प्रवृत्तिदोषजनितोऽर्थः फलम्। १.१.२०
प्रवृत्ति और दोष से उत्पन्न अर्थ (=भोग = सुख दुःख) फल है।
दोष और प्रवृत्ति अर्थात् जो धर्म अधर्म हम मन वाणी तथा शरीर से करते है उनसे जो सुख दुःख की प्राप्ति हमें होती है वह उनके फल है। और क्योंकि उन सुख दुःख की उत्पत्ति के लिए उनके साधन (देह इन्द्रिय अर्थ मन आदि) भी आवश्यक है, उन साधनों की प्राप्ति भी फल है।
यहां यह प्रश्न हो सकता है की दोष प्रवृत्ति का कारण है तो फिर यहां फिर से उसे क्यों कहा गया। उसका समाधान एक तो यह है की दोष रहित क्रिया को धर्म अधर्म रूपी कर्म उत्पन्न करने वाली प्रवृत्ति न समझनी चाहिए यह पुनः स्पष्ट करने के लिए कहा गया परन्तु पुनः कथन वाला तर्क आवश्यक नहीं है क्योंकि प्रवृत्ति से जो फल मिलते है उनको आत्मा तब ही भोगता है जब वह दोष जिनके कारण से धर्म अधर्म किया था वह अब भी हो। अर्थात् फल के लिए स्वतंत्र रूप से भी दोष की आवश्यकता है।
अर्थात् दोष रहने पर मनुष्य धर्म अधर्म करेगा। अब जब धर्म अधर्म का फल मिलने का समय आएगा तब वही दोष सुख दुःख भोगने में भी कारणरूप बनेंगे। यदि इस बीच में उसने तत्वज्ञान पा कर दोषों को हटा लिया है तो कर्म फल सामने आने पर भी आत्मा उसका भोग नहीं करेगा अर्थात् सुख दुःख नहीं भोगेगा।
बाधनालक्षणं दुःखम्। १.१.२१
बाधा स्वरूप वाला (जो प्रतिकूल है, जो पीडा, ताप देता है) वह दुःख है।
भाष्यकार कहते है की सुखदुःख के अनुभव रूपी तथा शरीर इन्द्रिय आदि साधनों रूपी जो फल है वही दुःख है। यहां समस्त फल को (जिसको हम सुख रूपी समझते है उसको भी) दुःख ही कहा क्योंकि कोई भी सुख दुःख से अलिप्त नहीं है और बडे से बडे सुख रूपी फल को भोगने के लिए भी शरीर आवश्यक है और शरीर के रहते दुःखों से (बाधनाओं से, पीडा से) अत्यंत निवृत्ति संभव नहीं है।
अर्थात् समस्त फल, जब वह सुख रूपी हो तब भी बाधनाओं से बिंधा हुआ, उससे सना हुआ ही होता है और उस फल को भोगने के लिए आवश्यक जन्म भी दुःख ही है।
तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः। १.१.२२
उस दुःख से अत्यंत छूट जाना मोक्ष है।
भाष्यकार इसको खोलते हुए कहते है की वर्तमान जन्म (शरीर) के छूटने पर नया जन्म न ग्रहण करने से जन्म के साथ नित्य संबंध रखने वाले और उससे विभक्त हो कर न रहने वाले दुःखों से आत्मा को सम्पूर्ण, अत्यंत छुटकारा मिल जाता है।
भाष्यकार आगे कहते है की मोक्ष (अपवर्ग) की अवस्था में आत्मा अभय (भय रहित), अजर (व्याधि रहित), मृत्यु रहित स्थान में परमात्मा के अनंत आनंद को अबाधित रूप से भोगता है।