प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि। १.१.३
प्रत्यक्ष अनुमान उपमान शब्द प्रमाण है।
प्रत्यक्ष अनुमान उपमान शब्द प्रमाण है।
यह प्रमाणों का विभाग दर्शाता सूत्र है। इस पर पूर्वपक्षी कहता है की प्रत्यक्ष प्रमाण वास्तव में अनुमान प्रमाण के अंतर्गत ही आ जाता है।
प्रत्यक्षमनुमानमेकदेशग्रहणादुपलब्धेः। २.१.२८
प्रत्यक्ष अनुमान ही है एक देश के ग्रहण से ज्ञान के उत्पन्न होने से।
प्रत्यक्ष अनुमान ही है एक देश के ग्रहण से ज्ञान के उत्पन्न होने से।
जिसे आप प्रत्यक्ष कह रहे हो वह वास्तव में अनुमान प्रमाण ही है क्योंकि प्रत्यक्ष (इन्द्रिय अर्थ का सन्निकर्ष) तो किसी वस्तु के एक देश का कर रहे हो और उस वस्तु के बाकी देशों को अनुमान से जान रहे हो। जैसे जिसे आप वृक्ष का प्रत्यक्ष कह रहे हो उसमें वृक्ष का आगे के भाग (और उसकी भी ऊपरी सतह) से ही चक्षु इन्द्रिय का सन्निकर्ष (प्रत्यक्ष) हो रहा है, उसके बाकी के अवयवों का उस अल्प प्रत्यक्ष के आधार पर अनुमान हो रहा है। इस लिए वृक्ष का अनुमान हो रहा है प्रत्यक्ष नहीं।
न प्रत्यक्षेण यावत्तावदप्युपलम्भात्। २.१.२९
जितना हुआ उतना पर प्रत्यक्ष से हुआ ज्ञान होने पर उसे अनुमान नहीं कह सकते।
जितना हुआ उतना पर प्रत्यक्ष से हुआ ज्ञान होने पर उसे अनुमान नहीं कह सकते।
वृक्ष के आगे के भाग का ज्ञान जो इन्द्रिय से प्राप्त हुआ है उसे जब आप स्वयं ही प्रत्यक्ष मन रहे हो तो प्रत्यक्ष प्रमाण के निषेध की आपकी प्रतिज्ञा वहीं भंग हो जाति है।
और फिर अनुमान (व्याप्ति ज्ञान) प्रत्यक्ष पूर्वक ही होता है। यदि प्रत्यक्ष की सत्ता को ही नकार दोगे तो अनुमान भी कैसे हो पाएगा?
पूर्वपक्षी का विरोध गुणों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) के प्रत्यक्ष* में तो बनता ही नहीं क्योंकि वहाँ आगे पीछे के भाग का प्रश्न नहीं उठता।
* गुण द्रव्य में रहता है। (शब्द को छोड कर,) गुण का प्रत्यक्ष गौण रूप से होता है जब हम द्रव्य का प्रत्यक्ष करते है। जैसे हम गौ को देखते है तब उसके रंग (रूप) का, उसकी दौडने की क्रिया (कर्म) का, उसके गोत्व (जाति) का भी गौण रूप से प्रत्यक्ष करते है पर हम मुख्य रूप से यही कहेंगे की हमने गौ का प्रत्यक्ष किया।
* गुण द्रव्य में रहता है। (शब्द को छोड कर,) गुण का प्रत्यक्ष गौण रूप से होता है जब हम द्रव्य का प्रत्यक्ष करते है। जैसे हम गौ को देखते है तब उसके रंग (रूप) का, उसकी दौडने की क्रिया (कर्म) का, उसके गोत्व (जाति) का भी गौण रूप से प्रत्यक्ष करते है पर हम मुख्य रूप से यही कहेंगे की हमने गौ का प्रत्यक्ष किया।
यद्यपि प्रत्यक्ष प्रमाण की सत्ता को ही अस्वीकार करने वाले पूर्वपक्षी के आरोप का खंडन यहाँ हो जाता है, उस आरोप के पीछे पूर्वपक्षी और सिद्धांती के सिद्धांतों में अवयव अवयवी को लेकर भिन्नता कारणभूत है।
पूर्वपक्षी (बौद्ध) वस्तुओं को अवयवसमूह मानता है (समुदायवाद) जब की सिद्धांती अवयवी की स्वतंत्र सत्ता को स्वीकार करता है (उत्पत्तिवाद अथवा आरंभवाद)। नैयायिक उपदान(=समवायी) कारण में से अवयवी रूप कार्य की उत्पत्ति मानते है। इसलिए घडा पूर्वपक्षी के लिए मिट्टी के कणों का समूह मात्र है जो घडा नाम धारण करता है तो नैयायिक के लिए वह घडा उत्पन्न हुआ कार्य द्रव्य है जो मिट्टी के कणों के साथ समवाय संबंध से रहता है।
इस लिए पूर्वपक्षी के मत में वृक्ष के कुछ अवयवों का प्रत्यक्ष हुआ है, सभी अवयवों का नहीं। जब की सिद्धांती जो वृक्ष को एक इकाई के रूप में देखता है जड, तना, पत्ते के समूह मात्र के रूप में नहीं उसके लिए उसने किया प्रत्यक्ष वृक्ष का ही है। (पूर्वपक्षी के अपने सिद्धांत के हिसाब से भी वह वृक्ष का ज्ञान अनुमान से हुआ नहीं कह सकता क्योंकि जैसे कुछ अवयवों के प्रत्यक्ष से सम्पूर्ण अवयवसमूह का प्रत्यक्ष वह नहीं मानता ऐसे ही कुछ अवयवों के अनुमान से सम्पूर्ण अवयवसमूह का अनुमान भी नहीं मान सकता।)
सूत्रकार अब अवयव का प्रत्यक्ष अवयवी का प्रत्यक्ष ही है यह बताते है।
न चैकदेशोपलब्धिरवयविसद्भावात्। २.१.३०
और, अवयवी की सत्ता होने से उसके एक भाग की ही उपलब्धि है ऐसा नहीं कह सकते।
जैसे हम किसी मनुष्य को देखते है तब उसकी त्वचा का प्रत्यक्ष हुआ ऐसा नहीं परंतु उस मनुष्य का प्रत्यक्ष हुआ यह कहते है (ऐसे ही कहना उचित है।) क्योंकि उसके जीतने रूप का प्रत्यक्ष हुआ उससे हमें उस व्यक्ति के होने का ज्ञान हुआ है। अवयव और अवयवों में समवाय संबंध से रहने वाले अवयवी दोनों का ज्ञान अवयव के प्रत्यक्ष से हो जाता है।
जिज्ञासु जिसने समुदायवाद और उत्पत्तिवाद दोनों को सुन रखा है उसे वो विपरीत बातें सुनकर संदेह होता है की अवयवी है की नहीं। उसका प्रश्न।
साध्यत्वादवयविनि संदेहः। २.१.३१
अवयवी ही साध्य कोटि में होने से (अभी प्रमाणित न होने से) संदेह बना रहता है।
क्या अवयवी होता है अथवा अवयवसमूह मात्र होते है। यदि अवयवी ही न हो तो उसका प्रत्यक्ष होने का प्रश्न ही नहीं उठेगा। मात्र अवयवों का ही प्रत्यक्ष / अनुमान हो पाएगा।
उत्तर
सर्वाग्रहणमवयव्यसिद्धेः। २.१.३२
अवयवी न होने पर किसी भी वस्तु का प्रत्यक्ष नहीं हो पाएगा।
अवयवी न होने पर किसी भी वस्तु का प्रत्यक्ष नहीं हो पाएगा।
परमाणु* तो इंद्रियग्राह्य नहीं है तो यदि अनेक परमाणु से बना अवयवी न हो और मात्र अवयवों का ही प्रत्यक्ष हो सकता हो तो किसी भी वस्तु का प्रत्यक्ष नहीं हो पाएगा।
*परमाणु = परम अणु। सबसे छोटा पदार्थ। जो खंडित न हो सके और दूसरे पदार्थों से (अवयवों से) न बना हो। (क्योंकि नहीं तो उसके खंड / अवयव उससे छोटे बन जाएंगे।)
*परमाणु = परम अणु। सबसे छोटा पदार्थ। जो खंडित न हो सके और दूसरे पदार्थों से (अवयवों से) न बना हो। (क्योंकि नहीं तो उसके खंड / अवयव उससे छोटे बन जाएंगे।)
धारणाकर्षणोपपत्तेश्च। २.१.३३
और धारण तथा आकर्षण से भी अवयवी होने का पता चलता है।
और धारण तथा आकर्षण से भी अवयवी होने का पता चलता है।
अवयवों के बीच में धारण तथा आकर्षण से भी अवयवी का पता चलता है। अवयवसमूह मात्र होने से एक अवयव को धारण करने, खींचने से अन्य अवयवों पर प्रभाव नहीं पडता जैसे गेहूँ के ढेर में से एक गेहूँ उठाते है तो अन्य गेहूँ भी उसके साथ खींच कर नहीं आते।
अवयवी को न मानने वालों को स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए की जो मुझे यह एक वस्तु है ऐसा ज्ञान हो रहा है वह एक वस्तु क्या है। समुदाय अनेक वस्तुओं से बनता है अनेक में एक का ज्ञान नहीं हो सकता वह मिथ्या ज्ञान कहलाएगा।
सेनावनवद्ग्रहणमिति चेन्नातीन्द्रियत्वादणूनाम्। २.१.३४
सेना तथा वन के लिए जैसा ज्ञान है ऐसा कहो तो वह गलत है परमाणुओं के अतीन्द्रिय होने से।
जैसे अनेक सैनिकों से एक सेना और अनेक वृक्षों से एक वन बनता है ऐसा कहो तो वह गलत उदाहरण होगा। वहाँ एक एक सैनिक और वृक्ष की पृथकता का ज्ञान समीप से देखने से होता है, दूर से देखने से एक सेना वन का ज्ञान जो होता है वह गौण ज्ञान है। यह उदाहरण परमाणु समूह जैसा नहीं है क्योंकि परमाणु अतेंद्रिय है उनको पृथक पृथक देख ही नहीं पाने से और मात्र अवयवी का ही प्रत्यक्ष हो पाने से मुख्य गौण का अवसर ही प्राप्त नहीं होता।
और अवयवसमूह पक्ष में तो सेना और वन वैसे भी एक सिद्ध नहीं है तो जो स्वयं सिद्ध नहीं है उसे उदाहरण नहीं बनाया जा सकता।