गुरुवार, 22 सितंबर 2022

अनुपलब्धिसम

तदनुपलब्धेरनुपलम्भादभावसिद्धौ तद्विपरीतोपपत्तेरनुपलब्धिसमः। ५.१.२९

अनुपलब्धि की प्राप्ति न होने से उससे विरुद्ध की सिद्धि होती है ऐसा कथन अनुपलब्धिसम प्रतिषेध है।

प्रतिवादी वादी से कहता है की आप का कहना है की कोई वस्तु नहीं है तो उसकी अनुपलब्धि दिखाओ। यदि अनुपलब्धि की प्राप्ति नहीं दिखा सकते तो सिद्ध होता है की वह है।

उत्तर

अनुपलम्भात्मकत्वादनुपलब्धेरहेतुः। ५.१.३०

अभाव की अनुपलब्धि ही होती है। किसी वस्तु का अस्तित्व और नास्तित्व दोनों साथ में नहीं हो सकते।

ज्ञानविकल्पानां च भावाभावसंवेदनादध्यात्मम्। ५.१.३१ 

किसी विषय के ज्ञान का होना न होना आत्मा को मन के द्वारा प्रत्यक्ष होता है।

इस जाति को सीधे सीधे व्यवहार में लाना क्लिष्ट लग सकता है पर थोडी पूर्व तैयारी के साथ खेल खेल जाए तो आधी दुनिया को आर्थिक सामाजिक शासकीय परितापों से बचने के लिए जातिवादी का उत्पाद अभाव की प्राप्ति को दिखाने के लिए उपयोग करने पर बाध्य किया जा सकता है यह हमें अब प्रत्यक्ष है।


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पीछे मैंने यह तर्क रखा था।

"जाति प्रयोग तर्क के वह प्रयोग है जो प्रमाण तक नहीं पहुंचाते। तर्क के प्रमाण तक न पहुंचा पाने के पीछे अपूर्ण तर्क, प्रमाणों से विसंगतता, अप्राप्त प्रमाण जैसे कारण रहते है जो जाति प्रयोगों में देखने मिलते है। परंतु जाति प्रयोग का अस्तित्व उस बात का सूचक है की वे सद् उत्तर जैसे लग सकते है। यदि उनके सफल होने की कोई संभावना ही न होती तो वह प्रयोग में ही न आते। क्योंकि जो तर्क कभी भी सद् उत्तर न बन पाए वह सद् उत्तर जैसा कभी लग भी नहीं सकता। इससे हम स्वयं की जाति समझ की एक परीक्षा कर सकते है। क्या हम ऐसे उदाहरण देख सकते है जहां जाति लक्षण (जिस तर्क को जाति का लक्षण बताया गया है) वादी की व्याप्ति का खंडन करता हो। (P.S. जाति प्रकरण के अंत में इसे संशोधित करेंगे। क्योंकि इस तर्क में त्रुटि, अपूर्णता है।)"

जब मैंने यह तर्क रखा था तब मेरी धारणा यह थी की जातिवादी के सिवाय अन्य सभी सत्यनिष्ठ और स्वाध्यायशील अधिक नहीं तो कम अंश में तो है ही। अर्थात वो स्वयं का हित देखने के लिए यथा शक्ति पुरुषार्थ करेंगे। परंतु मेरी वह धारणा वास्तविकता से मेल नहीं खाती यह स्पष्ट है। और यह उन जाति प्रयोगों के निरंतर बने रहने से भी स्पष्ट है जिसमें सत्य तक पहुंचाने का दिखवा मात्र भी नहीं है - जो वितंडा में प्रयोग में लाए जाने वाले प्रयोग अधिक लगते है। ऐसे प्रयोग सफल इस लिए नहीं होते क्योंकि उन जैसे प्रयोग अन्यत्र सत्य तक पहुंचाने की क्षमता रखते है अपितु इस लिए होते है की वह सामने वाले की अस्वाध्यायशीलता और अन्य निर्बलताओ का दक्षता से उपयोग करते है।
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