शनिवार, 29 अक्टूबर 2022

प्रमाण सामान्य परीक्षा २.१.८-१५

प्रमाण का सामान्य लक्षण "उपलब्धिसाधनं प्रमाणम्"*, जो सत्य ज्ञान का साधन है वह प्रमाण है किया गया है।

*सूत्रकार ने प्रमाण सामान्य का कोई लक्षण सूत्र नहीं दिया है। भाष्यकार ने प्रमाण के निर्वाचन से ही यह अर्थ निकलता है ऐसा प्रमाणों के विभाग के सूत्र (१.१.३) की चर्चा में कहा था। https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/04/1.1.3.html 

इस पर लगाए गए आरोप, जो शून्यवादी बौद्धों के माने जाते है उन्हें सूत्रकार २.१.८-११ सूत्रों में देते है।

प्रत्यक्षादीनामप्रामाण्यं त्रैकाल्यासिद्धेः। २.१.८
पूर्वं हि प्रमाणसिद्धौ नेन्द्रियार्थसंनिकर्षात्प्रत्यक्षोत्पत्तिः। २.१.९
पश्चात्सिद्धौ न प्रमाणेभ्यः प्रमेयसिद्धिः। २.१.१०
युगपत्सिद्धौ प्रत्यर्थनियतत्वात्क्रमवृत्तित्वाभावो बुद्धीनाम्। २.१.११

यह आरोप हमें विचित्र लग सकते है। कहा यह जा रहा है की प्रत्यक्ष आदि सभी प्रमाण किसी भी काल में अर्थ को सिद्ध नहीं कर सकते। अर्थात् प्रमाण की सत्ता को ही नकारा जा रहा है। पूर्वपक्षी कहता है की साधन-साध्य में क्रम रहता है जबकि प्रमाण प्रमेय के बीच में क्रम नहीं बन सकता। प्रमाण को पहले मानेंगे तो बिना प्रमेय के इन्द्रिय का सन्निकर्ष अर्थ के साथ कैसे होगा? प्रमाण को बाद में मानेंगे तो बिना प्रमाण के प्रमेय में पहले प्रमेयत्व नहीं होगा और एक साथ दोनों हो नहीं सकते क्योंकि मन एक बार में एक ही ज्ञान उत्पन्न कर सकता है।

उत्तर

त्रैकाल्यासिद्धेः प्रतिषेधानुपपत्तिः। २.१.१२
सर्वप्रमाणप्रतिषेधाच्च प्रतिषेधानुपपत्तिः। २.१.१३
तत्प्रामाण्ये वा न सर्वप्रमाणविप्रतिषेधः। २.१.१४
त्रैकाल्याप्रतिषेधश्च शब्दादातोद्यसिद्धिवत्तत्सिद्धेः। २.१.१५
प्रमेया च तुलाप्रामाण्यवत्। २.१.१६

सूत्र १२-१४ में सूत्रकार कहते है,
तुम्हारी त्रिकाल में प्रमाण की असिद्धि के हेतु के हिसाब से तो तुम्हारा प्रतिषेध ही नहीं टिक पाएगा। (तुम जिसका प्रतिषेध कर रहे हो वह प्रतिषेध से प्रथम है , पश्चात है अथवा साथ में है?)
जब तुम प्रमाणों को ही नहीं मान रहे हो तो तुम्हारा प्रतिषेध प्रामाणिक है अथवा अप्रामाणिक? यदि अपने प्रतिषेध में प्रामाण्य मानते हो तो प्रमाण मात्र का प्रतिषेध नहीं होगा।

इस प्रकार पूर्वपक्षी के प्रतिषेध उसके स्वसिद्धांत तथा स्वहेतु से ही पराजित होते है यह दिखाने के पश्चात सूत्रकार यह स्पष्ट करते है की प्रमाण और प्रमेय की उत्पत्ति भिन्न काल में होने पर भी प्रमाण प्रमेय का ज्ञान करा सकता है। जैसे बाद में उत्पन्न हुआ शब्द उस वाद्य का ज्ञान करा सकता है जिसने उसे उत्पन्न किया है। और कोई वस्तु को प्रमाण अथवा प्रमेय ही मान लेना भी ठीक नहीं क्योंकि परिस्थिति के हिसाब से कभी कोई वस्तु प्रमाण बनती है तो फिर कभी वही वस्तु प्रमेय। जैसे तुला अन्य पदार्थों को तोलते समय प्रमाण है पर जब उसकी ही परीक्षा की जा रही है तब प्रमेय।

(प्रमाण शब्द को ज्ञान के बाह्य साधन जैसे तुला, बाट, दिया, प्रकाश के लिए, इंद्रियां, जो भी ज्ञान के साधन है उन के लिए, उत्पन्न हुए ज्ञान के लिए अथवा वस्तु के ज्ञान से उत्पन्न उस वस्तु को प्राप्त करने / छोडने की बुद्धि के लिए भी प्रयोग में लाया जाता है। सूत्रकार ने जो प्रमाण के लक्षण दिए है उससे अंतिम दो अर्थ होंगे पर प्रथम दो अर्थ में भी उनका प्रयोग होता है, जैसे यहां।) 

पिछली post में मैंने कहा था की कुछ प्रश्नों को, जो हमारे लिए उपयोगी न लगे उन्हें छोड दूँगी और ऊपर के प्रश्न उसी प्रकार के है। फिर भी उनका उल्लेख करने के पीछे दो कारण है।
 
१. उत्तर अथवा कहो उत्तर का प्रकार

पूर्वपक्षी के आरोप स्वसिद्धांत और स्वहेतु के ही विपरीत थे ऐसे में उसका उत्तर देते समय उन्होंने जो प्रश्न ही गलत थे उनका उत्तर देना/उनसे स्वयं की रक्षा करना नहीं प्रारंभ कर दिया। पहले उन्होंने पूर्वपक्षी के स्वसिद्धांत विरुद्ध कथन को ही उजागर किया। हमने वाद/निग्रहस्थान के लक्षण देखते समय देखा था की स्वसिद्धांत विरुद्ध कथन यह गलती सबसे अधिक अक्षम्य है। - this emphasis is mine.

जब सामने वाले का प्रश्न ही गलत हो तब यदि हम प्रश्न की व्यर्थता दिखाने के बदले प्रश्न का उत्तर देने लगते है तब हम उसके प्रश्न को योग्य स्वीकार करने के दोषी बनते है और उसकी गलती न पकडने से स्वयं निग्रहस्थान में आएंगे सो अलग।

पूर्वपक्षी के खंडन के उपरांत सूत्रकार ने जवाब भी दिया है, जिसको मैं पूर्वपक्षी को दिया गया जवाब नहीं (क्योंकि हार के पश्चात अब वह प्रतिपक्ष के रूप में है ही नहीं) अपितु शास्त्राध्ययन कर रहे जिज्ञासुओं के लिए है ऐसे देखती हूँ।

२। आरोप की गुणवत्ता

जो कारण सूत्रों को छोडने का हो सकता था वही उनको न छोडने का है। यह दिखाने के लिए की संस्कृत में लिखी गई हर बात सही अथवा उच्च गुणवत्ता वाली नहीं होती। (यहाँ ये पूर्वपक्षी के आरोप है पर अन्य कहीं पूर्वपक्षी के लिखे ग्रंथों में वह सिद्धांत के रूप में भी हो सकते है।) संस्कृत एक भाषा है जो सही गलत, अच्छे बुरे, बुद्धिमान कुतर्की, विद्वान सामान्य हर प्रकार के लोगों ने उपयोग की है। ऐसा तो था नहीं की अच्छे अच्छे बुद्धिमान परोपकारी आप्तजन तो संस्कृत में अपनी बात कहते थे और ज अभी सत्य तक नहीं पहुंचे है अथवा असत्य की और ही चल पडे है आदि कोई अन्य भाषा का प्रयोग करते थे।

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2022

द्वितीय अध्याय प्रथम आह्निक : संशय परीक्षा २.१.१-७

प्रथम अध्याय में हमने प्रथम सूत्र में दर्शाये गए १६ पदार्थों के विभाग तथा लक्षण देखें थे। सूत्रकार अब उन पदार्थों की परीक्षा प्रारंभ करते है। परीक्षा से तात्पर्य है की जो लक्षण कहे गए है वह योग्य है अथवा नहीं, उनमें कोई त्रुटि तो नहीं रह गई यह देखना। इसके लिए सूत्रकार स्वयं प्रश्न उठाकर (ऐसे संशय जो जिज्ञासु को हो सकते है अथवा वह आरोप जो अन्य मत के मानने वाले उनके समय में लगाते हो।) उनका समाधान देंगे।

यहाँ कई प्रश्न सूत्रकार के समय के अन्य प्रचलित मतों की मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए उठाए गए है (खास करके बौद्ध), उनमें से अधिकतर प्रश्न मैं यहाँ सम्मिलित न करूँ यह हो सकता है। यदि हम प्रश्न को ही समझ न पाए/योग्य लगे/जो प्रश्न हमें स्वयं को न हो उसे ले कर हम अध्ययन की जटिलता ही बढाएंगे और ऐसा करने से इस स्तर पर मुझे कोई लाभ प्रतीत नहीं होता। यह भी हो सकता है की लक्षण सूत्र को समझाते समय भाष्यकार ने कुछ प्रश्न प्रथम अध्याय में ही उठा लिए हो, ऐसे प्रश्न जिसके उत्तर हम देख चुके है उनको भी यहां नहीं लेंगे/विस्तार से नहीं लेंगे।

संशय परीक्षा

प्रमाण तक पहुँचने की प्रक्रिया संशय से प्रारंभ होती है। यदि संशय ही न हो तो न उसे निवृत्त करने की इच्छा होगी न प्रमाणों का प्रयोग होगा। तो सर्वप्रथम परीक्षा संशय की की गई है।  

परीक्षा सूत्र को देखने से पहले एक बार हमने प्रथम अध्याय में संशय से संबंध में जो पढा था उसे याद कर लेते है।

प्रथम सूत्र में संशय उन १६ पदार्थों में गिनाया गया है जिनके तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।

प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः। १.१.१

प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अवयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास छल जाति और निग्रहस्थान इन के तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।

संशय के लक्षण का सूत्र हमने इस प्रकार देखा था।
(इस पर पूरी चर्चा यहाँ देखें, https://nyaydarshannotes.blogspot.com/2022/06/1.1.23.html
संक्षेप में,)

समानानेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः। १.१.२३

समान धर्म के ज्ञान से अथवा विशेष धर्म के ज्ञान से अथवा परस्पर विरोधी ज्ञान से अथवा उपलब्धि की अव्यवस्था से अथवा अनुपलब्धि की अव्यवस्था से विशेष ज्ञान की अपेक्षा रखने वाला द्विकोटिक ज्ञान संशय(विमर्श) कहलाता है।

प्रत्येक ऐसी अवस्था में जहां किसी वस्तु का निश्चय न हो रहा हो वहां संशय उभरेगा यह नहीं कह सकते। यदि निश्चय करने की इच्छा भी हो तब संशय उभरेगा। जब वर्तमान ज्ञान से निश्चय नहीं हो पा रहा हो और निश्चय पर पहुंचने की इच्छा हो तब धर्मी (प्रमेय) के विशेष धर्म को जानने की इच्छा होगी जिससे निश्चय हो सके। इस लिए विशेष की अपेक्षा रखने वाला ज्ञान इसको विमर्श का विशेषण बनाया है।

सूत्र में संशय उत्पन्न होने की पाँच अवस्था बतायी है।
१। समानधर्मोंपपत्ति अर्थात् दो भिन्न वस्तुओं के समान धर्मों का किसी वस्तु में दिखना।
२। अनेकधर्मोंपपत्ति अर्थात् अनेक (विशेष) धर्म का दिखना : कोई ऐसा धर्म दिखना जो कहीं और नहीं दिख रहा हो और उस धर्म के आधार पर वस्तु का वर्गीकरण न हो पा रहा हो।
३। विप्रतिपत्ति अर्थात् विरोधी धर्मों का दिखना। एक ही धर्मी के लिए एक साथ सच न हो सके ऐसी विरोधी बातों का सामने आना।
४। उपलब्धि अव्यवस्था : जहां वस्तु मिल रही है पर यह निश्चय नहीं हो पा रहा है की वह वहां होते हुए उपलब्ध हो रही है अथवा न होते हुए। (जैसे रण में पानी है अथवा मृगमरीचिका)
५। अनुपलब्धि अव्यवस्था : जहां वस्तु की उपलब्धि नहीं हो रही है पर यह निश्चय नहीं हो पा रहा है की वह वहां न होते हुए अनुपलब्ध हो रही है अथवा होते हुए। (जैसे भूगर्भजल)

परीक्षा प्रकरण में सूत्रकार पूर्वपक्षी की तरफ से नीचे के प्रश्न उठाते है।

समानानेकधर्माध्यवसायादन्यतरधर्माध्यवसायाद्वा न संशयः। २.१.१
विप्रतिपत्त्यव्यवस्थाध्यवसायाच्च। २.१.२
विप्रतिपत्तौ च सम्प्रतिपत्तेः। २.१.३
अव्यवस्थात्मनि व्यवस्थितत्वाच्चाव्यवस्थायाः। २.१.४
तथात्यन्तसंशयस्तद्धर्मसातत्योपपत्तेः। २.१.५

जिसका उत्तर छठे सूत्र में देते है।
यथोक्ताध्यवसायादेव तद्विशेषापेक्षात्संशयेनासंशयो नात्यन्तसंशयो वा। २.१.६

इन प्रश्नों को संक्षेप में ऐसे समझ सकते है की पूर्वपक्षी यह कह रहा है की संशय के जो पाँच कारण गिनाए गए है वहाँ अलग अलग प्रकार के ज्ञान हो रहे है (समान/विशेष/विरुद्ध धर्म) और ज्ञान का होना संशय उत्पन्न नहीं करता। 

उत्तर : पूर्वपक्षी ने विशेष की अपेक्षा हो तब संशय होता है इस भाग को अनदेखा कर दिया है। ऐसा/इतना ज्ञान होना जिससे किसी वस्तु का निश्चयात्मक ज्ञान न हो मात्र संशय उत्पन्न नहीं करेगा यदि निश्चयात्मक ज्ञान तक पहुँचने की इच्छा ही न हो पर ऐसी इच्छा होने पर ऐसा ज्ञान संशय उत्पन्न करने का कारण बनेगा।

पूर्वपक्षी यह भी कहता है की जो ज्ञान संशय का कारण बना है वह हमेशा बने रहने से संशय भी हमेशा बना रहेगा।

उत्तर : संशय उत्पन्न करने वाले ज्ञान के उपरांत जब संशय का निवारण करने वाले प्रमाण को भी प्रमाता जान लेता है तब संशय का निवारण हो जाता है। जैसे सामने पडी वस्तु में अभी भी वह समान धर्म है जो रज्जु और सांप दोनों में रहते है पर उसके विशेष धर्म से जब निश्चय हो जाता है की वह रज्जु है अथवा सांप तब संशय नहीं बना रहता।

आगे सूत्रकार कहते है, 
यत्र संशयस्तत्रैवमुत्तरोत्तरप्रसङ्गः। २.१.७

जहां संशय उठाया जाए वहाँ इस प्रकार उक्ति प्रत्युक्ति से उसका निराकरण करना चाहिए।

आगे अन्य पदार्थों में उठाए गए संशय का भी पूर्वपक्षी के आरोप सिद्धांती के उत्तर के माध्यम से निराकरण किया जाएगा।

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2022

निग्रहस्थान : विक्षेप मतानुज्ञा पर्यनुयोज्योपेक्षण निरनुयोज्यानुयोग अपसिद्धान्त हेत्वाभास

विक्षेप

कार्यव्यासङ्गात्कथाविच्छेदो विक्षेपः। ५.२.१९

किसी अन्य कार्य के बहाने कथा का भंग करना विक्षेप निग्रहस्थान है।
(बात उत्तर से बचने के लिए ही कही गई हो तभी बहाना कहलाता है।)  


मतानुज्ञा

स्वपक्षे दोषाभ्युपगमात्परपक्षे दोषप्रसङ्गो मतानुज्ञा। ५.२.२०

स्वपक्षमें दोष को मानकर परपक्ष में भी वह दोष है ऐसी आपत्ति करना मतानुज्ञा निग्रहस्थान है।

जब स्वयं के पक्ष में दोष मन लिया तो हार वहीं हो जाति है।


पर्यनुयोज्योपेक्षण

निग्रहस्थानप्राप्तस्यानिग्रहः पर्यनुयोज्योपेक्षणम्। ५.२.२१

प्रतिपक्ष के निग्रहस्थान में आने पर भी उसका निग्रह न करना पर्यनुयोज्योपेक्षण (प्रश्न करने योग्य की उपेक्षा करना)  निग्रहस्थान है।

क्योंकि निग्रहस्थान में आया हुआ पक्ष स्वयं ऐसा नहीं कहेगा की प्रतिपक्षी ने उसको हराने का अवसर जाने दिया, यह निग्रहस्थान तब प्रकाश में आएगा जब सभा में से कोई यह प्रकाशित करेगा। ऐसे में एक पक्ष मूलतः निग्रहस्थान में आने से और दूसरा पक्ष पर्यनुयोज्योपेक्षण निग्रहस्थान में आने से पराजित हो जाएगा।


निरनुयोज्यानुयोग

अनिग्रहस्थाने निग्रहस्थानाभियोगो निरनुयोज्यानुयोगः। ५.२.२२

जहां निग्रहस्थान नहीं हो वहां निग्रहस्थान दिखाना निरनुयोज्यानुयोग निग्रहस्थान है।

पाँचवे अध्याय के प्रथम आह्निक में हम ने जो २४ प्रकार की जातियाँ देखी थी वह सारी इस निग्रहस्थान के अंतर्गत आयेगी।
 
[ऊपर के दो निग्रहस्थान आज के समय के controlled opposition के सिद्धांत के समान है जहां सत्ताधारी पक्ष के "प्रतिपक्ष" वास्तव में controlled opposition होते है। इसमें प्रतिपक्ष जहां निग्रहस्थान हो वहाँ प्रश्न नहीं करके पक्ष को हार से बचाता है और जहां निग्रहस्थान नहीं हो वहां प्रश्न करके उसे जिताने में मदद करता है।

वैसे ऐसा भी हो सकता है की किसी एक को controlled opposition कहना उपयुक्त न हो। यह भी हो सकता है की कब कौन से पक्ष को जिताना है उस पर निर्भर रहे की कौन सा पक्ष कब controlled opposition की भूमिका निभाये। ऐसा तब हो सकता है जब पक्ष प्रतिपक्ष दोनों ही controlled हो और सत्ता किसी और ही के पास हो।]


अपसिद्धान्त

सिद्धान्तमभ्युपेत्यानियमात्कथाप्रसङ्गोऽपसिद्धान्तः। ५.२.२३

सिद्धान्त को स्वीकार करके उसीके नियम को तोडकर कथा में प्रसंग उपस्थित करना अपसिद्धान्त निग्रहस्थान है।

जिस सिद्धांत को स्वीकार करके एक पक्ष चर्चा कर रहा है उसी सिद्धांत के कोई नियम विरुद्ध की बात वो पक्ष करें तो वो अपसिद्धान्त निग्रहस्थान में आता है।

निग्रहस्थानों का प्रयोग वाद में नहीं होता क्योंकि वहाँ हार जीत के उद्देश्य से चर्चा नहीं हो रही होती। इस कारण से यदि गलती हो भी तो उसे दिखाकर उसे सुधारने का अवसर दिया जाता है। परंतु जो सिद्धांत विरुद्ध बात कहे वह वाद में प्रवृत्त नहीं होता। अर्थात् अपसिद्धान्त का प्रसंग वाद में बनेगा ही नहीं और जहां बनेगा उसे वाद नहीं कहेंगे। इस का अर्थ यह होगा की सिद्धांत विरुद्ध कथन से आगे (कथन सिद्धांत विरुद्ध है यह स्पष्ट करने के पश्चात) कोई भी चर्चा अयोग्य है।


हेत्वाभास

हेत्वाभासाश्च यथोक्ताः। ५.२.२४

और हेत्वाभास जो पहले कहे जा चुके है वह भी निग्रहस्थान है।


इस के साथ पाँचवें अध्याय का द्वितीय आह्निक समाप्त होता है।

न्यायदर्शन की यहां समाप्ति होती है परंतु हमने क्योंकि क्रम तोडते हुए प्रथम अध्याय के पश्चात पाँचवां अध्याय ले लिया था, आगे हम २-४ अध्यायों में से हमारे लिए अधिक उपयुक्त अंश देखेंगे।

निग्रहस्थान : अपार्थक अप्राप्तकाल न्यून अधिक पुनरुक्त अननुभाषण अज्ञान अप्रतिभा

अपार्थक

पौर्वापर्यायोगादप्रतिसम्बद्धार्थमपार्थकम्। ५.२.१०

जिस वाक्य समुदाय के पूर्वापर वाक्यों के बीच कोई संबंध न हो, अर्थात वाक्य समुदाय का कोई अर्थ न निकलता हो, ऐसे उच्चारण से अपार्थक निग्रहस्थान बनता है।

(जहां वाक्य ही अर्थ रहित हो वह पूर्व देखा हुआ निरर्थक निग्रहस्थान है, जहां वाक्यसमूह अर्थ रहित हो वह अपार्थक निग्रहस्थान है।)


अप्राप्तकाल

अवयवविपर्यासवचनमप्राप्तकालम्। ५.२.११

अनुमान प्रमाण के अवयवों (प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन) को उलट पुलट क्रम में कहना (उनकी प्राप्ति का क्रम न होते हुए कहना) अप्राप्तकाल निग्रहस्थान है।

चर्चा में वादी प्रतिवादी के बोलने का भी एक क्रम है। वादी को पहले प्रतिज्ञा दे कर उसके लिए हेत्वाभास से मुक्त हेतु देना चाहिए, फिर प्रतिवादी को वादी के हेतु का खंडन करके स्वयं की प्रतिज्ञा और हेतु रखने चाहिए। वादी फिर स्वयं का हेत्वाभास के आरोप से उद्धार कर के प्रतिवादी का खंडन कर सकता है यह प्रक्रिया निर्णय होने तक चलेगी। इस क्रम को तोडते हुए बोलना भी अप्राप्तकाल निग्रहस्थान है।


न्यून

हीनमन्यतमेनाप्यवयवेन न्यूनम्। ५.२.१२

पाँच अवयवों में से किसी का प्रयोग न करने से न्यून निग्रहस्थान बनता है। (वैसे यह formal setting में होगा, informal चर्चा जो वाद रूप में हो रही हो उसमें तीन अवयव से काम चल सकता है।)

अधिक

हेतूदाहरणाधिकमधिकम्। ५.२.१३

एक से अधिक हेतु अथवा उदाहरण देना अधिक निग्रहस्थान है।

चर्चा के प्रारंभ में एक से अधिक हेतु उदाहरण दे सकते है की नहीं उस के लिए नियम बनाकर उसके अनुरूप अधिक निग्रहस्थान की प्राप्ति हो रही है अथवा नहीं यह देख सकते है। यदि एक से अधिक हेतु उदाहरण का निषेध न किया गया हो तो उसको निग्रहस्थान नहीं मानेंगे।


पुनरुक्त
 
शब्दार्थयोः पुनर्वचनं पुनरुक्तमन्यत्रानुवादात्। ५.२.१४

प्रयोजन सहित के पुनःकथन रूप अनुवाद को छोडकर एक ही शब्द को एक ही अर्थ कहने के लिए फिर से कहना पुनरुक्त निग्रहस्थान है।

एक बार कहने से अर्थ समझ में आ जाने पर भी वही अर्थ को पुनः कहने का चर्चा में कोई औचित्य नहीं है। 'शब्द अनित्य है। शब्द अनित्य है।' कहना पुनरुक्त निग्रहस्थान में ले जाएगा (और 'शब्द अनित्य है। ध्वनि विनाश धर्म वाला है।' कहना भी)। परंतु एक ही शब्दों को प्रतिज्ञा और निगमन में दोहराना निग्रहस्थान नहीं बनेगा। क्योंकि वहाँ प्रयोजन भिन्न भिन्न है। प्रतिज्ञा में जहां वह सिद्धांत रखा जा रहा है जिसे सिद्ध करना है, निगमन में वह सिद्धांत है जो सिद्ध किया गया है।

पुनरुक्त निग्रहस्थान का दूसरा प्रकार अगले सूत्र में,

अर्थादापन्नस्य स्वशब्देन पुनर्वचनं पुनरुक्तम्। ५.२.१५

प्राप्त अर्थ को शब्द से पुनः कहना भी पुनरुक्त निग्रहस्थान है।

शब्दों का प्रयोजन अर्थ की प्राप्ति करवाना होता है। चर्चा में जब कोई अर्थ अन्य बातों से स्पष्ट हो ही चुका हो तब उस अर्थ को पुनः शब्दों से कहना भी पुनरुक्त निग्रहस्थान बनेगा।


अननुभाषण

विज्ञातस्य परिषदा त्रिरभिहितस्याप्यप्रत्युच्चारणमननुभाषणम्। ५.२.१६

परिषदने जाना हुआ तीन बार कहे हुए विषय का भी कोई उत्तर न देना अननुभाषण निग्रहस्थान है।

प्रतिवादी ने अपने पक्ष की स्थापना की है जो परिषद को समझ में आई है, उत्तर न मिलने पर प्रतिवादीने अपनी बात तीन बार कही है फिर भी यदि वादी (जो बात को समझ पा रहा है पर) उसका कोई उत्तर देता ही नहीं है तो उसे अननुभाषण कहेंगे। 


अज्ञान

अविज्ञातं चाज्ञानम्। ५.२.१७

और विषय को समझ ही न पाना अज्ञान निग्रहस्थान है।

प्रतिवादी ने अपने पक्ष की स्थापना की है जो परिषद को समझ में आई है, प्रतिवादी ने अपनी बात तीन बार कही है फिर भी यदि वादी बात को समझ ही नहीं पा रहा है तब वह अज्ञान निग्रहस्थान में आयेगा।

अप्रतिभा

उत्तरस्याप्रतिपत्तिरप्रतिभा। ५.२.१८

उत्तर का न सूझना अप्रतिभा निग्रहस्थान है।

प्रतिवादी ने क्या कहा है वह समझने और अपनी समझ ठीक है यह दिखाते हुए प्रतिवादी के पक्ष को दोहराने के बाद (जिसे अनुवाद कहते है। सामने वाले का खंडन करते समय पहले उसके पक्ष को दोहराते है जिससे उसके पक्ष को सही समझे है वह स्पष्ट हो।) उसका कोई उत्तर (खंडन) न सूझने से वादी अप्रतिभा निग्रहस्थान में आ जाता है।

रविवार, 9 अक्टूबर 2022

निग्रहस्थान : प्रतिज्ञाहानि प्रतिज्ञान्तरं प्रतिज्ञाविरोध प्रतिज्ञासंन्यास हेत्वन्तर अर्थान्तर निरर्थक अविज्ञातार्थ

पाँचवें अध्याय के दूसरे आह्निक में अब हम सोलह पदार्थों में से अंतिम निग्रहस्थान देखेंगे। निग्रहस्थान वह स्थान है जहां पराजय होता है (जहां प्रतिपक्ष निग्रहस्थान में पहुँचने वाले पक्ष को अपनी पकड में ले लेता है।)

प्रथम अध्याय में हमने निग्रहस्थान का लक्षण देखा था।

विप्रतिपत्तिरप्रतिपत्तिश्च निग्रहस्थानम्। १.२.१९

(विप्रतिपत्ति) विरुद्धज्ञान से कथन कर देना (अनुचित/गलत/नियम विरुद्ध कथन करना) अथवा (अप्रतिपत्ति) अज्ञानता वश चुप रह जाना (बात को समझ न पाना/ समझा न पाना) निग्रहस्थान है।


निग्रहस्थानों के २२ विभाग है जो प्रथम सूत्र में कहें है।

प्रतिज्ञाहानिः प्रतिज्ञान्तरं प्रतिज्ञाविरोधः प्रतिज्ञासंन्यासो हेत्वन्तरमर्थान्तरं निरर्थकमविज्ञातार्थमपार्थकमप्राप्तकालं न्यूनमधिकं पुनरुक्तमननुभाषणमज्ञानमप्रतिभा विक्षेपो मतानुज्ञा पर्यनुयोज्योपेक्षणं निरनुयोज्यानुयोगोऽपसिद्धान्तो हेत्वाभासाश्च निग्रहस्थानानि। ५.२.१

प्रतिज्ञाहानि प्रतिज्ञान्तरं प्रतिज्ञाविरोध प्रतिज्ञासंन्यास हेत्वन्तर अर्थान्तर निरर्थक अविज्ञातार्थ अपार्थक अप्राप्तकाल  न्यून अधिक पुनरुक्त अननुभाषण अज्ञान अप्रतिभा विक्षेप मतानुज्ञा पर्यनुयोज्योपेक्षण निरनुयोज्यानुयोग अपसिद्धान्त  हेत्वाभास ये निग्रहस्थान है।


नीचे निग्रहस्थानों का अर्थ मात्र दिया है। वर्तमान उदाहरण, जहां मिल सकेंगे वहाँ हम सभी के अर्थ देखने के बाद देखेंगे।

प्रतिज्ञाहानि
प्रतिदृष्टान्तधर्माभ्यनुज्ञा स्वदृष्टान्ते प्रतिज्ञाहानिः। ५.२.२
स्वपक्ष में परपक्ष के (साध्य)धर्म का स्वीकार प्रतिज्ञाहानि नाम का निग्रहस्थान है।

प्रतिज्ञान्तर
प्रतिज्ञातार्थप्रतिषेधे धर्मविकल्पात्तदर्थनिर्देशः प्रतिज्ञान्तरम्। ५.२.३
प्रतिज्ञा के अर्थ के प्रतिषेध के उपरांत खंडित हुई प्रतिज्ञा में कोई विशेषण जोडकर अन्य अर्थ प्रस्तुत करना प्रतिज्ञान्तर निग्रहस्थान है।

प्रतिज्ञाविरोध
प्रतिज्ञाहेत्वोर्विरोधः प्रतिज्ञाविरोधः। ५.२.४
प्रतिज्ञा तथा हेतु का परस्पर विरोध होने से प्रतिज्ञाविरोध निग्रहस्थान बनता है।

प्रतिज्ञासंन्यास
पक्षप्रतिषेधे प्रतिज्ञातार्थापनयनं प्रतिज्ञासंन्यासः। ५.२.५
प्रतिज्ञा के प्रतिषेध के उपरांत खंडित हुई प्रतिज्ञा को छिपाना प्रतिज्ञासंन्यास है।

हेत्वन्तर
अविशेषोक्ते हेतौ प्रतिषिद्धे विशेषमिच्छतो हेत्वन्तरम्। ५.२.६
अविशेष हेतु के खंडित होने पर हेतु में विशेषण देने का प्रयत्न हेत्वन्तर निग्रहस्थान है।

अर्थान्तर
प्रकृतादर्थादप्रतिसम्बद्धार्थमर्थान्तरम्। ५.२.७
प्रकृत अर्थ की उपेक्षा कर के असंबद्ध अर्थ का कथन अर्थान्तर निग्रहस्थान है।

निरर्थक
वर्णक्रमनिर्देशवन्निरर्थकम्। ५.२.८
वर्णक्रम का उच्चारण जैसे कोई अर्थ को लिए हुए नहीं होता ऐसे निरर्थक प्रलाप करना निरर्थक निग्रहस्थान है।

अविज्ञातार्थ
परिषत्प्रतिवादिभ्यां त्रिरभिहितमप्यविज्ञातमविज्ञातार्थम्। ५.२.९
तीन बार बोलने पर भी यदि परिषद अथवा प्रतिवादी क्या कहा है न समझ पाए (उनको समझ या सके ऐसे स्पष्ट, प्रसिद्ध शब्दों में बोलने में तीन प्रयत्न पर भी असफल रहें) तब बोलने वाला अविज्ञातार्थ निग्रहस्थान में आता है। (अपनी बात कहने के लिए अप्रसिद्ध, क्लिष्ट अथवा अस्पष्ट शब्द जो किसी को समझ न आए का उपयोग bug है feature नहीं)