अहेतुसम प्रतिषेध
त्रैकाल्यानुपपत्तेर्हेतोरहेतुसमः। ५.१.१८
तीनों काल में कहीं हेतु की सिद्धि नहीं है ऐसा प्रतिषेध अहेतुसम प्रतिषेध है।
okay, इस जाति का अर्थ समझने में मैंने देखते ही हार सी मान ली थी। ऐसा कैसा जवाब? त्रिकाल में कोई हेतु नहीं है? ऐसे कैसे कोई हाथ खडे कर सकता है? और तभी कुछ ऐसी दलीलें जो वस्तुतः यही कहती हो की इस कार्य का हेतु तो त्रिकाल और त्रिलोक कहीं भी नहीं मिलेगा कान में गूंजने लगी।
आप को ये मधुमेह उच्च रक्तचाप जैसे रोग हुए है जिनका कारण जीवनशैली होती है।
- पर इन का कोई हेतु ही नहीं है। हमारे आहार विहार में तो इतनी भी गड़बड़ कभी भी नहीं रही। हम तो इतने जागरूक और व्यवस्थित है।
आप का बेटा इतनी छोटी आयु में इतना बिगड़ गया है। कहीं न कहीं उसके संस्कार में चूक रह गई है।
- पर हमने तो हमारे बेटे को हमेशा सर्वश्रेष्ठ संस्कार दिए है और सब प्रकार से उसे उच्च वातावरण ही प्रदान किया है। उसके बिगड़ने का तो त्रिकाल में कोई हेतु ही नहीं है।
और वो बंदूक ने किसी को मारा (अर्थात् किसी ने नहीं मारा) जैसे अनेक woke world जवाब।
यह प्रतिषेध हमें वहां मिलता है जहां जातिवादी स्वयं के पक्ष की कोई accountability fix नहीं होने देना चाहता।
यह वितंडा का शुद्ध स्वरूप है। वैतंडिक वादी को खंडित तो करना चाहता है पर कोई अन्य हेतु बताना भी नहीं चाहता, नहीं तो फिर उसे सिद्ध करने की झंझट गले पडेगी।
उत्तर
न हेतुतः साध्यसिद्धेस्त्रैकाल्यासिद्धिः। ५.१.१९
साध्य की सिद्धि हेतु से ही होने के कारण त्रिकाल में उसकी असिद्धि नहीं हो सकती।
प्रतिषेधानुपपत्तेश्च प्रतिषेद्धव्याप्रतिषेधः। ५.१.२०
प्रतिषेध की उत्पत्ति नहीं होने से प्रतिषेध योग्य का भी प्रतिषेध नहीं हो पाएगा।
अब तक के सारे उत्तरों में मुझे यह उत्तर सब से ज्यादा पसंद आए। basically, गौतम ऋषि ने जातिवादी को दिए जाने योग्य जवाब दिए है वो यह है।
१) (बकवास बंध करो,) हेतु का न होना नहीं होता।
२) हेतु है ही नहीं यह कहोगे तो (तुम्हारे ऊपर सारे संभावित आरोप लग जायेंगे और उन में से किसी का भी स्वीकार नहीं करने से) तुम किसी भी आरोप का प्रतिषेध करने के लायक नहीं रहोगे।
वैसे जातिवादी भी यह जानता है और जहां उसे ऐसा वादी मिले जो इतना मूर्ख न हो जो बिना हेतु के कार्य हो गया मान ले तो किसी न किसी ऐसे हेतु को सर पर responsibility transfer करने का प्रयत्न करता है जिससे अपनी गलती न दिखे। जैसे जीवनशैली में दूसरों के द्वारा उत्पन्न तनाव मुख्य रहता है और बच्चे के बिगड़ने में समाज, मित्र, फिल्में जैसी वस्तुएं।
यदि एक वस्तु जो मुझे सबसे अधिक उपयोगी लगती है तो वो है 'यथा ब्रह्मांडे तथा पिण्डे' / 'यथा पिण्डे तथा ब्रह्मांडे'। इससे हम जाति के बाह्य प्रयोग को समझकर उसके आंतरिक प्रयोग को भी समझ सकते है और उससे बच सकते है। यदि हम अवांछनीय परिस्थिति में स्वयं को पाते है तो सत्य कारण तक पहुँचने के लिए प्रत्येक प्रयास करें और यदि वह कारण ऐसा मिलता दिखे की जिसको स्वीकार करने में हमें किसी भी कारण से कष्ट हो रहा है तो वह कारण (जिससे कष्ट हो रहा है उस) का प्रतिषेध करें, न की अवांछनीय परिस्थिति के हेतु का।
और यदि ऐसा करने में कठिनाई आ रही है तो गौतम ऋषि ने दिए हुए उत्तर याद करें। हमारे न मानने से कुछ नहीं होगा, यदि कार्य है तो कारण तो है ही। और यदि उसे नहीं मानेंगे तो तो उसका प्रतिषेध (सुधार के प्रयत्न) कैसे करेंगे? जो कार्य हो चुका है उसके हेतु का त्रिकाल में न होना सिद्ध करना भले ही असंभव हो पर वह वर्तमान तथा भविष्य दो काल में वह न रहें उसके प्रयत्न करने की शक्ति हम स्वयं से न छीने।
मेरी दृष्टि में सूत्र में त्रिकाल शब्द का उपयोग गौतम ऋषि की हमारे प्रति की अपार करुणा की और संकेत करता है। हम कभी इतना नीचे भी गिर जाए की स्वयं से वाद करने के स्थान पर जल्प भी नहीं वितंडा पर उतर आए तब भी, वो हमें याद दिलाते है की हेतु का त्रिकाल में निषेध नहीं हो सकता और हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करते है की क्या दो अथवा एक काल में ऐसा हो सकता है? क्या हम हेतु को स्वीकार कर, उसे मिटाकर परिस्थिति बदल सकते है?