गुरुवार, 10 नवंबर 2022

अनुमान प्रमाण परीक्षा (२.१.३५-२.१.४१)

पूर्वपक्षी :-

रोधोपघातसादृश्येभ्यो व्यभिचारादनुमानमप्रमाणम्। २.१.३५

रोध उपघात तथा सादृश्य के कारण अनुमान गलत होने से अनुमान प्रमाण नहीं है।  

कभी कोई कारण आ जाने से अनुमानित कार्य जो अन्यथा होता वह बाधित हो जाता है, कभी कोई कारण आ जाने से कोई कार्य जिसके न होने का अनुमान हो वह वह हो जाता है अथवा कारण/कार्य के सादृश्य से कार्य/कारण का अनुमान गलत हो सकता है ऐसे में अनुमान को प्रमाण अर्थात् निश्चित ज्ञान कराने वाला नहीं कह सकते।

जैसे खूब काले बादल उमड आने पर कोई वर्षा होगी ऐसा अनुमान करता है परंतु वायु बादलों को उडा ले जाता है और वर्षा नहीं होती, नदी में खूब पानी आने से कोई ऊपर वर्षा हुई होगी यह अनुमान करता है परंतु पानी ऊपर बांध टूटने से अथवा हिम पिघलने से आया हो सकता है, चींटीयों को अपना घर बदलते देख कुछ दिनों में वर्षा होने का अनुमान करते हो परंतु वह उनके वर्तमान घर पर अन्य कोई आपत्ति के कारण स्थानांतरण कर रही हो यह हो सकता है, मनुष्य द्वारा मोर जैसी ध्वनि करने पर कोई उससे मोर का अनुमान कर सकता है। ऐसे प्रसंगों से पता चलता है की अनुमान निश्चित ज्ञान नहीं है और इसलिए उसे प्रमाण नहीं कहा जा सकता।

उत्तर :-   
नैकदेशत्राससादृश्येभ्योऽर्थान्तरभावात्। २.१.३६

एक देश त्रास तथा सादृश्य के कारण भिन्न अनुमान होने से अनुमान प्रमाण असिद्ध नहीं होता।

गलत अनुमान का कारण कार्य कारण में से कोई एक देश मात्र को देखकर अथवा अन्य कारणों की उपेक्षा अथवा कार्य कारण को यथायोग्य न समझना है। परिस्थिति को समग्रता से देखकर उसके अनुसार व्याप्ति विचार करते हुए किए गये अनुमानमें गलती नहीं होने से वह पूरी परिस्थिति को ठीक से समझे बिना किए गए अनुमान से भिन्न है और अप्रमाण नहीं है।

जैसे ऊपर वर्षा होने पर आई हुई बाढ में पेड पत्ते मिट्टी वगैरह होते है जो बिना वर्षा के आए पानी में नहीं होते, चींटियाँ यदि बिना भूमि की गर्मी और वर्षा अनुकूल वातावरण के अथवा अन्य विपत्ति के दिखते हुए घर बदल रही है तब उन परिस्थितियों की उपेक्षा करके अनुमान करना गलत होगा। ऐसे ही मोर की ध्वनि सुनकर मोर का अनुमान होता है मनुष्य के स्वर को मोर का समझना वह प्रमाण प्रयोग करने वाले की गलती है। मानो कोई धूल के बादल को धुआँ समझकर आग का अनुमान कर ले तो उससे धुएं और आग की व्याप्ति खंडित नहीं होती।

सूत्र २.१.३७-४१ के विस्तार में न जाते हुए आगे चलते है। सूत्र और अर्थ नीचे दिए है।

पूर्वपक्षी :-
वर्तमानाभावः पततः पतितपतितव्यकालोपपत्तेः। २.१.३७
गिरते हुए के संबंध में गिरा अथवा गिरेगा ऐसा भूतकाल अथवा भविष्यकाल का ही बोध होता है इसलिए वर्तमानकाल का अभाव है।

पूर्वपक्षी का कहना है की अनुमान का प्रयोग मात्र भूत और भविष्य के लिए ही हो सकता है जैसे गिरती हुई वस्तु को देखकर वह गिर गई अथवा गिरेगी यही अनुमान हो सकता है अर्थात् वर्तमान का अभाव है।


उत्तर :-

तयोरप्यभावो वर्तमानाभावे तदपेक्षत्वात्। २.१.३८
वर्तमान के अभाव में भूत भविष्य का भी अभाव मानना पडेगा क्योंकि उन दोनों को वर्तमान की अपेक्षा है।

नातीतानागतयोरितरेतरापेक्षासिद्धिः। २.१.३९
भूत भविष्य की एक दूसरे की अपेक्षा से सिद्धि नहीं होती।

वर्तमानाभावे सर्वाग्रहणम्प्रत्यक्षानुपपत्तेः। २.१.४०
वर्तमान के अभाव में प्रत्यक्ष की सिद्धि न हो पाने से कोई भी ज्ञान नहीं हो पाएगा। (क्योंकि बाकी प्रमाण प्रत्यक्ष मूलक होते है।)

कृतताकर्तव्यतोपपत्तेस्तूभयथा ग्रहणम्। २.१.४१
वर्तमानकाल में भूत भविष्य की भी सिद्धि हो पाने से दोनों प्रकार से ग्रहण होता है।

जो क्रिया अभी चल रही है उसके उल्लेख में तीनों कालों का ग्रहण हो जाता है, क्रिया के आरंभ से लेकर वर्तमान तक के भूत, वर्तमान और वर्तमान से क्रिया के अंत तक के भविष्य। वर्तमान का प्रयोग इस तरह से भी होता है।