शुक्रवार, 13 मई 2022

इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम्। १.१.१० चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम्। १.१.११

अब सूत्रकार प्रथम प्रमेय आत्मा के लक्षण बताते है।

इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम्। १.१.१०

इच्छा द्वेष प्रयत्न सुख दुःख ज्ञान यह आत्मा के लिङ्ग (परिचायक, लक्षण) है।

जब जीव किसी वस्तु से सुख का अनुभव करता है तो जब वह वस्तु पुनः देखता है तब उसे प्राप्त करना चाहता है। मानो किसी व्यक्ति ने आम खाया और उसे उसका स्वाद अत्यंत पसंद आया। अब जब वो आम को फिर कभी देखेगा तो उसे खाने की इच्छा करेगा। जब उसने आम खाया था तब उसका स्वाद रसना ने ग्रहण किया था और अब वह आम चक्षु से देख रहा है इन दोनों इन्द्रियों के पीछे यदि अनुभूति/ज्ञान/भोग करने वाला कोई एक ही न हो तो जैसे किसी एक व्यक्ति की अनुभूति दूसरे के साथ नहीं जुड सकती ऐसे ही रसना और चक्षु इन्द्रिय से प्राप्त ज्ञान जुड नहीं पाते। वह जो अलग अलग इन्द्रिय के विषयों को भोगता है और पूर्व के अनुभव(ज्ञान) के आधार पर इच्छा द्वेष(*अनिच्छा) करता है, इच्छा/द्वेष(अनिच्छा) के आधार पर विषय को पाने/छोडने के लिए प्रयत्न करता है, उसको पाकर/त्यागकर सुख और न पाकर/न त्यागकर दुःख की अनुभूति करने वाला कोई एक है और उससे आत्मा का अनुमान हो सकता है।

*द्वेष शब्द वर्तमान में किसी का बुरा चाहना अर्थ में प्रचलित है पर मूलतः यह शब्द द्विष् धातु से बना है जिसका अर्थ अप्रीति है (द्विषँ अप्रीतौ) अर्थात् प्रीति का अभाव मात्र, शत्रुता अथवा वैमनस्य का होना नहीं।

इच्छा द्वेष प्रयत्न सुख दुःख और ज्ञान इनको आत्मा के विशेष लक्षण, अर्थात् गुण बताये है। समवायी गुण जैसे पृथ्वी में गंध, जल में रस, अग्नि में रूप इत्यादि। गुण क्योंकि गुणी के बहार नहीं रह सकते गुण को देखकर गुणी का अनुमान होता है।

शरीर का लक्षण

चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम्। १.१.११

चेष्टा इन्द्रिय और अर्थों का आश्रय शरीर है।

जो क्रिया ज्ञान, इच्छा और प्रयत्नपूर्वक होती है उसको चेष्टा कहते है। ज्ञान, इच्छा और प्रयत्न आत्मा के गुण है इनके उभरने पर जो क्रिया शरीर में होती है वह चेष्टा है। और क्योंकि आत्मा के शरीर में न रहते हुए यह नहीं हो सकती शरीर को इनका आश्रय बताया गया है कारण नहीं।

जब शरीर ठीक रहता है तो इन्द्रियाँ* भी ठीक रहती है और जब शरीर की हानि होती है तो इन्द्रियाँ भी ठीक काम नहीं कर पाती अथवा विनाश को प्राप्त होती है जिससे इन्द्रिय शरीर के आश्रित होना स्पष्ट होता है। 

इन्द्रिय को दो भागों में देखा जाता है। सूक्ष्म इन्द्रिय और स्थूल इन्द्रिय (जिसको गोलक कहा जाता है। आँख कान इत्यादि)। सूक्ष्म इन्द्रिय आत्मा के साथ रहती है (जड प्रकृति से बनी होने पर भी। जब तक आत्मा मुक्ति को प्राप्त नहीं करता) और शरीर की हानि होने पर यद्यपि इनकी हानि नहीं होती पर स्थूल इन्द्रिय के न रहने पर / ठीक से न काम करने पर यह भी आत्मा को संवेदना पहुँचाने में असमर्थ रहती है। यहाँ हम इन्द्रिय से स्थूल इन्द्रिय (गोलक) का ही ग्रहण करेंगे जिसका आश्रय शरीर है। 

सुख दुःख की अनुभूति का सामर्थ्य आत्मा का है शरीर का नहीं पर यह संवेदना शरीर (इन्द्रिय जो स्वयं शरीर पर आश्रित है) के न होते हुए आत्मा नहीं कर सकता।  अर्थात् इन संवेदनाओं (जिसमें सारा अर्थ आ जाता है) का आश्रय भी शरीर है।