शनिवार, 28 मई 2022

तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः। १.१.२२ (चर्चा भाग १)

सूत्र २२ के भाष्य में अपवर्ग के अनुसंधान में एक मुद्दा उठाया गया है और उसकी विस्तृत चर्चा (प्रतिपक्षी की कल्पना करके) की गई है। पहले नीचे वह चर्चा प्रस्तुत की है पर उसके बाद में मेरे कुछ अपने विचार रखे है।

सूत्र २२ और उसका अर्थ इस प्रकार था। 

तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः। १.१.२२
उस  दुःख से अत्यंत छूट जाना मोक्ष है।

भाष्यकार इसको खोलते हुए कहते है की वर्तमान जन्म (शरीर) के छूटने पर नया जन्म न ग्रहण करने से जन्म के साथ नित्य संबंध रखने वाले और उससे विभक्त हो कर न रहने वाले दुःखों से आत्मा को सम्पूर्ण, अत्यंत छुटकारा मिल जाता है।

भाष्यकार आगे बताते है की मोक्ष (अपवर्ग) की अवस्था में आत्मा अभय (भय रहित), अजर (व्याधि रहित), मृत्यु रहित स्थान में परमात्मा के अनंत आनंद को अबाधित रूप से भोगता है।

भाष्यकार द्वारा प्रस्तुत चर्चा :

कुछ लोग ऐसा मानते है की मोक्ष मिलने पर जो आनंद आत्मा भोगता है वह उसका अपना है अर्थात् आत्मा का स्वाभाविक आनंद है जो उसका अपना ही गुण होने पर भी संसार में रहते हुए प्रकट नहीं हो रहा था (आत्मा को अपने अंदर के आनंद का ज्ञान नहीं हो पा रहा था) और अब बंधनों के हट जाने पर प्रकट हो गया। (जब की सिद्धांत पक्ष में आत्मा की आनंद भोग करने की शक्ति अपनी स्वाभाविक है पर अपवर्ग में मिलने वाला आनंद परमात्मा का है।)

इसका खंडन करते हुए भाष्यकार कहते है की पूर्वपक्षी के इस मत में प्रत्यक्ष अनुमान अथवा शब्द कोई भी प्रमाण न होने से यह मत सर्वथा अप्रामाणिक है।
 
यद्यपि प्रमाण के अभाव से उपरोक्त मत का खंडन हो ही जाता है पर फिर भी भाष्यकार उस मत के पक्षधर कल्पित पूर्वपक्षी की और से स्वयं ही कुछ तर्क दे कर उनका भी खंडन प्रस्तुत करते है।

मान लो की आनंद आत्मा का अपना स्वभाव है और मोक्ष में वही आनंद प्रकट हो जाता है तो उस प्रकटीकरण का कारण क्या है?
यदि कहो की कारण नित्य है (अर्थात् कोई कारण नहीं है, आनंद नित्य प्रगट ही रहता है) तो मोक्ष और बद्धावस्था में कोई अंतर नहीं रह जाएगा क्योंकि दोनों ही अवस्थाओं में जीवात्मा वह आनंद से परिपूर्ण रहेगा। धर्म अधर्म से उत्पन्न सुख दुःख के साथ साथ जीवात्मा का अपना स्वाभाविक आनंद भी रहेगा। 

यदि कहो की ऐसा मानने में क्या हानि है तो वह प्रत्यक्ष से विपरीत जाता है क्योंकि मनुष्य अधर्म से उत्पन्न दुःख भोगते समय आनंद का अनुभव नहीं करता। और फिर अपवर्ग अवस्था का आनंद इतना अधिक और प्रबल है की यदि उसका सांसारिक सुख दुःख के साथ मिश्रण माने तो सांसारिक सुख दुःख का अस्तित्व नगण्य ही रह जाएगा और ऐसे में न धर्म अधर्म के फल का कोई अर्थ रहेगा न ही बद्धावस्था और मुक्तावस्था में कोई अंतर। 

उपरोक्त तर्क से बाधित होकर यदि पूर्वपक्षी कहता है की मोक्ष अवस्था में आनंद के प्रकटीकरण का कोई अनित्य कारण है तो उसको वह कारण बताना चाहिए और क्योंकि वह कारण अनित्य है अर्थात् उत्पन्न हुआ हो ऐसा है तो उसके उत्पन्न होने का कारण भी बताना चाहिए। मान लो की उसने कोई कारण जैसे योगसमाधि से उत्पन्न धर्म को आत्मा के स्वाभाविक आनंद के प्राकट्य का कारण बताया (वो जो भी कारण बताएगा वह आत्मा के बद्धावस्था के समय उत्पन्न हुआ होगा) तो वह कारण कार्यजगत के रहते उत्पन्न हुआ है और उसके प्रलय पर वह कारण (जैसे योगसमाधि से उत्पन्न धर्म) भी समाप्त हो जाएगा और आत्मा का आनंद भी। मोक्ष में भी आनंद का अभाव होने से संदेह उत्पन्न होगा की वह अभाव आनंद जिसका अस्तित्व है उसकी अप्राप्ति के कारण है अथवा आनंद का अस्तित्व ही नहीं है?जब सुख का बोध न हो रहा हो फिर भी सुख है ऐसा मानने के लिए कोई प्रमाण नहीं है।

यदि ये कहा जाए की योगसमाधि से उत्पन्न धर्म का नाश नहीं होता तो वह भी अप्रामाणिक है क्यों की जो भी उत्पन्न होता है उसका नाश होता ही है।

कोई नित्य अथवा अनित्य कारण है जिससे आत्मा के आनंद का मोक्ष में प्रकटीकरण होता है इस तर्क के न चल पाने पर पूर्वपक्षी यदि यह कहता है की बद्धकाल में आत्मा का आनंद बाधक कारण से अप्रकट रहता है जैसे शरीर के होने पर तो यह भी तर्क भी युक्ति वाला नहीं है की शरीर जिसका कार्य भोग की उपलब्धि करवाना है वही भोग की उपलब्धि में बाधक बनेगा और वह भी सर्वश्रेष्ठ आनंद के भोग की। भोग के साधन ही भोग को रोक दे ऐसा मानने में कोई अनुमान प्रमाण भी नहीं है। आत्मा को जब उसके पास शरीर नहीं होता (जैसे मृत्यु और जन्म के बीच में (संसार के रहते हुए अथवा प्रलयावस्था में)) तब कोई भी भोग (अनुभूति / ज्ञान / उपलब्धि) प्राप्त होता हो उस विषय में प्रमाण का अभाव है और शरीर आदि भोग के साधन न रहने पर भोग नहीं हो सकता यह अनुमान हो सकता है।

अब यदि पूर्वपक्षी यह कहता है की आत्मा शरीर के बिना आनंद भोग कर सकता है और करता है उसमें शास्त्र के वह सारे वचन को प्रमाण रूप ले सकते है जिसमें मोक्ष के लिए प्रयत्न करने का उपदेश है। अर्थात् मोक्ष इष्ट (प्राप्त करने योग्य) वस्तु है जो आनंद देगी तभी तो मनुष्य उसके लिए प्रयत्न करेगा।   

तो यह तर्क भी योग्य नहीं है क्योंकि मनुष्य मात्र इष्ट को प्राप्त करने के लिए नहीं अनिष्ट को छोडने के लिए भी प्रयत्न करता ही है और जन्म के रहते दुःखों से निवृत्ति नहीं हो सकती क्योंकि जो सुख भी है इस संसार में वह दुःख से ऐसे घुल मिल गए है की उनको अलग अलग कर के सुख सुख को ले लेना और दुःख दुःख तो त्याग देना संभव नहीं है। दुःख को यदि छोडना है तो साथ में सांसारिक समस्त सुखों को भी छोडना ही पडेगा। इसी लिए जन्म के चक्र से छूटने का उपदेश है और प्रयत्न भी होना चाहिए। दुःख से छूट जाने के लिए सुख शब्द का व्यवहार भी होता है।  

पूर्वपक्षी का मत यदि यह है की संसार के अनित्य सुख को मोक्ष के नित्य सुख की प्राप्ति के लिए छोडना चाहिए तो मनुष्य उसी तर्क से संसार के अनित्य शरीर और इन्द्रिय के बदले नित्य शरीर और इंद्रियाँ प्राप्त करने की भी इच्छा रख सकता है और उसी को मोक्ष कह सकता है। (जब की पूर्वपक्षी भी नित्य शरीर इंद्रियाँ के पक्ष में नहीं है।) पूर्वपक्षी कहें की नित्य शरीर इन्द्रिय की बात कोई युक्ति पूर्वक की नहीं है तो फिर उसी तरह नित्य सुख की बात भी युक्ति वाली नहीं है। 

आगे यह कहा गया की यदि नित्य सुख के राग में कोई मोक्ष के लिए प्रयत्न करें तो वह सफल नहीं होगा क्योंकि राग तो बंधन का कारण है और यह कहो की मोक्ष मार्ग में आगे जाता हुआ मनुष्य अपने राग क्षीण कर लेगा तो फिर उसको नित्य आनंद है या नहीं उससे कोई अंतर नहीं होगा (क्योंकि उसने उससे अपना राग हटा लिया है।) जो बात दोनों पक्ष को स्वीकार्य होगी।

भाष्यकार ने स्वयं अपवर्ग अभय अजर अमृत्युपद और ब्रह्मक्षेम (ब्रह्मानन्द) से युक्त अवस्था है यह कहा है तो वहां आनंद न होने का पक्ष वे नहीं ले रहे है। सूत्रकार ने दुःखों से मुक्ति की ही बात रखी है उसका तात्पर्य यह है की समस्त दुःखों अर्थात् जन्म चक्र के अंत के बिना उस आनंद की प्राप्ति नहीं हो सकती और सारें प्रयत्न भी उसी के लिए करने है उसके बाद ब्रह्म का आनंद तो बिना प्रयत्न के ही मिलेगा तो उसके लिए कोई उपदेश की भी आवश्यकता नहीं है।