शुक्रवार, 29 अप्रैल 2022

अथ तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमानम् पूर्ववच्छेषवत्सामान्यतो दृष्टं च। १.१.५

अनुमान प्रमाण प्रत्यक्ष की भांति सीधा स्पष्ट नहीं है और यहां त्रुटियां होने की संभावना अधिक रहती है। परंतु प्रत्यक्ष की तुलना में इस का क्षेत्र बहुत ही व्यापक है क्योंकि हम प्रत्यक्ष बहुत ही अल्प वस्तुओं का तथा मात्र वर्तमान का ही कर पाते है परंतु व्यवहार में हमें पग पग पर प्रमाण की आवश्यकता रहती है और विषय मात्र वर्तमान के न हो कर भूतकाल अथवा भविष्य के भी होते है जहां अनुमान प्रमाण यही उपयोगी सिद्ध होता है। इन सब कारणों से इस शास्त्र का मुख्य विषय भी अनुमान प्रमाण ही है।

अनुमान प्रमाण के लक्षण अगले सूत्र में बताए गए है।

अथ तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमानम् पूर्ववच्छेषवत्सामान्यतो दृष्टं च। १.१.५

प्रत्यक्ष पूर्वक अनुमान प्रमाण तीन प्रकार का होता है। पूर्ववत् शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट।

अथ = इस के पश्चात (प्रत्यक्ष के पश्चात अनुमान का वर्णन किया जाता है)
तत्पूर्वकं = तत् (प्रत्यक्ष) पूर्वक। पहले आपने प्रत्यक्ष पूर्वक लिंग/धर्म (लक्षण) - लिंगी/धर्मी (धर्म जिसमें रहता है वह पदार्थ) का संबंध जाना हुआ है और फिर जब आप धर्म देखते हो और स्मृति में से उस संबंध के ज्ञान (व्याप्ति ज्ञान) के उभरने से अप्रत्यक्ष धर्मी का ज्ञान होता है।
वर्तमान में किया गया धर्म का प्रत्यक्ष ही अनुमान प्रमाण का हेतु बनेगा। जैसे धुआं प्रत्यक्ष होने पर अग्नि का ज्ञान होता है उसमें धुएं  का प्रत्यक्ष ही हेतु है (जो अनुमान प्रमाण के पंचावयव का दूसरा अवयव है।)
त्रिविधम् = तीन प्रकार का
अनुमानम् = अनुमान प्रमाण होता है।

(भाष्यकार पूर्ववत् शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट के दो दो अर्थ दे रहें है।)
पूर्ववत् = १) पूर्व वाला। कारण से कार्य का अनुमान २) पूर्व जैसा   
शेषवत् = १) शेष वाला। कार्य से कारण का अनुमान। २) शेष (बाकि) बचा वह 
सामान्यतोदृष्ट =सामान्य नियम के आधार पर अनुमान। 

पहले प्रथम अर्थ देखते है। 

पूर्ववत् = पूर्व वाला। कारण से कार्य का अनुमान
जैसे उमड के आये हुए काले बादल (और वर्षा के अन्य चिन्ह) देखकर यह निश्चय हो जाता है की वर्षा आएगी।
  
शेषवत् = शेष वाला। कार्य से कारण का अनुमान।
जैसे नदी में अचानक आया हुआ बहुत पानी, उसका तेज वेग और पानी का मिट्टी पत्ते को लिए हुए होने से यह पता लगता है की ऊपर कहीं वर्षा हुई है। 

सामान्यतोदृष्ट =सामान्य नियम के आधार पर अनुमान।
जैसे हमने हमेशा देखा है की यदि कोई वस्तु देशांतर को प्राप्त होती है तो ऐसा उसने गति करने पर ही होता है। अब हम कोई एक व्यक्ति को एक दिन एक जगह और अन्य दिन अन्य जगह देखते है तो हम यह जान लेते है की उसने गति की है। भले ही हमने उसे गति करते नहीं देखा।
ऐसे ही जब सूर्य किरण हम तक पहुंचती है तो यद्यपि हम उसे गति करते नहीं देख पाते पर वह सूर्य से निकल कर हम तक पहुंची है (देशांतर को प्राप्त हुई है) उससे हम जान सकते है की उसने गति की है।

अब इन का दूसरा अर्थ देखते है।
  
पूर्ववत् = पूर्व जैसा। हमने पूर्व में जो व्याप्तिज्ञान किया है उनमें से एक (जो दूसरे का निश्चय से बोध करता है) को देख कर दूसरे को अनुमान से जान लेंगे।
यदि व्याप्ति सम है जैसे जो उत्पन्न होता है वह नाश को भी प्राप्त होता है और जो नाश हुआ है वह उत्पन्न भी हुआ होगा। अर्थात् यदि दो में से कोई एक को देख कर दूसरे का निश्चय हो सकता है तब अनुमान दोनों और कर सकते है। यदि व्याप्ति विषम हो जैसे जहां धुआं होता है वहां आग होती है पर जहां आग हो वहां धुएं का होना अनिवार्य नहीं है। वहां हम व्याप्ति के अनुसार एक को देखकर दूसरे का अनुमान कर सकते है पर विपरीत नहीं। 
 
यहां पूर्ववत् में प्रथम अर्थ के पूर्ववत् और शेषवत् दोनों का समावेश हो जायेगा।
  
शेषवत् = शेष बचा वह। जैसे मानो हमारे घर तीन मित्र आये थे। उनके जाने के बाद हमने देखा की उनमें से कोई चावीयों का गुच्छा भूल गया है। हम एक को फोन करके पूछते है पर गुच्छा उसका नहीं है। हम दूसरे को पूछते है पर वह उसका भी नहीं है। अब क्योंकि एक ही मित्र बचा है जिसका वह गुच्छा हो सकता है उसको बिना पूछे ही हम निश्चय कर लेंगे की वह उसका है। 

सामान्यतोदृष्ट =सामान्य नियम के आधार पर अनुमान। जैसे हमें पता है की गुण हमेशा गुणी में ही रहता है। अब यह नियम के आधार पर जब हम कोई गुण देखते है पर गुणी का प्रत्यक्ष नहीं कर पाते है तब भी कोई न कोई गुणी तो होगा यह जान लेते है। जैसे इच्छा प्रयत्न आदि गुण को देखकर हम आत्मा (अथवा कोई न कोई यदि हम आत्मा न कहना चाहे) गुणी का अनुमान कर लेते है। 

भाष्यकार सामान्यतोदृष्ट के इस अर्थ को प्रथम अर्थ से इस आधार पर अलग बताते है की वहां कार्य-कारण का सम्बन्ध था अथवा वहां जिसका अनुमान कर रहे है उस जैसी अन्य वस्तु/क्रियाएं हमने देख रखी है जब की यहां हम ऐसी वस्तु का अनुमान भी करते है जो हमने कभी भी प्रत्यक्ष नहीं की है।

मेरी टिप्पणी :-
भाष्यकार ने दो अर्थ दिए है पर दूसरे अर्थ में प्रथम अर्थ में समाविष्ट सारे प्रसंग पूरी तरह समाविष्ट हो जाते है और वह अधिक व्यापक है। तो मुझे प्रथम अर्थ की कोई प्रासंगिकता नहीं लगती। हो सकता है आगे ऐसी स्थिति में मैं अपनी Notes में एक ही लिखूं।

मेरी तत्पूर्वकं को ले कर कुछ टिप्पणियां है पर उनको जब अनुमान प्रमाण को विस्तार से आगे देखेंगे तब उठाऊंगी। पर संक्षिप्त में, 'प्रत्यक्ष प्रमाण पूर्वक' इसको व्याप्ति स्थापना से जोडना मुझे योग्य लगता है वह व्याप्ति स्थापना प्रमाण का उपयोग कर रहा है उसके द्वारा ही हुई हो, अर्थात् उसने ही व्याप्ति का प्रत्यक्ष किया हो यह कहना उचित नहीं लगता। और क्योंकि शब्द और अनुमान दोनों ही अंततः प्रत्यक्ष मूलक होते है हम उनके द्वारा स्थापित व्याप्ति आधारित अनुमान भी कर सकेंगे (हम करते तो है ही, पर ऐसा करने से तत्पूर्वकं खंडित नहीं होगा जब उसको व्याप्ति स्थापना के साथ जोड़ेंगे।)

भाष्यकार त्रिविधम् को ले कर प्रश्न उठाते है की जब तीन प्रकार का उल्लेख ही कर दिया है तो फिर त्रिविधम् भी क्यों कहा? वह तो बिना कहे भी कोई भी समझ सकता था। इसका कोई संतोष जनक उत्तर तो नहीं दिया है पर यह निर्देश किया है की सूत्रकार ने ऐसा ही तीन और सूत्र में भी आगे किया है। तो हम उसको सूत्रकार की शैली मान सकते है। 


प्रश्न:-

१) जब प्रत्यक्ष प्रमाण को श्रेष्ठ माना गया है और वहां तक पहुंचे बिना जिज्ञासा पूर्ण शांत नहीं होती तो अनुमान प्रमाण को इस शास्त्र का मुख्य विषय क्यों माना गया है?

क) क्योंकि हम बहुत थोडी वस्तुओं का प्रत्यक्ष कर पाते है पर अनुमान का क्षेत्र अति व्यापक है इस दृष्टि से वह महत्वपूर्ण है। 
ख) प्रत्यक्ष मात्र वर्तमान का होता है पर अनुमान भूत भविष्य का भी होता है इस दृष्टि से अनुमान व्यापक और महत्वपूर्ण है। 
ग) प्रत्यक्ष सीधा स्पष्ट होता है अनुमान की तुलना में जहां गलतीयां होने की अनेक संभावनाएं रहती है इसलिए उसे विस्तार से समझना अति आवश्यक है।
घ) ऊपर के सारे कारणों से अनुमान को मुख्य विषय बनाया गया है।
ङ) प्रत्यक्ष प्रमाण ही शास्त्र का मुख्य विषय है क्योंकि वह सर्वश्रेष्ठ है।

२) सूत्रकार ने अनुमान प्रमाण कितने प्रकार का बताया है? कौन कौन से?

३) जब हमें कार्य कारण अथवा धर्म धर्मी की व्याप्ति का ज्ञान है और यदि उसमें से एक को देखकर दूसरे का अनुमान कर लेते है तो सूत्र में बताये गए किस प्रकार के अनुमान का हम प्रयोग कर रहे है?


सोमवार, 25 अप्रैल 2022

update - इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्। १.१.४

न्यायदर्शन Notes शुरू करने के पूर्व foreword में मैंने कहा था,
"as I learn, will put notes out here. Expect them to be blatant copy of Acharya's kathan. ... Expect the pace to be slow and do not expect me to defend / explain things in this iteration. I plan to limit myself to my 'blatant copy' notes."

और तब मैंने सोचा था की ज्यादा से ज्यादा मैं अपनी शंकाए कहीं एक दो footnotes में लिख दूंगी पर यहां मात्र चौथे सूत्र में मुझे अपनी footnote से कुछ बडी असहमति लिखने के उपरांत कोई विकल्प नहीं दिखता।

यह पोस्ट मैंने जो समझा है उस पर आधारित है। प्रथम पोस्ट की तुलना में जो नया है वह भूरे रंग में और असहमति लाल रंग में है।   
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तृतीय सूत्र में प्रमाणों के विभाग कहने के उपरांत सूत्रकार प्रथम विभाग प्रत्यक्ष के लक्षण चतुर्थ सूत्र में बताते है। 

इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्। १.१.४

इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न हुआ वह ज्ञान जो अव्यपदेश्य, अव्यभिचारी तथा व्यवसायात्मक हो उसको प्रत्यक्ष कहते है।

उत्पन्न हुआ ज्ञान = नया अर्थ जो मन ने ग्रहण करके आत्मा तक पहुंचाया है। 

(आत्मा सदैव मन को ही देखता रहता है। कोई भी ज्ञान आत्मा तक मन ही पहुंचाता है। जो भी वस्तु मन जानता है उसको आत्मा को जनाता है। मन जो जड है चेतन नहीं उसका काम आत्मा का उपकार करना है और वह आत्मा की इच्छा (और उन इच्छाओं से बने संस्कार) के अनुसार काम करता है।)

कैसे उत्पन्न हुआ ज्ञान?
इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न हुआ ज्ञान। 

कैसा ज्ञान ?
१) अव्यपदेश्य : व्यपदेश का अर्थ है कथन, शब्द द्वारा किसी वस्तु का बोध कराना। व्यपदेश्य = कथन करने योग्य। अव्यपदेश्य का अर्थ है वह ज्ञान जिसका शब्द द्वारा बोध न कराया जा सके। 

ऐसा ज्ञान जो किसी के कहने से उत्पन्न हुआ हो वह प्रत्यक्ष नहीं कहा जा सकता।

जब हम किसी की कही हुई बात सुनते/पढते है तब इन्द्रिय का अर्थवाचक शब्द  से (श्रोत्र/चक्षु/त्वचा का शब्द के ध्वनि/रूप/स्पर्श के साथ) सन्निकर्ष होता है। पर ऐसे ज्ञान को प्रत्यक्ष नहीं कहेंगे। वहां इन्द्रिय का सन्निकर्ष अर्थ के साथ नहीं हुआ है मात्र अर्थ के वाचक शब्दों के साथ हुआ है। अर्थ का ज्ञान वहां हमें जब मन उन वाचक शब्दों के अर्थ को स्मृति / संस्कार में से उभारकर आत्मा को अर्थ का ज्ञान कराता है तब होता है। 

जो ज्ञान इन्द्रिय के अर्थ से सन्निकर्ष से उत्पन्न होता है वह शब्द से नहीं दिया जा सकता। शब्द अनुभूति को वर्णित करने में हमेशा अपर्याप्त रहते है इस लिए उस ज्ञान का बोध शब्दों द्वारा हो ही नहीं सकता।

अर्थ के नामधेय (=नाम, संज्ञा) होते है जिससे व्यवहार चलता है। जैसे केले के स्वाद को हम मीठा कहते है पर न तो केले के मीठेपन का अनुभव करने के लिए हमारा 'मीठा' शब्द जानना पर्याप्त है न ही यदि कोई केला खाए तो उसकी स्वाद अनुभूति में उसको मीठा शब्द ज्ञात है या नहीं उससे कोई अंतर आएगा।

२) अव्यभिचारी : अ (निषेधात्मक) +वि (उपसर्ग, विरुद्ध रूप से) +अभि (चारों ओर) +चारि (चर् धातु से गति करने वाला).
व्यभिचारी = इधर उधर गति करने वाला। अव्यभिचारी =जिसमें स्थिरता हो, जो डिगे नहीं। अर्थात् वह ज्ञान जो बदल जाने वाला/खंडित होने वाला न हो। जैसे तपती धूप में हमने पानी देखा (मृगजल) पर निकट जाने पर वह नहीं था। ऐसे ज्ञान को भी प्रत्यक्ष नहीं कहेंगे। (भाष्यकार ने न्यायदर्शन की भूमिका में प्रमाण के बारे में कहा था प्रमाणतोऽर्थप्रतिपत्तौ प्रवृत्तिसामर्थ्यात् अर्थवत् प्रमाणम्)

३) व्यवसायात्मक : =निश्चयात्मक। प्रत्यक्ष ज्ञान संदेह रहित होना चाहिए। जैसे यदि हम कोई वस्तु को देखते है (चक्षु इन्द्रिय का वस्तु के साथ सन्निकर्ष होता है) परंतु  हमें निश्चय नहीं हो पा रहा है की वह सांप है या रज्जु तो ऐसे में उसको प्रत्यक्ष नहीं कहा जायेगा।


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* जिस प्रश्न और उत्तर से में असहमत हूँ वे इस प्रकार थे। 
प्रश्न : तो क्या प्रत्यक्ष में मात्र इन्द्रिय का अर्थ से ही सन्निकर्ष होता है? इन्द्रिय का मन से तथा मन का आत्मा के साथ सन्निकर्ष नहीं होता? इनके बगैर प्रत्यक्ष हो जायेगा? यदि यह सन्निकर्ष भी होते है तो सूत्र में क्यों नहीं बताये?

उत्तर : यह सूत्र प्रत्यक्ष के सारे कारणों का अवधारण (निश्चय) नहीं करता। प्रत्यक्ष के पीछे इतने ही कारण है यह कहना सूत्र का प्रयोजन नहीं है अपितु प्रत्यक्ष के विशेष (भेदक) कारणों (लक्षण) को बताना इसका प्रयोजन है। आत्मा का मन से सन्नीकर्ष प्रत्येक प्रमाण में होता है और वह सब में सामान्य होने से प्रत्यक्ष का विशेष लक्षण नहीं बनेगा। 

मेरा पक्ष :-
प्रश्न ही नहीं बनता पर पहले ये देखते है की गलत प्रश्न को सही मान के दिए गए उत्तर से कैसे स्वयं का ही पक्ष खंडित हो रहा है।

वहां मन-आत्मा सन्निकर्ष के बारे में यह कहा गया की क्योंकि वह सब प्रमाणों में समान है इसलिये नहीं कहा गया।
तो क्या बाकी प्रमाण व्यभिचारी, संशयात्मक हो सकते है? प्रमाणतोऽर्थप्रतिपत्तौ प्रवृत्तिसामर्थ्यात् अर्थवत् प्रमाणम् क्या मात्र प्रत्यक्ष के लिए कहा था? 

प्रथम तो, ऐसा नहीं है की सूत्रकार ने पहले प्रमाण के लक्षण दे दिए हो (जिससे प्रमाण को अप्रमाण से भिन्न कर दिया हो) और अब वे प्रमाणों के अंदर विभाग मात्र के लक्षण दे रहे हो। इससे यह कहना सर्वथा विपरीत है की प्रत्यक्ष प्रमाण के सारे कारणों को सूत्रकार ने नहीं बताया जब इससे पहले उन्होंने प्रमाण के कोई कारण बताए ही नहीं जहां से हम यहां न बताये हुए सामान्य कारणों को inherit कर  सकें। (अपरिचित के दो हाथ है कहना तब व्यर्थ होगा जब हम लक्षण मनुष्य से भरी गाडी में से एक मनुष्य के कर रहे हो। मान लो वहां सारे जिव जंतु हो तब? और फिर यदि अतिव्याप्ति हो रही हो तो विशेषण लगा ही सकते है। जैसे यहां अव्यभिचारी आदि लगाए ही है)

उत्तर स्वयं के पक्ष को खंडित इस लिए करता है क्योंकि वास्तव में प्रश्न ही नहीं बनता। जब हम सूत्र में कहे गए 'उत्पन्न हुए ज्ञान' की अनदेखी नहीं करेंगे तो वह प्रश्न ही नहीं बनेगा। और यदि फिर भी कोई यह प्रश्न पूछे तो इनको यह स्पष्ट करना चाहिए की सूत्रकार के शब्द उत्पनं ज्ञानम् का अर्थ क्या है? क्या मन के अर्थ को ग्रहण करके आत्मा तक पहुंचाने से ही आत्मा को ज्ञान नहीं होता? क्या कोई और पद्धति से भी ज्ञान उत्पन्न हो जाता है? यदि नहीं तो सूत्रकार ने एक ही बात दो बार क्यों नहीं कही ऐसी आपत्ति क्यों?
(यहां वैसे मुझे व्याकरण का ज्ञान न होने के उत्पन्न मेरी असमर्थता दिख रही है)
  
जहाँ तक इन्द्रिय और मन के सन्निकर्ष को ले कर उत्तर था तो उसमें मेरी असहमति प्रथम post में ही व्यक्त कर दी थी। पर अब जब मेरा पक्ष यह है की प्रश्न ही नहीं बनता तो उसको यहां लिखना अर्थहीन है। फिर भी उस उत्तर के प्रति असहमति वहां देख सकते है।

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हम विषय शब्द का अनेक बार उपयोग करते है तो इस शब्द का अर्थ क्या है?
विषय शब्द वि (विशिष्ट) उपसर्ग पूर्वक सि (षिञ् बन्धने) धातु से बनता है जिसका अर्थ है जो विशिष्ट रूप से इन्द्रियों को बांध देता है वह।

प्रश्न :-

१) इनमें से कौन सा ज्ञान प्रत्यक्ष है? यदि नहीं है तो क्यों नहीं है?

क) आपके पडोसी उनकी बेटी जो जापान में रहती है वहां तीन महीने रहे कर आये है और अब जापान में सब कैसा है वह आपको सविस्तार सुना रहे है। उनके वर्णन से आपको जो ज्ञान हो रहा है क्या वह प्रत्यक्ष कहा जायेगा?

ख) वो वहां के कुछ videos भी लाये है और दिखाते है।

ग) उन्होंने वहां एक राष्ट्रीय उद्यान में कुछ पक्षीओं की ध्वनि रेकॉर्ड की थी वह भी आपको सुनाते है यद्यपि वहां कोई पक्षी  दिखाई नहीं दे रहा है।
घ) वे वहां से आप के लिए कोई मिठाई ले आये है जो आप ने खायी पर उसका नाम आप को पता नहीं है। 

२) आप कल टहलने गए थे और रास्ते में सांप है ऐसा दिखने पर डर कर रास्ता बदल कर वापस आ गए थे। आज जब उस रास्ते पर फिर से जाते है तो जहां कल सांप देखा समझे थे वहां रज्जु का टुकडा पडा हुआ देखकर समझ जाते है कल आप गलत समझे थे। आपने कल किस का प्रत्यक्ष किया था? सांप अथवा रज्जु का? और आज?

३) आपके समक्ष से कोई पसार हो गया और आप को दिखा भी पर क्यों की आप का ध्यान ट्विटर में था तो वह कौन था उस पर ध्यान नहीं गया बस उसने सफेद शर्ट पहनी थी उतना ध्यान गया। दूसरे दिन वह व्यक्ति आप को कहता है की कल आपने मुझे प्रत्यक्ष देखा तो था। क्या वो सही है? 

रविवार, 24 अप्रैल 2022

इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवस्यात्मकं प्रत्यक्षम्। १.१.४

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तृतीय सूत्र में प्रमाणों के विभाग कहने के उपरांत सूत्रकार प्रथम विभाग प्रत्यक्ष के लक्षण चतुर्थ सूत्र में बताते है। 

इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्। १.१.४

इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न हुआ वह ज्ञान जो अव्यपदेश्य (जिसका शब्द द्वारा बोध न कराया जा सके), अव्यभिचारी (बदल जाने वाला / खंडित होने वाला न हो) तथा व्यवसायात्मक (संदेह रहित) हो उसको प्रत्यक्ष कहते है।

सूत्र ३ के भाष्य में हमने देखा था की वृत्ति (प्रमाण) इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष अथवा उससे उत्पन्न हुए ज्ञान दोनों को कहते है। पर ध्यान रहे की इस सूत्र में सूत्रकार मात्र सन्निकर्ष से उत्पन्न हुए ज्ञान को प्रमाण बताते है। (अन्य भाष्यकार यहां यतः (जिससे) पद को अध्याहार मानकर जिस सन्निकर्ष से ज्ञान उत्पन्न होता है यह अर्थ भी करते है। पृष्ठ २६, सन्दर्भ ५)  

इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न हुआ प्रत्येक ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं कहलायेगा। सूत्रकार कुछ विशेषताएं बताते है जिनके होने पर ही उस ज्ञान को प्रत्यक्ष कहा जाता है।

१) अव्यपदेश्य : व्यपदेश का अर्थ है कथन, शब्द द्वारा किसी वस्तु का बोध कराना। व्यपदेश्य = कथन करने योग्य। अव्यपदेश्य का अर्थ है वह ज्ञान जिसका शब्द द्वारा बोध न कराया जा सके। 

ऐसा ज्ञान जो किसी के कहने से उत्पन्न हुआ हो वह प्रत्यक्ष नहीं कहा जा सकता।

जब हम किसी की कही हुई बात सुनते/पढते है तब इन्द्रिय का अर्थवाचक शब्द  से (श्रोत्र/चक्षु/त्वचा का शब्द के ध्वनि/रूप/स्पर्श के साथ) सन्निकर्ष होता है। पर ऐसे ज्ञान को प्रत्यक्ष नहीं कहेंगे। वहां इन्द्रिय का सन्निकर्ष अर्थ के साथ नहीं हुआ है मात्र अर्थ के वाचक शब्दों के साथ हुआ है। अर्थ का ज्ञान वहां हमें जब मन उन वाचक शब्दों के अर्थ को स्मृति / संस्कार में से उभारकर आत्मा को अर्थ का ज्ञान कराता है तब होता है। 

जो ज्ञान इन्द्रिय के अर्थ से सन्निकर्ष से उत्पन्न होता है वह शब्द से नहीं दिया जा सकता। १) शब्द से वह अनुभूति उत्पन्न नहीं हो सकती २) शब्द अनुभूति को वर्णित करने में हमेशा अपर्याप्त रहते है इस लिए उस ज्ञान का बोध शब्दों द्वारा हो ही नहीं सकता। 

अर्थ के नामधेय (=नाम, संज्ञा) होते है जिससे व्यवहार चलता है। जैसे केले के स्वाद को हम मीठा कहते है पर न तो केले के मीठेपन का अनुभव करने के लिए हमारा 'मीठा' शब्द जानना पर्याप्त है न ही यदि कोई केला खाए तो उसकी स्वाद अनुभूति में जिसको मीठा शब्द ज्ञात है या नहीं उससे कोई अंतर आएगा।

२) अव्यभिचारी : अ (निषेधात्मक) +वि (उपसर्ग, विरुद्ध रूप से) +अभि (चारों ओर) +चारि (चर् धातु से गति करने वाला).
व्यभिचारी = इधर उधर गति करने वाला। अव्यभिचारी =जिसमें स्थिरता हो, जो डिगे नहीं। अर्थात् वह ज्ञान जो बदल जाने वाला/खंडित होने वाला न हो। जैसे तपती धूप में हमने पानी देखा (मृगजल) पर निकट जाने पर वह नहीं था। ऐसे ज्ञान को भी प्रत्यक्ष नहीं कहेंगे। (भाष्यकार ने न्यायदर्शन की भूमिका में प्रमाण के बारे में कहा था प्रमाणतोऽर्थप्रतिपत्तौ प्रवृत्तिसामर्थ्यात् अर्थवत् प्रमाणम्)

३) व्यवसायात्मक : =निश्चयात्मक। प्रत्यक्ष ज्ञान संदेह रहित होना चाहिए। जैसे यदि हम कोई वस्तु को देखते है (चक्षु इन्द्रिय का वस्तु के साथ सन्निकर्ष होता है) परंतु  हमें निश्चय नहीं हो पा रहा है की वह सांप है या रज्जु तो ऐसे में उसको प्रत्यक्ष नहीं कहा जायेगा।

अब भाष्यकार पूर्वपक्षी का एक प्रश्न ले कर उसका उत्तर देते है। 
प्रश्न : तो क्या प्रत्यक्ष में मात्र इन्द्रिय का अर्थ से ही सन्निकर्ष होता है? इन्द्रिय का मन से तथा मन का आत्मा के साथ सन्निकर्ष नहीं होता? इनके बगैर प्रत्यक्ष हो जायेगा? यदि यह सन्निकर्ष भी होते है तो सूत्र में क्यों नहीं बताये?

उत्तर : यह सूत्र प्रत्यक्ष के सारे कारणों का अवधारण (निश्चय) नहीं करता। प्रत्यक्ष के पीछे इतने ही कारण है यह कहना सूत्र का प्रयोजन नहीं है अपितु प्रत्यक्ष के विशेष (भेदक) कारणों (लक्षण) को बताना इसका प्रयोजन है। आत्मा का मन से सन्नीकर्ष प्रत्येक प्रमाण में होता है और वह सब में सामान्य होने से प्रत्यक्ष का विशेष लक्षण नहीं बनेगा। 

(आत्मा सदैव मन को ही देखता रहता है। कोई भी ज्ञान आत्मा तक मन ही पहुंचाता है। जो भी वस्तु मन जानता है उसको आत्मा को जनाता है। मन जो जड है चेतन नहीं उसका काम आत्मा का उपकार करना है और वह आत्मा की इच्छा (और उन इच्छाओं से बने संस्कार) के अनुसार काम करता है।)

इन्द्रिय और मन का सन्निकर्ष इस लिए नहीं कहा की
१) उस की भेदकता विषय और इन्द्रिय के सन्निकर्ष के समान ही है, एक सन्निकर्ष को कहने से ही लक्षण पूर्ण हो जायेगा और दूसरे को कहने से भेदकता में अंतर नहीं आएगा इस लिए नहीं कहा।

अथवा (जो मुझे थोडा भी तर्कसंगत नहीं लगता)
२) विषय इन्द्रिय सन्निकर्ष में प्रत्येक इन्द्रिय के अपने अपने विषय है जिससे हर एक इन्द्रिय के प्रत्यक्ष में भिन्नता है पर इन्द्रिय मन सन्निकर्ष में मन प्रत्येक इन्द्रिय के सामने एक ही होने से ऐसी भिन्नता नहीं है इस लिए उसे लक्षण नहीं बनाया।  

(इन्द्रिय मन सन्निकर्ष के उत्तर को ले कर मेरी शंका : इसका उत्तर यह क्यों नहीं दिया गया? -> अतीन्द्रिय विषय (वह विषय जो बाह्य इन्द्रियों से ग्राह्य नहीं है) में मन (अंतःकरण) का सन्निकर्ष  सीधा अर्थ के साथ होता है वहां फिर इन्द्रिय (मन) का सन्निकर्ष मन के साथ ऐसा कहना वह दोनों एक ही होने से नहीं बनता। ऐसे में यदि इन्द्रिय मन सन्निकर्ष को लक्षण बनाएंगे तो उस लक्षण की वहां अव्याप्ति हो जाएगी और यदि यह कहे की अव्याप्ति नहीं होगी क्योंकि वस्तु का स्वयं से सन्निकर्ष तो रहता ही है तब भी  ऊपर (१) तर्क के अनुसार इसका पृथक वचन व्यर्थ है। और यदि इस सन्निकर्ष का फल अर्थ का मन तक पहुंचना ऐसा लेंगे तो यह भी मन आत्मा के सन्निकर्ष की भांति सब प्रमाणों में सामान्य हो जायेगा और लक्षण नहीं बनेगा। ) 


हम विषय शब्द का अनेक बार उपयोग करते है तो इस शब्द का अर्थ क्या है?
विषय शब्द वि (विशिष्ट) उपसर्ग पूर्वक सि (षिञ् बन्धने) धातु से बनता है जिसका अर्थ है जो विशिष्ट रूप से इन्द्रियों को बांध देता है वह।

प्रश्न :-

१) इनमें से कौन सा ज्ञान प्रत्यक्ष है? यदि नहीं है तो क्यों नहीं है?

क) आपके पडोसी उनकी बेटी जो जापान में रहती है वहां तीन महीने रहे कर आये है और अब जापान में सब कैसा है वह आपको सविस्तार सुना रहे है। उनके वर्णन से आपको जो ज्ञान हो रहा है क्या वह प्रत्यक्ष कहा जायेगा?

ख) वो वहां के कुछ videos भी लाये है और दिखाते है।

ग) उन्होंने वहां एक राष्ट्रीय उद्यान में कुछ पक्षीओं की ध्वनि रेकॉर्ड की थी वह भी आपको सुनाते है यद्यपि वहां कोई पक्षी  दिखाई नहीं दे रहा है।
घ) वे वहां से आप के लिए कोई मिठाई ले आये है जो आप ने खायी पर उसका नाम आप को पता नहीं है। 

२) आप कल टहलने गए थे और रास्ते में सांप है ऐसा दिखने पर डर कर रास्ता बदल कर वापस आ गए थे। आज जब उस रास्ते पर फिर से जाते है तो जहां कल सांप देखा समझे थे वहां रज्जु का टुकडा पडा हुआ देखकर समझ जाते है कल आप गलत समझे थे। आपने कल किस का प्रत्यक्ष किया था? सांप अथवा रज्जु का? और आज?

३) आपके समक्ष से कोई पसार हो गया और आप को दिखा भी पर क्यों की आप का ध्यान ट्विटर में था तो वह कौन था उस पर ध्यान नहीं गया बस उसने सफेद शर्ट पहनी थी उतना ध्यान गया। दूसरे दिन वह व्यक्ति आप को कहता है की कल आपने मुझे प्रत्यक्ष देखा तो था। क्या वो सही है? 

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शुक्रवार, 22 अप्रैल 2022

प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि। १.१.३

सूत्रकर्ता ने न्यायशास्त्र में पदार्थों के उपपादन का क्रम इस प्रकार रखा है।   
 
१) उद्देश २) लक्षण ३) परीक्षा 

उद्देश : नाममात्र से पदार्थ का उल्लेख करना वह उद्देश है। जैसे प्रथम सूत्र में १६ पदार्थों का नाम मात्र ले कर उद्देश किया गया है।
 
लक्षण : उद्दिष्ट पदार्थ का स्वरूप कथन, उसको अन्य पदार्थ से भिन्न स्पष्ट कर देने वाला धर्म लक्षण है। जैसे की यदि अनेक गायों में से आप किसी को कोई एक गाय बताना चाहते है तो उसको काली गाय/छोटी बछडी ऐसे कोई विशिष्ट लक्षण जो उस गाय में ही घटते हो उससे दिखाएंगे। 

परीक्षा : उद्दिष्ट पदार्थ के जो लक्षण कहे गए है वह उसके वास्तविक स्वरूप को स्पष्ट करता है की नहीं यह प्रमाणों से निश्चित करना परीक्षा है। लक्षण करने में अनेक त्रुटियां हो जाती है। जैसे की लक्षण लक्षित वस्तु पर यथार्थ घटता ही न हो (अव्याप्ति) अथवा वह अन्य वस्तुओं पर भी घटता हो (अतिव्याप्ति) अथवा लक्षण ऐसा हो की जिसका होना ही संभव न हो (असंभव)। परीक्षा से ऐसी कोई त्रुटि तो नहीं रह गयी है यह निश्चित करते है।

इस शास्त्र में दो पद्धतियां देखने को मिलती है। 
१) पदार्थ का उद्देश किया जाये (जैसे प्रथम सूत्र में 'प्रमाण') -> उसके विभाग बताये जाये (जैसे तृतीय सूत्र में प्रमाण कितने प्रकार के होते है वह बताया गया है) -> प्रत्येक विभाग के लक्षण
२) पदार्थ का उद्देश किया जाये (जैसे प्रथम सूत्र में 'छल') -> उसके लक्षण बताये जाये -> उसके विभाग बताये जाये 

तृतीय सूत्र में सूत्रकार सर्वप्रथम उद्दिष्ट पदार्थ प्रमाण के विभाग बताते है। 

प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि। १.१.३ 

प्रत्यक्ष अनुमान उपमान शब्द प्रमाण है। 

तृतीय सूत्र के प्रत्येक शब्द की व्याख्या करते हुए भाष्यकार कहते है,

प्रत्यक्ष : अक्षस्य अक्षस्य प्रतिविषयं वृत्तिः प्रत्यक्षम् 
अक्ष = इन्द्रिय, अक्षस्य अक्षस्य दो बार कहने से अर्थ होगा प्रत्येक इंद्रिय का
प्रतिविषय =अपने अपने विषय के साथ (आँख का रूप, श्रोत्र का शब्द, रसना का रस, त्वचा से स्पर्श, घ्राण का गंध (अथवा अंतःकरण का बाह्य करणों से ग्राह्य न हो ऐसे सूक्ष्म विषय जैसे आत्मा) के साथ)
वृत्ति =सन्निकर्ष, ज्ञान (यह दोनों अर्थ ले सकते है)

वृत्ति का अर्थ जब सन्निकर्ष लेंगे तब वस्तु का अर्थ/ज्ञान प्रमिति बनेगा। जैसे हमने आँख से देखकर यह पीने का पानी है यह निश्चय किया तो यहाँ पानी के रूप के साथ चक्षु इन्द्रिय के सन्निकर्ष को वृत्ति (=प्रमाण = जिससे कुछ जाना जाता है) मानेंगे तो प्रमिति "यह पीने का पानी है" उस ज्ञान को कहेंगे।
यदि हम "यह पीने का पानी है" इस ज्ञान को वृत्ति (=प्रमाण) कहेंगे तब प्रमिति उस पानी को ग्रहण करने अथवा छोडने/उपेक्षा (न पीने) की इच्छा को कहेंगे। 


अनुमान : मितेन लिंगेन अर्थस्य पश्चान्मानमनुमानम्
अनु + मान = पश्चात् + ज्ञान
मितेन = जाने हुए, लिंगेन = लक्षण से
जिस अर्थ को जानना है उसका कोई लक्षण पहले ज्ञात हो जाये उसके पश्चात् जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह अनुमान है। 
जैसे हमें पता है की धुआं आग का लक्षण है। अब जब हम धुएं को जानकर उसके आधार पर अग्नि के होने को जान लेते है वह अनुमान है। 

उपमान : सारूप्य ज्ञान, समान धर्मों का बोध
जैसे किसी ने नीलगाय नहीं देखी। उसको बताया गया की वह कुछ कुछ गाय जैसी होती है। अब जब वो नीलगाय को देखकर यह जान लेता है की यह नीलगाय है तब उसने उपमान प्रमाण का उपयोग किया है।

शब्द : जिसके द्वारा अर्थ की अभिव्यक्ति होती है।

भाष्यकार आगे बताते है की प्रमाण उपलब्धि (= बुद्धि =ज्ञान *) के साधन है और यह उसकी समाख्या (उसके निर्वचन) से ही पता लगता है।
*इस शास्त्र में बुद्धि उपलब्धि और ज्ञान समानार्थी के रूप में प्रयोग किए गए है। 
समाख्या =सम्यक रूप से आख्यान जिसके द्वारा =संज्ञा = नाम 
निर्वचन =निश्चित रूप से कथन करना =व्युत्पत्ति (शब्द किस धातु प्रत्यय से बना है यह जानना)
प्रमाण शब्द प्र उपसर्ग पूर्वक मा (माङ् माने) धातु से करण अर्थ में ल्युट् प्रत्यय से निष्पन्न हुआ है = प्रकर्ष रूप से जाना जाता है जिससे। 

हमारे शब्दों की यह विशेषता है की उनका अर्थ जानने के लिए हमें कहीं और नहीं जाना पडता, वह अपने अर्थ को स्वयं बताते है। 
जैसे मनुष्य शब्द का क्या अर्थ है यह जानना हो तो हम यह देखेंगे की मनुष्य शब्द किस धातु से बना है। मन् (मनुँ अवबोधने) धातु से यह शब्द बना है। उसका अर्थ है जो जानता है वह मनुष्य। 

और ऐसे ही प्रमाण के चारों विभाग के नाम भी अपने अर्थ को स्वयं ही बताते है जो हमने ऊपर उनका अर्थ करते समय देखा।

आगे भाष्यकार एक जिज्ञासा का उत्तर देते है। 
जिज्ञासा यह है की क्या कोई एक अर्थ को जनाने के लिए सारें प्रमाण आते है या किसी प्रमेय के लिए कोई प्रमाण और किसी और प्रमेय के लिए कोई प्रमाण ऐसी व्यवस्था है?

उत्तर : दोनों प्रकार देखे जाते है। उदाहरण के लिए मानो आप कहीं अंदर बैठे है और किसी ने आपको बताया की बहार कुछ दूर आग लगी है। यहां आप ने आग को शब्द प्रमाण से जाना। पर आपकी जिज्ञासा शांत नहीं हुई। आप बहार निकलकर देखते है तो दूर से उठता धुआं दिखाई देता है। अब आपको अनुमान प्रमाण से भी पता लग गया की आग लगी है। आप की जिज्ञासा लेकिन अभी भी पूरी शांत नहीं हुई और आप उस दिशा में जा कर आग को प्रत्यक्ष देखते है। इस तरह यहां शब्द अनुमान और प्रत्यक्ष सारे प्रमाणों का उपयोग एक ही प्रमेय के लिए हुआ। 

ऐसा ही अन्य प्रमेय जैसे आत्मा में भी है। शास्त्र से हमें शब्द प्रमाण मिलता है की आत्मा है। हम उस शब्द प्रमाण पर विश्वास करते हुए भी आत्मा के लक्षण (सुख, दुःख, प्रयत्न, ज्ञान) देखकर आत्मा को अनुमान प्रमाण से जानने का प्रयत्न भी करते है। तथापि हमारी जिज्ञासा का सम्पूर्ण समाधान तब ही हो सकता है जब हम आत्मा का प्रत्यक्ष कर ले। (जो योगसमाधि में आत्मा और मन के संयोगविशेष से योगी कर सकता है।) (यहाँ प्रमाता और प्रमेय दोनों एक ही है।)

इस प्रकार से जब एक प्रमेय को जनाने सारे प्रमाण आते है उसको अभिसंप्लव कहते है। परन्तु कुछ प्रमेय ऐसे है जहां कोई एक प्रमाण ही आता है। जैसे हाथ में रखा हुआ आंवला। यहां यह सीधा सीधा प्रत्यक्ष ही हो रहा है और हमें कोई और प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। तो कहीं मानो आप खंड में अंदर बैठे है और बिजली कडकने की ध्वनि सुनाई दी। यहां आप अनुमान प्रमाण से जान लेंगे की बाहर बिजली हुई है पर न तो यह जनाने के लिए शब्द प्रमाण है न ही उसका प्रत्यक्ष संभव है।

ऐसे ही कहा जाता है की स्वर्ग की इच्छा करने वाला अग्निहोत्र करें।  अब स्वर्ग का कोई प्रत्यक्ष नहीं कर सकता और जिसका प्रत्यक्ष असंभव हो उसका अनुमान भी नहीं करा जा सकता (उसके कोई लक्षण प्रत्यक्ष न होने पर) तो उसमें मात्र शब्द प्रमाण ही रहे जाता है। ऐसे एक प्रमेय के लिए जब एक प्रमाण आता है तो उसको व्यवस्था कहते है। 

इन सब प्रमाणों से होने वाली प्रमिति में प्रत्यक्ष प्रमाण को प्रधानता है। क्योंकि शब्द प्रमाण से जानी हुई वस्तु के भी लक्षण जानने की इच्छा रहती है और लक्षण जान कर भी उसको प्रत्यक्ष करके, पूर्ण रूप से जान कर ही आत्मा की जानने की भूख मिटती है।

प्रश्न :-

१) इन में से लक्षण के लिए कौन सा कथन सही है?
क) कोई वस्तु का प्रत्येक धर्म जो हमेशा उस में रहता हो वह उसका लक्षण कहा जायेगा।
ख) कोई वस्तु का प्रत्येक धर्म जो यदि कभी भी उस में रहता हो वह उसका लक्षण कहा जायेगा।
ग) कोई वस्तु के वह धर्म जो उसमें विशेष हो अर्थात् उसको दूसरी वस्तुओं से पृथक करने में सहायक हो वह उसके लक्षण कहे जायेंगे।

२) लक्षण करने में होने वाली कुछ त्रुटिओं के नाम हमने जाने। क्या नीचे दिए गए उदाहरणों में उन में से कोई त्रुटि है? यदि है तो कौन सी?

क) आपने रेलवे स्टेशन पर आने वाले अपने मित्र को लेने के लिए किसी को भेजा। लेने जाने वाले को आपने अपने मित्र की पहचान के लिए उसके लक्षण बताये की उसके दो हाथ दो पैर और दो आँखे है। (अधिक जानकारी : गाड़ी सामान्य ही थी - यदि किसी का एक्स्ट्रा चतुराई का मूड बन रहा हो तो।)
ख) आप अपने प्रिय महानुभाव के लक्षण किसी को बता रहे है। की वह तो त्रिकालदर्शी है और इतने बलवान की १००० व्यक्ति उन पर एक साथ हमला कर दे तो भी वह निहत्थे ही उन्हें परास्त कर सकते है।
ग) जो पढे लिखे लोग होते है उनका लक्षण है की उनको अंग्रेजी आती है। 
 
३. न्यायदर्शन में कितने प्रमाण माने जाते है? सारूप्य ज्ञान, समान धर्मों को जानकर किसी वस्तु को जान लेना कौन सा प्रमाण है?

४. किसी वस्तु का कोई लक्षण प्रत्यक्ष करना संभव न हो तो उस वस्तु को अनुमान तथा शब्द प्रमाण से ही जाना जा सकता है। सही/गलत?

५. प्रमाणों में कौन सा प्रमाण प्रधान माना जाता है? क्यों?

६. प्रमाण वह है जिससे कुछ जाना जाता है। तो यदि हम किसी वस्तु के अर्थ को प्रमाण कहे तब उससे हम क्या जानते है? (या फिर हम किसी वस्तु के अर्थ को प्रमाण नहीं कह सकते?)

गुरुवार, 21 अप्रैल 2022

Resources

१. न्यायदर्शन by आचार्य चंद्रदत्त शर्मा (audio lectures, hindi)
at https://archive.org/details/Nyayadarshana

२. न्यायदर्शन by आचार्य सत्यजित् आर्य (audio lectures, hindi)
at https://archive.org/details/001NDBHOOMIKA14.09.01


Books

१. न्यायदर्शन by आचार्य ढुंढिराज शास्त्री
at https://archive.org/details/HindiNyayaDarshanaDhundhirajShastri

२. न्यायदर्शनम् by आचार्य उदयवीर शास्त्री
at https://archive.org/details/20210504_20210504_2251/Nyaya_Darshanam_Uday_Vir_Shastri/

३) भारतीय दर्शन परिचय खंड १ न्यायदर्शन
     - हरिमोहन झा

https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.538446/
pdf: https://archive.org/download/in.ernet.dli.2015.538446/2015.538446.Bharatiya-Darshan.pdf

४) न्यायदर्शनम् - स्वामी दर्शनानंद सरस्वती
https://archive.org/details/KRI136NyayaDarshanam1919MuradabadSw.DarshananadaSaraswati/

५) न्यायदर्शनम्  ન્યાયાર્થપ્રકાશ ભાષ્ય - પં. મયાશંકર શર્મા
https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.258037/

शनिवार, 16 अप्रैल 2022

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः। १.१.२

प्रथम सूत्र में सूत्रकार कहते है की सूत्र में निर्दिष्ट १६ पदार्थों के तत्वज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है। 

अब प्रश्न उठता है की क्या उनका तत्वज्ञान प्राप्त होते ही मोक्ष मिल जायेगा?

इस प्रश्न का उत्तर सूत्रकार दूसरे सूत्र में देते है।

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः। १.१.२ 

दुःख जन्म प्रवृत्ति दोष मिथ्याज्ञान के उत्तर उत्तर के (अगले अगले के) नष्ट हो जाने पर उसके अव्यवहित पूर्व के नाश हो जाने पर मोक्ष मिलता है।

जन्म प्रवृत्ति दोष मिथ्याज्ञान ये दुःख जन्म प्रवृत्ति दोष के कारण है और कारण के नाश होने पर कार्य का नाश होता जायेगा। 

प्रथम सूत्र में निर्दिष्ट पदार्थों के तत्वज्ञान से मिथ्याज्ञान का नाश होगा। 
मिथ्याज्ञान का नाश होने पर दोषों का नाश होगा। 
दोषों का नाश होने पर प्रवृत्ति हटेगी।
प्रवृत्ति के हटने पर जन्मचक्र का नाश होगा। 
जन्म के हटने पर दुखों से आत्यंतिक मुक्ति मिलेगी (जहां लेशमात्र भी दुःख शेष नहीं होगा) अर्थात् मोक्ष मिलेगा। 

दुःख के मूल में मिथ्याज्ञान है और जब तक मिथ्याज्ञान को पूर्णतया नहीं हटाएंगे तब तक दुःख पूर्ण रूप से नहीं मिटेगा। 

प्रथम सूत्र में आये प्रमेय के अंतर्गत सूत्रकार १२ प्रमेय दर्शाएंगे। उन १२ प्रमेयों के तत्वज्ञान से मुक्ति मिलेगी जो की इस शास्त्र का निःश्रेयस है। यहां भाष्यकार संकेत करते है की उन प्रमेयों के विषय में क्या क्या मिथ्याज्ञान होता है। जैसे की,

आत्मा होता ही नहीं है ऐसा मानना। जो आत्मा नहीं है उसको आत्मा मानना। सुख को दुःख, दुःख को सुख मानना। नित्य को अनित्य, अनित्य को नित्य मानना। जो अत्राण (रक्षा करने में असमर्थ है) है उसको त्राण (रक्षक) मानना। भयावह में निर्भयता की भावना करना। घृणित को स्वीकार्य मानना। त्याज्य को अत्याज्य मानना। यह सब आत्मा तथा तत्व संबंधी मिथ्याज्ञान है। 

प्रवृत्ति के विषय में, कर्म को न मानना (सब काम पूर्व निर्धारित अथवा आकस्मिक अथवा नैसर्गिक ही होते रहते है), कर्मफल को न मानना, यह मिथ्याज्ञान है। यह संसार दोष निमित्तक नहीं है और न ही आत्मा इसमें दोष के कारण आता है (इस शास्त्र में दोष = राग द्वेष मोह)। यह दोष विषयक मिथ्याज्ञान है। 

मृत्यु के साथ सब समाप्त हो जाता है। बस देह ही था जो नष्ट हो गया और ऐसा कुछ नहीं है जो एक देह को छोडकर दूसरे को प्राप्त करेगा। कोई चेतन आत्मा नहीं है जिसके देह से संयोग को जन्म और वियोग को मृत्यु कहते है। अथवा मृत्यु के बाद जन्म है भी तो वह अनिमित्तक / आकस्मिक / कर्म से अतिरिक्त कोई निमित्त से हो जाता है। यह प्रेत्यभाव के बारे में मिथ्याज्ञान है। प्रेत्य =प्रकर्ष रूप से गया हुआ, भाव = होना, प्रेत्यभाव = प्रकर्ष रूप से जा कर फिर से होना।
(प्रेत शब्द "जिसमें से प्रकर्ष रूप से जाया जा चूका है" अर्थात् वह शरीर जिसमें से आत्मा निकल गया है उसके लिए भी कहा जाता है।)

मोक्ष अत्यंत भयंकर वस्तु है। उसमें सर्व प्रियजन, सुख के साधन, कल्याणकारी सर्व वस्तु से वियोग हो जाता है। ऐसा कौन बुद्धिमान होगा के जो सर्व कल्याणकारी वस्तुओं के वियोग रूप भयजनक मोक्ष की कामना करेगा। ऐसा मानना अपवर्ग के बारे में मिथ्याज्ञान है।
अपवर्ग = अप +वर्ग। अप = दूर, वर्ग = छोडना वृजीँ (वृज् ) वर्जने धातु से, अपवर्ग = दुःखों को दूर छोडना
मोक्ष, मुक्ति का अर्थ भी (दुःखों को) छोडना है। मुच् (मुचँ) प्रमोचने मोदने च, मुच् (मुचॢँ) मोक्षणे धातु से।  

ऐसे सब मिथ्याज्ञानों से जो जो वस्तु हमें अनुकूल प्रतीत होती है उसमें हम राग कर लेते है और जो जो प्रतिकूल लगती है वहां द्वेष कर लेते है। 

याद रहें की जो जो प्राप्त करने अथवा छोड़ने की इच्छाएं हमें तत्वज्ञान से होती है (मिथ्याज्ञान से नहीं) वह राग द्वेष नहीं है।

(कुछ लोग कहते है की मुक्ति पाने के लिए सभी इच्छाएं छोडनी पडेगी, मुक्ति की इच्छा भी। पर उनसे यदि पूछा जाए की मुक्ति की इच्छा क्यों छोडनी है तो जवाब मिलेगा ऐसा नहीं करने पर मुक्ति नहीं मिलेगी)

मिथ्याज्ञान से उत्पन्न दोष (राग, द्वेष, मोह) के कारण मनुष्य असत्य, ईर्ष्या, असूया (गुण में दोष देखना), लोभ से युक्त प्रवृत्ति करता है।

शरीर, वाणी तथा मन से होने वाली धर्म अधर्म (पुण्य पाप)  प्रवृत्तियां इस प्रकार है। दोष से मात्र पापात्मक ही नहीं पुण्यात्मक प्रवृत्ति भी होती है। और मोक्ष में पाप के साथ साथ पुण्य भी बाधक होता है। (सकाम पुण्य जो पुण्य के फल को साध्य मान कर किया गया है वह बाधक होता है। निष्काम धर्माचरण जहां उसके फल को साध्य नहीं माना है उसका फल आत्मा को मोक्ष की दिशा में आगे बढने के लिए साधन जुटाने में हेतु बनता है।)

अशुभ / अधर्म / पापात्मिका प्रवृत्तियां 

शरीर : हिंसा, चोरी, प्रतिषिद्ध मैथुन
वाणी : असत्य, कठोर वचन, चुगली(अयथार्थ कथन, जिसको बात नहीं कहनी चाहिए उससे कहना), प्रलाप (असम्बद्ध कथन)
मन : परद्रोह भावना, परद्रव्य अभीप्सा, नास्तिकता

शुभ / धर्म / पुण्यात्मिका प्रवृत्तियां 

शरीर : दान, परित्राण(रक्षण), परिचर्या(सेवा)
वाणी : सत्य, हितकर, प्रिय, स्वाध्याय (योगदर्शन में स्वाध्याय का अर्थ मोक्ष दिलाने वाले शास्त्रों का अध्ययन यह किया गया है।)
मन : दया, अस्पृहा, श्रद्धा
श्रद्धा = श्रत् (सत्य) +धा (धारण करना). सत्य को धारण करना और यदि हमें कोई सत्य पहले नहीं पता था पर अब पता चला है तो उसको स्वीकार करके धारण करना। (यहां यह अन्तर्भावित है की यदि हमें पहले कोई असत्य ज्ञान था और बाद में पता चला की वह असत्य है तो उसको छोड देना।)

यहां प्रवृत्ति को जन्म का कारण बताया गया है। और दोष को प्रवृत्ति का कारण। अर्थात् मात्र दोष जनित प्रवृत्ति (धर्माधर्म) ही जन्म का कारण है। दोष रहित प्रवृत्ति नहीं। दोष सहित धर्म अधर्म रूपी प्रवृत्ति सकाम कर्म है। इससे विपरीत निष्काम कर्म जो तत्वज्ञान पर आधारित है वह बंधन का कारण नहीं बनते। जब तक शरीर है तब तक कर्म न करना तो संभव ही नहीं है इस लिए न तो यह समझना चाहिए की अकर्मण्यता मुक्ति का मार्ग है न ही निष्काम कर्म (जो तत्वज्ञान से प्रेरित हो) को त्यागने योग्य समझना चाहिए।

सूत्र में आया हुआ प्रवृत्ति शब्द प्रवृत्ति से उत्पन्न होने वाले धर्म अधर्म के लिए है। प्रवृत्ति है साधन जिनका।

हम अन्य प्रसंगों में भी कार्य के लिए कारण का शब्द प्रयोग देखते है। जैसे की "अन्न प्राणीयों का प्राण है। यहां अन्न कारण और प्राण कार्य होते हुए भी कार्य कारण में अभेद शब्द प्रयोग होता है। ऐसे ही यहां प्रवृत्ति शब्द प्रवृत्ति के कार्य के लिए प्रयोग हुआ है। 

यह प्रवृत्ति(धर्म/अधर्म) अच्छे/बुरे जन्म का कारण बनते है। 
जन्म = शरीर, इंद्रिय, बुद्धि के समूहविशेष के साथ आत्मा का संयोग

और जब तक जन्म रहेगा तब तक कोई न कोई दुःख तो रहेगा ही। 
दुःख = प्रतिकूल संवेदना, पीडा, ताप, बाधना

इस प्रकार मिथ्याज्ञान से लेकर दुःख तक की श्रृंखला टूटेगी नहीं और जन्म मरण का चक्र चलता ही रहेगा। यह मात्र तत्वज्ञान से ही टूटेगा। 

तत्वज्ञान से मिथ्याज्ञान का नाश होगा। मिथ्याज्ञान के नाश से दोष का, दोष के नाश से प्रवृत्ति का, प्रवृत्ति से जन्म का और जन्म के नाश से दुःख का नाश होगा अर्थात अपवर्ग की प्राप्ति होगी। 


प्रश्न :-

१) दुख की गहरी जड में क्या है?

२) मिथ्याज्ञान के दूर होने से उससे तुरंत बाद क्या हटता है?

३) पुण्य भी मुक्ति में बाधा बनता है जिससे वह पाप जितना ही हानिकारक और त्यागने योग्य है। सही/गलत? क्यों?

४) प्राप्त करने अथवा छोडने की प्रत्येक इच्छा अंततः मोक्ष में बाधा बनती है। सही/गलत?

गुरुवार, 14 अप्रैल 2022

न्यायदर्शन १.१.१ (तर्क - निग्रहस्थान)

प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः। १.१.१


प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अवयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास छल जाति और निग्रहस्थान इन के तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।


तर्क

तर्क को प्रमाण नहीं कहा जा सकता पर फिर वह प्रमाण से भिन्न भी नहीं है। वह प्रमाणों का सहायक है।

एक उदाहरण देखते है।
मान लो किसी को यह प्रश्न हुआ के हमारा जो ये जन्म है उसका कारण क्या है? (जन्म = जन्म मरण का क्रम)
क्या वह कारण नित्य है के उत्पन्न हुआ हो ऐसा है?
के फिर उसके पीछे कोई कारण ही नहीं है? बस आकस्मिक जन्म हो गया।

इस प्रश्न से उसके मन में ऊह चली (तर्क को ऊह भी कहते है। उह वितर्के)
यदि जन्म का कारण उत्पन्न हुआ है तब तो वह नष्ट भी हो सकता है (जो वस्तु उत्पन्न होती है वह नष्ट भी होती है यह एक सिद्धांत है। ऐसे ही यह भी सिद्धांत है की जो वस्तु उत्पन्न नहीं हुई अर्थात् नित्य है वह नष्ट भी नहीं होती।)। अर्थात् उस कारण को नष्ट करके हम जन्म (जन्म मरण के चक्र से ) छूट सकते है।

पर यदि जन्म का हेतु नित्य है तो उसका उच्छेद अशक्य होने से जन्म के क्रम का उच्छेद भी अशक्य है। और ऐसे में मोक्ष के लिए कोई भी प्रयास करना व्यर्थ है। ऐसे ही यदि हमारा जन्म कोई निश्चित कारण से नहीं अपितु आकस्मिक ही हुआ है तो भी हमारा प्रयास करना व्यर्थ है। वह जैसे आकस्मिक शुरू हुआ है ऐसे ही कभी आकस्मिक अंत भी हो सकता है या फिर नहीं भी हो सकता।

अब यह तर्क हमें इससे आगे ले जाने में समर्थ नहीं है। हमें अब प्रमाण की आवश्यकता होगी। जब हम प्रमाण खोज ने जायेंगे तो हमें शास्त्र से शब्द प्रमाण मिलता है की जन्म कर्म निमित्तक है। (कर्म = अविद्या जनित कर्म। विस्तार से आगे देखेंगे।) कर्म उत्पन्न होता है इसलिए हम इसे नष्ट करने के प्रयास भी कर सकते है।

इस तरह उपस्थित हुए हुए प्रमाण (जिसको हम ने तर्क के कारण ढूंढा था), जिसकी शंका की निवृत्ति के लिए आवश्यकता पडी थी उसको तर्क अनुगृहीत कराता है। अनु = फिर से/बाद में +गृहीत

तर्क प्रमाण तक पहुंचाता है इस तरह से वह भी तत्वज्ञान का एक अंग है। वाद में प्रमाण सहित तर्क अपने पक्ष की सिद्धि और प्रतिपक्ष का खंडन करने में सहायता करता है। (प्रमाण रहित मात्र तर्क कुछ सिद्ध नहीं कर पाता).

निर्णय
निर्णय ही तत्वज्ञान है।
निर्णय = निश्चित रूप से प्राप्त करना। नी (णीञ् प्रापणे) धातु से प्राप्त करना अर्थ में,  निर् = निश्चित रूप से।
यह प्रमाणों का फल है। निर्णय होने पर अर्थात् तत्वज्ञान की प्राप्ति होने पर वाद की समाप्ति होती है। कभी कभी इसकी (निर्णय = तत्वज्ञान की) रक्षा के लिए जल्प और वितंडा का प्रयोग भी करना स्वीकार्य होता है।

तर्क और निर्णय से ही लोक व्यवहार चलता है।  इनकी महत्ता के कारण इन्हें प्रथम सूत्र में पृथक उल्लिखित किया गया है।

वाद
अपने अपने सिद्धांतों की रक्षा करते वाक्यसमूह जो दोनों में से एक पक्ष की सिद्धि होने पर समाप्त हो जाते है उनको (उन दोनों पक्ष के वाक्यसमूहों को) वाद कहते है। इसका उद्देश्य तत्वज्ञान है, हार जीत नहीं। इस लिए यदि वाद में प्रतिपक्ष से कोई गलती भी हो जाती है तो तुरंत उस गलती को पकड के प्रतिपक्ष को निग्रहस्थान में लाने (हारा हुआ घोषित करने) के बदले गलती दिखाकर प्रतिपक्ष को उसे सुधारने का अवसर देते है।

जल्प, वितंडा
वाद से विशेष (अलग/भिन्न) जल्प और वितंडा है। विशेष शब्द में शेष धातु है अर्थात् जो बाकी बचा वह। विशेष का अर्थ वाद से अच्छा ऐसा नहीं लेना है।

जल्प में मुख्य प्रयोजन हार जीत रहता है और अपने स्थापित पक्ष की किसी भी प्रकार से सिद्धि करने का प्रयत्न किया जाता है, अपना पक्ष तत्व के विपरीत हो तो भी। वितंडा में तो वैतंडिक अपने पक्ष की स्थापना ही नहीं कराता और दूसरे के पक्ष पर प्रहार किए जाता है। पक्ष की स्थापना न करने का अर्थ है या तो वह अपनी प्रतिज्ञा ही नहीं बताएगा या फिर अपनी प्रतिज्ञा की हेतु और उदाहरण दे के स्थापना नहीं करेगा।

इनका उपयोग तत्व की रक्षा के लिए भी हो सकता है। जब समय अथवा अन्य कारणों से वाद शक्य न हो तब प्रतिपक्ष तत्व की हानि न कर पाए इस हेतु से सिद्धांती भी जल्प/वितंडा का प्रयोग कर सकता है। (यह हम आगे सूत्र में देखेंगे।)

हेत्वाभास

हेतु वह होता है जिसमें साध्य को सिद्ध करने का सामर्थ्य होता है। हेत्वाभास वह है जो हेतु जैसा लगता तो हो पर हो नहीं। मात्र हेतु के समान आभास-प्रतीत हो रहा हो और इस कारण से वह प्रतिज्ञा को सिद्ध नहीं कर पाएगा। जब ऐसा हेतु दिया जाता है तब उसको हेत्वाभास कहते है, जो उपयोग करने वाले को निग्रहस्थान में ले जाएगा।

निग्रहस्थान (हार के स्थान) में होते हुए भी हेत्वाभास को अलग से प्रथम सूत्र में उल्लिखित क्यों किया गया है?

वाद में यदि प्रतिपक्ष गलती करता है तो उसको तुरंत निग्रहस्थान में न लाकर उसको उसकी गलती दिखाकर उसे सुधारने का अवसर देते है। यहां हेत्वाभास को समझकर प्रतिपक्ष को समझना भी पडता है और हम स्वयं भी हेत्वाभास का प्रयोग न करें इसकी सावधानी रखनी पडती है। इस का ज्ञान इस कारण से महत्व रखता है जो उसे प्रथम सूत्र में लेने का कारण है। 


छल जाती निग्रहस्थान

छल : प्रतिपक्ष के वक्तव्य का जिस अर्थ में वह किया गया है उससे अन्य अथवा विपरीत अर्थ में उसका अर्थघटन करना छल है।

जाति : जाति इस शास्त्र का एक पारिभाषिक शब्द है। (जिस धर्म की चर्चा नहीं हो रही हो उससे) साधर्म्य और वैधर्म्य द्वारा प्रतिपक्ष का खंडन करना यह जाति है। (इसका विस्तार आगे देखेंगे)

निग्रहस्थान : निग्रहस्थान वह है जहां निग्रहस्थान में पहुँचने वाला पकड में आ जाता है। (निश्चित गृहीत हो जाता है) अर्थात् हार जाता है। विपरीत समझना अथवा समझ न पाना यह निग्रहस्थान है। अलग अलग निग्रहस्थानों को हम बाद में विस्तार से देखेंगे।

हेत्वाभास की ही तरह इनका ज्ञान प्रतिपक्ष की गलती को समझने तथा स्वयं गलती न करने के हेतु महत्वपूर्ण है। और यदि हमें तत्व की रक्षा के लिए जल्प वितंडा का आलंबन लेना पडा है तब भी प्रतिपक्ष यदि छल जाति का उपयोग करता है तब उसको पकड के उसको निग्रहस्थान में लाने के लिए हमें इसका ज्ञान होना आवश्यक है। 


हमने प्रथम सूत्र में आए हुए १६ पदार्थों का प्राथमिक परिचय किया। आगे इन सब को विस्तृत रूप से जानेंगे।

१५ पदार्थों के कारण आन्वीक्षिकी विद्या विशिष्ट है। इसकी महत्ता दर्शाने कौटिल्य अर्थशास्त्र के विघोद्देश प्रकरण में न्याय विद्या के बारे में कहा गया है

    प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम्।
    आश्रयः सर्वधर्माणां विघोद्देशे प्रकीर्तिता।।

यह विद्या सर्व विद्याओं के स्वरूप को प्रकाशित करता हुआ दीपक, सर्व कर्मों का उपाय और सर्व धर्मों का आश्रय है।

प्रथम सूत्र में कहा गया है की इन १६ पदार्थों के तत्वज्ञान से हमें निःश्रेयस की प्राप्ति होती है। अब प्रमाणों का उपयोग हम हर समय हर क्षेत्र हर विद्या में करते है। उस दृष्टि से तत्वज्ञान और निःश्रेयस का अर्थ हम जिन जिन विद्याओं में न्याय का प्रयोग करते है उन उन के अनुरूप होगा। जैसे की आयुर्वेद में तत्वज्ञान शरीर और औषध का ज्ञान और निःश्रेयस स्वास्थ्य होगा, वाणिज्य में वाणिज्य संबंधी ज्ञान और सफलता होगा।

परन्तु न्यायशास्त्र का (आन्वीक्षिकी विद्या होने पर भी) अपना विषय अध्यात्म है। इसका तत्वज्ञान जो प्रमेय के अंतर्गत आत्मा आदि १२ प्रमेय गिनाये गए है उनका तत्वज्ञान और इसका निःश्रेयस आत्यंतिक दुःख निवृत्ति रूप अपवर्ग अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति है। प्रथम सूत्र का अर्थ अब यह होगा।

प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अवयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास छल जाति और निग्रहस्थान इन के तत्वज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है।


प्रश्न :-
१) तर्क,
क) प्रमाणों का अनुग्राहक है।
ख) प्रमाणों में से एक है क्योंकि वह हमें तत्वज्ञान कराता है। 
ग) हमें अध्यात्म से विमुख करता है। 
घ) लोक व्यवहार में बाधा उत्पन्न करता है।

२) वाद में,
क) प्रयोजन हार जीत नहीं अपितु तत्वज्ञान होता है इस लिए निर्णय का वाद में स्थान नहीं है।
ख) यदि प्रतिपक्ष गलती करें तो उसे गलती दिखाकर सुधारने का अवसर दिया जाता है।
ग) वाद समान विचार वाले व्यक्ति के बीच चल रही कथा को कहते है।

३) जल्प वितंडा,
क) का प्रयोग तत्व की रक्षा के लिए भी हो सकता है।
ख) का ज्ञान उन्हीं के लिए उपयोगी है जिनका तत्वज्ञान से कुछ लेना देना नहीं है मात्र और मात्र हार जित ही जिनका लक्ष्य है।
ग) में यदि प्रतिपक्ष गलती करें तो उसे उसको सुधारने का अवसर दिया जाता है।

४) इन में से कौन से वाक्य सही है।
क) हेत्वाभास निग्रहस्थान में से एक है
ख) हेत्वाभास का प्रयोग तत्व की रक्षा के लिए भी हो सकता है।
ग) छल जाती निग्रहस्थान में आते है।

५) इन में से कौन से वाक्य सही और कौन से गलत है। 
क) न्यायशास्त्र में दिए गए प्रमेय अध्यात्म विषयक है।
ख) न्याय विद्या का प्रयोग अध्यात्म में ही होता है।
ख) न्याय विद्या का प्रयोग अध्यात्म को छोडकर बाकी विषयों में होता है क्यों की अध्यात्म श्रद्धा का विषय है जिसमें संशय तर्क वाद सब वर्ज्य है।
ग) न्याय विद्या का प्रयोग सभी क्षेत्र में होता है और उन उन क्षेत्र के तत्वज्ञान को पाकर भी हम अपवर्ग अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति कर सकते है।

रविवार, 10 अप्रैल 2022

न्यायदर्शन १.१.१ (सिद्धांत, अवयव)

प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः। १.१.१


प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अवयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास छल जाति और निग्रहस्थान इन के तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।


सिद्धांत
"यह ऐसा है" ऐसा कहकर जो अर्थ जनाया जा रहा है वही सिद्धांत है। 
दृष्टान्त के बारे में बात करते समय लिए गए वाक्यसमूह में प्रथम वाक्य अर्थात प्रतिज्ञा 'पर्वत पर आग है।' सिद्धांत है। 

दो पक्षों में सिद्धांत की जब भिन्नता होती है तभी चर्चा (वाद जल्प वितंडा) होती है इस लिए सिद्धांत एक महत्वपूर्ण प्रमेय (जिसको जाना जाता है) है। इस लिए इसको भी मुख्य १६ पदार्थों में जगह मिली है।

अवयव
(अनुमान प्रमाण में) साधनीय अर्थ की सिद्धि जिस पूरे वाक्यसमूह से होती है उस वाक्यसमूह के पांच अवयव है। वाक्यसमूह स्वयं इन पांच अवयव का अवयवी कहलायेगा। 

यह पांच अवयव इस प्रकार है।
१) प्रतिज्ञा : दोनों पक्ष अपने अपने सिद्धांत को रखेंगे जिसे प्रतिज्ञा कहा जाता है। इस को (अपनी अपनी तरफ से, सिद्ध हो चूका हो उस अर्थ में नहीं) आगम भी कहा जाता है।
हमारे पहले के उदाहरण में पर्वत पर आग है यह प्रथम पक्ष की प्रतिज्ञा थी।

२) हेतु : यह अनुमान प्रमाण का मुख्य आधारभूत अवयव है। यहां दोनों पक्ष यह बतायेंगे की उनकी प्रतिज्ञा किस आधार पर सिद्ध होती है। इस अवयव को अनुमान भी कहते है और यह अवयव वाक्यसमूह में सबसे महत्वपूर्ण होने से सम्पूर्ण वाक्यसमूह को भी इसी के नाम से अनुमान प्रमाण कहा जाता है।
हमारे पहले के उदाहरण में 'पर्वत पर धुआं होने से।' यह प्रथम पक्ष का हेतु था।

३) दृष्टान्त : यह ऐसा उदाहरण है जो दोनों पक्ष ने पहले प्रत्यक्ष किया हुआ है और जिसके बारे में दोनों पक्ष का ज्ञान एक समान है। जहाँ धुआँ होता है वहाँ आग होती ही है। जैसे रसोई के चूल्हे में और हवन में। यह हमारा व्याप्ति सहित दृष्टान्त अर्थात तीसरा अवयव था।
जैसे प्रतिज्ञा में आगम, हेतु में अनुमान ऐसे दृष्टान्त में प्रत्यक्ष प्रमाण अंतर्भावित है।

जब हम अनुमान प्रमाण का उपयोग स्वार्थ में करते है (स्वयं किसी निर्णय पर पहुंचने के लिए) तब ऊपर के तीन अवयवों से हमारे उद्देश्य की पूर्ति हो जाती है। परन्तु यदि हम अनुमान प्रमाण किसी के साथ चर्चा करते समय प्रयोग में लाते है तो दो और अवयव जो कथा का तरीके से उपसंहार करके निर्णय प्रस्तुत करेंगे वह भी आवश्यक है। 

४) उपनय : 'जैसा वह ऐसा यह' कहकर उदाहरण और साध्य में साम्य दिखाना यह उपनय है। जैसे रसोई में धुआं होता है ऐसे ही पर्वत पर भी धुआं है। यह वाक्य उपनय अवयव बनेगा। इसमें उपमान प्रमाण अन्तर्निहित है।

५) निगमन : ऊपर के तीन अवयवों से जो हमने प्रतिज्ञा वाक्य में कहा है वह  सिद्ध होता है यह कहना निगमन है। 'इस से सिद्ध होता है की पर्वत पर अग्नि है' यह निगमन अवयव बनेगा।  


प्रश्न :-

१) सिद्धांत के विषय में इन में से क्या सही है?
क) पंचावयवों में से प्रथम अवयव प्रतिज्ञा सिद्धांत है।
ख) पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों के हेतु अलग अलग है पर सिद्धांत एक ही होता है।
ग) यदि प्रतिपक्ष अपना सिद्धांत ही नहीं बता रहा है तो वह वैतंडिक कहलाएगा (वितंडा करने वाला)। 
घ) अपना सिद्धांत बताने से अपने पक्ष की स्थापना हो जाती है।

२) अनुमान प्रमाण जब स्वार्थ में उपयोग करते है तो कौन कौन से अवयव की आवश्यकता नहीं?

३) अनुमान प्रमाण के किस अवयव को अनुमान कहा जाता है? उदाहरण (दृष्टांत) किस प्रमाण पर आधारित है?

शनिवार, 9 अप्रैल 2022

न्यायदर्शन १.१.१ (प्रयोजन, दृष्टांत)

प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः। १.१.१

प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अवयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास छल जाति और निग्रहस्थान इन के तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।

प्रयोजन
जिस अर्थ को प्राप्त करने की अथवा छोडने की इच्छा करते हुए कर्म किया जाता है वह अर्थ उस कर्म का प्रयोजन है।
सर्व मनुष्य तथा सर्व प्राणियों के कर्मों में प्रयोजन व्याप्त है। 
बिना प्रयोजन के कभी कोई प्रवृत्ति नहीं करता और न्याय की प्रवृत्ति भी प्रयोजन पर आश्रित है।

संशय : क्या वितंडा भी सप्रयोजन होती है?
इस संशय को समझने के लिए पहले यह जानते है की वितंडा क्या है फिर इसका उत्तर देखेंगे। 

न्याय प्रवृत्ति के अंतर्गत जब पक्ष प्रतिपक्ष में चर्चा* होती है वह तीन प्रकार में से एक की होती है। 
*चर्चा शब्द चर्च् अध्ययने से बनता है। अध्ययन = अधि अयन। किसी वस्तु को अंदर तक घुसकर उसको प्राप्त करना (समझना)
चर्चा को कथा भी कहते है। कथ वाक्यप्रबन्धे। प्रबंध = प्रकृष्ट रूप से बांधना। 

कथा तीन प्रकार की होती है। 
वाद : वाद में पक्ष प्रतिपक्ष तत्व का निर्णय करने के लिए चर्चा करते है। 
जल्प : यहां प्रयोजन तत्व तक पहुंचना नहीं अपितु हार जित का होता है। अर्थात स्वयं के पक्ष को किसी भी तरह से सिद्ध करना (यदि वह गलत हो फिर भी)
वितंडा : यहां वैतण्डिक अपने पक्ष की स्थापना ही नहीं करता। और उसका अपना कोई पक्ष ही नहीं होने पर भी वह सामने वाले की बातों पर प्रहार करता रहता है। (वितंडा शब्द तड् आघाते धातु से बनता है) 

वाद और जल्प के प्रयोजन तो स्पष्ट है पर क्या वितंडा का भी कोई प्रयोजन है?

भाष्यकार उत्तर देते कहते है की यदि कोई वैतण्डिक सिद्धान्ती के पक्ष पर प्रहार करता है तो उसे अपने पक्ष की स्थापना करने के लिए कहना चाहिए। यदि वह अपने पक्ष की स्थापना कर देता है तो वह कथा वाद अथवा जल्प बन जाएगी, यदि वो यह भी कहे की उसका कोई पक्ष नहीं है बस सिद्धान्ति के पक्ष का खंडन करना ही उसका प्रयोजन है तो भी यदि वह हेतु और दृष्टान्त से अपने पक्ष की स्थापना करता है (सिद्धान्ति के पक्ष का खंडन हो सके ऐसे हेतु और दृष्टान्त देता है) तो भी उसकी प्रवृत्ति सप्रयोजन सिद्ध हो जाएगी (और कथा जल्प बन जाएगी।) और यदि वह अपने पक्ष की स्थापना न करें (ये तो कह दे की सिद्धान्ति गलत है पर ये न समझाये की कैसे गलत है) तो फिर उसके शब्द प्रलाप मात्र बन कर रह जायेंगे और कथा का स्वरूप ही नष्ट हो जायेगा।

अर्थात वितंडा में भी प्रयोजन तो होता है वैतण्डिक का अपने पक्ष की स्थापना न करना मात्र उसकी रणनीति का भाग है। (और ऐसे लोग मिलने पर या तो उनसे उनके पक्ष की स्थापना करवानी चाहिए या ये सिद्ध करके के वह चर्चा करने योग्य नहीं है अपना समय नष्ट होने से बचाना चाहिए )

दृष्टान्त

न्याय क्या है? प्रमाणों से अर्थ का परीक्षण करना यह न्याय है। 
इन प्रमाणों में अनुमान प्रमाण (जो की प्रत्यक्ष तथा आगम पर आधारित है) वह मुख्य है. उसी को अन्वीक्षा कहते है। इस अनुमान प्रमाण के पांच अवयव है जिसमें से तीसरा दृष्टान्त है। (जब हम अनुमान प्रमाण का प्रयोग दूसरे के साथ चर्चा करते समय करते है तब यह पांचों अवयवों का उपयोग करना आवश्यक है। यह चर्चा हम आगे करेंगे)

दृष्टान्त ऐसा होता है जिसमें शास्त्रीय और लौकिक दोनों ज्ञान वाले का बुद्धिसाम्य हो और उसके पीछे प्रत्यक्ष का आधार हो।
दृष्टान्त = दृष्ट अंत = अंत तक (निश्चित रूप से) जाना हुआ। 

जैसे किसी ने कहा के 'वहां दूर पर्वत पर आग लगी है।' यह प्रथम अवयव अर्थात प्रतिज्ञा है। अब उसने वहां जा के आग को प्रत्यक्ष देखा नहीं है न ही किसी और व्यक्ति जिसने वहां जा के आग को देखा हो उसने बताया है फिर भी उसने यह अनुमान प्रमाण से जान लिया के वहां आग है।

यह कैसे सिद्ध होता है? तो सिद्धान्ति कहेगा 'क्यों की वहां धुआँ है।' इस वाक्य को हेतु कहा जाता है जो की अनुमान प्रमाण का दूसरा अवयव है। और 'जहाँ धुआँ होता है वहाँ आग होती ही है। जैसे रसोई के चूल्हे में और हवन में।' यह व्याप्ति सहित दृष्टान्त अर्थात तीसरा अवयव है।' दृष्टान्त के न होने पर प्रथम दो अवयव भी नहीं टिक पाते।

दृष्टान्त का उपयोग अपने पक्ष की सिद्धि और प्रतिपक्ष का खंडन (व्याप्ति में दोष दिखाकर) करने में दोनों में ही अनिवार्य है। 

दृष्टान्त ऐसा होना चाहिए जो दोनों पक्ष को मान्य हो। अर्थात् उन्हें उस बारे में पहले ही ज्ञान हो।

अब यदि किसी ने कभी धुआँ ही न देखा हो और उसे यह न पता हो की आग के बिना धुआँ नहीं उठता तो उसके साथ चर्चा में यह दृष्टान्त नहीं दे सकते। ऐसे ही यदि कोई दूर से उठने वाले धुँए को नहीं देख पा रहा हो (अथवा किसी के कहने से उस बात को नहीं जान पाया हो) उसको हमने जो हेतु दिया वह भी नहीं दे पाएंगे। अर्थात अनुमान प्रमाण स्वतंत्र नहीं होता। उसके पीछे अनुमान प्रमाण प्रयोग करने वाले को प्रत्यक्ष अथवा शब्द प्रमाण से प्राप्त ऐसा ज्ञान होना अनिवार्य है जिसके आधारित अनुमान किया जा सके। (कहते है पैसे पैसे को खींचता है। यहाँ यह देख सकते है की कैसे ज्ञान ज्ञान को बढाता है। जितना अधिक हम जानते है और अधिक जानना उतना ही संभव होता जाता है।)

अनुमान प्रमाण को विस्तार से हम आगे जानेंगे पर यहाँ ये उल्लेख कर ले की अनुमान से हमेशा (निश्चित, पर) सामान्य ज्ञान ही होता है विशेष नहीं। जैसे दूर से धुँए को देख कर हम आग का निश्चय अनुमान प्रमाण से कर सकते है पर उस आग की विशेषताएँ जैसे की उसका आकार विस्तार बिना आग को प्रत्यक्ष देखे नहीं जान सकते। 

अनुमान कभी यदि प्रत्यक्ष अथवा आगम से विरुद्ध जाता दिखता है तो वह अनुमान अमान्य हो जायेगा। ऐसा अनुमान न्यायाभास मात्र है न्याय नहीं। 

प्रश्न :-
१) इन में से कौन सा वाक्य गलत है ?
क) एक जैसी प्रवृत्ति हमेशा उसके साथ जुड़े हुए कोई एक निश्चित प्रयोजन से ही होती है। जैसे की नौकरी, व्यवसाय का प्रयोजन अर्थोपार्जन होता है।
ख) प्रयोजन वह अर्थ है जिसे प्रवृत्ति करने वाला प्राप्त करना अथवा छोडना चाहता है। 
ग) जल्प का प्रयोजन हार जित है, सत्य तक पहुंचना नहीं।  

२) दृष्टांत,
क) आगम और अनुमान प्रमाण का एक अवयव है। 
ख) प्रत्यक्ष प्रमाण पर आधारित होता है। 
ग) जिस दृष्टांत पर हमें पूर्ण विश्वास हो वह हम प्रयोग कर सकते है। प्रतिपक्ष का उस पर सहमत होना आवश्यक नहीं है।