बुधवार, 29 जून 2022

विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णयः। १.१.४१

विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णयः। १.१.४१

(विमृश्य) संशय द्वारा (पक्षप्रतिपक्षाभ्याम्) पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों से (अर्थावधारणं) अर्थ का निश्चय करना (निर्णयः) निर्णय है।

एक साथ सत्य न हो सके ऐसे दो अर्थों की प्राप्ति होती देखकर जब संशय होता है तब वह परस्पर विरुद्ध अर्थ में से कौन सा सच है यह जानने के लिए दोनों अर्थों के हेतु ढूँढने के लिए तर्क का प्रयोग होता है और पक्ष और प्रतिपक्ष बनते है। उन दोनों पक्षों पर प्रमाणों तथा तर्क सहित विचार करने पर कोई एक पक्ष खंडित हो जाता है (हट जाता है) और दूसरा पक्ष सिद्ध हो जाता है (बच जाता है)। इस एक पक्ष के सिद्ध होने से अर्थ का निर्धारण होता है जिसको निर्णय कहते है।

यह निर्णयरूपी तत्वज्ञान ही प्रमाणों का फल है। 

शंका :- निर्णय तो जो पक्ष बच गया उसी से होता है। फिर पक्ष प्रतिपक्ष दोनों से होता है क्यों कहा? जो पक्ष खंडित हो गया उसका निर्णय में क्या योगदान?

उत्तर :- जब पक्ष प्रतिपक्ष में से एक खंडित हो जाए और एक सिद्ध हो जाए तभी निर्णय होता है। यदि दोनों खंडित हो जाए अथवा दोनों सिद्ध हो जाए अथवा (जहां एक का सिद्ध/खंडित होना स्वतः ही दूसरे को खंडित/सिद्ध नहीं करता), एक खंडित हो पर दूसरा सिद्ध न हो पाए अथवा एक सिद्ध हो जाए पर दूसरा खंडित न हो पाए तब संशय की निवृत्ति नहीं होती। इस लिए एक का सिद्ध होना और दूसरे का खंडित होना दोनों मिलकर संशय की निवृत्ति और तत्वज्ञान की प्राप्ति कराते है।

भाष्यकार आगे यह स्पष्ट करते है की जहां हेतु से यह सिद्ध होता हो की एक धर्मी परस्पर विरुद्ध धर्मों का आश्रय हो सकता है तब वहां उन सभी परस्पर विरुद्ध धर्मों का होना मान लेना चाहिए (उसको पक्ष प्रतिपक्ष बनाकर निरर्थक विवाद नहीं करना चाहिए)। जैसे गाय का काला, सफेद, लाल रंग की होना परस्पर विरुद्ध धर्म है, तब भी यह कहना की गाय काली, सफेद, लाल होती है ठीक है। क्योंकि यहां गाय का अर्थ गाय जाति है गाय व्यक्ति नहीं। एक व्यक्ति में तो वह एक साथ न रह पाने वाले विरुद्ध धर्म बनेंगे पर जाति में भिन्न भिन्न व्यक्ति में भिन्न भिन्न रंग मिलता है।

ऐसे ही एक ही वस्तु में भी परस्पर विरोधी धर्म भिन्न भिन्न समय पर मिल सकते है। जैसे यान कभी गतिमान होता है और कभी स्थिर। अथवा एक समय में विरुद्ध धर्म भिन्न अधिकरण के लिए हो सकते है जैसे आत्मा में इच्छा और अनिच्छा दोनों भिन्न भिन्न वस्तु के प्रति एक ही समय में हो सकती है।

तत्वज्ञान की प्राप्ति के लिए सदा संशय और पक्ष प्रतिपक्ष का होना अनिवार्य नहीं है। जैसे प्रत्यक्ष और शब्द प्रमाण से इनके बिना भी तत्वज्ञान की प्राप्ति होती है। 

(हाँ, जिज्ञासा अवश्य होनी चाहिए। यदि जानने की इच्छा ही न हो तो कितने ही प्रत्यक्ष और शब्द प्रमाण हमारे सामने से निकल जाएंगे और हमारा चित्त एक को भी ग्रहण नहीं करेगा। यह मेरा अनुभव है, पाठ का भाग नहीं। अर्थात् मैंने यह प्रत्यक्ष पूर्वक जाना है शब्द प्रमाण से नहीं।)

इस के साथ प्रथम अध्याय का प्रथम आह्निक समाप्त होता है।

रविवार, 26 जून 2022

अविज्ञाततत्त्वेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्त्वज्ञानार्थमूहस्तर्कः। १.१.४०

आर्षं धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राऽविरोधिना।
यस्तर्केणानुसंधत्ते स धर्मं वेद नेतरः॥  - मनुस्मृति १२-१०६

जो वेद और ऋषिविहित धर्मोपदेश अर्थात धर्मशास्त्र का वेदशास्त्र के अनुकूल तर्क के द्वारा अनुसंधान करता है वही धर्म के तत्व को समझ पाता है अन्य नहीं।


आगे हम प्रथम सूत्र में कहे गए सोलह पदार्थ में आठवें पदार्थ  तर्क का लक्षण देखेंगे। 

अविज्ञाततत्त्वेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्त्वज्ञानार्थमूहस्तर्कः। १.१.४०

जिस विषय का वास्तविक स्वरूप ज्ञात नहीं है उसके वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए प्रमाणों की संगति से किया जाता विचार तर्क है।

किसी वस्तु का सामान्य ज्ञान होने पर (परंतु उसका विशेष न ज्ञान होने पर) उसका वास्तविक स्वरूप जानने की इच्छा होती है वह जिज्ञासा है। जिज्ञासा से प्रेरित मनुष्य सोचता है की इस का कारण यह है अथवा दूसरा? ऐसे उसके मन में विरोधी कारणों की प्राप्ति होती है। अब जब वह स्वयं ने सोचे विरुद्ध कारणों/पक्षों में से कौन सा सत्य है यह जानने के लिए दोनों पक्ष के प्रत्येक गुण पर विचार करता है और ऐसा विचार करने पर वह एक पक्ष के सत्य होने अथवा न होने की प्रबल संभावना देखता है, उस संभावना तक पहुँचने के विचार की प्रक्रिया को तर्क कहते है।

उदाहरण
किसी को यह जानने की जिज्ञासा हुई की आत्मा उत्पन्न होता है अथवा नित्य है? और इस को ले कर उसके मन में उह चली।

यदि आत्मा उत्पन्न होता हो तो? जन्म के साथ शरीर, मन के साथ साथ आत्मा को भी उत्पन्न हुआ मान लो तो? जब आत्मा जन्म के साथ ही उत्पन्न हो रहा है तब उसके कोई संचित कर्म तो हो नहीं सकते क्योंकि वह पहले था ही नहीं। फिर किस आधार पर सब को शरीर, भिन्न भिन्न योनि, भिन्न भिन्न बुद्धि, संस्कार तथा उन के आधार से सुख दुख मिलेंगे? यदि इन सब के लिए पूर्वजन्म का कर्माशय काम नहीं करता तो यही मानना पडेगा की बिना कारण से ऐसे ही कार्य हो जाते है। और जब आत्मा शरीर के साथ नष्ट भी हो जाएगा तो वह सारे कर्म जिसका फल उसको अभी नहीं मिला है वह व्यर्थ हो जाएंगे। यदि कर्मफल सिद्धांत की हानि अथवा बिना कारण कार्य उत्पन्न नहीं होता इस सिद्धांत की हानि उसको स्वीकार्य नहीं तो वह आत्मा के उत्पन्न होने को भी स्वीकार नहीं करेगा।

स्वयं को सत्य से समीप पहुंचता हुआ देख जिज्ञासु के मन में प्रसन्नता* का भाव भी उत्पन्न होता है। (फिर भले ही वह सत्य कितना ही कडवा भी क्यों न हो। कोई भी स्वयं अंधेरे में रहने की इच्छा नहीं करता। दुनिया का सब से बडा असत्य भाषण करने वाला भी स्वयं तो वस्तुओं को ठीक ठीक ही जानना चाहेगा।)

*प्रसन्न शब्द सन्न से बनता है। सन्न का उपयोग गति के पूर्ण अभाव को दर्शाने के लिए हम करते है। जैसे वह ये सुनकर सन्न रह गया। प्रसन्न = प्र (प्रकृष्ट रूप से) सन्न। मन की स्थिरता प्रसन्नता है और चंचलता अथवा कोई निश्चय पर न पहुँच पाना अप्रसन्नता। क्योंकि सत्य स्थिरता देता है सत्य का ज्ञान प्रसन्नता का कारण बनता है।

न्यायदर्शन में तर्क को स्वयं में प्रमाण नहीं माना गया है। हाँ तर्क जिस पक्ष को बल देता है उस पक्ष को जिज्ञासु आगे प्रमाणों के आधार पर अधिक सरलता से सिद्ध कर सकता है और तर्क की प्रक्रिया उसे प्रमाणों तक पहुँचने में भी सहायक होती है इस लिए उसे प्रमाणों का अनुग्राहक बताया गया है।

गुरुवार, 23 जून 2022

उदाहरणापेक्षस्तथेत्युपसंहारो न तथेति वा साध्यस्योपनयः। १.१.३८, हेत्वपदेशात्प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनम्। १.१.३९

अनुमान प्रमाण के चतुर्थ अवयव उपनय के लक्षण।

उदाहरणापेक्षस्तथेत्युपसंहारो न तथेति वा साध्यस्योपनयः। १.१.३८

उदाहरण की अपेक्षा से यह ऐसा ही है अथवा यह ऐसा नहीं है ऐसा कथन करके उपसंहार करना उपनय है। 

हेतु और साध्य का संबंध उदाहरण के द्वारा देने के बाद उसको प्रतिज्ञा की सिद्धि की तरफ खींचना (उपसंहार करना) उपनय है। जैसे शब्द उत्पत्ति धर्म वाला है (हेतु) और जो जो उत्पत्ति धर्म वाला होता है वह वह अनित्य होता है जैसे स्थाली (उदाहरण) देने के बाद यह कथन करना की "स्थाली के समान शब्द भी उत्पत्ति धर्म वाला है" उपनय कहलाता है। 

हेतु और उपनय एक समान दिख सकते है परंतु हेतु साध्य में साधन धर्म है यह मात्र बताता है जब की उपनय उदाहरण में बतायी गई व्याप्ति के बल पर वह हेतु में दिखाया गया धर्म वास्तव में साधन धर्म है इस बात का कथन है।
  
हेत्वपदेशात्प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनम्। १.१.३९

हेतु के उपदेश से प्रतिज्ञा का पुनः कथन करना निगमन है।

जब तक प्रतिज्ञा साध्य कोटि में है तब तक वह प्रतिज्ञा कहलाएगी परंतु जब हेतु उदाहरण उपनय द्वारा उसकी सिद्धि हो जाती है तब वह साध्य कोटि में न रहकर सिद्ध कोटि में आ जाती है। सिद्धांत (प्रतिज्ञा) की सिद्धि के उपरांत पुनः कथन करना निगमन है। जैसे "उत्पत्ति धर्म वाला होने से शब्द अनित्य है" हमारे पंचावयव का निगमन होगा। निगमन = निश्चित/पूर्ण रूप से प्राप्ति/जानकारी।

पूरे पंचावयव इस प्रकार रहेंगे।
प्रतिज्ञा : शब्द अनित्य है।
हेतु : उत्पत्ति धर्म वाला होने से।
(व्याप्ति सहित) उदाहरण : जो जो उत्पत्ति धर्म वाला होता है वह वह अनित्य होता है जैसे स्थाली। अथवा जो जो उत्पत्ति धर्म वाला नहीं होता वह वह नित्य होता है जैसे आत्मा।
उपनय : स्थाली के समान शब्द भी उत्पत्ति धर्म वाला है। अथवा आत्मा से विरुद्ध शब्द उत्पत्ति धर्म वाला है।
निगमन : उत्पत्ति धर्म वाला होने से शब्द अनित्य है

प्रतिज्ञा आदि पाँच अवयवों का परस्पर संबंध।

आगे भाष्यकार समझाते है की कैसे अनुमान प्रमाण में इन पांचों अवयवों का अपना महत्व है और इनका परस्पर अटूट संबंध है। इन में से एक भी के नहीं होने से काम नहीं चलेगा।

पहला वाक्य प्रतिज्ञा है। यदि वह न हो तो बाकी चार के लिए आधार ही नहीं रहेगा। किस को सिद्ध करने के लिए बाकी चार कहें जाएंगे? और यदि वक्ता बाकी वाक्यों का कथन करने लगता है तो सुनने वालों को समझ नहीं आएगा की वह क्या बोल रहा है और क्यों बोल रहा है।

यदि हेतु को निकाल दिया जाए तो साध्य के लिए साधन धर्म ही नहीं होगा। बिना साधन धर्म के सिद्धि कैसे होगी?

उदाहरण के न होने पर साधन धर्म से साध्य धर्म का निश्चय हो सकता है यह प्रतिपादित नहीं होगा। और न ही उपनय बनेगा।

हेतु में जिस धर्म की उपस्थिति साध्य में दिखाई गयी है उसको उपनय उदाहरण में दिखाई गई व्याप्ति से जोडकर उसका साधन धर्म होना सिद्ध करता है और ऐसे ही प्रतिज्ञा में साध्य विषय का कथन मात्र है जब की निगमन उस विषय की सिद्धि हो जाने का कथन है । इस तरह से शब्दों की समानता होते हुए भी हेतु-उपनय और प्रतिज्ञा-निगमन का अर्थ भिन्न भिन्न है और उनका स्वतंत्र महत्व है।
 
उपनय और निगमन आगे आए हुए वाक्यों के अर्थों को जोडकर उनका समर्थन करते है और पूरी चर्चा में गांठ लगाकर उसके निष्कर्ष को व्यवस्थित रूप से रखते है। उनके अभाव में चर्चा बिखर जाएगी। और वक्ता यह भी जनाता है की वो जो सिद्ध करने चला था वह (और वही) उसने सिद्ध कर दिया है। चर्चा में भटक कर कहीं और ही नहीं पहुँच गया।

इन पांचों के उपयोग से अर्थसिद्धि में किसी प्रकार का संशय अथवा आशंका शेष नहीं रहते।

आगे हम क्रमप्राप्त पदार्थ तर्क का लक्षण देखेंगे।

बुधवार, 22 जून 2022

साध्यसाधर्म्यात्तद्धर्मभावी दृष्टान्त उदाहरणम्। १.१.३६, तद्विपर्ययाद्वा विपरीतम्। १.१.३७

साध्यसाधर्म्यात्तद्धर्मभावी दृष्टान्त उदाहरणम्। १.१.३६
तद्विपर्ययाद्वा विपरीतम्। १.१.३७

साध्य के समान धर्म से युक्त दृष्टांत से साध्य की समता दिखाना उदाहरण है।
साध्य के विपरीत धर्म से युक्त दृष्टांत से साध्य का विपर्यय (विपरीतता) दिखाना उदाहरण है।

उदाहरण में साध्य धर्म तथा साधक धर्म प्रवर्तमान हो अर्थात् अन्वयव्याप्ति को दिखाता हुआ उदाहरण हो तो उसे साधर्म्य उदाहरण कहेंगे और जब दोनों धर्म से रहित हो तो उसे वैधर्म्य उदाहरण कहेंगे। जैसे "शब्द अनित्य है" प्रतिज्ञा और "उत्पत्तिधर्म वाला होने से" हेतु के उदाहरण यह बन सकते है।

जो जो उत्पन्न होता है वह वह अनित्य होता है जैसे स्थाली। - अन्वय व्याप्ति सहित साधर्म्य उदाहरण।
जो जो उत्पन्न नहीं होता है वह वह नित्य होता है जैसे आत्मा। - व्यतिरेक व्याप्ति सहित वैधर्म्य उदाहरण।

हेतु की चर्चा करते समय वहां व्याप्ति समझने के लिए हेतु के साथ दिखाई थी पर पंचावयव में व्याप्ति उदाहरण के साथ कही जाएगी।

यद्यपि अन्वय तथा व्यतिरेक कोई भी व्याप्ति का उपयोग किया जाता है, यदि दोनों उपलब्ध हो तो साधारणतः अन्वय व्याप्ति तथा साधर्म्य उदाहरण उपयोग में लाए जाते है। पर कहीं कहीं दो में से एक ही व्याप्ति का उदाहरण मिलना संभव होता है वहां जिसका उदाहरण प्राप्त हो वह व्याप्ति और संबंधित उदाहरण से काम लिया जाता है।

जब हम साध्य धर्म को सिद्ध करने के लिए हेतु और उदाहरण देते है तब हमारे साध्य और उदाहरण दोनों में साधक धर्म और साध्य धर्म दोनों रहेंगे (अथवा वैधर्म्य उदाहरण में नहीं रहेंगे) परंतु उदाहरण में वह दोनों धर्मों का होना (अथवा न होना) पहले से सिद्ध होना चाहिए ऐसे ही साध्य में साधक धर्म का होना भी पहले से सिद्ध होना पडेगा तभी हेतु + व्याप्ति सहित उदाहरण साध्य धर्म को सिद्ध कर पाएगा।

अन्य महत्वपूर्ण बात यह है की हेतु और उदाहरण में जिस धर्म को हम साधक धर्म (आगे साधन धर्म शब्द प्रयोग हुआ है) बताएंगे उसकी साध्य धर्म के साथ व्याप्ति प्रमाणित होनी चाहिए। हेतु का मुख्य आधार तो व्याप्ति की प्रामाणिकता ही है उदाहरण तो उस व्याप्ति को समझने के लिए एक दृष्टांत मात्र ही है।

ऐसी कोई भी वस्तु जिसमें साध्य धर्म हो/न हो और अन्य कोई धर्म साध्य के समान/विपरीत हो उसको उठाकर उदाहरण, और अन्य धर्म को साधन धर्म नहीं बना सकते (यदि उन दो धर्मों के बीच की व्याप्ति सिद्ध न हो तो)। ऐसा करने वाला हार जाएगा जो हम आगे देखेंगे।

जैसे आत्मा के साथ (अथवा अन्य कोई वस्तु के साथ भी) ऐसे हेतु और उदाहरण नहीं बना सकते जिसकी व्याप्ति ही न बनती हो।
शब्द अनित्य है।
गुण होने से।
जो जो गुण नहीं होता वह वह नित्य होता है जैसे आत्मा। (आत्मा गुण नहीं है और नित्य है भी पर ये कोई व्याप्ति नहीं है। )

शनिवार, 18 जून 2022

प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः। १.१.३२, १.१.३३-३५

अब हम क्रम प्राप्त अवयव के लक्षण देखेंगे।
 
प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः। १.१.३२

प्रतिज्ञा हेतु उदाहरण उपनय तथा निगमन यह पाँच अवयव है।

इन को अवयव कहा गया है क्योंकि वह एक विशेष वाक्यसमूह जो इन पांचों को मिलकर बनता है उनके अवयव है। वह वाक्यसमूह इन का अवयवी कहा जाएगा।

जैसे की हम जानते है न्यायदर्शन का मुख्य विषय प्रमाणों का उपयोग करना है और प्रमाणों में मुख्य (सर्वोच्च नहीं) अनुमान प्रमाण है। यह पाँच अवयव इसी अनुमान प्रमाण के लिए है।

अनुमान प्रमाण का उपयोग दो प्रकार से होता है।

एक तो जब हम स्वयं किसी निर्णय पर पहुँचने के लिए उसका प्रयोग करते है। जिसको स्वार्थानुमान (स्वार्थ में अनुमान) कहा जाता है उस समय हम विधिवत इन पांचों अवयवों का उपयोग नहीं करते। वहां हमारे मन में मुख्यतः हेतु तक पहुंचने की प्रक्रिया ही होती है। (इस लिए हेतु अवयव को ही अनुमान भी कहते है)।

परंतु जब इस प्रमाण का उपयोग प्रतिपक्ष के साथ चर्चा करने के लिए किया जाता है जहां हम इस का उपयोग जिस निर्णय पर हम पहुँच चुके है उसको एक सुव्यवस्थित रूप से प्रतिपक्ष और अन्यों को समझाने के लिए करते है अथवा किसी अर्थ तक पहुँचने के लिए अन्य से चर्चा कर रहे है और हमारा वर्तमान निर्णय और उसका आधार अन्य के सामने रखते है, जिसको परार्थानुमान कहते है, तब स्वयं के पक्ष को इन पाँच अवयवों द्वारा प्रस्तुत करना अनिवार्य है।

अनेक मतों के भिन्न भिन्न विचार के अनुसार कई इन पाँच में से कुछ अवयव को निरर्थक बताते है तो कई इन पाँच के उपरांत अन्य अवयव भी होने चाहिए यह मानते है। इन मतों की चर्चा भाष्यकार ने की है पर हमारे लिए इस समय वह महत्वपूर्ण न होने से हम सीधे सीधे इन पाँच अवयव के लक्षण ही देखते है।


साध्यनिर्देशः प्रतिज्ञा। १.१.३३

साध्य (सिद्ध करने योग्य) का निर्देश (कथन) प्रतिज्ञा है।

जिस विषय के निर्णय के लिए चर्चा (वाद/जल्प) हो रही है उसमें पक्ष तथा प्रतिपक्ष अपने अपने सिद्धांत का कथन करेंगे। यह दोनों सिद्धांत अभी साध्य (जिसको सिद्ध करना है) कोटि में है। इन को उनकी प्रतिज्ञा कहेंगे। निर्णय होने पर प्रमाणित प्रतिज्ञा सिद्ध हो जाएगी और दूसरी खंडित हो जाएगी। 

जैसे एक पक्ष मानता है की शब्द अनित्य है पर सामने वाला मानने को तैयार नहीं वह उसे नित्य मानता है। अब चर्चा के प्रारंभ में वादी अपनी प्रतिज्ञा का कथन करेगा। "शब्द अनित्य है" कहकर।

यहां अनित्यत्व साध्य धर्म है और उस धर्म का अधिकरण(आधार/धर्मी) शब्द है। साध्य धर्म के अधिकरण को 'पक्ष' (पक्ष यहां पारिभाषिक शब्द है) कहा गया है।

जो पदार्थ निश्चित रूप से अनित्य है (जिसकी अनित्यता पहले से ज्ञात है और सर्वमान्य है) वह शब्द के सपक्ष (पक्ष के समान) कहें जाएंगे। इनको सधर्मा (समान धर्म वाले) भी कहा जा सकता है। जैसे घडा, स्थाली(बर्तन) इत्यादि।

जो पदार्थ निश्चित रूप से नित्य है (जिसकी नित्यता पहले से ज्ञात है और सर्वमान्य है) वह शब्द के विपक्ष कहें जाएंगे। इन को विधर्मा भी कहा जा सकता है। जैसे आत्मा।

संक्षेप में, (उदाहरण : शब्द के अनित्यत्व को सिद्ध करने की चर्चा में)
- सिद्धांत(जो अभी साध्य है) के कथन को प्रतिज्ञा कहेंगे। (शब्द अनित्य है।)
- जिस पर संशय बना हुआ है (जिस को सिद्ध करने के लिए चर्चा हो रही है) उस धर्म को साध्य धर्म कहेंगे। (अनित्यता)
- साध्य धर्म के अधिकरण को पक्ष कहेंगे। (शब्द)
- पदार्थ जिसमें साध्य धर्म पहले से निश्चित है उसे सपक्ष अथवा सधर्मा कहेंगे। (घडा, स्थाली)
- पदार्थ जिसमें साध्य धर्म का अभाव पहले से निश्चित है उसे विपक्ष अथवा विधर्मा कहेंगे। (आत्मा)

प्रश्न :- आप गोपाल के घर गए हो। गोपाल के पास कई गायें है। आप को गायों के बारे में कुछ ज्ञान नहीं है। गोपाल आपको सामने खडे गौरांग और गायत्री को दिखाकर कहता है की यह देसी गाय की प्रजाति है। उतने में एक और गाय गौरी वहां आती है। आप पूछते हो की क्या गौरी भी देसी गाय है?

अब क्योंकि गोपाल गायों के बारे में ठीक ठीक जनता है और आप को ठीक ठीक ही बताएगा उसके हाँ अथवा ना जवाब को आप शब्द प्रमाण मान ही सकते हो। पर फिर भी क्योंकि गोपाल को पता है की कोई वस्तु शब्द प्रमाण से जानने पर भी उसको स्वयं समझ सके ऐसे जानने की इच्छा रहती ही है इस लिए वह आप को जवाब में मात्र हाँ न कहकर अनुमान प्रमाण से भी जनाने के लिए पंचावयव का प्रयोग करता है।

उसकी प्रतिज्ञा क्या होगी?
और यहां साध्य धर्म, पक्ष, सपक्ष/सधर्मा, विपक्ष/विधर्मा क्या है?


उदाहरणसाधर्म्यात्साध्यसाधनं हेतुः। १.१.३४
तथा वैधर्म्यात्। १.१.३५


उदाहरण के साधर्म्य से साध्य का जो साधन है वह हेतु है।
ऐसे ही [उदाहरण के] वैधर्म्य से [साध्य का जो साधन है वह हेतु है]।

हेतु अनुमान प्रमाण के पंचावयव का मुख्य अवयव है जो साध्य को सिद्ध करने का मुख्य साधन है। इसी को अनुमान भी कहा जाता है। (इस मुख्य अवयव के नाम से ही प्रमाण का नाम अनुमान प्रमाण बना।)

हेतु में सपक्ष अथवा विपक्ष पदार्थ जिसका भी उदाहरण हम देना चाहते है उसमें विद्यमान/अविद्यमान साध्य धर्म और उनमें विद्यमान/अविद्यमान साधक धर्म (जो पक्ष में भी विद्यमान/अविद्यमान है) उनका संबंध दिखाते है।

जैसे शब्द अनित्य है इस प्रतिज्ञा का साधर्म्य हेतु अनित्यता को सपक्ष स्थाली के उत्पत्ति धर्म वाले होने से जोडकर बनेगा।

(शब्द अनित्य है)
उत्पत्ति धर्म वाला होने से। क्योंकि जो जो उत्पन्न होता है वह वह अनित्य होता है।

यहां उत्पत्ति धर्म (जो स्थाली और शब्द दोनों में है) का संबंध साध्य धर्म अनित्यत्व (जो स्थाली में सिद्ध है और शब्द में सिद्ध करना है) से जोडा गया है। इस संबंध को व्याप्ति कहते है।

ऐसे ही यदि वैधर्म्य हेतु बनाना है तो विपक्ष आत्मा के नित्यत्व (अनित्यत्व के न होने) को उस में उत्पत्ति धर्म के न होने से जोडेंगे।

(शब्द अनित्य है)
वैधर्म्य हेतु :- उत्पत्ति धर्म वाला होने से। क्योंकि जो जो उत्पन्न नहीं होता वह वह अनित्य नहीं होता।

साधर्म्य से दिखाई गई व्याप्ति (जहां जहां यह होता है वहां वहां वह होता है) को अन्वय कहते है।

वैधर्म्य से दिखाई गई व्याप्ति (जहां जहां यह नहीं होता वहां वहां वह नहीं होता) को व्यतिरेक कहते है।

यदि हम कोई भी व्याप्ति को विपरीत दिशा से देखें, अर्थात साध्य को साधक और साधक को साध्य बनाकर देखें, यदि वह व्याप्ति तब भी सत्य रहती है तब उसको समव्याप्ति कहेंगे।

जैसे उत्पत्ति धर्म और अनित्यत्व की व्याप्ति जो हमनें अभी हेतु में दिखाई वह यह थी,
जो जो उत्पत्ति धर्म वाला (साधक धर्म वाला) होता है  वह वह अनित्य (साध्य धर्म वाला) होता है।

अब यदि इसको उलटा कर दे तब भी वह ठीक है।
जो जो अनित्य (साधक धर्म वाला) होता है वह वह उत्पत्ति धर्म वाला (साध्य धर्म वाला) होता है।

हम उत्पत्ति धर्म से अनित्यत्व तथा अनित्यत्व से उत्पत्ति धर्म दोनों ही सिद्ध कर सकते है। इसको समव्याप्ति कहेंगे।

परंतु यदि हम जो उदाहरण हम पहले अनेक बार प्रयोग कर चुके है (पर्वत अग्नि वाला है) उसके हेतु की व्याप्ति को देखें, "जहां जहां धुआँ होता है वहां वहां अग्नि होता है।" अब यदि इस के साध्य साधक धर्म को उलटा करेंगे और कहें,
जहां जहां अग्नि होता है वहां वहां धुआँ होता है। तो यह व्याप्ति सही नहीं होगी।
ऐसी व्याप्ति को विषम व्याप्ति कहेंगे।

विषम व्याप्ति में जिस साधक धर्म से हमने अन्वय व्याप्ति बनाई थी उसी से व्यतिरेक व्याप्ति नहीं बना सकते। अर्थात् हम ऐसा नहीं कह सकते की जहां जहां धुआं नहीं होता वहां वहां अग्नि नहीं होता।
 
(व्याप्ति, समव्याप्ति, विषमव्याप्ति, अन्वय, व्यतिरेक इन शब्दों का हम प्रचुर उपयोग करेंगे आगे जा कर।)


प्रश्न :-

गोपाल हमें गौरी देसी गाय है यह निर्णय पर पहुँचाने के लिए यह प्रतिज्ञा तथा हेतु देता है।
प्रतिज्ञा : गौरी देसी गाय है।
हेतु : कूबडधारी होने से। क्योंकि जो जो गाय प्रजाति कूबडधारी होती है वह वह गाय प्रजाति देसी होती है।

गोपाल ने जो व्याप्ति दी है वह अन्वय है अथवा व्यतिरेक?
क्या उसको अन्वय से व्यतिरेक (अथवा व्यतिरेक से अन्वय) कर सकते है? यदि कर सकते है तो व्याप्ति क्या होगी? यदि नहीं कर सकते तो क्यों नहीं कर सकते?
गोपाल ने दी है वह व्याप्ति सम है अथवा विषम?   


(अति सरल उदाहरणों से निराश न हो। अभी मूलभूत सिद्धांतों और शब्दावली को ठीक ठीक समझना हमारा उद्देश्य है। विस्तार तथा गहराई में जाने के अवसर बाद में आ सकते है।) 

बुधवार, 15 जून 2022

समानतन्त्रसिद्धः परतन्त्रासिद्धः प्रतितन्त्रसिद्धान्तः। १.१.२९, १.१.३०-३१

समानतन्त्रसिद्धः परतन्त्रासिद्धः प्रतितन्त्रसिद्धान्तः। १.१.२९

जो समान शास्त्रों में एक समान स्वीकार्य हो और उसी रूप में अन्य शास्त्रों  में स्वीकृत न हो वह प्रतितंत्र सिद्धांत है। 

जैसे एक शास्त्र में कोई विषय अधिकृत है और शास्त्र के उद्देश्य के अनुरूप उस विषय की व्याख्या की गई है। यह व्याख्या उस शास्त्र के समान शास्त्रों* में तो उसी रूप में स्वीकार की गई है पर अन्य शास्त्र जब उसी विषय के बारे में स्वयं को अधिकृत करके उसकी व्याख्या करते है तो वह व्याख्या उन शास्त्र के प्रतिपाद्य विषय तथा स्तर के अनुरूप करते है जो पहले वाले शास्त्र की व्याख्या से भिन्न है। ऐसे विषयों को प्रतितंत्र सिद्धांत कहते है। 

*ऐसे शास्त्र जो एक दूसरे से संबंधित विषयों के बारे में है और समान स्तर पर है वह सामान शास्त्र है। जैसे न्याय और वैशेषिक यह दोनों व्यावहारिक स्तर पर पदार्थ विद्या से संबंधित है जिसमें न्यायशास्त्र विद्या कैसे पानी है उस विषय को लिए है जब की वैशेषिक विद्या कीन कीन पदार्थों की पानी है उस विषय को लिए हुए है। ऐसे ही योग और सांख्य यह दोनों परस्पर समान शास्त्र है। वह न्याय वैशेषिक की भांति बाह्य भौतिक जगत पर नहीं अपितु आंतरिक आध्यात्मिक एक गहराई वाले विषय को लिए हुए है।

उदाहरण के लिए योग-सांख्य के कुछ सिद्धांत इस प्रकार है।
- जो असत् है वह कभी सद्भाव में नहीं आता (अर्थात जो नहीं है वह उत्पन्न नहीं होता)।
- जो है वह कभी विनाश को प्राप्त नहीं होता।
- आत्मा में कभी कोई बदलाव नहीं आता और इस कारण से सब आत्मा एक समान है।

जब की न्याय वैशेषिक यह मानते है की,
- वस्तुओं की उत्पत्ति होती है (जैसे जीव के कर्माशय के अनुरूप उसका शरीर, दोषों के अनुरूप प्रवृत्ति) और जो भी उत्पन्न होता है वह नष्ट भी होता ही है। यह योग सांख्य से भिन्न है। भिन्न होते हुए भी यह परस्पर का खंडन करते है इस भाव में इसे न ले कर ऐसे समझना है जैसे एक बालक को जब माता रोटी बनाकर देती है तब उसके लिए वह उत्पन्न हुई रोटी है परन्तु अन्य दृष्टि से देखे तो आटे का रूप परिवर्तन ही हुआ है और न तो आटा नष्ट हुआ है न रोटी असत् में से उत्पन्न हुई है। न्याय वैशेषिक जो पदार्थ की व्यावहारिक स्तर पर बात करते है वे कहेंगे की मिट्टी से घडा, आटे से रोटी उत्पन्न हुए है।
 
- न्याय वैशेषिक जीवों को व्यावहारिक जगत में दिखने वाले भेद के अनुरूप भिन्न भिन्न दोषों/संस्कारों वाले मानते है योग सांख्य इन भिन्नताओं के कारणरूप संस्कार चित्त (जो आत्मा से भिन्न और जड है) के आश्रित है यह मानते है। 

ऊपर के उदाहरण प्रतितंत्र सिद्धांत के होते हुए भी ऐसे है जैसे मानो किसी को नदी के उस पार कहीं जाना है और उसने किसी को पूछा की क्या करें तो जवाब मिला नाव में बैठ जाओ। अब वह नाव सामने वाले किनारे पर पहुंच गयी तब उसने फिर से किसी को पूछा की अब क्या करें तो जवाब मिला नाव से उतर जाओ। यहाँ अधिकार क्षेत्र अलग अलग होने से विपरीत लगने वाले उत्तर भी एक दूसरे का खंडन नहीं करते।  

यत्सिद्धावन्यप्रकरणसिद्धिः सोऽधिकरणसिद्धान्तः। १.१.३०

जिसके सिद्ध होने से अन्य सम्बद्ध अर्थों की सिद्धि हो जाए वह अधिकरण सिद्धांत है।

जिस वर्तमान विषय को सिद्ध किया जा रहा है उसके सिद्ध हो जाने पर वह सारे अर्थ जिनके अभाव में वर्तमान विषय बनता ही नहीं वे भी सिद्ध हो जाते है। उन सब अर्थों का वर्तमान विषय अधिकरण (उनकी सिद्धि के अधिकार को लिए हुए) है जिससे उसको अधिकरण सिद्धांत कहते है।

इस को समझने के लिए हम एक शास्त्रीय और एक अन्य उदाहरण लेंगे।

शास्त्रीय उदाहरण :
आत्मा की सिद्धि के लिए कहा गया की आत्मा देह इन्द्रिय आदि से भिन्न है क्योंकि जो वस्तु को देखा है और स्पर्श किया है वह एक ही है ऐसा प्रतिसंधान आत्मा न हो तो कौन करेगा? अब यह प्रसंग सिद्ध होने से नीचे के सारे अर्थ जिनको सीधे सीधे कहा नहीं गया है वह भी सिद्ध हो जाएंगे।
- देखने वाली इन्द्रिय और स्पर्श करने वाली इन्द्रिय अलग अलग है अर्थात् नियत विषय वाली है । (नहीं तो प्रतिसंधान की आवश्यकता ही नहीं होती)
- इंद्रियाँ ज्ञान ग्रहण करने का साधन मात्र है स्वयं बोध का भोग नहीं करती (यदि ज्ञान इंद्रियों को ही होता तो कोई अन्य कैसे प्रतिसंधान कर सकता है)
- चेतन तत्व अनेक विषयों के ज्ञान का भोग कर सकता है और वह इंद्रियों को साधन के रूप में उपयोग कराता है।

आत्मा के उस हेतु से सिद्ध होने से ऊपर के अर्थ भी सिद्ध हो जाएंगे क्योंकि उनके सिद्ध हुए बिना आत्मा सिद्ध नहीं हो सकता। ऐसे सारे अर्थों का सिद्ध होना अधिकरण सिद्धांत की सीमा में आता है।  

अन्य उदाहरण 
सद्वृत्त आयुर्वेद में स्वास्थ्य की रक्षा के लिए दिए गए सिद्धांतों में से है। सद्वृत्त का एक सिद्धांत कहता है की सभी वस्तुओं पर बिना सोचे समझे विश्वास नहीं करना चाहिए और न ही प्रत्येक वस्तु पर शंका करनी चाहिए। यह सिद्ध हो जाने पर नीचे की बातें भी स्वयं सिद्ध हो जाएगी। 

- व्यवहार में सब वस्तु अपने पूर्ण प्रामाणिक रूप में हमारे सामने नहीं आती।
- सारी वस्तु अप्रामाणिक भी नहीं होती।
- हमारी बुद्धि का योग्य उपयोग (हमारी परिस्थितियां जो हमारे निर्णयों से प्रभावित होती है) हमारे स्वास्थ्य की रक्षा में योगदान देता है। 


अपरीक्षिताभ्युपगमात्तद्विशेषपरीक्षणमभ्युपगमसिद्धान्तः। १.१.३१

जो अभी परीक्षित नहीं है, थोडी देर परीक्षा करने के हेतु से जिसको स्वीकारा है वह अभ्युपगम सिद्धांत है।

जिस विषय को सिद्ध करने के लिए चर्चा चल रही है उस विषय में एक पक्ष के सिद्धांत को दूसरे पक्ष द्वारा आंशिक रूप से स्वीकार कर लेना यह देखने के लिए की ऐसा करने पर भी दूसरे पक्ष के सिद्धांत की पूर्ण सिद्धि होती है अथवा नहीं। ऐसा दूसरे पक्ष के मान्य सिद्धांतों में विसंगतताओं को दिखने के लिए अथवा उसके हेतु की अपूर्णता दिखाने के लिए अथवा उसके सिद्धांतों में से जो सरलता से असिद्ध हो सकता हो उसको पहले असिद्ध करने के लिए किया जा सकता है।
 
शास्त्रीय उदाहरण :
न्याय तथा वैशेषिक दर्शन शब्द को गुण और अनित्य मानते है। प्रतिपक्षी उसको द्रव्य और नित्य मानता है। सिद्धांती यदि प्रतिपक्षी को कहे के चलो थोडी देर के लिए मान लेते है की शब्द द्रव्य है और ऐसा मानकर भी देखते है की वह नित्य सिद्ध हो सकता है क्या? तो यह (शब्द को नित्यत्व की परीक्षा के समय द्रव्य मान लेना) अभ्युपगम सिद्धांत कहा जाएगा।

अन्य उदाहरण :
एक पक्ष मानता है की आज कल शिक्षण/परीक्षण की गुणवत्ता कम हो गई है इस लिए स्नातक होने पर भी व्यक्ति उस योग्यता को लिए हुए नहीं होता जो अपेक्षित है। दूसरा पक्ष कहता है की समस्या समस्त शिक्षण व्यवस्था में नहीं अपितु नई उभर आई अनेक शिक्षण संस्थाओं के कारण है जिनकी गुणवत्ता कम है।

अब यदि प्रथम पक्ष कहे के चलो मान लेते है की नई संस्थाओं के स्नातक उन संस्थाओं की गुणवत्ता के कारण पूर्ण योग्य नहीं है तो भी क्या पुरानी संस्थाओं के स्नातक पहले जैसे है? तो यहां नई संस्थाओं के शिक्षण पर दुष्प्रभाव को मान लेना अभ्युपगम सिद्धांत होगा। ऐसे ही दूसरा पक्ष कह सकता है की चलो मान लेते है की समस्त शिक्षण का स्तर ही गिर गया है तो फिर पुरानी संस्थाओं के स्नातक क्यों अभी भी पहले की ही भांति योग्य है? (यदि वो हो तो)

ध्यान रहें यहां सिद्धांत शब्द तत्व, सत्य, सिद्ध, के लिए प्रयुक्त नहीं है। यहां सिद्धांत का अर्थ है जिसको स्वपक्ष अथवा प्रतिपक्ष सिद्ध मानता है। प्रारंभ में दोनों पक्ष स्वयं के सिद्धांत रखेंगे और दोनों एक दूसरे से विरुद्ध होने से एक तो असत्य होगा ही (दोनों भी असत्य हो सकते है)। पर फिर भी उन दोनों को यहां उनके अपने अपने सिद्धांत ही कहेंगे।

अधिकरण तथा अभ्युपगम दोनों को ठीक से जानना वर्तमान परिस्थिति में अत्यंत उपयोगी है। (वह सदा ही अत्यंत उपयोगी है वैसे तो, क्योंकि असत्य का प्रचार करने वाले सदा ही होते है।) उन परिस्थितियों में भी जहां हम स्वयं तत्वज्ञान तक अभी नहीं पहुँच पाए है यह कम से कम हमें उन असत्यों से शीघ्रता से अवगत करा देगा जिसमें सत्य का अभाव उनकी आंतरिक विसंगतताओं से अथवा सिद्धांत से जुडे हुए अन्य अर्थ के ज्ञात होने से पता चल जाता हो।

और यह हमें किसको आप्त कोटि में नहीं लेना चाहिए यह समझने भी सहायता कर सकता है। उदाहरण के लिए मानो किसी ने कहा की यह पुष्प सूरजमुखी* का है और हेतु दिया वह सूरज की दिशा के साथ दिशा परिवर्तन कर रहा है इस लिए। हमें यह पता नहीं है की वह पुष्प सूर्यमुखी का है अथवा नहीं और हमने उस व्यक्ति को इस लिए पूछा था क्योंकि हम उसे पुष्पों के विषय में विशेषज्ञ मानते थे।

*सूरजमुखी जिसकी संज्ञा है उस का। अर्थात् रूढ अर्थ लेना है यौगिक नहीं।

अब हमें यद्यपि उस पुष्प के विषय में ज्ञान नहीं है, हमने अन्य अनेक पुष्पों को स्वयं का मुख सूर्य की दिशा में बना रहे ऐसे दिशा परिवर्तन करते हुए देखा है। यहां यदि हम उस व्यक्ति के हेतु को मान ले तो वह सारे भिन्न भिन्न पुष्प भी सूरजमुखी सिद्ध हो जाएंगे जो सत्य नहीं होगा। इससे हमें उस पुष्प के विषय में भले ही न पता चला हो वह व्यक्ति पुष्पविशेषज्ञ नहीं है उतना पता तो चल गया।

अधिकरण सिद्धांत के क्षेत्र में कौन कौन से अर्थों का समावेश होता है यह अच्छी प्रकार से जानने से हम कहाँ प्रतिपक्ष का खंडन करने के लिए अभ्युपगम का प्रयोग करना है यह निर्णय भी कर सकते है।

ऐसे ही यदि कोई सिद्धांत आंतरिक विसंगतताओं से ग्रस्त हो तो उसके अधिकरण क्षेत्र में आने वाले दो अर्थ (अथवा अधिकरण में आने वाले अर्थ और प्रतिपक्ष ने माना हुआ कोई अन्य सिद्धांत) एक दूसरे का ही खंडन करते मिलेंगे जिससे उस सिद्धांत के सत्य होने की कोई संभावना नहीं है यह हम अल्प प्रयास से ही जान जाएंगे।

इन दोनों के वर्तमान में प्रासंगिक कई उदाहरण लिए जा सकते है पर उनको जब हम इन विषयों को विस्तार से परीक्षा के समय देखेंगे तब के लिए रखते है।

सिद्धांत के लक्षण के साथ हमने प्रथम सूत्र में आए १६ पदार्थों में से प्रथम छह पदार्थ के लक्षण देख लिए है। आगे हम सातवें पदार्थ अवयव के लक्षण देखेंगे।

शनिवार, 11 जून 2022

यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत्प्रयोजनम्। १.१.२४ , १.१.२५-२८

यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत्प्रयोजनम्। १.१.२४

जिस अर्थ को उद्येशकर (जिस उद्देश्य से) प्राणियों की प्रवृत्ति होती है वह प्रयोजन है।

जिस अर्थ को प्राप्त करने योग्य अथवा छोडने योग्य निश्चय से मानकर प्राणी उसको प्राप्त करने अथवा छोडने की प्रवृत्ति करता है वह प्रयोजन है। इस में सुख प्राप्ति/दुख त्याग को मुख्य प्रयोजन तथा उनके साधन को प्राप्त करने/छोडने को गौण प्रयोजन कह सकते है।


लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिन्नर्थे बुद्धिसाम्यं स दृष्टान्तः। १.१.२५

लोक व्यवहार को जानने वाले (लौकिक) और शास्त्र को जानने वाले (परीक्षक) दोनों की बुद्धि जिस विषय को ले कर समान हो वह दृष्टांत बन सकता है।

दृष्टांत शब्द में से भी यही अर्थ निकलता है। दृष्ट = ज्ञात, अंत = पूर्णता तक। पूर्ण रूप से ज्ञात विषय।

स्वार्थ तथा परार्थ दोनों में अनुमान प्रमाण का प्रयोग करते समय दृष्टांत के बिना संशय निवृत्ति अर्थात् निर्णय पर नहीं पहुँचा जा सकता। दृष्टांत इस लिए न्याय का अंग भी है। विरोधी के दृष्टांत में (उसी के पक्ष से) विरोध दिखने से प्रतिपक्ष का खंडन और स्वयं के दृष्टांत की योग्यता स्थापित करके स्वयं के पक्ष की सिद्धि हो सकती है।

तन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थितिः सिद्धान्तः। १.१.२६

तंत्र (शास्त्र), अधिकरण (अधिकार) तथा अभ्युपगम (थोडी देर परीक्षण करने के लिए स्वीकृत) इन तीनों के माने हुए विषयों की संस्थिति (व्यवस्था) मानना सिद्धांत है।

"यह ऐसा ही है" ऐसा कहकर जिस अर्थ समूह को स्वीकार किया जाता है उसको सिद्ध कहते है। ऐसे सिद्ध विषय की अच्छी प्रकार की व्यवस्था को सिद्धांत कहते है।

सिद्धांत = सिद्ध + अंत = पूर्णतया सिद्ध। संस्थिति = सम् + स्थिति = जो अच्छी प्रकार से ठहर गया है (निश्चित हो गया है)।

इस सूत्र में सिद्धांत का लक्षण संस्थिति है। ऐसा निश्चय से स्वीकारा गया अर्थसमूह शास्त्र (तंत्र) का हो सकता है, अधिकरण का हो सकता है अथवा किसी अर्थ समूह को परीक्षा करने के लिए थोडी देर के लिए स्वीकारा गया हो सकता है।

तंत्र सिद्धांत दो प्रकार का हो सकता है सर्वतन्त्र और प्रतितंत्र जिससे सिद्धांत के चार विभाग बनेंगे। इन के बारे में आगे के सूत्र स्वयं बताएंगे।

स चतुर्विधः सर्वतन्त्रप्रतितन्त्राधिकरणाभ्युपगमसंस्थित्यर्थान्तरभावात्। १.१.२७

परस्पर भिन्न होने से वह सिद्धांत चार प्रकार का होता है। सर्वतन्त्र सिद्धांत, प्रतितंत्र सिद्धांत, अधिकरण सिद्धांत तथा अभ्युपगम सिद्धांत।

सर्वतन्त्राविरुद्धस्तन्त्रेऽधिकृतोऽर्थः सर्वतन्त्रसिद्धान्तः। १.१.२८

सभी शस्त्रों में समान रूप से स्वीकृत (अविरुद्ध) तथा किसी शास्त्र में अधिकृत (विशेष रूप से वर्णित) अर्थ (विषय) सर्वतन्त्र सिद्धांत है। 

कोई विषय किसी शास्त्र का मुख्य विषय होने से उसमें विस्तार से वर्णित है और दूसरे शास्त्रों में उस शास्त्र में वर्णित सिद्धांत से कोई विरोध नहीं है तब वह विषय सर्व शास्त्र (तंत्र) को समान रूप से मान्य होने से उसे सर्वतन्त्र सिद्धांत कहा जाता है।

जैसे घ्राण रसना चक्षु त्वक् श्रोत्र ये इंद्रियाँ है और पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश पंचमहाभूत है, किसी विषय का ज्ञान प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से किया जाता है यह न्याय वैशेषिक में विशेष रूप से वर्णित है और अन्य शास्त्रों में उसे उसी रूप में स्वीकारा गया है। ऐसे सिद्धांतों को सर्वतन्त्र सिद्धांत कहेंगे।

शुक्रवार, 10 जून 2022

समानानेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः। १.१.२३

समानानेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः। १.१.२३

समान धर्म के ज्ञान से अथवा अनेक (*विशेष) धर्म के ज्ञान से अथवा परस्पर विरोधी ज्ञान से अथवा उपलब्धि की अव्यवस्था से अथवा अनुपलब्धि की अव्यवस्था से विशेष ज्ञान की अपेक्षा रखने वाला द्विकोटिक ज्ञान (विमर्श) संशय कहलाता है।

*एक शब्द का प्रयोग हम समान के लिए भी करते है। उस अर्थ को लेते हुए अनेक का अर्थ होगा जो समान नहीं है वह अर्थात् विशेष। 

यहां संशय का लक्षण बताने के लिए विमर्श शब्द का उपयोग हुआ है। विमर्श शब्द में वि उपसर्ग विरोध अर्थ में है और यह शब्द मृश् (मृशँ आमर्शने) धातु जिसका अर्थ स्पर्श करना (जानकारी के लिए किसी वस्तु तक पहुंचना) है उससे बना है। अर्थ होगा जो विरोधी अर्थों को छू रहा हो। अर्थात् ऐसा ज्ञान जो विरोधी धर्मों तक पहुंचता हो और इससे धर्मी का निश्चय नहीं हो सकता।

पर प्रत्येक ऐसी अवस्था में जहां किसी वस्तु का निश्चय न हो रहा हो वहां संशय उभरेगा यह नहीं कह सकते। यदि निश्चय करने की इच्छा भी हो तब संशय उभरेगा। जब वर्तमान ज्ञान से निश्चय नहीं हो पा रहा हो और निश्चय पर पहुंचने की इच्छा हो तब धर्मी (प्रमेय) के विशेष धर्म को जानने की इच्छा होगी जिससे निश्चय हो सके। इस लिए विशेष की अपेक्षा रखने वाला ज्ञान इसको विमर्श का विशेषण बनाया है।

जैसे मान लो किसी ने अलग अलग मत आत्मा के विषय में क्या कहते है वह पढा। उसका अपना न ही कोई आत्मा के बारे में मत/ज्ञान है न ही उसके विषय में विरुद्ध धर्मों को पढकर उसे यह जिज्ञासा हुई की इन में से कौन सही है और कौन गलत। उसने यह जाना की ये मत वाले ऐसा मानते है और वे मत वाले ऐसा मानते है और आगे बढ गया। यहां विरोधी धर्मों की प्राप्ति तो हुई पर संशय नहीं उभरा।

सूत्र में संशय उत्पन्न होने की पाँच अवस्था बतायी है।

१। समानधर्मोंपपत्ति अर्थात् दो भिन्न वस्तुओं के समान धर्मों का दिखना : हमारे सामने जो धर्मी है उसमें ऐसे लक्षणों का दिखना जो एक से अधिक धर्मी में होते है। अब उनको देखकर यह संशय उत्पन्न होगा की उन अनेक धर्मी जिनमें वो समान लक्षण होते है उन में से सामने वाला (जिसका विषय है वह) धर्मी कौन सा है।

जैसे संध्या के समय हम निर्जन स्थल से जा रहे है और कुछ दूर हमें ५-६ फिट की कोई आकृति दिखी और हमें संशय हुआ की वह कोई मनुष्य है (जो हमारे लिए भय का कारण बन सकता है) अथवा स्थाणु (ठूँठ, सूखे हुए वृक्ष का तना)। स्थाणु और मनुष्य की ऊंचाई चौडाई एक समान होने से और अपर्याप्त प्रकाश से वस्तु के विशेष गुण जैसे यदि मनुष्य हो तो उसके हाथ पैर सर और स्थाणु हो तो वृक्ष की आकृति न दिखने से यह संशय उत्पन्न हुआ जिसका निराकरण उन विशेष धर्मों को जानकर होगा।   

ध्यान रहे की यहां देखने वाले को दोनों धर्मी के समान गुणों के बारे में पहले से ज्ञान होना पडेगा तभी उसको संशय उत्पन्न होगा।

२। अनेकधर्मोंपपत्ति अर्थात् अनेक (विशेष) धर्म का दिखना : कोई ऐसा धर्म दिखना जो कहीं और नहीं दिख रहा हो और उस धर्म के आधार पर वस्तु का वर्गीकरण न हो पा रहा हो।

वैशेषिक दर्शन कहता है की कोई भी उत्पन्न पदार्थ द्रव्य गुण कर्म इन तीन में से एक होता है। अब किसी ने विभाग से शब्द को उत्पन्न होते हुए देखा (जैसे कपडा चीरने से शब्द उत्पन्न होता है, जैसे फटाका फूटते समय शब्द उत्पन्न होता है ) परंतु यह विशेष लक्षण की शब्द विभाग से उत्पन्न होता है उससे वह शब्द को द्रव्य गुण अथवा कर्म क्या माने वह वो निश्चय नहीं कर पा रहा  है अर्थात् उस विषय में उसे संशय उत्पन्न हुआ है जिसका निराकरण वह अब शब्द के अन्य विशेष लक्षणों को जानकार करने का प्रयत्न करेगा।

यहां धर्म और धर्मी दोनों प्रत्यक्ष है पर प्रत्यक्ष धर्म को देखकर देखने वाला धर्मी का यथायोग्य वर्गीकरण करने में असमर्थ है और संशय वहां उत्पन्न हुआ है।  

३। विप्रतिपत्ति अर्थात् विरोधी धर्मों का दिखना : वि = विरुद्ध, प्रतिपत्ति = ज्ञान। एक ही धर्मी के लिए एक साथ सच न हो सके ऐसी विरोधी बातों का सामने आना। जैसे किसी ने कहा की आज मंगलवार है और दूसरे ने कहा की बुधवार है अब यदि सुनने वाले को पता नहीं है की आज कौन सा दिन है तो यह संशय का कारण बन सकता है।

४। उपलब्धि अव्यवस्था : जहां वस्तु मिल रही है (उपलब्धि हो रही है) पर यह निश्चय नहीं हो पा रहा है की वह वहां होते हुए उपलब्ध हो रही है अथवा न होते हुए। उदाहरण : रण में जाते समय सामने पानी दिखने से यह संशय हो सकता यही की यह मृगमरीचिका है अथवा सच में पानी है। 

५। अनुपलब्धि अव्यवस्था : जहां वस्तु की उपलब्धि नहीं हो रही है पर यह निश्चय नहीं हो पा रहा है की वह वहां न होते हुए अनुपलब्ध हो रही है अथवा होते हुए। जैसे हमने अनेक उदाहरण देखें है जहां वस्तु होते हुए भी (प्रथम दृष्ट्या) नहीं दिखती। किसी स्थल पर तो हम न दिखती हुई वस्तु के होने के बारे में निश्चय से कह सकते है जैसे खडे हुए जीवित वृक्ष की जडें और कहीं जो नहीं दिख रहा है वह नहीं है वह भी निश्चय से कह सकते है जैसे हमारी हथेली पर (न दिखता हुआ) आंवला। पर कहीं कहीं वस्तु न दिख पाने पर भी यह संशय बना रहता है की वह है अथवा नहीं जैसे भूगर्भ जल। यह संशय अनुपलब्धि की अव्यवस्था के कारण उत्पन्न हुआ है क्योंकि जब वह होता है तब भी नहीं दिखता और नहीं होता है तब भी नहीं दिखता।


प्रश्न :-

नीचे के प्रसंग संशय उत्पन्न होने की कौन सी अवस्था का उदाहरण है। 

१। आप ने हमेशा देखा है की शरदी खांसी ऋतु परिवर्तन में प्रचुर मात्रा में दिखने को मिलते है और उनसे भयभीत होने का कोई कारण नहीं समझते थे। अब नया सायन्स कहेता है की यही लक्षण एक नए रोग में भी दिखते है जिससे भयभीत होना चाहिए। अब जब आप किसी को शरदी खांसी से ग्रसित देखते है तो आप को संशय होता है की यह हमेशा वाली शरदी खांसी है या नया रोग।

२। किसी ने एक स्तनधारी जीव देखा जिसके पंख भी थे। ऐसा उसने कहीं और नहीं देखा था न ही इस जीव के बारे में उसे कोई ज्ञान है। अब उसे संशय हो सकता है की यह जीव स्थलचर है या नभचर।

३। जीवाणु परीक्षा का परिणाम यदि यह कहता है की जीवाणु पाए गए है तब भी यह संशय रहता है की वह होते हुए प्राप्ति का परिणाम आया है अथवा न होते हुए। (True Positive / False Positive)

४। आप ट्विटर पर फॉलो करने योग्य हैन्डल ढूंढ रहे थे। अकस्मात @nyaynotes तक पहुंचते है। देखते है की इस हैन्डल के followers नहीं है पर आप को यह संशय बना रहता है की क्या यह हैन्डल फॉलो करने योग्य नहीं है इस लिए इसके फॉलोवर्स नहीं है अथवा फॉलो करने योग्य होते हुए भी ऐसा है।