सोमवार, 30 मई 2022

तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः। १.१.२२ (चर्चा भाग ३)



भाग १ में दी गई चर्चा जो भाष्यकार ने प्रस्तुत की है वह मुझे अत्यंत निराशाजनक लगी। माना की मैं अभी एक प्राथमिक विद्यार्थी ही हूँ पर सामने दिखती हुई विसंगतताओं को अनदेखा भी नहीं कर सकती। 

यद्यपि आनंद कहाँ से आएगा इस बात का कोई प्रसंग नहीं था पर फिर भी यह भाष्यकार पर निर्भर है यदि वह सूत्र के आस पास का कोई विषय उठाना चाहे तो। तो मुद्दा चर्चा जहां से और जैसे शुरू की गई वह नहीं है, खास कर के तब जब भाष्यकार दुख की निवृत्ति अवस्था (मोक्ष) में ब्रह्म का आनंद है वह पहले ही कह चुके है। मेरी समस्या नीचे के कारणों से बनी।

चर्चा शुरू करते समय ऐसा भास हो रहा था की भाष्यकार का पक्ष आनंद की सत्ता को स्वीकार कर रहा है पर अंत तक आते आते नीचे के तर्क देना बिलकुल ही ठीक नहीं था। और चर्चा में एक तरह से उन्होंने अपने पक्ष की तो स्थापना ही नहीं की मात्र कल्पित पुर्वपक्षी का खंडन ही किया और ऐसा करते समय स्वयं के पूर्व स्वीकृत सिद्धांत से अंतर भी बना लिया। 
 
१। आनंद हो या न हो उससे कोई अंतर नहीं आता
२। आनंद है तो सही पर यदि आनंद को मानेंगे (मानकर प्रयत्न करेंगे) तो राग होगा और उस के कारण मोक्ष में बाधा आएगी
३। यह तर्क की अपवर्ग के लिए किया गया प्रयत्न इष्ट की प्राप्ति के लिए नहीं पर अनिष्ट की निवृत्ति के लिए है।

१। आनंद हो या न हो उससे कोई अंतर नहीं आता:

यदि यह कथन का तात्पर्य यह है की आनंद की सत्ता तो हम स्वीकारते है पर उससे होने या न होने से फिर भी कोई अंतर नहीं आता,

यहां शास्त्र के १२ प्रमेयों, जिसके तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है उसमें भी जो मुख्य प्रमेय है अपवर्ग उसके विषय में बात हो रही है और कहा यह जा रहा है की उस प्रमेय का अर्थ (जिसको भोगने के लिए ये सारी रामायण हो रही है) सत्तात्मक हो या असत्तात्मक उससे हमें कोई लेना देना नहीं है। प्रमेय के अर्थ की और उपेक्षा का भाव = प्रमेय की और उपेक्षा का भाव।

यदि कथन का तात्पर्य यह है की हम स्वयं ही अनिर्णय की स्थिति में है की वहां आनंद है या नहीं (पर उससे कोई अंतर नहीं आता),

पहले तो यह कथन स्वयं के पूर्व कही गई बात से विरुद्ध जाएगा जहां आनंद की सत्ता स्वीकारी गई है पर यदि उन्हें अपने पक्ष को बदलने का अवसर दिया भी जाए तो इसमें दो आपत्तियाँ आएगी। १) दुःखों से पूर्ण निवृत्ति और सर्वोच्च सुख की एकता को यह स्वीकार नहीं करते (क्योंकि यदि करते तो वह अनिर्णय की स्थिति में नहीं होते) २) ऊपर की तरह उपेक्षा का भाव बनेगा।

२। आनंद है तो सही पर यदि आनंद को मानेंगे (मानकर प्रयत्न करेंगे) तो राग होगा और उस के कारण मोक्ष में बाधा आएगी।

यहां सर्वोच्च प्रमेय के तत्वज्ञान और उससे उत्पन्न ईप्सा को अविद्या और दोष कहा जा रहा है (राग/मोह = दोष जो अविद्या से उत्पन्न होते है) और इतना पर्याप्त न हो ऐसे जिसे अविद्या/दोष कहा जा रहा है उसी की प्राप्ति में बाधा न आए उसकी चिंता की जा रही है।

३। यह तर्क की अपवर्ग के लिए किया गया प्रयत्न इष्ट की प्राप्ति के लिए नहीं पर अनिष्ट की निवृत्ति के लिए है इस में दो आपत्तियाँ है। एक तो की इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट की निवृत्ति इन का साम्य स्वीकार नहीं किया गया और दूसरा यदि मान भी लो की यह दो कोई भिन्न वस्तु है (इस पर हमने भाग २ में चर्चा की थी) और यह भी माने की यदि सुख दुःख घुल मिल गए हो तब एक को छोडना है तो दूसरे को भी छोडना पडेगा (इस पर एक और चर्चा हो सकती है पर अभी नहीं) तब यही तर्क यह भी कहेगा की एक चाहिए तो दूसरा भी स्वीकार करना पडेगा। मनुष्य इन दो में से क्या करता है वह इन की मात्रा पर निर्भर करेगा।

वह मनुष्य जो अपवर्ग से मात्र एक हाथ की दूरी पर है वह तो अनेक सुखों और ज्ञानों से परिपूर्ण होगा। एक ऐसा मनुष्य जो अभ्युदय के चरम पर है, स्थितप्रज्ञ है, द्वंद्वों से परे है, अनेक सिद्धियों का स्वामी है, अत्यंत सुखदायी जन्म, स्वस्थ शरीर, लंबी आयु या कहो इच्छा मृत्यु की सिद्धि, निर्मल आनंदित मन, तेजस्वी बुद्धि और क्या नहीं? इस जगह पर खडा व्यक्ति आगे इससे अधिक आनंद न हो तो क्यों बाकी बचे थोडे से अनिष्ट की निवृत्ति के लिए यह सब छोड देगा?

यदि कहो की ऐसे व्यक्ति को भी जब तक शरीर है तब तक कोई न कोई दुख तो होगा ही और वह उसे भी दूर करना चाहेगा तो वहां तक तो तर्क योग्य है पर यदि कहो की वह बाकी बचे थोडे से दुःख से बचने के लिए वह सर्व सुख छोड देगा तो यह बात नहीं बनती।

यदि किसी के सामने ९९ प्रतिशत दुःख और १ प्रतिशत सुख के मिश्रण को छोडने का विकल्प हो तो वह दुःख से बचने के लिए सुख को भी छोड दे यह तर्क संगत लगता है (संसार में ऐसा प्रयत्न करने का अत्यंत दुःखभरा उदाहरण आत्मघात में दिखता है) पर यदि वह मिश्रण ९९ प्रतिशत सुख और १ प्रतिशत दुःख हो तो?  क्या वह आत्मघात सादृश्य प्रवृत्ति करेगा?
 
और फिर उसकी अपवर्ग तक की यात्रा (अभ्युदय) में क्या देखने मिलता है? जैसे जैसे मनुष्य का अभ्युदय होता है तब वह अपने छोटे छोटे दुःखों से बचने के लिए बडे बडे सुख त्यागता जाता है अथवा यह की उसके सुख में वृद्धि और दुःख में अल्पता आती जाती है? तो अचानक अपवर्ग से एक हाथ की दूरी पर यह परिवर्तन क्यों?

यदि कहो की अपवर्ग के एक हाथ की दूरी पर खडे वह मनुष्य के लिए तो संसार में सब दुःख ही दुःख है (अर्थात् अनिष्ट अल्प नहीं बडा है उसके लिए) तो १) यदि उसको पूछो की क्या वह अपनी स्थिति कोई एक सामान्य सांसारिक मनुष्य (जिसको अनेक दुःख तो है पर अनेक सुख भी है और वह यह नहीं कहता के बस दुःख ही दुःख है) जैसी कर लेना चाहेगा? उसको तो हां कहनी चाहिए क्योंकि १०० प्रतिशत दुःख से तो एक सामान्य सांसारिक मनुष्य की स्थिति अच्छी ही है और कौन जीवात्मा दुःख से कम दुःख की तरफ नहीं जाना चाहेगा? और २) वो सामान्य स्थिति से यहां तक पहुँचा ही क्यों? उसे तो प्रयत्न पहले ही बंध कर देने चाहिए थे। 

यह सब देखकर कोई आश्चर्य नहीं के जो हमने पहले अपवर्ग के बारे में मिथ्याज्ञान पढा था वह प्रचलित हुआ हो। की वहां तो सारा सुख छूट जाएगा, वह कोई भयंकर स्थिति है वगैरह।

रविवार, 29 मई 2022

तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः। १.१.२२ (चर्चा भाग २)


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अपवर्ग = सुख की प्राप्ति अथवा दुःखों से अत्यंत निवृत्ति इस विषय को समझने का मेरा प्रयत्न। 
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सूत्र का अर्थ और भाष्यकार का कथन इस प्रकार था।    

तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः।  १.१.२२
उस दुःख से अत्यंत छूट जाना मोक्ष है।

भाष्यकार इसको खोलते हुए कहते है की वर्तमान जन्म (शरीर) के छूटने पर नया जन्म न ग्रहण करने से जन्म के साथ नित्य संबंध रखने वाले और उससे विभक्त हो कर न रहने वाले दुःखों से आत्मा को सम्पूर्ण, अत्यंत छुटकारा मिल जाता है।

भाष्यकार आगे बताते है की मोक्ष (अपवर्ग) की अवस्था में आत्मा अभय (भय रहित), अजर (व्याधि रहित), मृत्यु रहित स्थान में परमात्मा के अनंत आनंद को अबाधित रूप से भोगता है।

सूत्रकार ने अपवर्ग को दुःखों से अत्यन्त निवृत्ति कहा है जब की अनेक मत (अथवा कम से कम ऊपर की चर्चा के पूर्वपक्षी और भाष्यकार स्वयं का मत) अपवर्ग में आत्मा की परम सुख की प्राप्ति को मानते है। इस समय यदि हो सकता है तो यह प्रश्न हो सकता है की सूत्रकार ने मोक्ष को व्याख्यायित करते समय उसे दुःखों से आत्यंतिक निवृत्ति क्यों कहा अत्यंत सुख की प्राप्ति क्यों नहीं? (जब सुख सिद्ध हो जाएगा बाद चाहे तो वह कहाँ से आता है वह प्रश्न आ सकता है।)
 
प्रथम तो हम दुःख और सुख को समझने का एक उदाहरण द्वारा प्रयास करते है।

मान लो एक व्यक्ति को काम पर जाना है पर यात्रा लिए कोई साधन नहीं है। अब वहां एक बस शुरू हुई जिससे वह यात्रा कर सकता है। उसने काम पर जाना शुरू किया जिससे उसकी परिस्थिति पहले से कुछ कम कष्टप्रद हुई। यहां हम कह सकते है की उसके दुःख कम हुए अथवा तो कुछ सुख प्राप्त हुआ।

वह एक मात्र बस जो आगे से भरी हुई आती है उसमें खूब भीड रहती है और उसमें यह व्यक्ति जैसे तैसे चढ जाता है (जो उसके लिए सुख है)। थोडी देर में उसकी दृष्टि बस के आगे वाले भाग तक पहुँचती है जहां पीछे की तुलना में थोडी कम प्रतिकूलता से खडा रहा जा सकता है। व्यक्ति प्रयत्न पूर्वक आगे पहुंचता है। पहले की अपेक्षा में वह कुछ और सुखी अथवा कम दुःखी कहा जा सकता है। ऐसे ही आगे खडे रहने की अपेक्षा तीन की seat में पांच लोग बैठते हो उसमें एक स्थान, स्वतंत्र पूरी seat, खिडकी वाली, धूप न हो, पैर फैलाने के लिए अच्छी जगह हो, बस के मध्य में जहां रोड के खड्डों से कम तकलीफ हो से लेकर बस के बदले और सुविधाजनक गाडी, हवाई यान और उसमें भी  business class, private jet या फिर स्वयं के स्वामित्व वाला  worm hole भी यदि संभव हो तो उसकी भी कल्पना कर सकते है।

ऊपर की प्रत्येक दो स्थिति के बीच के अंतर को हम प्राप्त किया गया सुख अथवा छोडा हुआ दुःख कह सकते है। किसी को यह लग सकता है यह बात बहुत दुःखी और सामान्य व्यक्ति के लिए तो ठीक है पर जो पहले से ही सुखी है उसके लिए तो दुःख की निवृत्ति का कोई अर्थ नहीं है हां अधिक सुख का अर्थ हो सकता है। पर यदि हम ध्यान से सोचे तो जब हम यह कहते है की 'जो सुखी है' वहां हमारी बुद्धि में यही है की वह जो कोई अपर्याप्तता अनुभव न कर रहा हो। पर यदि कोई अपने सुख से अधिक सुख की सत्ता को जान ले तो फिर उसे स्वयं के सुख की अपूर्णता का ज्ञान (दुख के होने का ज्ञान) हो जाएगा और यदि नहीं तो उसके लिए अन्य वस्तु अधिक सुख वाली है यह नहीं कह सकते।

इस को इस शास्त्र में ही अब तक आए हुए सूत्रों के द्वारा ऐसे समझ सकते है की इच्छा आत्मा का स्वाभाविक गुण है और सुख/सुख के साधन सामने आते ही वह उद्भूत होगा। इच्छा उद्भूत हो जाने पर यदि वह सुख/सुख के साधन की प्राप्ति में कोई बाधा रहती है तो उसी को दुःख कहते है। यहां तात्पर्य यह नहीं है की उसका सुख पहले से कम होगा, तात्पर्य मात्र यह है की उसके portfolio में अब वर्तमान सुख + नया तत्वज्ञान(+) + अपूर्ण इच्छा(-) है जिसका valuation पहले (वर्तमान सुख + अविद्या(-)) से अधिक होते हुए भी उसको हम दुःख मुक्त नहीं कह सकते। दूसरे शब्दों में कहे तो जब तक हम सर्वोच्च सुख को प्राप्त नहीं करते तब तक हम दुःख तो भोग रहे ही है भले ही हमारे ज्ञान का स्तर वह हो की हम उस दुःख को देख पाए अथवा नहीं। 

अधिक सुख का अर्थ बिना साध्य के अधिक साधन (साधन लगने वाली वस्तु मात्र) नहीं है। मान लो किसी को भूख लगी है और पेट भर भोजन के लिए उसे ५० रुपए की आवश्यकता है जो उसके पास है और वह सुखी है। अब यदि उसको पता चले की १०० रुपये में उतना ही भोजन पर सर्वश्रेष्ठ सामग्री से बना हुआ मिलता है तब और ५० रुपये का होना उसके लिए सुख का कारण और न होना दुःख का कारण बनेंगे पर उसके बाद अधिक पैसे उसके सुख का कारण नहीं बनेंगे न ही उनका न होना दुःख का कारण। यहां १०० रुपये पर उसे सर्वोच्च सुख मिलता है यह भी कह सकते है और उसके दुःखों की अत्यंत निवृत्ति हुई यह भी कह सकते है।

यही कारण है की निःश्रेयस से पहले अभ्युदय आता है। मनुष्य सुखी होता जाता है, होता जाता है (अभ्युदय) और अंत में सर्व दुःखों से मुक्त हो जाता है (मोक्ष)।

अर्थात् सर्वोच्च सुख और दुःख की अत्यन्त निवृत्ति समानार्थी है। और जब यह दोनों समानार्थी है तो सूत्रकार इन दो में से किसी का भी प्रयोग कर सकते है।
 
पर फिर भी क्या दुःखों की अत्यंत निवृत्ति पसंद करने के पीछे कोई कारण हो सकता है?

कोई भी उपदेश की उपयोगिता शब्द प्रमाण बनने तक है। वह हमें अनुमान में, उह करते समय और प्रत्यक्ष के लिए प्रयत्न करते समय भी अत्यंत उपयोगी बन सकता है पर अंत में वह रहेगा तो शब्द प्रमाण ही। प्रत्यक्ष तो व्यक्ति को स्वयं ही करना पडेगा।

शास्त्रों को हम कोई virtual reality जो हमें सीधा सीधा सुख/सत्य का अनुभव करवायेंगे ऐसा न मानते हुए उन्हें दिशा निर्देश, सुख/सत्य तक पहुंचने का मानचित्र मान के चलें तभी उनसे लाभान्वित हो पाएंगे।

अब इस दृष्टि से सूत्रकार यदि हमें ऐसा मानचित्र देना चाहते है जिससे उसका उपयोग करते समय हमारे भटकने की संभावना कम से कम हो तो क्या अपवर्ग को सर्वाधिक सुख कहो अथवा दुःखों से अत्यंत निवृत्ति इस से अंतर आएगा?

हमारे ऊपर वाले उदाहरण पर लौटते है। जहां व्यक्ति को सर्वोच्च सुख प्राप्त करने के लिए १०० रुपए चाहिए। अब हमें उसे उपदेश देना है की कैसे पता करे की पैसे क्यों कमाये जाए, कैसे कमाए जाए और पैसे कमाए जा चुके है उसका लक्षण क्या है? लक्ष्यप्राप्ति का लक्षण बताने के लिए क्या नीचे के दोनों वाक्य समान उपयोगी होंगे?

१) जब तुम्हारी लक्ष्य प्राप्ति होगी तब तुम्हारे पास अत्यंत पैसे होंगे अथवा कहो तब तुम्हारे पास १०० रुपये होंगे। (पैसा होना = सुख)

२) जब तुम्हारी लक्ष्य प्राप्ति होगी तब तुम्हारे पास पैसों की थोडी भी कमी नहीं होगी (पैसों की कमी = दुःख) 

उपदेश ग्राहक जिसके पास अभी ५० रुपये है और वह स्वयं को सुखी देखता है वह इन उपदेशों को सुनकर उस पर चलता है। 

परिस्थिति क :
उसको अधिक गुणवत्ता के भोजन के बारे में ज्ञान हुआ और उसे पाने की इच्छा भी पर अभी उसके पास मात्र ५० रुपये है। अर्थात् अब वह स्वयं की वर्तमान परिस्थिति में दुःख देख रहा है।

जीव मात्र को जब कोई भी दुःख होता है तब वह उसको दूर करने का प्रयत्न करता ही है उसके लिए उसे किसी उपदेश की आवश्यकता नहीं है। अब वह ५० रुपये प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करेगा। यहां उसकी ५० रुपए और प्राप्त करने की इच्छा तत्वज्ञान पूर्वक की इच्छा है और उसके लिए किया गया प्रयत्न सुख का/दुःख को दूर करने का कारण बनेगा।

यदि उपदेश को भी देखें तो उसके दोनों रूपों में वह अभी लक्ष्य प्राप्ति नहीं हुई है ऐसा समझकर पैसा कमाने के लिए प्रयत्न करेगा और अपने दुःख को दूर कर लेगा/सुख को पा लेगा। (वैसे तो उपदेश २ में ही उसे ठीक से पता है की वो पैसा कमाने के प्रयत्न क्यों कर रहा है तो उसी को तत्वज्ञान कहेंगे)

परिस्थिति ख :

वह सुखी है। अर्थात् उसको अधिक गुणवत्ता के भोजन के बारे में ज्ञान नहीं है और न ही पाने की इच्छा (जब तक ज्ञान नहीं होगा तो इच्छा भी नहीं होगी)

उपदेश के प्रथम रूप में वह और पैसे कमाने का प्रयत्न करेगा और वह मात्र व्यर्थ की मेहनत करके अपना सुख बढाने के बदले कम ही करेगा। क्योंकि वो अब ५० रुपये को गुणवत्ता रूपी लक्ष्य को प्राप्त करने के साधन के रूप में नहीं अपितु उसी को लक्ष्य मान कर मेहनत कर रहा है। साध्य के ज्ञान के अभाव में वह मेहनत व्यर्थ जाएगी और उसका सुख जब उसके पास ५० रुपये थे तब था उससे भी कम हो जाएगा।

यहां पैसे की कामना और उसके लिए प्रयत्न राग/मोह (जिस को उत्पन्न करने में उपदेश कारण है) जनित है और दुःख का कारण।

उपदेश के दूसरे रूप में वह सोचेगा की उस की लक्ष्य प्राप्ति हो गई है और वह अपना जितना सुख है उसकी हानि किए बिना उसको भोगेगा। अभी वो सर्वोच्च सुख से वंचित है पर उसका कारण उसकी अविद्या है (अधिक गुणवत्ता युक्त भोजन के अस्तित्व के प्रति), लक्ष्यप्राप्ति का लक्षण नहीं।

परिस्थिति ग :
वह सुखी है। उसने प्रयत्न करके १०० रुपये कमा लिए है और सर्वोत्तम गुणवत्ता युक्त भरपेट भोजन प्राप्त कर लिया है। 

हमारे उदाहरण में तो वह यहां भी और पैसे कमाने के प्रयत्न के पीछे अपनी हानि कर सकता है पर मोक्ष वाले उदाहरण में जब उसने लक्ष्य प्राप्ति कर ली है तब उसे कोई शब्द प्रमाण की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उसने स्वयं ने प्रत्यक्ष कर लिया है। न ही अब कोई हानि की संभावना है। 

दूसरे उपदेश रूप में उसकी हानि की संभावना नहीं है और इस कारण से सर्वोच्च सुख और दुःखों से अत्यंत निवृत्ति तत्वतः समानार्थी होने पर भी जिसको अभी पूरा तत्वज्ञान नहीं हुआ है उसके लिए दुःखों से अत्यंत निवृत्ति अधिक उपयोगी मानचित्र बन सकता है और वही सूत्रकार ने प्रयोग किया है।


शनिवार, 28 मई 2022

तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः। १.१.२२ (चर्चा भाग १)

सूत्र २२ के भाष्य में अपवर्ग के अनुसंधान में एक मुद्दा उठाया गया है और उसकी विस्तृत चर्चा (प्रतिपक्षी की कल्पना करके) की गई है। पहले नीचे वह चर्चा प्रस्तुत की है पर उसके बाद में मेरे कुछ अपने विचार रखे है।

सूत्र २२ और उसका अर्थ इस प्रकार था। 

तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः। १.१.२२
उस  दुःख से अत्यंत छूट जाना मोक्ष है।

भाष्यकार इसको खोलते हुए कहते है की वर्तमान जन्म (शरीर) के छूटने पर नया जन्म न ग्रहण करने से जन्म के साथ नित्य संबंध रखने वाले और उससे विभक्त हो कर न रहने वाले दुःखों से आत्मा को सम्पूर्ण, अत्यंत छुटकारा मिल जाता है।

भाष्यकार आगे बताते है की मोक्ष (अपवर्ग) की अवस्था में आत्मा अभय (भय रहित), अजर (व्याधि रहित), मृत्यु रहित स्थान में परमात्मा के अनंत आनंद को अबाधित रूप से भोगता है।

भाष्यकार द्वारा प्रस्तुत चर्चा :

कुछ लोग ऐसा मानते है की मोक्ष मिलने पर जो आनंद आत्मा भोगता है वह उसका अपना है अर्थात् आत्मा का स्वाभाविक आनंद है जो उसका अपना ही गुण होने पर भी संसार में रहते हुए प्रकट नहीं हो रहा था (आत्मा को अपने अंदर के आनंद का ज्ञान नहीं हो पा रहा था) और अब बंधनों के हट जाने पर प्रकट हो गया। (जब की सिद्धांत पक्ष में आत्मा की आनंद भोग करने की शक्ति अपनी स्वाभाविक है पर अपवर्ग में मिलने वाला आनंद परमात्मा का है।)

इसका खंडन करते हुए भाष्यकार कहते है की पूर्वपक्षी के इस मत में प्रत्यक्ष अनुमान अथवा शब्द कोई भी प्रमाण न होने से यह मत सर्वथा अप्रामाणिक है।
 
यद्यपि प्रमाण के अभाव से उपरोक्त मत का खंडन हो ही जाता है पर फिर भी भाष्यकार उस मत के पक्षधर कल्पित पूर्वपक्षी की और से स्वयं ही कुछ तर्क दे कर उनका भी खंडन प्रस्तुत करते है।

मान लो की आनंद आत्मा का अपना स्वभाव है और मोक्ष में वही आनंद प्रकट हो जाता है तो उस प्रकटीकरण का कारण क्या है?
यदि कहो की कारण नित्य है (अर्थात् कोई कारण नहीं है, आनंद नित्य प्रगट ही रहता है) तो मोक्ष और बद्धावस्था में कोई अंतर नहीं रह जाएगा क्योंकि दोनों ही अवस्थाओं में जीवात्मा वह आनंद से परिपूर्ण रहेगा। धर्म अधर्म से उत्पन्न सुख दुःख के साथ साथ जीवात्मा का अपना स्वाभाविक आनंद भी रहेगा। 

यदि कहो की ऐसा मानने में क्या हानि है तो वह प्रत्यक्ष से विपरीत जाता है क्योंकि मनुष्य अधर्म से उत्पन्न दुःख भोगते समय आनंद का अनुभव नहीं करता। और फिर अपवर्ग अवस्था का आनंद इतना अधिक और प्रबल है की यदि उसका सांसारिक सुख दुःख के साथ मिश्रण माने तो सांसारिक सुख दुःख का अस्तित्व नगण्य ही रह जाएगा और ऐसे में न धर्म अधर्म के फल का कोई अर्थ रहेगा न ही बद्धावस्था और मुक्तावस्था में कोई अंतर। 

उपरोक्त तर्क से बाधित होकर यदि पूर्वपक्षी कहता है की मोक्ष अवस्था में आनंद के प्रकटीकरण का कोई अनित्य कारण है तो उसको वह कारण बताना चाहिए और क्योंकि वह कारण अनित्य है अर्थात् उत्पन्न हुआ हो ऐसा है तो उसके उत्पन्न होने का कारण भी बताना चाहिए। मान लो की उसने कोई कारण जैसे योगसमाधि से उत्पन्न धर्म को आत्मा के स्वाभाविक आनंद के प्राकट्य का कारण बताया (वो जो भी कारण बताएगा वह आत्मा के बद्धावस्था के समय उत्पन्न हुआ होगा) तो वह कारण कार्यजगत के रहते उत्पन्न हुआ है और उसके प्रलय पर वह कारण (जैसे योगसमाधि से उत्पन्न धर्म) भी समाप्त हो जाएगा और आत्मा का आनंद भी। मोक्ष में भी आनंद का अभाव होने से संदेह उत्पन्न होगा की वह अभाव आनंद जिसका अस्तित्व है उसकी अप्राप्ति के कारण है अथवा आनंद का अस्तित्व ही नहीं है?जब सुख का बोध न हो रहा हो फिर भी सुख है ऐसा मानने के लिए कोई प्रमाण नहीं है।

यदि ये कहा जाए की योगसमाधि से उत्पन्न धर्म का नाश नहीं होता तो वह भी अप्रामाणिक है क्यों की जो भी उत्पन्न होता है उसका नाश होता ही है।

कोई नित्य अथवा अनित्य कारण है जिससे आत्मा के आनंद का मोक्ष में प्रकटीकरण होता है इस तर्क के न चल पाने पर पूर्वपक्षी यदि यह कहता है की बद्धकाल में आत्मा का आनंद बाधक कारण से अप्रकट रहता है जैसे शरीर के होने पर तो यह भी तर्क भी युक्ति वाला नहीं है की शरीर जिसका कार्य भोग की उपलब्धि करवाना है वही भोग की उपलब्धि में बाधक बनेगा और वह भी सर्वश्रेष्ठ आनंद के भोग की। भोग के साधन ही भोग को रोक दे ऐसा मानने में कोई अनुमान प्रमाण भी नहीं है। आत्मा को जब उसके पास शरीर नहीं होता (जैसे मृत्यु और जन्म के बीच में (संसार के रहते हुए अथवा प्रलयावस्था में)) तब कोई भी भोग (अनुभूति / ज्ञान / उपलब्धि) प्राप्त होता हो उस विषय में प्रमाण का अभाव है और शरीर आदि भोग के साधन न रहने पर भोग नहीं हो सकता यह अनुमान हो सकता है।

अब यदि पूर्वपक्षी यह कहता है की आत्मा शरीर के बिना आनंद भोग कर सकता है और करता है उसमें शास्त्र के वह सारे वचन को प्रमाण रूप ले सकते है जिसमें मोक्ष के लिए प्रयत्न करने का उपदेश है। अर्थात् मोक्ष इष्ट (प्राप्त करने योग्य) वस्तु है जो आनंद देगी तभी तो मनुष्य उसके लिए प्रयत्न करेगा।   

तो यह तर्क भी योग्य नहीं है क्योंकि मनुष्य मात्र इष्ट को प्राप्त करने के लिए नहीं अनिष्ट को छोडने के लिए भी प्रयत्न करता ही है और जन्म के रहते दुःखों से निवृत्ति नहीं हो सकती क्योंकि जो सुख भी है इस संसार में वह दुःख से ऐसे घुल मिल गए है की उनको अलग अलग कर के सुख सुख को ले लेना और दुःख दुःख तो त्याग देना संभव नहीं है। दुःख को यदि छोडना है तो साथ में सांसारिक समस्त सुखों को भी छोडना ही पडेगा। इसी लिए जन्म के चक्र से छूटने का उपदेश है और प्रयत्न भी होना चाहिए। दुःख से छूट जाने के लिए सुख शब्द का व्यवहार भी होता है।  

पूर्वपक्षी का मत यदि यह है की संसार के अनित्य सुख को मोक्ष के नित्य सुख की प्राप्ति के लिए छोडना चाहिए तो मनुष्य उसी तर्क से संसार के अनित्य शरीर और इन्द्रिय के बदले नित्य शरीर और इंद्रियाँ प्राप्त करने की भी इच्छा रख सकता है और उसी को मोक्ष कह सकता है। (जब की पूर्वपक्षी भी नित्य शरीर इंद्रियाँ के पक्ष में नहीं है।) पूर्वपक्षी कहें की नित्य शरीर इन्द्रिय की बात कोई युक्ति पूर्वक की नहीं है तो फिर उसी तरह नित्य सुख की बात भी युक्ति वाली नहीं है। 

आगे यह कहा गया की यदि नित्य सुख के राग में कोई मोक्ष के लिए प्रयत्न करें तो वह सफल नहीं होगा क्योंकि राग तो बंधन का कारण है और यह कहो की मोक्ष मार्ग में आगे जाता हुआ मनुष्य अपने राग क्षीण कर लेगा तो फिर उसको नित्य आनंद है या नहीं उससे कोई अंतर नहीं होगा (क्योंकि उसने उससे अपना राग हटा लिया है।) जो बात दोनों पक्ष को स्वीकार्य होगी।

भाष्यकार ने स्वयं अपवर्ग अभय अजर अमृत्युपद और ब्रह्मक्षेम (ब्रह्मानन्द) से युक्त अवस्था है यह कहा है तो वहां आनंद न होने का पक्ष वे नहीं ले रहे है। सूत्रकार ने दुःखों से मुक्ति की ही बात रखी है उसका तात्पर्य यह है की समस्त दुःखों अर्थात् जन्म चक्र के अंत के बिना उस आनंद की प्राप्ति नहीं हो सकती और सारें प्रयत्न भी उसी के लिए करने है उसके बाद ब्रह्म का आनंद तो बिना प्रयत्न के ही मिलेगा तो उसके लिए कोई उपदेश की भी आवश्यकता नहीं है।


गुरुवार, 26 मई 2022

प्रवृत्तिदोषजनितोऽर्थः फलम्। १.१.२० बाधनालक्षणं दुःखम्। १.१.२१ तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः। १.१.२२

प्रवृत्तिदोषजनितोऽर्थः फलम्। १.१.२०

प्रवृत्ति और दोष से उत्पन्न अर्थ (=भोग = सुख दुःख) फल है।

दोष और प्रवृत्ति अर्थात् जो धर्म अधर्म हम मन वाणी तथा शरीर से करते है उनसे जो सुख दुःख की प्राप्ति हमें होती है वह उनके फल है। और क्योंकि उन सुख दुःख की उत्पत्ति के लिए उनके साधन (देह इन्द्रिय अर्थ मन आदि) भी आवश्यक है, उन साधनों की प्राप्ति भी फल है।

यहां यह प्रश्न हो सकता है की दोष प्रवृत्ति का कारण है तो फिर यहां फिर से उसे क्यों कहा गया। उसका समाधान एक तो यह है की दोष रहित क्रिया को धर्म अधर्म रूपी कर्म उत्पन्न करने वाली प्रवृत्ति न समझनी चाहिए यह पुनः स्पष्ट करने के लिए कहा गया परन्तु पुनः कथन वाला तर्क आवश्यक नहीं है क्योंकि प्रवृत्ति से जो फल मिलते है उनको आत्मा तब ही भोगता है जब वह दोष जिनके कारण से धर्म अधर्म किया था वह अब भी हो। अर्थात् फल के लिए स्वतंत्र रूप से भी दोष की आवश्यकता है। 

अर्थात् दोष रहने पर मनुष्य धर्म अधर्म करेगा। अब जब धर्म अधर्म का फल मिलने का समय आएगा तब वही दोष सुख दुःख भोगने में भी कारणरूप बनेंगे। यदि इस बीच में उसने तत्वज्ञान पा कर दोषों को हटा लिया है तो कर्म फल सामने आने पर भी आत्मा उसका भोग नहीं करेगा अर्थात् सुख दुःख नहीं भोगेगा।    


बाधनालक्षणं दुःखम्। १.१.२१

बाधा स्वरूप वाला (जो प्रतिकूल है, जो पीडा, ताप देता है) वह दुःख है।
  
भाष्यकार कहते है की सुखदुःख के अनुभव रूपी तथा शरीर इन्द्रिय आदि साधनों रूपी जो फल है वही दुःख है। यहां समस्त फल को (जिसको हम सुख रूपी समझते है उसको भी) दुःख ही कहा क्योंकि कोई भी सुख दुःख से अलिप्त नहीं है और बडे से बडे सुख रूपी फल को भोगने के लिए भी शरीर आवश्यक है और शरीर के रहते दुःखों से (बाधनाओं से, पीडा से) अत्यंत निवृत्ति संभव नहीं है।

अर्थात् समस्त फल, जब वह सुख रूपी हो तब भी बाधनाओं से बिंधा हुआ, उससे सना हुआ ही होता है और उस फल को भोगने के लिए आवश्यक जन्म भी दुःख ही है।    


तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः।  १.१.२२

उस दुःख से अत्यंत छूट जाना मोक्ष है। 

भाष्यकार इसको खोलते हुए कहते है की वर्तमान जन्म (शरीर) के छूटने पर नया जन्म न ग्रहण करने से जन्म के साथ नित्य संबंध रखने वाले और उससे विभक्त हो कर न रहने वाले दुःखों से आत्मा को सम्पूर्ण, अत्यंत छुटकारा मिल जाता है।

भाष्यकार आगे कहते है की मोक्ष (अपवर्ग) की अवस्था में आत्मा अभय (भय रहित), अजर (व्याधि रहित), मृत्यु रहित स्थान में परमात्मा के अनंत आनंद को अबाधित रूप से भोगता है।

रविवार, 22 मई 2022

पुनरुत्पत्तिः प्रेत्यभावः । १.१.१९

पुनरुत्पत्तिः प्रेत्यभावः । १.१.१९ 

पुनः (फिर) पैदा होना प्रेत्यभाव है।

प्रेत्यभाव शब्द स्वयं ही यह अर्थ स्पष्ट करता है।
प्रेत्य = प्रकर्ष रूप से जाकर (जो मर गया है अब वापस उसी शरीर में नहीं आएगा), भाव = होना। अर्थात् मर कर फिर से होना। 

आत्मा शरीर मन इंद्रियाँ इन सब का बंधना (संयोग होना) जन्म है। जब आत्मा शरीर छोडकर जाता है तब मन, इंद्रियाँ* और पंचप्राण उसके साथ जाते है और नया शरीर मिलने पर इनकी निकाई (समूह) फिर बनता है। हम अनेक योनि के और एक एक योनि में भी अनेक शरीर को प्राप्त कर के छोड चुके है (और पीछे के शरीरों से अब हमारा कोई लगाव नहीं) और आगे भी ऐसा ही होगा।

* यहां तात्पर्य सूक्ष्म इंद्रियों से है, स्थूल इंद्रियां अर्थात् इंद्रियों के गोलक शरीर का भाग है और शरीर के साथ ही नष्ट हो जाती है।
   
फिर पैदा (उत्पन्न) होने का अर्थ एक दूसरे से सम्बद्ध तत्वों की निकाई का उत्पन्न होना है आत्मा का फिर उत्पन्न होना नहीं। क्योंकि आत्मा न तो उत्पन्न होता है न ही नष्ट होता है।

यह जन्म मरण जन्म का चक्र अनादि काल से चला आ रहा है और अपवर्ग (मोक्ष) पर तुटेगा।

यहां प्रश्न हो सकता है की यदि कोई वस्तु अनादि है तो वह अनंत ही होगी। अथवा सांत है तो उसका आदि भी होगा। अनादि और सांत तो हो नहीं सकती। यह तर्क सर्वथा उचित है और यहां तात्पर्य यह है की वह प्रवाह से अनादि है और प्रवाह से अनंत भी।

मोक्ष एक बहुत ही लंबे काल तक यह चक्र का रुकना है और यह काल इतना लंबा है की मोक्ष मिलने पर यह कहना की अब यह चक्र रुक गया है गलत नहीं होगा। पर वह हमारी बुद्धि की पकड में न आए उतने लंबे काल बाद ही सही वह चक्र फिर से शुरू होगा। अर्थात् अभी हम जिस चक्र में है वह भी पीछे कभी मोक्ष से वापस आने पर शुरू हुआ होगा जो १०, १००, १०,००,००० या उससे भी अधिक कितने भी जन्म पहले हो सकता है। और उस मोक्ष के पहले भी अनंत ऐसे चक्र थे।

इसका कोई आदि न होने से यह अनादि है। और आगे भी ऐसे अनंत चक्र होंगे (अर्थात् यह प्रवाह से अनंत भी है) पर वर्तमान चक्र का एक लंबे समय तक रुकना मोक्ष में होगा जो हमारा वर्तमान लक्ष्य है जिस आधार पर ये कहा है की यह चक्र मोक्ष में रुकेगा।

शनिवार, 21 मई 2022

युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिंगम्। १.१.१६, १.१.१७ -१८

आगे सूत्रकार मन का लक्षण बताते है। यद्यपि सूत्रकार ने मन का एक लक्षण बताया है भाष्यकार ने मन के कुछ लक्षण और बताये है जैसे की,

स्मृति : जहाँ ज्ञान उभरता है पर बाह्य इन्द्रिय से कोई काम नहीं हो रहा है।

अनुमान : यहाँ लिंग का प्रत्यक्ष हो रहा है पर स्मृति और उस स्मृति को लिंग के प्रत्यक्ष से जोडकर नये ज्ञान की प्राप्ति होने में भी कोई बाह्य करण काम नहीं कर रहा है। यह भी अंतःकरण का लक्षण है।

शब्दप्रमाण : शब्दप्रमाण में भी किसी के कहे शब्दों को उन शब्दों के पहले से जाने हुए अर्थों को उभारकर, उनके साथ जोडकर नए ज्ञान की उत्पत्ति करना मन का लक्षण है।

संशय : जब कोई ऐसे सामान्य ज्ञान होने पर जो निर्णय पर पहुंचने के लिए अपर्याप्त हो, विशेष की अपेक्षा से अनिर्णय की स्थिति उत्पन्न करना अर्थात् संशय उत्पन्न करना भी मन का लक्षण है। 

ऐसे ही प्रतिभा (अचानक कोई ज्ञान का अंदर से उभर आना), स्वप्न, उह (तर्क), संकल्प आदि में भी बाह्य इन्द्रिय का कोई व्यापार (उपयोग) नहीं है और वह भी मन के लक्षण है। 

ऐसे ही सुख दुख का प्रत्यक्ष और इच्छा आदि भी मन के बिना संभव नहीं है। यहाँ प्रश्न हो सकता है की सुख दुःख (को अनुभव करने का सामर्थ्य) और इच्छा द्वेष प्रयत्न तो सूत्रकार ने आत्मा के लक्षण बताये थे। इसका समाधान यह है की इन के लिए आत्मा और मन दोनों ही आवश्यक है तो इन्हें देखकर दोनों का अनुमान हो सकता है। पर दोनों के कार्य में अंतर है।

सुख दुःख मन में उत्पन्न होते है और आत्मा उसको अनुभव करता है (इस लिए सुख दुःख आत्मा के गुण नहीं है पर सुख दुःख को अनुभव करने का सामर्थ्य आत्मा का गुण है) जब की इच्छा द्वेष जो आत्मा के गुण है वह आत्मा में सदा रहते है और निमित्त पा कर उद्भूत (प्रकट) होते है। यहाँ मन निमित्त को आत्मा तक पहुंचाने और इच्छा द्वेष के प्रकटीकरण का साधन बनता है।  

भाष्यकार के ऊपर बताए हुए लक्षणों से मन का पता लगता है पर सूत्रकार मन का एक ही सुगम लक्षण बताते है।

युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिंगम्। १.१.१६ 

एक साथ (युगपत्) अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति न करना यह मन का लक्षण है।

मन एक समय एक ही ज्ञान को ग्रहण करता है। बाह्य इन्द्रियां एक साथ अपने अपने विषयों से जुडी रहती है पर क्योंकि मन एक समय में एक ही ज्ञान उत्पन्न करता है वह इन में से कोई एक ही (अथवा एक भी नहीं यदि वह बाह्य इन्द्रियों से होने वाले प्रत्यक्ष के उपरांत की अन्य कोई अपनी वृत्ति उत्पन्न कर रहा है तब) मन से सन्निकर्ष स्थापित कर पायेगी और वह एक ज्ञान ही एक समय में आत्मा तक पहुंचेगा।


अब प्रवृत्ति का लक्षण देखेंगे। 

प्रवृत्तिर्वाग्बुद्धिशरीरारम्भः। १.१.१७ 

वाणी मन तथा शरीर से कार्यों को करना प्रवृत्ति है। 

इस सूत्र में आया हुआ बुद्धि शब्द मन के अर्थ में है। बुद्धि शब्द बोध (ज्ञान) के अर्थ में जो हमने पीछे प्रयोग किया था भी बनता है और बोध के करण अर्थात् मन के अर्थ में भी जो अर्थ यहाँ लेना है।

पीछे हमने १.१.२ सूत्र (दुःखजन्मप्रवृत्तिदोष...) में वाणी मन तथा शरीर से होने वाले १० - १० धर्म अधर्म (पुण्य पाप) जाने थे। प्रवृत्ति वही कार्य है। (अविद्या जनित दोष युक्त प्रवृत्ति से ही पुण्य पाप बनते है तत्वज्ञान जनित निष्काम कर्म से नहीं) 


दोष का लक्षण

प्रवर्तनालक्षणा दोषाः। १.१.१८ 

जो आत्मा को सकाम कर्मों में प्रेरित करते है वे (राग द्वेष मोह) दोष कहलाते है।
 
दोष तीन है राग द्वेष और मोह। राग अविद्या जनित फल की इच्छा है। यह रजस प्रधान है। जब की मोह में अविद्या जनित फल की कामना होने पर भी मूढ़ता ज्यादा है रजस नहीं। अर्थात् यह तमस प्रधान अवस्था है।

जहाँ अविद्या (मिथ्याज्ञान) है वहां राग द्वेष मोह है ही। 

अब राग द्वेष मोह को तो हम देख नहीं सकते पर जब मनुष्य उनसे प्रेरित हो कर प्रवृत्ति करता है तो उन प्रवृत्तियों को देखकर उनके पीछे विद्यमान दोष का पता लगता है।

दोष (संस्कार) से उत्पन्न प्रवृत्ति चित्त के दृष्ट धर्म है और संस्कार जिनको हम सीधे सीधे देख नहीं सकते है वह चित्त के अदृष्ट धर्म है।

जिज्ञासु : यह दोषों के बारे में तो प्रत्येक आत्मा जानता ही है तो इनका लक्षण प्रवृत्ति है बताने की क्या आवश्यकता थी?

उत्तर : जब रागयुक्त, द्वेषयुक्त अथवा मोहयुक्त मनुष्य कर्म करता है (मन, वाणी अथवा शरीर से) तब ही उन दोषों के होने की सिद्धि होती है। यदि कभी कोई दोषयुक्त प्रवृत्ति होती ही नहीं तो दोषों की सिद्धि नहीं होती।

यदि हमें स्वयं के दोषों (संस्कारों) को समझना है तो भी अपनी प्रवृत्तियों को ध्यान से देखने पर उनको समझ पाएंगे।

शनिवार, 14 मई 2022

घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्राणीन्द्रियाणि भूतेभ्यः। १.१.१२, १.१.१३ -१५

इन्द्रियों के लक्षण

घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्राणीन्द्रियाणि भूतेभ्यः।  १.१.१२

घ्राण रसना चक्षु त्वक् तथा श्रोत्र ये पाँच ज्ञानेंद्रियाँ पांच भूतों के सहयोग से कार्य करती है तथा इनके गोलक पञ्चभूतों से उत्पन्न होते है।

यह लक्षण सूत्र है पर सूत्रकार ने मात्र इन्द्रियों के नाम बताये है। ऐसा इसलिए की इनके नाम में ही इनके लक्षण अंतर्निहित है जो इनके निर्वचन से स्पष्ट होता है। 

घ्राण का निर्वचन है जिघ्रति अनेन इति घ्राणम्। जिससे सूंघता है, गंध को ग्रहण करने का साधन।

रसन = रासयति अनेन इति रसनम्। चखता है जिससे वह रसन (रसना) है। 

चक्षु = चष्टे अनेन इति चक्षुः। देखता है जिसके द्वारा वह इन्द्रिय चक्षु है।
 
त्वक्  =बाकी इन्द्रियों की तरह त्वक् में निर्वचन नहीं हो पायेगा।
त्वक् (=त्वचा) शब्द त्वच संवरणे (संवरण = अच्छी तरह से ढक लेना) धातु से जो अच्छी तरह से ढक लेता है अर्थ में होता है। यह शब्द तनु विस्तारे से भी बन सकता है जिसका अर्थ फैला हुआ होगा। दोनों निर्वचन का तात्पर्य समान है। जिसने शरीर को ढका हुआ है अथवा सम्पूर्ण शरीर पर फैला हुआ है। यहाँ इन्द्रिय त्वक् में रहती है तो उसे त्वक् इन्द्रिय कह दिया जाता है। उसको स्पर्शन इन्द्रिय भी कहा जाता है। छूता है जिस इन्द्रिय के द्वारा। 

श्रोत्र = शृणोति अनेन इति श्रोत्रम्। सुनता है जिसके द्वारा वह इन्द्रिय श्रोत्र है

अपने अपने विषय को ग्रहण करना प्रत्येक इन्द्रिय का लक्षण (उसकी पहचान) है।  

सूत्रमें 
भूतेभ्यः का अर्थ है इन्द्रियां भूतों (पाँच महाभूतों) से सम्बद्ध है। इनसे उत्पन्न हुई है और उनके गुणों का ग्रहण कराती है।


यह भूत कौन से है यह अगला सूत्र बताता है। 

पृथिव्यापस्तेजो वायुरकाशमिति भूतानि।  १.१.१३

पृथ्वी जल अग्नि वायु तथा आकाश ये पाँच स्थूलभूत या महाभूत कहे जाते है।


अर्थ के लक्षण 

गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः पृथिव्यादिगुणास्तदर्थाः। १.१.१४

गन्ध रस रूप स्पर्श शब्द यथाक्रम पृथ्वी आदि के गुण है तथा घ्राणादि इंद्रियों के विषय है। (यह बाह्य इन्द्रियों से गृहीत होने वाले अर्थ है।)

घ्राण पृथ्वी से (उसकी प्रधानता से) उत्पन्न होती है और गंध जो को पृथ्वी का गुण है उसको ग्रहण कराती है। ऐसे ही रसना चक्षु त्वक् तथा श्रोत्र में जल अग्नि वायु तथा आकाश की प्रधानता है और वह उनके गुण रस रूप स्पर्श तथा शब्द का ग्रहण कराती है। 


बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानमित्यनर्थान्तरम्। १.१.१५

बुद्धि उपलब्धि और ज्ञान ये तीनों पद समानार्थक है।

अन्य शास्त्रों में बुद्धि शब्द को मन के समानार्थक के रूप में प्रयोग किया गया है (जैसे योगदर्शन) पर यहाँ इस शास्त्र में बुद्धि को ज्ञान अर्थ में लिया गया है।

शुक्रवार, 13 मई 2022

इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम्। १.१.१० चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम्। १.१.११

अब सूत्रकार प्रथम प्रमेय आत्मा के लक्षण बताते है।

इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम्। १.१.१०

इच्छा द्वेष प्रयत्न सुख दुःख ज्ञान यह आत्मा के लिङ्ग (परिचायक, लक्षण) है।

जब जीव किसी वस्तु से सुख का अनुभव करता है तो जब वह वस्तु पुनः देखता है तब उसे प्राप्त करना चाहता है। मानो किसी व्यक्ति ने आम खाया और उसे उसका स्वाद अत्यंत पसंद आया। अब जब वो आम को फिर कभी देखेगा तो उसे खाने की इच्छा करेगा। जब उसने आम खाया था तब उसका स्वाद रसना ने ग्रहण किया था और अब वह आम चक्षु से देख रहा है इन दोनों इन्द्रियों के पीछे यदि अनुभूति/ज्ञान/भोग करने वाला कोई एक ही न हो तो जैसे किसी एक व्यक्ति की अनुभूति दूसरे के साथ नहीं जुड सकती ऐसे ही रसना और चक्षु इन्द्रिय से प्राप्त ज्ञान जुड नहीं पाते। वह जो अलग अलग इन्द्रिय के विषयों को भोगता है और पूर्व के अनुभव(ज्ञान) के आधार पर इच्छा द्वेष(*अनिच्छा) करता है, इच्छा/द्वेष(अनिच्छा) के आधार पर विषय को पाने/छोडने के लिए प्रयत्न करता है, उसको पाकर/त्यागकर सुख और न पाकर/न त्यागकर दुःख की अनुभूति करने वाला कोई एक है और उससे आत्मा का अनुमान हो सकता है।

*द्वेष शब्द वर्तमान में किसी का बुरा चाहना अर्थ में प्रचलित है पर मूलतः यह शब्द द्विष् धातु से बना है जिसका अर्थ अप्रीति है (द्विषँ अप्रीतौ) अर्थात् प्रीति का अभाव मात्र, शत्रुता अथवा वैमनस्य का होना नहीं।

इच्छा द्वेष प्रयत्न सुख दुःख और ज्ञान इनको आत्मा के विशेष लक्षण, अर्थात् गुण बताये है। समवायी गुण जैसे पृथ्वी में गंध, जल में रस, अग्नि में रूप इत्यादि। गुण क्योंकि गुणी के बहार नहीं रह सकते गुण को देखकर गुणी का अनुमान होता है।

शरीर का लक्षण

चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम्। १.१.११

चेष्टा इन्द्रिय और अर्थों का आश्रय शरीर है।

जो क्रिया ज्ञान, इच्छा और प्रयत्नपूर्वक होती है उसको चेष्टा कहते है। ज्ञान, इच्छा और प्रयत्न आत्मा के गुण है इनके उभरने पर जो क्रिया शरीर में होती है वह चेष्टा है। और क्योंकि आत्मा के शरीर में न रहते हुए यह नहीं हो सकती शरीर को इनका आश्रय बताया गया है कारण नहीं।

जब शरीर ठीक रहता है तो इन्द्रियाँ* भी ठीक रहती है और जब शरीर की हानि होती है तो इन्द्रियाँ भी ठीक काम नहीं कर पाती अथवा विनाश को प्राप्त होती है जिससे इन्द्रिय शरीर के आश्रित होना स्पष्ट होता है। 

इन्द्रिय को दो भागों में देखा जाता है। सूक्ष्म इन्द्रिय और स्थूल इन्द्रिय (जिसको गोलक कहा जाता है। आँख कान इत्यादि)। सूक्ष्म इन्द्रिय आत्मा के साथ रहती है (जड प्रकृति से बनी होने पर भी। जब तक आत्मा मुक्ति को प्राप्त नहीं करता) और शरीर की हानि होने पर यद्यपि इनकी हानि नहीं होती पर स्थूल इन्द्रिय के न रहने पर / ठीक से न काम करने पर यह भी आत्मा को संवेदना पहुँचाने में असमर्थ रहती है। यहाँ हम इन्द्रिय से स्थूल इन्द्रिय (गोलक) का ही ग्रहण करेंगे जिसका आश्रय शरीर है। 

सुख दुःख की अनुभूति का सामर्थ्य आत्मा का है शरीर का नहीं पर यह संवेदना शरीर (इन्द्रिय जो स्वयं शरीर पर आश्रित है) के न होते हुए आत्मा नहीं कर सकता।  अर्थात् इन संवेदनाओं (जिसमें सारा अर्थ आ जाता है) का आश्रय भी शरीर है।

शनिवार, 7 मई 2022

आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गास्तु प्रमेयम् । १.१.९

प्रथम सूत्र में दिए गए १६ पदार्थ में से द्वितीय प्रमेय है। सूत्रकार अब इसके विभाग बताते है।

आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गास्तु प्रमेयम् । १.१.९

आत्मा शरीर इन्द्रिय अर्थ बुद्धि मन प्रवृत्ति दोष प्रेत्यभाव फल दुःख अपवर्ग यह प्रमेय है। 

इस शास्त्र में यह १२ प्रमेय लिये है इस का तात्पर्य यह नहीं है की इन १२ के अतिरिक्त कोई वस्तु जानने योग्य नहीं है। इस का तात्पर्य यह है की इस शास्त्र ने इन प्रमेयों के लिए अपने को अधिकृत किया है। इन प्रमेयों को लेते हुए भी इस शास्त्र का मुख्य विषय प्रमाण ही है।

एक तरह से ऐसे भी समझ सकते है जैसे हम कोई भी दुकान में हम जाए तो वहां तराजू मिलता है (जैसे कोई भी क्षेत्र में हमें प्रमाणों का प्रयोग करना पडता है) पर यदि हम तराजू की दुकान में जाए तो तराजू को हम देख सके इस लिए वहां पदार्थ रहते है। पर पदार्थ वहां मुख्य वस्तु नहीं है जैसे अन्य दुकानों में। पर इस का अर्थ यह भी नहीं है की इन प्रमेयों की स्वतंत्र उपयोगिता कम है। शास्त्र रचयिता ने ऐसे प्रमेय नहीं लिए है जो प्रमाणों का उपयोग कैसे करते है यह दर्शाने के काम तो आये पर उनका बाकी कोई उपयोग न हो। यह जानने योग्य पदार्थों में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण भी लिए गए है। 

इन १२ प्रमेय में भी मुख्य प्रमेय आत्मा है। क्योंकि आत्मज्ञान के बिना अपवर्ग प्राप्ति नहीं होती। बाकी के प्रमेय आत्मज्ञान तक पहुंचने में सहायक है। इन सारे प्रमेय के सूत्र आगे आएंगे पर संक्षिप्त में भाष्यकार इनको यहां भी बताते है। 

आत्मा : यह सर्व वस्तुओं को देखने वाला, भोगने वाला, अनुभव करने वाला और सर्वज्ञ है। सर्व = वो सब जो सारी इन्द्रियां ग्रहण करती है और मन उनको आत्मा तक पहुंचाता है, वो सब जो विषय मन ग्रहण करके आत्मा तक पहुंचता है और सर्व सुख दुःख। इस लिए आत्मा को सर्वज्ञ भी कहते है। शरीर और मन द्वारा प्राप्त सर्व अनुभूतिओं को जानने वाला।

ध्यान रहे सर्वज्ञ का अर्थ सबकुछ जानना वाला नहीं है। सर्व अर्थ को जानने वाला तो मात्र परमात्मा ही है और उसे भी आत्मा के नाम से कहा जाता है पर यहां वह अर्थ नहीं है।

कहां किस शब्द का अर्थ कैसे करना है यह मीमांसा दर्शन का विषय है वहां जैमिनी मुनि ने एक सिद्धांत दिया है की सर्व शब्द का अर्थ अधिकारक्षेत्र के अंदर आने वाले / विषय सम्बन्धी सर्व के लिए होता है। जैसे जब मां बच्चे को कहती है की सारा दूध पी जाओ तो उसका अर्थ बच्चे को जितना दूध पीना है उतना सारा दूध होता है। घर में पतीला भर के दूध है वह अथवा पूरे गांव में है वह सारा दूध नहीं।

न्यायदर्शन का विषय आत्मा तक ही सीमित है क्योंकि आत्मा के प्रत्यक्ष तक स्वयं के प्रयत्न होते है और वहां तक हम अपने करण के उपयोग से पहुंचते है। परमात्मा को न तो हम हमारे प्रयत्न से प्राप्त कर सकते है न ही हमारे पास कोई ऐसा करण है जो उसका प्रत्यक्ष करा सके। आत्मा स्वयं के प्रत्यक्ष के पश्चात जब उस लायक हो जाता है तो वह स्वयं अपनी उपलब्धि करवाता है।

शरीर : यह आत्मा के भोगों का आधार है। शरीर में रहते ही आत्मा सुख दुःख भोग सकता है। 

इन्द्रिय : यह आत्मा के भोग के साधन है। यहां पांच बाह्य इन्द्रियों (श्रोत त्वक् चक्षु रसना(जिह्वा) घ्राण जो हमें शब्द स्पर्श रूप रस गंध के ज्ञान करवाती है।) को ही लिया जायेगा क्योंकि सूत्रकार ने छठी इन्द्रिय मन को अलग प्रमेय के अंतर्गत लिया है।

अर्थ : शब्द स्पर्श रूप रस गंध यह अर्थ है जिनको इन्द्रियां ग्रहण करती है और मन आत्मा तक पहुंचता है। 

बुद्धि : वह भोग है जो आत्मा करता है (=ज्ञान, उपलब्धि)

मन : यह आंतरिक करण (इन्द्रिय) है। बाह्य इन्द्रियां मात्र अपने अपने नियत विषय का ही ग्रहण कर सकती है। जैसे चक्षु इन्द्रिय गंध रस स्पर्श अथवा शब्द का ग्रहण नहीं कर सकती और ऐसे ही अन्य इन्द्रियां। परन्तु मन सर्व विषय के ग्रहण का साधन (करण) है। (यहां भी सर्व का अर्थ है जीवात्मा का जिन विषयों को ग्रहण करने का सामर्थ्य है वह सर्व।). मन की यह विशिष्टता को देखते हुए मन इन्द्रिय होते हुए भी इस को इन्द्रिय (जहां मात्र बाह्य इन्द्रियों का ग्रहण किया है) से पृथक इन १२ प्रमेयों में लिया है।    
 
प्रवृत्ति, दोष  : दोष और दोष पूर्वक प्रवृत्ति वह शरीर इन्द्रिय अर्थ बुद्धि सुख दुःख के उत्पन्न होने के कारण है।  

प्रेत्यभाव : एक देह को त्याग कर अन्य देह ग्रहण करना। अर्थात् ऐसा नहीं है की वर्तमान देह के पहले हमारे और देह नहीं थे न ही ऐसा है के वर्तमान के बाद और नहीं होंगे। यह आत्मा का देह प्राप्ति का क्रम जो अनादि काल से चल रहा है और अपवर्ग तक चलता रहेगा यह प्रेत्यभाव है।

फल : साधन सहित सुख दुःख की प्राप्ति फल है। ध्यान रहे यहां मात्र सुख दुःख नहीं कहा गया और एक तरह से साधन ही मुख्य फल है। साधन हमें मुफ्त में नहीं मिलते। कर्माशय में से पुण्य खर्च करके मिलते है। फिर वह साधन का उपयोग हम कितना सुख दुःख पाने के लिए करते है यह हम पर निर्धारित है।

जैसे मानो आपने एक अच्छा tele lens ख़रीदा bird photography के लिए। अब उसके पैसे तो हर एक ख़रीदकर्ता को एक से देने पडेंगे फिर चाहे कोई उसका बहोत ही उत्कृष्ट, कोई मध्यम और कोई उसका निकृष्ट प्रयोग करें। ऐसे ही हमने खूब सारे पुण्य खर्च करके मनुष्य शरीर और अच्छे से काम करने वाली इन्द्रिया ली यह हमारे कर्माशय का फल होगा। अब हम पर निर्भर है की हम इन साधन का क्या उपयोग करें। हम इन साधन का ऐसा उपयोग भी कर सकते है की इनके लिए किया गया खर्चा अनेक गुना वापस मिल जाये या फिर पैसे डुबो भी सकते है और डुबोने पर आये तो हम इस का उपयोग करके अपने आप के बडे बडे नुकसान भी कर सकते है जो मनुष्येतर शरीर में रहते हुए नहीं हो सकते है।

दुःख : यहां दुःख का अर्थ सुख का न होना नहीं है। परन्तु जब सुख भी होता है तब भी हमेशा वह दुःख से लिप्त ही होता है इसको जानना है। 

अपवर्ग : जन्म मरण प्रवाह के उच्छेद को अपवर्ग कहते है जहां लेश मात्र भी दुःख नहीं है और परमात्मा का अनंत सुख है। यह जान लेने से की एक भी (सांसारिक, शरीर रहते हुए मिलने वाला) सुख दुःख से रहित हो ही नहीं सकता, मनुष्य वह सब दुःख लाने वाले सुखों से भी विरक्त होगा और उसका अपवर्ग का मार्ग प्रशस्त होगा।

प्रश्न :- 

१) नीचे में से कौन कौन से कथन सही है?

क) सूत्रकार ने इस शास्त्र के लिए प्रमेय इस लिए लिए है की प्रमाणों का प्रयोग कैसे करना है वह दिखाने के लिए उन्हें प्रमेयों की आवश्यकता थी। 
ख) सूत्रकार ने सर्वश्रेष्ठ प्रमेय इस शास्त्र में लिए है जिनके जान लेने से अपवर्ग की प्राप्ति होगी। 
ग) इन १२ प्रमेयों में मुख्य प्रमेय आत्मा है। बाकि ११ आत्मा को समझने में सहायक है। 
घ) यहां भाष्यकार ने आत्मा को सर्वज्ञ कहा है। इससे स्पष्ट है की आत्मा का अर्थ इस शास्त्र में परमात्मा होता है क्योंकि उसके अतिरिक्त सब कुछ कोई नहीं जानता।

२) जब मन भी इन्द्रिय है तो प्रमेयों में जहां इन्द्रिय पहले ही आ चूका है मन को फिर क्यों लिया गया है?

३) आत्मा शरीर में रहते हुए इन्द्रियों और मन से गृहीत अर्थ का ज्ञान प्राप्त करता है (भोगता है). इसमें इस सूत्र में प्रयोग किया गया शब्द बुद्धि किस वस्तु के लिए प्रयोग किया है?

शुक्रवार, 6 मई 2022

स द्विविधों दृष्टादृष्टार्थत्वात् । १.१.८

स द्विविधों दृष्टादृष्टार्थत्वात् । १.१.८ 

वह (शब्द प्रमाण) दो प्रकार का होता है। दृष्टार्थ (इस जन्म में प्रत्यक्ष होने वाले विषय वाला) और अदृष्टार्थ (इस जन्म में प्रत्यक्ष न होने वाले विषय वाला।)

दृष्टार्थ : शब्द प्रमाण से जाने गए अर्थ का इसी जन्म में प्रत्यक्ष किया जा सके वह दृष्टार्थ है। जैसे किसी ने कहा की अमुक जगह पर मेला लगा है। हम वहां जा कर उसका प्रत्यक्ष कर सकते है। जीवन में ऐसे शब्द प्रमाण व्यवहार चलाने में प्रचुर मात्रा में उपयोग में आते है।

अदृष्टार्थ : शब्द प्रमाण से जाने गए अर्थ का इसी जन्म में प्रत्यक्ष न किया जा सके वह अदृष्टार्थ है। यदि कोई शब्द प्रमाण अगले जन्मों के बारे में कुछ बताता है तो उस अर्थ को हम इस जन्म में देख नहीं सकते और अगले जन्म में हमें यह याद नहीं होगा की हमने पिछले जन्म में शब्द प्रमाण से कुछ जाना था। 

तो क्या ऐसे विषयों के बारे में हम शब्द प्रमाण से अतिरिक्त कुछ नहीं जान सकते? जान सकते है। अनुमान प्रमाण का प्रयोग हम ऐसी जगहों पर कर ही सकते है।
  
उदाहरण के लिए यह शब्द प्रमाण ले लेते है की आत्मा है। (यह वैसे तो दृष्टार्थ में आयेगा क्योंकि आत्मा का (स्वयं का) प्रत्यक्ष संभव है। पर ऐसा करना इतने अल्प संख्या में योगिओं के लिए ही संभव है की सामान्य जन के लिए वह अदृष्टार्थ कहा जा सकता है। हम आत्मा का प्रत्यक्ष करने में असमर्थ होते हुए भी इच्छा द्वेष प्रयत्न आदि को देखकर आत्मा का अनुमान कर सकते है।

यह दो विभागों को स्पष्टता से बताने का उद्देश्य यह है की हम अदृष्टार्थ को शब्द प्रमाण न माने यह न हो। जैसे की वेदों में आए हुए अदृष्टार्थ शब्द प्रमाण।  
परमात्मा सबसे बडा आप्त है क्योंकि वह सर्वज्ञ है और हमारे उपकार के लिए उसका उपदेश होता है। इस लिए वेद जो ईश्वर का उपदेश है (जो वह प्रत्येक सृष्टि के प्रारंभ में श्रेष्ठ ऋषिओं के अंतःकरण में प्रकाशित करता है।) शब्द प्रमाण है।* और ऐसे शब्द प्रमाणों को भी अनुमान प्रमाण से जानने के प्रयत्न किए जा सकते है।

*वेद अथवा अन्य वेद सम्मत शास्त्र को शब्द प्रमाण मानने का अर्थ यह बिलकुल नहीं है की कोई भी उनका जो अर्थ करने लगे वही शब्द प्रमाण है। या तो हम व्याकरण निरुक्त वगैरह पढकर, हमारे अंतःकरण को पूर्ण निर्मल और पवित्र बनाकर अपने आप को इस लायक बनाए जिससे हम उनका अर्थ स्वयं समझ सके अथवा ऐसा आप्त ढूंढे जो हमें अर्थ बता सके। (और वहां पहुंचने के लिए भी हमें कई शब्द प्रमाणों से लाभान्वित होना पडेगा तो हमें आप्त तो ढूंढना ही पडेगा।)

प्रश्न :-

१) शब्द प्रमाण वह है जहां हम आप्त उपदेश से कोई वस्तु जानते है और ऐसा करके जब हमें ज्ञान मिल ही जाता है तो अनुमान प्रमाण अथवा प्रत्यक्ष से जानने की कोई आवश्यकता नहीं रहती। सही/गलत?

२) वेद और वेद सम्मत ऋषिकृत शास्त्र में कही गयी वस्तु शब्द प्रमाण है फिर भले ही वह अदृष्टार्थ हो। सही/गलत?

३) जब भाई मैक्समूलर हमें वेदो का अर्थ समझाते है तो वह हमारे लिए शब्द प्रमाण है क्यों की वेद में कही गयी बात ईश्वर का शब्द होने से शब्द प्रमाण है। सही/गलत? क्यों?

४) आप अपने मित्र को मिलने उसके घर जाते है। आंगन में उसका ४ साल का बच्चा खेल रहा है। वह आप को बताता है की पापा तो घर पर नहीं है और आप वापस आ जाते है। क्या यहां बच्चे द्वारा दी गयी जानकारी शब्द प्रमाण है?

रविवार, 1 मई 2022

प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम्। १.१.६ आप्तोपदेशः शब्दः। १.१.७

प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम्। १.१.६
 
प्रसिद्ध वस्तु के जाने हुए समान धर्म से साध्य(जानने योग्य) वस्तु का ज्ञान कराने वाला साधन उपमान प्रमाण कहलाता है।

धर्म =जो भी द्रव्य में रहता है वह उसका धर्म कहलायेगा। गुण, कर्म, जाती
(इस दृष्टि से गुण - गुणी की तुलना में धर्म - धर्मी अधिक व्यापक है।)
सधर्म = समान धर्म
साधर्म्य = समान धर्म का होना 

जब कोई वस्तु के धर्म आप जानते हो और यह भी जानते हो की कोई अन्य वस्तु में इससे मिलते जुलते अमुक अमुक धर्म है (परन्तु उस अन्य वस्तु को नहीं जानते), उसके पश्चात अन्य वस्तु का प्रत्यक्ष करते समय उन जाने हुए समान धर्मों को वहां भी पा कर प्रत्यक्ष की जा रही वस्तु के साथ अन्य वस्तु का नाम जोडना यह उपमान प्रमाण का काम है।

जैसे आप को जंगल में जा कर मुद्गपर्णी और शालपर्णी (यह दो औषधीय पौधे है) लाने के लिए कहा गया। आप इन औषधियों को नहीं जानते पर आप को बताया  गया की इनके नाम इनके पर्ण मुंग और उडद (मुद्ग और शाल) के पत्तों के समान होने से है और आप मुंग और उडद के पौधों को पहचानते हो। तो अब जब जंगल में मुद्गपर्णी और शालपर्णी देखोगे तब उन के पत्तों को देखकर उन पौधों से उनका नाम जोड पाओगे (उनकी पहचान कर पाओगे)।

यहां आपका मुंग और उडद के पर्ण कैसे है यह जानना पहले का प्रत्यक्ष था (अब स्मृति में से आया था।)
आपका यह जानना की मुद्गपर्णी और शालपर्णी के पत्ते मुंग और उडद के पत्ते के समान होते है यह पहले का शब्द प्रमाण था (अब स्मृति में से आया था।)
मुद्गपर्णी और शालपर्णी का आप अभी प्रत्यक्ष कर रहे हो। 
उपमान प्रमाण यहां प्रत्यक्ष की जा रही वस्तु से उसका नाम जोडने का कार्य कर रहा है।

'जैसे यह वैसे वह' कहकर बोला जाता है वह उपमान प्रमाण है। अनुमान प्रमाण के पंचावयव में चतुर्थ अवयव उपनय उपमान प्रमाण सदृश्य है। (जैसे रसोई में धुआं आग के कारण था ऐसे ही पर्वत पर)


अब शब्द प्रमाण का सूत्र देखते है। 

आप्तोपदेशः शब्दः। १.१.७ 
आप्त पुरुष का कथन शब्द प्रमाण कहलाता है।

आप्त =वह पुरुष (=व्यक्ति) जिसने जिस पदार्थ का विषय है उसका साक्षात्कार किया है।
साक्षात्कार = जो वस्तु जैसी है उसको उसी रूप में निश्चयपूर्वक जानना।

ऐसा जानकार व्यक्ति (=पदार्थ का साक्षात्कृतधर्मा पुरुष = आप्त) जब उस विषय के बारे में अन्यों को बताने के लिए प्रवृत्त होता है तब उसका कथन शब्द प्रमाण कहलाता है। 

आप्ति शब्द आप् (आपॢँ व्याप्तौ) से बनता है जिसका अर्थ है पूर्ण जानकारी। उस आप्ति के साथ अपने कार्य में प्रवृत्त होने वाला पुरुष आप्त है। 

यह लक्षण उत्तम विद्वान, साधारण जन और अति सीमित ज्ञान रखने वालों पर एक सा लागू होगा। जिस जिस विषय में उनको यथार्थ जानकारी है उन उन विषय में वह आप्त बन सकते है।

जगत में अनेक व्यवहार इसी प्रमाण के आधार पर चलते है और मात्र मनुष्य ही नहीं, अन्य जीव भी (अन्य प्रमाणों के साथ साथ) इसका उपयोग करते है।