प्रश्न फिर से यही रहता है की ये कुतर्क अथवा उससे भी बुरी परिस्थिति, जहां दलील तर्क जैसी लगनी भी कम हो गई है, ऐसे सारे उत्तर अस्तित्व में बनें क्यों रहते है? इतनी हद तक की वे गौतम ऋषि के समय से पहले भी इतने प्रचलित थे की उन्होंने इस शास्त्र में स्थान पाया और आज भी हम आपने आस पास इन्हीं का राज चलते देख सकते है।
इसका जवाब ढूंढना है तो हमें जातिवादी से ध्यान हटाकर उनपर केंद्रित करना होगा जिन्हें जातिवादी प्रभावित करना चाह रहा है (उसका प्रतिवादी, न्यायाधीश अथवा श्रोतागण, जन सामान्य)। यह देखना सरल ही है की वो लोग जितने सत्यग्राही, स्वाध्यायशील, विद्यावान और सजग होंगे उतना ही कुतर्कों का चलना असंभव सा होने लगता है तो ऐसी दलीलें जहां तर्क का दूर दूर तक कोई लेना देना ही न हो वह तो एक क्षण भी नहीं टिकेंगे। और फिर भी कुतर्क और तर्कहीनता चलती है, चलती ही रहती है। इसका अर्थ यह है की जब समाज अथवा व्यक्ति का पतन होता है तब उनके सोचने की शक्ति और रीति में आने वाले बदलाव हमेशा से एक से रहे है (ऐसा होना expected भी है)। और यह की हम आज के समय को कितना ही भला बुरा कहें, ईश्वर की इस दुनिया में कोई वस्तु पहली बार नहीं होती।
अब मैं यहां समाज और व्यक्ति के behavioural patterns पर कोई चर्चा प्रारंभ करना नहीं चाहती, न ही मेरी कोई योग्यता है ऐसी कोई चर्चा के लिए, पर देखने का प्रयत्न करते है की पिछली दो और अर्थापत्तिसमा जाति का प्रयोग क्यों व्यवहार में बना रहता है? कौन इसे सच मान सकते है? तात्पर्य यहां यह नहीं है की इनका प्रत्येक प्रयोग चलता है अथवा सभी पर चलता है। इन के शिकंजे में फंसने वाले भी न तो सभी जातियों में फँसते है न किसी जाति के प्रत्येक प्रयोग में। पर इन जातियों को इतना खुराक कहीं न कहीं मिलता रहता है की वे बनी रहे।
प्रकरणसम : यह वितंडा में प्रवेश करने वाली पहली जाति थी। पक्ष न होते हुए (स्वयं के पक्ष की स्थापना का सामर्थ्य न रखते हुए) भी वैतंडिक ने अभी तर्क का दिखावा नहीं छोडा है। इसमें फँसने वाले लोग सोच सकते है की वादी के पक्ष में वो धर्म नहीं होगा तभी तो प्रतिपक्ष स्वयं के पक्ष में दिखा रहा है अथवा वादी के पक्ष में कोई धर्म होगा तभी तो प्रतिपक्ष स्वयं के पक्ष में उसका न होना बता रहा है। इतना सोच कर यदि वो इतने स्वाध्यायशील नहीं है की प्रमाणों को देखे तो जातिवादी की बातों में आ सकते है। और व्यवहार में यदि कोई वांछनीय धर्म बिना पुरुषार्थ से, मात्र जातिवादी को सिद्ध मान कर मिल जाता है (ऐसा लगता है की मिल जाता है) तो क्यों नहीं?
अहेतूसम : यहां वैतंडिक ने वैतंडिक न दिखने का प्रयत्न भी छोड दिया है। कोई हेतु ही नहीं इसलिए तुम गलत हो कह कर बैठ गया है। फिर भी यह उत्तर न्यायदर्शनकार के समय से ले कर आज तक चलता आ रहा है। यह मुझे मुख्य तीन प्रकार से काम करता लगता है।
१) "बिना हेतु के तो कार्य होता नहीं, अर्थात् जब हेतु ही नहीं है तो कार्य भी नहीं है।" ऐसा सोचकर लोग कार्य की असिद्धि समझ ले। जैसे बहुत से समाचार को हम fake news इस लिए कहते है की हमें निश्चय है की त्रिकाल में इस का कोई हेतु ही नहीं है। (और फिर "कार्य है तो कारण तो होगा ही" का उपयोग करने के लिए fake news होते भी है। अर्थात् गो की सिद्धि गोत्व से ही होगी, कूबड़, सिंग से नहीं। कौन से news fake है और कौन से नहीं उसका निश्चय उनकी सत्यता जानकार ही होगा, बिना प्रमाणों के तर्क/साधर्म्य मात्र से नहीं।)
२) बिना हेतु के तो कार्य होता नहीं, अर्थात् वादी का दिया हेतु है ही नहीं तो अन्य कोई हेतु होगा। और इससे वादी का खंडन तो होता ही है। (ध्यान रहे की प्रतिवादी ने अन्य कोई हेतु नहीं रखा है, पर जाति के शिकार होने वाले ने गलत अर्थापत्ति से यह अर्थ निकाला है।)
३) जातिवादी की विजय में जाति के शिकार को अपना कोई न कोई लाभ दिखता है तो वे उस बात को मानने के लिए ज्यादा उत्सुक रहते है न की क्यों मनानी है/सच क्या है यह सोचने में।
अर्थापत्तिसम : अर्थापत्तिसमा जाति क्यों व्यवहार में बनी रहती है यह देखने से पहले देखते है वह जाति है क्या।
अर्थापत्तितः प्रतिपक्षसिद्धेरर्थापत्तिसमः। ५.१.२१
अर्थापत्ति के आभास से ही प्रतिपक्ष की सिद्धि (पक्ष का खंडन) मानने से अर्थापत्तिसम प्रतिषेध बनता है।
किसी वस्तु के कथन से न कही हुई वस्तु का भी अर्थ निकल आ सकता है। जैसे किसी ने कहा आज राम को ऑफिस में बहुत देर तक बैठना पडा। इस में से यह अर्थ भी निकलता है की प्रतिदिन उसे इतनी देर तक नहीं बैठना पड़ता। पर जब कोई किसी के कथन से मनचाहा अर्थ निकालने लगे और यह जताये की अर्थापत्ति से यह सिद्ध होता है तब वह अर्थापत्तिसम प्रतिषेध बनता है।
जैसे उपर के उदाहरण में कोई कहे की आप के कथन अनुसार राम को छोड़कर दुनिया में आज किसी को ऑफिस में देर तक बैठना नहीं पडा तब ऐसी तोड मरोड के बनाई गई अर्थापत्ति से कोई खंडन नहीं होता।
यदि अहेतुसम शुद्ध वितंडा लगा था क्योंकि जातिवादी ने स्वयं के पक्ष की स्थापना का कोई प्रयत्न भी नहीं किया था तो यह तो उससे भी एक कदम आगे है। वहां कम से कम विरोध तो किया था, यहां तो वादी के पक्ष में से ही मनचाहा अर्थ निकाल लिया।
इस का current real life उदाहरण फिर कभी। वैसे इस समय में कौन उससे अपरिचित होगा?
उत्तर
अनुक्तस्यार्थापत्तेः पक्षहानेरुपपत्तिरनुक्तत्वादनैकान्तिकत्वाच्चार्थापत्तेः। ५.१.२२
न कहे गए का कोई भी अर्थ निकालने से यदि अर्थापत्ति होती तो अनेक विभिन्न अर्थ निकल सकते है (अनैकांतिक बन सकता है) और कोई भी पक्ष का खंडन उपलब्ध होने लगेगा।
अब वह सवाल की ये जाति प्रचलन में रहती कैसे है? जो पहली वस्तु दिमाग में आती है वह यह है की बिना सोचने की जहमत लिए यदि कोई क्लिष्ट विषय को भी समझने का दावा करने मिलता है तो मुफ़्त के पांडित्य को ना न कह पाने वाले बहुत से लोग मिल जाएंगे। वैसे और भी कारण होंगे, सोच पाने पर फिर लिखूँगी।
ऊपर जो उदाहरण मैंने अनकहा छोड दिया था उसमें तो कम से कम यही मुख्य कारण लगा मुझे। जहां एक और अति गंभीर अध्ययन करने वाला प्रामाणिक विशेषज्ञ (वादी) यह कर रहा था की जब वह हमारे शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र कैसे काम करता है उसके बारे में सोचता है तो उसके रोंगटे खडे हो जाते है उतना अद्भुत वह लगता है, वहीं एक सामान्य मनुष्य ने (जातिवादी के शिकार ने) उस प्रतिरक्षा तंत्र को उस दुश्मन के सामने भी, जिसको वह हरा चुका है, सर्वथा सामर्थ्यहीन सिद्ध कर दिया था। यह कहकर की "antibody" ३-४ महीने से ज्यादा नहीं टिकते। (अर्थापत्ति यह थी की वे ३-४ महीने दिखते है इस का अर्थ है उसके बाद तंत्र का कोई सामर्थ्य नहीं रहा।)