सूत्र १.१.३ में सूत्रकार ने प्रमाण के चार विभाग बताए थे।
प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि। १.१.३
प्रत्यक्ष अनुमान उपमान शब्द प्रमाण है।
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इस पर पूर्वपक्षी का आक्षेप है की इन के उपरांत अन्य प्रमाण भी है जो विभाग में होने चाहिए थे।
न चतुष्ट्वमैतिह्यार्थापत्तिसम्भवाभावप्रामाण्यात्। २.२.१
ऐतिह्य अर्थापत्ति संभव और अभाव भी प्रमाण होने से प्रमाण चार ही नहीं है।
ऐतिह्य : "ऐसा कहा जाता है" करके जो बातें प्रचलन में है पर जिनके बारे में यह नहीं पता की किसने कहा है, ऐसी बातें, जिसे हम जनमानस का ज्ञान कह सकते है उसे ऐतिह्य कहा जाता है।
अर्थापत्ति : एक कही हुई बात से उससे संलग्न न कही बात को जान लेना अर्थापत्ति है।
संभव : एक वस्तु के प्रमाणित होने पर दूसरी वस्तु का होना जब सिद्ध हो जाता है उसे संभव कहते है।
अभाव : किसी कार्य के न होने पर (उसके अभाव से) कोई अन्य बाधक कारण की सत्ता को जानने को अभाव प्रमाण कहते है।
उत्तर :-
शब्द ऐतिह्यानर्थान्तरभावादनुमानेऽर्थापत्तिसम्भवाभावानर्थान्तरभावाच्चाप्रतिषेधः। २.२.२
शब्द में ऐतिह्य का अर्थ और अनुमान में अर्थापत्ति संभव और अभाव के अर्थ आ जाने से प्रतिषेध नहीं बनता।
ऐतिह्य यदि किसी आप्त ने कहा सत्य है (भले ही हमें अब बताने वाले का नाम न पता हो) तब वह शब्द प्रमाण है और यदि असत्य है तो प्रमाण नहीं है। अर्थापत्ति संभव और अभाव अनुमान से भिन्न नहीं है। इसलिए प्रमाणों की संख्या चार जो बताई गई है वह ठीक है।
इस के बाद दूसरे अध्याय के द्वितीय आह्निक में शब्द और पद के ऊपर चर्चा है जिसे छोड कर हम आगे चलेंगे।
इस के बाद दूसरे अध्याय के द्वितीय आह्निक में शब्द और पद के ऊपर चर्चा है जिसे छोड कर हम आगे चलेंगे।