रविवार, 29 मई 2022

तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः। १.१.२२ (चर्चा भाग २)


----------------------------
अपवर्ग = सुख की प्राप्ति अथवा दुःखों से अत्यंत निवृत्ति इस विषय को समझने का मेरा प्रयत्न। 
---------------------------

सूत्र का अर्थ और भाष्यकार का कथन इस प्रकार था।    

तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः।  १.१.२२
उस दुःख से अत्यंत छूट जाना मोक्ष है।

भाष्यकार इसको खोलते हुए कहते है की वर्तमान जन्म (शरीर) के छूटने पर नया जन्म न ग्रहण करने से जन्म के साथ नित्य संबंध रखने वाले और उससे विभक्त हो कर न रहने वाले दुःखों से आत्मा को सम्पूर्ण, अत्यंत छुटकारा मिल जाता है।

भाष्यकार आगे बताते है की मोक्ष (अपवर्ग) की अवस्था में आत्मा अभय (भय रहित), अजर (व्याधि रहित), मृत्यु रहित स्थान में परमात्मा के अनंत आनंद को अबाधित रूप से भोगता है।

सूत्रकार ने अपवर्ग को दुःखों से अत्यन्त निवृत्ति कहा है जब की अनेक मत (अथवा कम से कम ऊपर की चर्चा के पूर्वपक्षी और भाष्यकार स्वयं का मत) अपवर्ग में आत्मा की परम सुख की प्राप्ति को मानते है। इस समय यदि हो सकता है तो यह प्रश्न हो सकता है की सूत्रकार ने मोक्ष को व्याख्यायित करते समय उसे दुःखों से आत्यंतिक निवृत्ति क्यों कहा अत्यंत सुख की प्राप्ति क्यों नहीं? (जब सुख सिद्ध हो जाएगा बाद चाहे तो वह कहाँ से आता है वह प्रश्न आ सकता है।)
 
प्रथम तो हम दुःख और सुख को समझने का एक उदाहरण द्वारा प्रयास करते है।

मान लो एक व्यक्ति को काम पर जाना है पर यात्रा लिए कोई साधन नहीं है। अब वहां एक बस शुरू हुई जिससे वह यात्रा कर सकता है। उसने काम पर जाना शुरू किया जिससे उसकी परिस्थिति पहले से कुछ कम कष्टप्रद हुई। यहां हम कह सकते है की उसके दुःख कम हुए अथवा तो कुछ सुख प्राप्त हुआ।

वह एक मात्र बस जो आगे से भरी हुई आती है उसमें खूब भीड रहती है और उसमें यह व्यक्ति जैसे तैसे चढ जाता है (जो उसके लिए सुख है)। थोडी देर में उसकी दृष्टि बस के आगे वाले भाग तक पहुँचती है जहां पीछे की तुलना में थोडी कम प्रतिकूलता से खडा रहा जा सकता है। व्यक्ति प्रयत्न पूर्वक आगे पहुंचता है। पहले की अपेक्षा में वह कुछ और सुखी अथवा कम दुःखी कहा जा सकता है। ऐसे ही आगे खडे रहने की अपेक्षा तीन की seat में पांच लोग बैठते हो उसमें एक स्थान, स्वतंत्र पूरी seat, खिडकी वाली, धूप न हो, पैर फैलाने के लिए अच्छी जगह हो, बस के मध्य में जहां रोड के खड्डों से कम तकलीफ हो से लेकर बस के बदले और सुविधाजनक गाडी, हवाई यान और उसमें भी  business class, private jet या फिर स्वयं के स्वामित्व वाला  worm hole भी यदि संभव हो तो उसकी भी कल्पना कर सकते है।

ऊपर की प्रत्येक दो स्थिति के बीच के अंतर को हम प्राप्त किया गया सुख अथवा छोडा हुआ दुःख कह सकते है। किसी को यह लग सकता है यह बात बहुत दुःखी और सामान्य व्यक्ति के लिए तो ठीक है पर जो पहले से ही सुखी है उसके लिए तो दुःख की निवृत्ति का कोई अर्थ नहीं है हां अधिक सुख का अर्थ हो सकता है। पर यदि हम ध्यान से सोचे तो जब हम यह कहते है की 'जो सुखी है' वहां हमारी बुद्धि में यही है की वह जो कोई अपर्याप्तता अनुभव न कर रहा हो। पर यदि कोई अपने सुख से अधिक सुख की सत्ता को जान ले तो फिर उसे स्वयं के सुख की अपूर्णता का ज्ञान (दुख के होने का ज्ञान) हो जाएगा और यदि नहीं तो उसके लिए अन्य वस्तु अधिक सुख वाली है यह नहीं कह सकते।

इस को इस शास्त्र में ही अब तक आए हुए सूत्रों के द्वारा ऐसे समझ सकते है की इच्छा आत्मा का स्वाभाविक गुण है और सुख/सुख के साधन सामने आते ही वह उद्भूत होगा। इच्छा उद्भूत हो जाने पर यदि वह सुख/सुख के साधन की प्राप्ति में कोई बाधा रहती है तो उसी को दुःख कहते है। यहां तात्पर्य यह नहीं है की उसका सुख पहले से कम होगा, तात्पर्य मात्र यह है की उसके portfolio में अब वर्तमान सुख + नया तत्वज्ञान(+) + अपूर्ण इच्छा(-) है जिसका valuation पहले (वर्तमान सुख + अविद्या(-)) से अधिक होते हुए भी उसको हम दुःख मुक्त नहीं कह सकते। दूसरे शब्दों में कहे तो जब तक हम सर्वोच्च सुख को प्राप्त नहीं करते तब तक हम दुःख तो भोग रहे ही है भले ही हमारे ज्ञान का स्तर वह हो की हम उस दुःख को देख पाए अथवा नहीं। 

अधिक सुख का अर्थ बिना साध्य के अधिक साधन (साधन लगने वाली वस्तु मात्र) नहीं है। मान लो किसी को भूख लगी है और पेट भर भोजन के लिए उसे ५० रुपए की आवश्यकता है जो उसके पास है और वह सुखी है। अब यदि उसको पता चले की १०० रुपये में उतना ही भोजन पर सर्वश्रेष्ठ सामग्री से बना हुआ मिलता है तब और ५० रुपये का होना उसके लिए सुख का कारण और न होना दुःख का कारण बनेंगे पर उसके बाद अधिक पैसे उसके सुख का कारण नहीं बनेंगे न ही उनका न होना दुःख का कारण। यहां १०० रुपये पर उसे सर्वोच्च सुख मिलता है यह भी कह सकते है और उसके दुःखों की अत्यंत निवृत्ति हुई यह भी कह सकते है।

यही कारण है की निःश्रेयस से पहले अभ्युदय आता है। मनुष्य सुखी होता जाता है, होता जाता है (अभ्युदय) और अंत में सर्व दुःखों से मुक्त हो जाता है (मोक्ष)।

अर्थात् सर्वोच्च सुख और दुःख की अत्यन्त निवृत्ति समानार्थी है। और जब यह दोनों समानार्थी है तो सूत्रकार इन दो में से किसी का भी प्रयोग कर सकते है।
 
पर फिर भी क्या दुःखों की अत्यंत निवृत्ति पसंद करने के पीछे कोई कारण हो सकता है?

कोई भी उपदेश की उपयोगिता शब्द प्रमाण बनने तक है। वह हमें अनुमान में, उह करते समय और प्रत्यक्ष के लिए प्रयत्न करते समय भी अत्यंत उपयोगी बन सकता है पर अंत में वह रहेगा तो शब्द प्रमाण ही। प्रत्यक्ष तो व्यक्ति को स्वयं ही करना पडेगा।

शास्त्रों को हम कोई virtual reality जो हमें सीधा सीधा सुख/सत्य का अनुभव करवायेंगे ऐसा न मानते हुए उन्हें दिशा निर्देश, सुख/सत्य तक पहुंचने का मानचित्र मान के चलें तभी उनसे लाभान्वित हो पाएंगे।

अब इस दृष्टि से सूत्रकार यदि हमें ऐसा मानचित्र देना चाहते है जिससे उसका उपयोग करते समय हमारे भटकने की संभावना कम से कम हो तो क्या अपवर्ग को सर्वाधिक सुख कहो अथवा दुःखों से अत्यंत निवृत्ति इस से अंतर आएगा?

हमारे ऊपर वाले उदाहरण पर लौटते है। जहां व्यक्ति को सर्वोच्च सुख प्राप्त करने के लिए १०० रुपए चाहिए। अब हमें उसे उपदेश देना है की कैसे पता करे की पैसे क्यों कमाये जाए, कैसे कमाए जाए और पैसे कमाए जा चुके है उसका लक्षण क्या है? लक्ष्यप्राप्ति का लक्षण बताने के लिए क्या नीचे के दोनों वाक्य समान उपयोगी होंगे?

१) जब तुम्हारी लक्ष्य प्राप्ति होगी तब तुम्हारे पास अत्यंत पैसे होंगे अथवा कहो तब तुम्हारे पास १०० रुपये होंगे। (पैसा होना = सुख)

२) जब तुम्हारी लक्ष्य प्राप्ति होगी तब तुम्हारे पास पैसों की थोडी भी कमी नहीं होगी (पैसों की कमी = दुःख) 

उपदेश ग्राहक जिसके पास अभी ५० रुपये है और वह स्वयं को सुखी देखता है वह इन उपदेशों को सुनकर उस पर चलता है। 

परिस्थिति क :
उसको अधिक गुणवत्ता के भोजन के बारे में ज्ञान हुआ और उसे पाने की इच्छा भी पर अभी उसके पास मात्र ५० रुपये है। अर्थात् अब वह स्वयं की वर्तमान परिस्थिति में दुःख देख रहा है।

जीव मात्र को जब कोई भी दुःख होता है तब वह उसको दूर करने का प्रयत्न करता ही है उसके लिए उसे किसी उपदेश की आवश्यकता नहीं है। अब वह ५० रुपये प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करेगा। यहां उसकी ५० रुपए और प्राप्त करने की इच्छा तत्वज्ञान पूर्वक की इच्छा है और उसके लिए किया गया प्रयत्न सुख का/दुःख को दूर करने का कारण बनेगा।

यदि उपदेश को भी देखें तो उसके दोनों रूपों में वह अभी लक्ष्य प्राप्ति नहीं हुई है ऐसा समझकर पैसा कमाने के लिए प्रयत्न करेगा और अपने दुःख को दूर कर लेगा/सुख को पा लेगा। (वैसे तो उपदेश २ में ही उसे ठीक से पता है की वो पैसा कमाने के प्रयत्न क्यों कर रहा है तो उसी को तत्वज्ञान कहेंगे)

परिस्थिति ख :

वह सुखी है। अर्थात् उसको अधिक गुणवत्ता के भोजन के बारे में ज्ञान नहीं है और न ही पाने की इच्छा (जब तक ज्ञान नहीं होगा तो इच्छा भी नहीं होगी)

उपदेश के प्रथम रूप में वह और पैसे कमाने का प्रयत्न करेगा और वह मात्र व्यर्थ की मेहनत करके अपना सुख बढाने के बदले कम ही करेगा। क्योंकि वो अब ५० रुपये को गुणवत्ता रूपी लक्ष्य को प्राप्त करने के साधन के रूप में नहीं अपितु उसी को लक्ष्य मान कर मेहनत कर रहा है। साध्य के ज्ञान के अभाव में वह मेहनत व्यर्थ जाएगी और उसका सुख जब उसके पास ५० रुपये थे तब था उससे भी कम हो जाएगा।

यहां पैसे की कामना और उसके लिए प्रयत्न राग/मोह (जिस को उत्पन्न करने में उपदेश कारण है) जनित है और दुःख का कारण।

उपदेश के दूसरे रूप में वह सोचेगा की उस की लक्ष्य प्राप्ति हो गई है और वह अपना जितना सुख है उसकी हानि किए बिना उसको भोगेगा। अभी वो सर्वोच्च सुख से वंचित है पर उसका कारण उसकी अविद्या है (अधिक गुणवत्ता युक्त भोजन के अस्तित्व के प्रति), लक्ष्यप्राप्ति का लक्षण नहीं।

परिस्थिति ग :
वह सुखी है। उसने प्रयत्न करके १०० रुपये कमा लिए है और सर्वोत्तम गुणवत्ता युक्त भरपेट भोजन प्राप्त कर लिया है। 

हमारे उदाहरण में तो वह यहां भी और पैसे कमाने के प्रयत्न के पीछे अपनी हानि कर सकता है पर मोक्ष वाले उदाहरण में जब उसने लक्ष्य प्राप्ति कर ली है तब उसे कोई शब्द प्रमाण की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उसने स्वयं ने प्रत्यक्ष कर लिया है। न ही अब कोई हानि की संभावना है। 

दूसरे उपदेश रूप में उसकी हानि की संभावना नहीं है और इस कारण से सर्वोच्च सुख और दुःखों से अत्यंत निवृत्ति तत्वतः समानार्थी होने पर भी जिसको अभी पूरा तत्वज्ञान नहीं हुआ है उसके लिए दुःखों से अत्यंत निवृत्ति अधिक उपयोगी मानचित्र बन सकता है और वही सूत्रकार ने प्रयोग किया है।