उपमान प्रमाण का लक्षण सूत्र था,
प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम्। १.१.६
प्रसिद्ध वस्तु के जाने हुए समान धर्म से साध्य(जानने योग्य) वस्तु का ज्ञान कराने वाला साधन उपमान प्रमाण कहलाता है।
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अब उसके परीक्षा सूत्र देखते है।
पूर्वपक्षी :-
अत्यन्तप्रायैकदेशसाधर्म्यादुपमानासिद्धिः। २.१.४२
अत्यन्त प्रायः अथवा एकदेश के साधर्म्य से उपमान प्रमाण की सिद्धि नहीं होती।
साधर्म्य तीन कोटि का हो सकता है।
१। अत्यन्त अर्थात् एकदम समानता। ऐसे में उपमान की सिद्धि नहीं होती जैसे गाय जैसी गाय कहने से क्या लाभ?
२। प्रायः अर्थात् बहु समानता। बहु सामान्य होने पर भी एक से दूसरे को नहीं पहचान जाता। जैसा बैल ऐसा भैंसा ऐसा नहीं कहा जाता।
३। एकदेश अर्थात् थोडी सी समानता। अल्प समानता से भी उपमान सिद्ध नहीं होता। हाथी और बिल्ली में भी कुछ समानता है पर जैसा हाथी ऐसी बिल्ली कहने से कुछ सिद्ध नहीं होता।
अर्थात् उपमान से कभी कुछ सिद्ध नहीं होता जिससे उपमान प्रमाण की सिद्धि नहीं होती।
उत्तर :-
प्रसिद्धसाधर्म्यादुपमानसिद्धेर्यथोक्तदोषानुपपत्तिः। २.१.४३
लोक में प्रसिद्ध साधर्म्य से उपमान की सिद्धि होने से ऊपर कहा गया दोष नहीं है।
जो साधर्म्य लोक में प्रसिद्ध है उनका उपयोग वस्तुएं जनाने के लिए होता ही है। शहर में रहने वाले को नीलगाय गाय जैसी होती है कहने से उसे नीलगाय प्रथम बार देखने पर वह नीलगाय है यह बोध हो जाता है। कवि भी कमल जैसी आँख, पल्लव जैसे कोमल हाथ ऐसी उपमाओं का प्रयोग करते है। इस लिए उपमान प्रमाण असिद्ध नहीं है।
पूर्वपक्षी :-
प्रत्यक्षेणाप्रत्यक्षसिद्धेः। २.१.४४
प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की सिद्धि होती है इसलिए (उपमान प्रमाण वास्तव में अनुमान प्रमाण ही है।)
जैसे अनुमान में प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की सिद्धि होती है (धुएं से अग्नि की) ऐसे ही यहाँ (गौ से गवय की), इसलिए उपमान अनुमान ही है, अलग प्रमाण नहीं।
उत्तर :-
नाप्रत्यक्षे गवये प्रमाणार्थमुपमानस्य पश्यामः। २.१.४५
तथेत्युपसंहारादुपमानसिद्धेर्नाविशेषः। २.१.४६
अप्रत्यक्ष गवय (नीलगाय) में हम उपमान का फल नहीं देख पाते।
"तथा" कहकर उपसंहार होने से उपमान प्रमाण की सिद्धि होने से अविशेष नहीं है। (उपमान अनुमान प्रमाण से भिन्न है।)
उपमान का फल शब्द और प्रत्यक्ष के संबंध को जानना है। जब नीलगाय प्रत्यक्ष हो तब यह जानना की यह नीलगाय है वह उपमान का फल होगा। अप्रत्यक्ष नीलगाय में उपमान का फल नहीं होता। न ही गाय और नीलगाय के बीच धुएं और अग्नि की भांति कोई व्याप्ति संबंध है। अनुमान स्वार्थ और परार्थ दोनों में होता है, उपमान मात्र परार्थ ही होता है।
उपमान का उपसंहार साध्य साधन की समानता दिखाते होता है। जैसी गौ ऐसी गवय। अनुमान में ऐसा नहीं है। अर्थात् उपमान प्रमाण अनुमान प्रमाण से भिन्न ही है।