे भाष्य का सामना होना अत्यंत आघात और निराशा जनक था और मैंने तब भी अपना दृष्टिकोण रखा था। भाष्यकार के उत्तर और मेरे उन उत्तर के प्रतिकार को छोड दे तो मेरा पक्ष संक्षेप में यह था।
 
लक्षण सूत्र :-
इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्। १.१.४

इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न हुआ वह ज्ञान जो अव्यपदेश्य, अव्यभिचारी तथा व्यवसायात्मक हो उसको प्रत्यक्ष कहते है।

पूर्वपक्षी :-
आत्मा-मन, मन-इन्द्रिय के सन्निकर्ष को लक्षण में क्यों नहीं कहा।

मेरा पक्ष :-
उत्पन्न हुआ ज्ञान = नया अर्थ जो मन ने ग्रहण करके आत्मा तक पहुंचाया है।

जब हम सूत्र में कहे गए 'उत्पन्न हुए ज्ञान' की अनदेखी नहीं करेंगे तो आत्मा-मन, मन-इन्द्रिय सन्निकर्ष के न कहे जाने का प्रश्न ही नहीं बनेगा। और यदि फिर भी कोई यह प्रश्न पूछे तो इनको यह स्पष्ट करना चाहिए की सूत्रकार के शब्द उत्पनं ज्ञानम् का अर्थ क्या है? क्या मन के अर्थ को ग्रहण करके आत्मा तक पहुंचाने से ही आत्मा को ज्ञान नहीं होता? क्या कोई और पद्धति से भी ज्ञान उत्पन्न हो जाता है? यदि नहीं तो सूत्रकार ने एक ही बात दो बार क्यों नहीं कही ऐसी आपत्ति क्यों?

पूरी चर्चा के लिए १.१.४ की posts देख सकते है। (यह उन्हीं के के लिए उपयोगी होगा जिन्होंने पहले भाष्य के अनुरूप विषय को समझ रखा है। जिनको unlearn करने की आवश्यकता नहीं है उनके लिए नहीं।)
https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/04/1.1.4update.html
https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/04/1.1.4.html


अब परीक्षा प्रकरण के सूत्र देखते है।

भाष्य के पीछे न जाते हुए मैंने यहां जो लिखा है वह सीधे सूत्र के आधार पर लिखा है। (पुस्तक में से सूत्र के पदार्थ की मदद से।)

पूर्वपक्षी :-
प्रत्यक्षलक्षणानुपपत्तिरसमग्रवचनात्। २.१.२०

प्रत्यक्ष के सभी लक्षण नहीं देने से लक्षण सिद्धि नहीं हो सकती।

पूर्वपक्षी :-
नात्ममनसोः संनिकर्षाभावे प्रत्यक्षोत्पत्तिः। २.१.२१

आत्मा और मन के संयोग के अभाव में प्रत्यक्ष नहीं हो सकता।

पूर्वपक्षी :-
दिग्देशकालाकाशेष्वप्येवं प्रसङ्गः। २.१.२२

दिशा देश काल आकाश के विषय में भी ऐसा ही है (उनको भी नहीं कहा गया जब की उनके बिना प्रत्यक्ष नहीं हो सकता।)

उत्तर :-
ज्ञानलिङ्गत्वादात्मनो नानवरोधः। २.१.२३

ज्ञान आत्मा का गुण होने से आत्मा का अग्रहण नहीं है। (जब ज्ञान कहा तो आत्मा को हुआ ज्ञान ही अर्थ होता है।) 

उत्तर :-
तदयौगपद्यलिङ्गत्वाच्च न मनसः। २.१.२४

एक समय में एक ही ज्ञान उत्पन्न करना (एक साथ अनेक ज्ञान उत्पन्न न करना) यह मन का धर्म होने से मन का भी अग्रहण नहीं है।

(एक साथ सभी इंद्रियाँ ज्ञान उत्पन्न नहीं करती इससे मन की सिद्धि होती है और ज्ञान उत्पन्न होने में मन की अनिवार्यता सिद्ध करती है। अर्थात् ज्ञान के उत्पन्न होने में जैसे अनिवार्य रूप से आत्मा ग्रहण हो जाता है ऐसे ही मन भी।)

उत्तर :-
तैश्चापदेशो ज्ञानविशेषाणाम्। २.१.२५

ज्ञान विशेष का (अर्थ का) व्यवहार इंद्रियों से होता है। (दिशा देश काल आकाश का नहीं। इस लिए अर्थ और इन्द्रिय का सन्निकर्ष लक्षण है और दिशा देश काल आकाश का होना/उनसे सन्निकर्ष का होना नहीं है।) 

पूर्वपक्षी :-
व्याहतत्वादहेतुः। २.१.२६

व्याघात होने से यह हेतु ठीक नहीं है। (अर्थ जिसका ज्ञान हो रहा है वह तो आपके लक्षण में है परंतु दिशा देश काल आकाश के भी होने और उनके ज्ञान के होने पर आपने उन्हें प्रत्यक्ष लक्षण में नहीं लिया।)

उत्तर :-
नार्थविशेषप्राबल्यात्। २.१.२७

(व्याघात) नहीं है। ज्ञान में अर्थ विशेष की ही मुख्यता रहती है।  (प्रत्यक्ष में अर्थ - शब्द स्पर्श रूप रस गंध की ही प्रमुखता रहती है दिशा देश काल आकाश की नहीं इस लिए अर्थ को लक्षण में कहना और दिशा देश काल आकाश को न कहना इसमें व्याघात दोष नहीं है।)

नीचे के दो सूत्र कुछ पुस्तक में है कुछ में नहीं। जिन पुस्तकों में वह नहीं है वह पुस्तक overall भी अधिक तर्कसंगत लगते है और यह सूत्र भाष्यकार ने किए विचित्र अर्थों को बल देने के लिए डाले हो ऐसे लगते है तो मैंने भी उन्हें नहीं लिया है।

प्रत्यक्षनिमित्तत्वाच्चेन्द्रियार्थयोः संनिकर्षस्य स्वशब्देन वचनम्। २.१.२६ 
सुप्तव्यासक्तमनसां चेन्द्रियार्थयोः संनिकर्षनिमित्तत्वात्। २.१.२७