सोमवार, 30 मई 2022

तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः। १.१.२२ (चर्चा भाग ३)



भाग १ में दी गई चर्चा जो भाष्यकार ने प्रस्तुत की है वह मुझे अत्यंत निराशाजनक लगी। माना की मैं अभी एक प्राथमिक विद्यार्थी ही हूँ पर सामने दिखती हुई विसंगतताओं को अनदेखा भी नहीं कर सकती। 

यद्यपि आनंद कहाँ से आएगा इस बात का कोई प्रसंग नहीं था पर फिर भी यह भाष्यकार पर निर्भर है यदि वह सूत्र के आस पास का कोई विषय उठाना चाहे तो। तो मुद्दा चर्चा जहां से और जैसे शुरू की गई वह नहीं है, खास कर के तब जब भाष्यकार दुख की निवृत्ति अवस्था (मोक्ष) में ब्रह्म का आनंद है वह पहले ही कह चुके है। मेरी समस्या नीचे के कारणों से बनी।

चर्चा शुरू करते समय ऐसा भास हो रहा था की भाष्यकार का पक्ष आनंद की सत्ता को स्वीकार कर रहा है पर अंत तक आते आते नीचे के तर्क देना बिलकुल ही ठीक नहीं था। और चर्चा में एक तरह से उन्होंने अपने पक्ष की तो स्थापना ही नहीं की मात्र कल्पित पुर्वपक्षी का खंडन ही किया और ऐसा करते समय स्वयं के पूर्व स्वीकृत सिद्धांत से अंतर भी बना लिया। 
 
१। आनंद हो या न हो उससे कोई अंतर नहीं आता
२। आनंद है तो सही पर यदि आनंद को मानेंगे (मानकर प्रयत्न करेंगे) तो राग होगा और उस के कारण मोक्ष में बाधा आएगी
३। यह तर्क की अपवर्ग के लिए किया गया प्रयत्न इष्ट की प्राप्ति के लिए नहीं पर अनिष्ट की निवृत्ति के लिए है।

१। आनंद हो या न हो उससे कोई अंतर नहीं आता:

यदि यह कथन का तात्पर्य यह है की आनंद की सत्ता तो हम स्वीकारते है पर उससे होने या न होने से फिर भी कोई अंतर नहीं आता,

यहां शास्त्र के १२ प्रमेयों, जिसके तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है उसमें भी जो मुख्य प्रमेय है अपवर्ग उसके विषय में बात हो रही है और कहा यह जा रहा है की उस प्रमेय का अर्थ (जिसको भोगने के लिए ये सारी रामायण हो रही है) सत्तात्मक हो या असत्तात्मक उससे हमें कोई लेना देना नहीं है। प्रमेय के अर्थ की और उपेक्षा का भाव = प्रमेय की और उपेक्षा का भाव।

यदि कथन का तात्पर्य यह है की हम स्वयं ही अनिर्णय की स्थिति में है की वहां आनंद है या नहीं (पर उससे कोई अंतर नहीं आता),

पहले तो यह कथन स्वयं के पूर्व कही गई बात से विरुद्ध जाएगा जहां आनंद की सत्ता स्वीकारी गई है पर यदि उन्हें अपने पक्ष को बदलने का अवसर दिया भी जाए तो इसमें दो आपत्तियाँ आएगी। १) दुःखों से पूर्ण निवृत्ति और सर्वोच्च सुख की एकता को यह स्वीकार नहीं करते (क्योंकि यदि करते तो वह अनिर्णय की स्थिति में नहीं होते) २) ऊपर की तरह उपेक्षा का भाव बनेगा।

२। आनंद है तो सही पर यदि आनंद को मानेंगे (मानकर प्रयत्न करेंगे) तो राग होगा और उस के कारण मोक्ष में बाधा आएगी।

यहां सर्वोच्च प्रमेय के तत्वज्ञान और उससे उत्पन्न ईप्सा को अविद्या और दोष कहा जा रहा है (राग/मोह = दोष जो अविद्या से उत्पन्न होते है) और इतना पर्याप्त न हो ऐसे जिसे अविद्या/दोष कहा जा रहा है उसी की प्राप्ति में बाधा न आए उसकी चिंता की जा रही है।

३। यह तर्क की अपवर्ग के लिए किया गया प्रयत्न इष्ट की प्राप्ति के लिए नहीं पर अनिष्ट की निवृत्ति के लिए है इस में दो आपत्तियाँ है। एक तो की इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट की निवृत्ति इन का साम्य स्वीकार नहीं किया गया और दूसरा यदि मान भी लो की यह दो कोई भिन्न वस्तु है (इस पर हमने भाग २ में चर्चा की थी) और यह भी माने की यदि सुख दुःख घुल मिल गए हो तब एक को छोडना है तो दूसरे को भी छोडना पडेगा (इस पर एक और चर्चा हो सकती है पर अभी नहीं) तब यही तर्क यह भी कहेगा की एक चाहिए तो दूसरा भी स्वीकार करना पडेगा। मनुष्य इन दो में से क्या करता है वह इन की मात्रा पर निर्भर करेगा।

वह मनुष्य जो अपवर्ग से मात्र एक हाथ की दूरी पर है वह तो अनेक सुखों और ज्ञानों से परिपूर्ण होगा। एक ऐसा मनुष्य जो अभ्युदय के चरम पर है, स्थितप्रज्ञ है, द्वंद्वों से परे है, अनेक सिद्धियों का स्वामी है, अत्यंत सुखदायी जन्म, स्वस्थ शरीर, लंबी आयु या कहो इच्छा मृत्यु की सिद्धि, निर्मल आनंदित मन, तेजस्वी बुद्धि और क्या नहीं? इस जगह पर खडा व्यक्ति आगे इससे अधिक आनंद न हो तो क्यों बाकी बचे थोडे से अनिष्ट की निवृत्ति के लिए यह सब छोड देगा?

यदि कहो की ऐसे व्यक्ति को भी जब तक शरीर है तब तक कोई न कोई दुख तो होगा ही और वह उसे भी दूर करना चाहेगा तो वहां तक तो तर्क योग्य है पर यदि कहो की वह बाकी बचे थोडे से दुःख से बचने के लिए वह सर्व सुख छोड देगा तो यह बात नहीं बनती।

यदि किसी के सामने ९९ प्रतिशत दुःख और १ प्रतिशत सुख के मिश्रण को छोडने का विकल्प हो तो वह दुःख से बचने के लिए सुख को भी छोड दे यह तर्क संगत लगता है (संसार में ऐसा प्रयत्न करने का अत्यंत दुःखभरा उदाहरण आत्मघात में दिखता है) पर यदि वह मिश्रण ९९ प्रतिशत सुख और १ प्रतिशत दुःख हो तो?  क्या वह आत्मघात सादृश्य प्रवृत्ति करेगा?
 
और फिर उसकी अपवर्ग तक की यात्रा (अभ्युदय) में क्या देखने मिलता है? जैसे जैसे मनुष्य का अभ्युदय होता है तब वह अपने छोटे छोटे दुःखों से बचने के लिए बडे बडे सुख त्यागता जाता है अथवा यह की उसके सुख में वृद्धि और दुःख में अल्पता आती जाती है? तो अचानक अपवर्ग से एक हाथ की दूरी पर यह परिवर्तन क्यों?

यदि कहो की अपवर्ग के एक हाथ की दूरी पर खडे वह मनुष्य के लिए तो संसार में सब दुःख ही दुःख है (अर्थात् अनिष्ट अल्प नहीं बडा है उसके लिए) तो १) यदि उसको पूछो की क्या वह अपनी स्थिति कोई एक सामान्य सांसारिक मनुष्य (जिसको अनेक दुःख तो है पर अनेक सुख भी है और वह यह नहीं कहता के बस दुःख ही दुःख है) जैसी कर लेना चाहेगा? उसको तो हां कहनी चाहिए क्योंकि १०० प्रतिशत दुःख से तो एक सामान्य सांसारिक मनुष्य की स्थिति अच्छी ही है और कौन जीवात्मा दुःख से कम दुःख की तरफ नहीं जाना चाहेगा? और २) वो सामान्य स्थिति से यहां तक पहुँचा ही क्यों? उसे तो प्रयत्न पहले ही बंध कर देने चाहिए थे। 

यह सब देखकर कोई आश्चर्य नहीं के जो हमने पहले अपवर्ग के बारे में मिथ्याज्ञान पढा था वह प्रचलित हुआ हो। की वहां तो सारा सुख छूट जाएगा, वह कोई भयंकर स्थिति है वगैरह।