शनिवार, 7 मई 2022

आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गास्तु प्रमेयम् । १.१.९

प्रथम सूत्र में दिए गए १६ पदार्थ में से द्वितीय प्रमेय है। सूत्रकार अब इसके विभाग बताते है।

आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गास्तु प्रमेयम् । १.१.९

आत्मा शरीर इन्द्रिय अर्थ बुद्धि मन प्रवृत्ति दोष प्रेत्यभाव फल दुःख अपवर्ग यह प्रमेय है। 

इस शास्त्र में यह १२ प्रमेय लिये है इस का तात्पर्य यह नहीं है की इन १२ के अतिरिक्त कोई वस्तु जानने योग्य नहीं है। इस का तात्पर्य यह है की इस शास्त्र ने इन प्रमेयों के लिए अपने को अधिकृत किया है। इन प्रमेयों को लेते हुए भी इस शास्त्र का मुख्य विषय प्रमाण ही है।

एक तरह से ऐसे भी समझ सकते है जैसे हम कोई भी दुकान में हम जाए तो वहां तराजू मिलता है (जैसे कोई भी क्षेत्र में हमें प्रमाणों का प्रयोग करना पडता है) पर यदि हम तराजू की दुकान में जाए तो तराजू को हम देख सके इस लिए वहां पदार्थ रहते है। पर पदार्थ वहां मुख्य वस्तु नहीं है जैसे अन्य दुकानों में। पर इस का अर्थ यह भी नहीं है की इन प्रमेयों की स्वतंत्र उपयोगिता कम है। शास्त्र रचयिता ने ऐसे प्रमेय नहीं लिए है जो प्रमाणों का उपयोग कैसे करते है यह दर्शाने के काम तो आये पर उनका बाकी कोई उपयोग न हो। यह जानने योग्य पदार्थों में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण भी लिए गए है। 

इन १२ प्रमेय में भी मुख्य प्रमेय आत्मा है। क्योंकि आत्मज्ञान के बिना अपवर्ग प्राप्ति नहीं होती। बाकी के प्रमेय आत्मज्ञान तक पहुंचने में सहायक है। इन सारे प्रमेय के सूत्र आगे आएंगे पर संक्षिप्त में भाष्यकार इनको यहां भी बताते है। 

आत्मा : यह सर्व वस्तुओं को देखने वाला, भोगने वाला, अनुभव करने वाला और सर्वज्ञ है। सर्व = वो सब जो सारी इन्द्रियां ग्रहण करती है और मन उनको आत्मा तक पहुंचाता है, वो सब जो विषय मन ग्रहण करके आत्मा तक पहुंचता है और सर्व सुख दुःख। इस लिए आत्मा को सर्वज्ञ भी कहते है। शरीर और मन द्वारा प्राप्त सर्व अनुभूतिओं को जानने वाला।

ध्यान रहे सर्वज्ञ का अर्थ सबकुछ जानना वाला नहीं है। सर्व अर्थ को जानने वाला तो मात्र परमात्मा ही है और उसे भी आत्मा के नाम से कहा जाता है पर यहां वह अर्थ नहीं है।

कहां किस शब्द का अर्थ कैसे करना है यह मीमांसा दर्शन का विषय है वहां जैमिनी मुनि ने एक सिद्धांत दिया है की सर्व शब्द का अर्थ अधिकारक्षेत्र के अंदर आने वाले / विषय सम्बन्धी सर्व के लिए होता है। जैसे जब मां बच्चे को कहती है की सारा दूध पी जाओ तो उसका अर्थ बच्चे को जितना दूध पीना है उतना सारा दूध होता है। घर में पतीला भर के दूध है वह अथवा पूरे गांव में है वह सारा दूध नहीं।

न्यायदर्शन का विषय आत्मा तक ही सीमित है क्योंकि आत्मा के प्रत्यक्ष तक स्वयं के प्रयत्न होते है और वहां तक हम अपने करण के उपयोग से पहुंचते है। परमात्मा को न तो हम हमारे प्रयत्न से प्राप्त कर सकते है न ही हमारे पास कोई ऐसा करण है जो उसका प्रत्यक्ष करा सके। आत्मा स्वयं के प्रत्यक्ष के पश्चात जब उस लायक हो जाता है तो वह स्वयं अपनी उपलब्धि करवाता है।

शरीर : यह आत्मा के भोगों का आधार है। शरीर में रहते ही आत्मा सुख दुःख भोग सकता है। 

इन्द्रिय : यह आत्मा के भोग के साधन है। यहां पांच बाह्य इन्द्रियों (श्रोत त्वक् चक्षु रसना(जिह्वा) घ्राण जो हमें शब्द स्पर्श रूप रस गंध के ज्ञान करवाती है।) को ही लिया जायेगा क्योंकि सूत्रकार ने छठी इन्द्रिय मन को अलग प्रमेय के अंतर्गत लिया है।

अर्थ : शब्द स्पर्श रूप रस गंध यह अर्थ है जिनको इन्द्रियां ग्रहण करती है और मन आत्मा तक पहुंचता है। 

बुद्धि : वह भोग है जो आत्मा करता है (=ज्ञान, उपलब्धि)

मन : यह आंतरिक करण (इन्द्रिय) है। बाह्य इन्द्रियां मात्र अपने अपने नियत विषय का ही ग्रहण कर सकती है। जैसे चक्षु इन्द्रिय गंध रस स्पर्श अथवा शब्द का ग्रहण नहीं कर सकती और ऐसे ही अन्य इन्द्रियां। परन्तु मन सर्व विषय के ग्रहण का साधन (करण) है। (यहां भी सर्व का अर्थ है जीवात्मा का जिन विषयों को ग्रहण करने का सामर्थ्य है वह सर्व।). मन की यह विशिष्टता को देखते हुए मन इन्द्रिय होते हुए भी इस को इन्द्रिय (जहां मात्र बाह्य इन्द्रियों का ग्रहण किया है) से पृथक इन १२ प्रमेयों में लिया है।    
 
प्रवृत्ति, दोष  : दोष और दोष पूर्वक प्रवृत्ति वह शरीर इन्द्रिय अर्थ बुद्धि सुख दुःख के उत्पन्न होने के कारण है।  

प्रेत्यभाव : एक देह को त्याग कर अन्य देह ग्रहण करना। अर्थात् ऐसा नहीं है की वर्तमान देह के पहले हमारे और देह नहीं थे न ही ऐसा है के वर्तमान के बाद और नहीं होंगे। यह आत्मा का देह प्राप्ति का क्रम जो अनादि काल से चल रहा है और अपवर्ग तक चलता रहेगा यह प्रेत्यभाव है।

फल : साधन सहित सुख दुःख की प्राप्ति फल है। ध्यान रहे यहां मात्र सुख दुःख नहीं कहा गया और एक तरह से साधन ही मुख्य फल है। साधन हमें मुफ्त में नहीं मिलते। कर्माशय में से पुण्य खर्च करके मिलते है। फिर वह साधन का उपयोग हम कितना सुख दुःख पाने के लिए करते है यह हम पर निर्धारित है।

जैसे मानो आपने एक अच्छा tele lens ख़रीदा bird photography के लिए। अब उसके पैसे तो हर एक ख़रीदकर्ता को एक से देने पडेंगे फिर चाहे कोई उसका बहोत ही उत्कृष्ट, कोई मध्यम और कोई उसका निकृष्ट प्रयोग करें। ऐसे ही हमने खूब सारे पुण्य खर्च करके मनुष्य शरीर और अच्छे से काम करने वाली इन्द्रिया ली यह हमारे कर्माशय का फल होगा। अब हम पर निर्भर है की हम इन साधन का क्या उपयोग करें। हम इन साधन का ऐसा उपयोग भी कर सकते है की इनके लिए किया गया खर्चा अनेक गुना वापस मिल जाये या फिर पैसे डुबो भी सकते है और डुबोने पर आये तो हम इस का उपयोग करके अपने आप के बडे बडे नुकसान भी कर सकते है जो मनुष्येतर शरीर में रहते हुए नहीं हो सकते है।

दुःख : यहां दुःख का अर्थ सुख का न होना नहीं है। परन्तु जब सुख भी होता है तब भी हमेशा वह दुःख से लिप्त ही होता है इसको जानना है। 

अपवर्ग : जन्म मरण प्रवाह के उच्छेद को अपवर्ग कहते है जहां लेश मात्र भी दुःख नहीं है और परमात्मा का अनंत सुख है। यह जान लेने से की एक भी (सांसारिक, शरीर रहते हुए मिलने वाला) सुख दुःख से रहित हो ही नहीं सकता, मनुष्य वह सब दुःख लाने वाले सुखों से भी विरक्त होगा और उसका अपवर्ग का मार्ग प्रशस्त होगा।

प्रश्न :- 

१) नीचे में से कौन कौन से कथन सही है?

क) सूत्रकार ने इस शास्त्र के लिए प्रमेय इस लिए लिए है की प्रमाणों का प्रयोग कैसे करना है वह दिखाने के लिए उन्हें प्रमेयों की आवश्यकता थी। 
ख) सूत्रकार ने सर्वश्रेष्ठ प्रमेय इस शास्त्र में लिए है जिनके जान लेने से अपवर्ग की प्राप्ति होगी। 
ग) इन १२ प्रमेयों में मुख्य प्रमेय आत्मा है। बाकि ११ आत्मा को समझने में सहायक है। 
घ) यहां भाष्यकार ने आत्मा को सर्वज्ञ कहा है। इससे स्पष्ट है की आत्मा का अर्थ इस शास्त्र में परमात्मा होता है क्योंकि उसके अतिरिक्त सब कुछ कोई नहीं जानता।

२) जब मन भी इन्द्रिय है तो प्रमेयों में जहां इन्द्रिय पहले ही आ चूका है मन को फिर क्यों लिया गया है?

३) आत्मा शरीर में रहते हुए इन्द्रियों और मन से गृहीत अर्थ का ज्ञान प्राप्त करता है (भोगता है). इसमें इस सूत्र में प्रयोग किया गया शब्द बुद्धि किस वस्तु के लिए प्रयोग किया है?