रविवार, 4 सितंबर 2022

अनुत्पत्तिसम प्रतिषेध

अनुत्पत्तिसम प्रतिषेध

प्रागुत्पत्तेः कारणाभावादनुत्पत्तिसमः। ५.१.१२

(कार्य की) उत्पत्ति से पहले कारणों का अभाव था ऐसा आधार बनाकर जो (अयोग्य) प्रतिषेध किया जाता है वह अनुत्पत्तिसम प्रतिषेध है।

तथाभावादुत्पन्नस्य कारणोपपत्तेर्न कारणप्रतिषेधः। ५.१.१३ 

वैसा होने से उत्पन्न हुए के कारण की सिद्धि होने से कारण का प्रतिषेध नहीं हो सकता। 

भाष्य और पुस्तकें पूरी तरह एक तरफ रखकर मात्र सूत्र के आधार पर मैंने जो समझने का प्रयत्न किया है वह नीचे दिया है।

जहां कारण का संचय अनिश्चित काल तक होता है/वह सुषुप्त अवस्था में अनिश्चित काल तक/प्रत्यक्ष न होते हुए रह सकता है, और फिर कार्य दिखता है वहां इस जाति के प्रयोग के लिए सरलता बनती है।

ऐसे में जब कार्य दिखता है तब कार्य के निश्चित पूर्व में कारण उत्पन्न हुआ नहीं दिखता (जैसे ढोल बजाने से शब्द उत्पन्न होता है तब कारण-हाथों का ढोल से संयोग होना दिखता है) और वह जब संचित होता रहता है तब कार्य की निष्पत्ति नहीं होने से हो सकता है वह बिलकुल ही न दिखे अथवा उसे कारण के रूप में देख पाना कठिन हो सकता है।

इस परिस्थिति का लाभ उठाते हुए जातिवादी कारण के कारण होने का ऐसे खंडन कर सकता है की यदि वह कारण कार्य की उत्पत्ति से पहले भी था तब तो कार्य भी पहले होना चाहिए था। कार्य पहले नहीं था वह सिद्ध करता है की कारण भी पहले नहीं था। (जैसे कोई धीरे धीरे अपथ्य के कारण अपने शरीर में आम का संचय करता है। अब एक दिन बीमारी के दिखने पर हो सकता जो वो आम संचय न देख पाए और कार्य के तुरंत पहले के समय में कोई कारण को ढूँढने का प्रयास करने लगे।)

उत्तर
कार्य का उत्पन्न होना कारण के होने को सिद्ध करता है उसे कार्य से पहले कारण नहीं था यह सिद्ध करने के लिए प्रमाण नहीं बना सकते। (यदि कारण की कार्य के साथ की व्याप्ति सही हो तो)

उदाहरण १
वैद्य : रात्रि को खट्टे दही का सेवन तुम्हें बंध करना होगा, तुम्हारी acidity उससे हुई है। रात्रि को खट्टे दही का सेवन पित्त कफ के प्रकोप करता है इसलिए।
रोगी : acidity तो मुझे १५-२० दिन से ही हो रही है जब की रात्रि को खट्टे दही का सेवन तो मैं पिछले ३ महीने से कर रहा हूँ। जब acidity नहीं थी तो उसका कारण भी नहीं होगा (परंतु दहीं का सेवन तो तब भी था) अर्थात् खट्टे दही का acidity से कोई लेना देना नहीं है।

उदाहरण २
वादी : राम अपने १५ वर्ष के कठिन पुरुषार्थ के कारण आज इस सफलता को प्राप्त हुआ है।
जातिवादी : पुरुषार्थ से कुछ नहीं होता। एक वर्ष पहले तक तो उसे सफलता मिली नहीं थी जो वर्ष भर पहले तक सफलता के कारण का अभाव का सूचक है। पुरुषार्थ से कुछ होना होता तो १५ वर्ष पहले ही हो जाता।

जाति प्रयोग तर्क के वह प्रयोग है जो प्रमाण तक नहीं पहुंचाते। तर्क के प्रमाण तक न पहुंचा पाने के पीछे अपूर्ण तर्क, प्रमाणों से विसंगतता, अप्राप्त प्रमाण जैसे कारण रहते है जो जाति प्रयोगों में देखने मिलते है। परंतु जाति प्रयोग का अस्तित्व उस बात का सूचक है की वे सद् उत्तर जैसे लग सकते है। यदि उनके सफल होने की कोई संभावना ही न होती तो वह प्रयोग में ही न आते। क्योंकि जो तर्क कभी भी सद् उत्तर न बन पाए वह सद् उत्तर जैसा कभी लग भी नहीं सकता। इससे हम स्वयं की जाति समझ की एक परीक्षा कर सकते है। क्या हम ऐसे उदाहरण देख सकते है जहां जाति लक्षण (जिस तर्क को जाति का लक्षण बताया गया है) वादी की व्याप्ति का खंडन करता हो। (P.S. जाति प्रकरण के अंत में इसे संशोधित करेंगे। क्योंकि इस तर्क में त्रुटि, अपूर्णता है।)

एक उदाहरण जो सत्य हो सकता है (हमेशा ऐसा होता है ऐसा कहने का तात्पर्य नहीं है।)

वादी : तुम मेरी यह बात का विरोध नहीं कर सकते। क्योंकि तुम तो आज तक मेरी कही प्रत्येक बात का समर्थन करते आए हो। (व्याप्ति: वादी की बात -> प्रतिवादी का समर्थन)

प्रतिवादी : मैंने आज तक जो भी बात का समर्थन किया वह बात के योग्य लगने से किया था, आप ने कही है इसलिए नहीं। पर यह बात मुझे योग्य नहीं लग रही है तो मैं उसका विरोध कर रहा हूँ। (वादी की व्याप्ति का खंडन यह कहते हुए की जब कार्य (विरोध) नहीं था तब उसका कारण (अयोग्य बात) भी नहीं था।)