रविवार, 22 मई 2022

पुनरुत्पत्तिः प्रेत्यभावः । १.१.१९

पुनरुत्पत्तिः प्रेत्यभावः । १.१.१९ 

पुनः (फिर) पैदा होना प्रेत्यभाव है।

प्रेत्यभाव शब्द स्वयं ही यह अर्थ स्पष्ट करता है।
प्रेत्य = प्रकर्ष रूप से जाकर (जो मर गया है अब वापस उसी शरीर में नहीं आएगा), भाव = होना। अर्थात् मर कर फिर से होना। 

आत्मा शरीर मन इंद्रियाँ इन सब का बंधना (संयोग होना) जन्म है। जब आत्मा शरीर छोडकर जाता है तब मन, इंद्रियाँ* और पंचप्राण उसके साथ जाते है और नया शरीर मिलने पर इनकी निकाई (समूह) फिर बनता है। हम अनेक योनि के और एक एक योनि में भी अनेक शरीर को प्राप्त कर के छोड चुके है (और पीछे के शरीरों से अब हमारा कोई लगाव नहीं) और आगे भी ऐसा ही होगा।

* यहां तात्पर्य सूक्ष्म इंद्रियों से है, स्थूल इंद्रियां अर्थात् इंद्रियों के गोलक शरीर का भाग है और शरीर के साथ ही नष्ट हो जाती है।
   
फिर पैदा (उत्पन्न) होने का अर्थ एक दूसरे से सम्बद्ध तत्वों की निकाई का उत्पन्न होना है आत्मा का फिर उत्पन्न होना नहीं। क्योंकि आत्मा न तो उत्पन्न होता है न ही नष्ट होता है।

यह जन्म मरण जन्म का चक्र अनादि काल से चला आ रहा है और अपवर्ग (मोक्ष) पर तुटेगा।

यहां प्रश्न हो सकता है की यदि कोई वस्तु अनादि है तो वह अनंत ही होगी। अथवा सांत है तो उसका आदि भी होगा। अनादि और सांत तो हो नहीं सकती। यह तर्क सर्वथा उचित है और यहां तात्पर्य यह है की वह प्रवाह से अनादि है और प्रवाह से अनंत भी।

मोक्ष एक बहुत ही लंबे काल तक यह चक्र का रुकना है और यह काल इतना लंबा है की मोक्ष मिलने पर यह कहना की अब यह चक्र रुक गया है गलत नहीं होगा। पर वह हमारी बुद्धि की पकड में न आए उतने लंबे काल बाद ही सही वह चक्र फिर से शुरू होगा। अर्थात् अभी हम जिस चक्र में है वह भी पीछे कभी मोक्ष से वापस आने पर शुरू हुआ होगा जो १०, १००, १०,००,००० या उससे भी अधिक कितने भी जन्म पहले हो सकता है। और उस मोक्ष के पहले भी अनंत ऐसे चक्र थे।

इसका कोई आदि न होने से यह अनादि है। और आगे भी ऐसे अनंत चक्र होंगे (अर्थात् यह प्रवाह से अनंत भी है) पर वर्तमान चक्र का एक लंबे समय तक रुकना मोक्ष में होगा जो हमारा वर्तमान लक्ष्य है जिस आधार पर ये कहा है की यह चक्र मोक्ष में रुकेगा।