स द्विविधों दृष्टादृष्टार्थत्वात् । १.१.८
वह (शब्द प्रमाण) दो प्रकार का होता है। दृष्टार्थ (इस जन्म में प्रत्यक्ष होने वाले विषय वाला) और अदृष्टार्थ (इस जन्म में प्रत्यक्ष न होने वाले विषय वाला।)
दृष्टार्थ : शब्द प्रमाण से जाने गए अर्थ का इसी जन्म में प्रत्यक्ष किया जा सके वह दृष्टार्थ है। जैसे किसी ने कहा की अमुक जगह पर मेला लगा है। हम वहां जा कर उसका प्रत्यक्ष कर सकते है। जीवन में ऐसे शब्द प्रमाण व्यवहार चलाने में प्रचुर मात्रा में उपयोग में आते है।
अदृष्टार्थ : शब्द प्रमाण से जाने गए अर्थ का इसी जन्म में प्रत्यक्ष न किया जा सके वह अदृष्टार्थ है। यदि कोई शब्द प्रमाण अगले जन्मों के बारे में कुछ बताता है तो उस अर्थ को हम इस जन्म में देख नहीं सकते और अगले जन्म में हमें यह याद नहीं होगा की हमने पिछले जन्म में शब्द प्रमाण से कुछ जाना था।
तो क्या ऐसे विषयों के बारे में हम शब्द प्रमाण से अतिरिक्त कुछ नहीं जान सकते? जान सकते है। अनुमान प्रमाण का प्रयोग हम ऐसी जगहों पर कर ही सकते है।
उदाहरण के लिए यह शब्द प्रमाण ले लेते है की आत्मा है। (यह वैसे तो दृष्टार्थ में आयेगा क्योंकि आत्मा का (स्वयं का) प्रत्यक्ष संभव है। पर ऐसा करना इतने अल्प संख्या में योगिओं के लिए ही संभव है की सामान्य जन के लिए वह अदृष्टार्थ कहा जा सकता है। हम आत्मा का प्रत्यक्ष करने में असमर्थ होते हुए भी इच्छा द्वेष प्रयत्न आदि को देखकर आत्मा का अनुमान कर सकते है।
यह दो विभागों को स्पष्टता से बताने का उद्देश्य यह है की हम अदृष्टार्थ को शब्द प्रमाण न माने यह न हो। जैसे की वेदों में आए हुए अदृष्टार्थ शब्द प्रमाण।
परमात्मा सबसे बडा आप्त है क्योंकि वह सर्वज्ञ है और हमारे उपकार के लिए उसका उपदेश होता है। इस लिए वेद जो ईश्वर का उपदेश है (जो वह प्रत्येक सृष्टि के प्रारंभ में श्रेष्ठ ऋषिओं के अंतःकरण में प्रकाशित करता है।) शब्द प्रमाण है।* और ऐसे शब्द प्रमाणों को भी अनुमान प्रमाण से जानने के प्रयत्न किए जा सकते है।
*वेद अथवा अन्य वेद सम्मत शास्त्र को शब्द प्रमाण मानने का अर्थ यह बिलकुल नहीं है की कोई भी उनका जो अर्थ करने लगे वही शब्द प्रमाण है। या तो हम व्याकरण निरुक्त वगैरह पढकर, हमारे अंतःकरण को पूर्ण निर्मल और पवित्र बनाकर अपने आप को इस लायक बनाए जिससे हम उनका अर्थ स्वयं समझ सके अथवा ऐसा आप्त ढूंढे जो हमें अर्थ बता सके। (और वहां पहुंचने के लिए भी हमें कई शब्द प्रमाणों से लाभान्वित होना पडेगा तो हमें आप्त तो ढूंढना ही पडेगा।)
प्रश्न :-
१) शब्द प्रमाण वह है जहां हम आप्त उपदेश से कोई वस्तु जानते है और ऐसा करके जब हमें ज्ञान मिल ही जाता है तो अनुमान प्रमाण अथवा प्रत्यक्ष से जानने की कोई आवश्यकता नहीं रहती। सही/गलत?
२) वेद और वेद सम्मत ऋषिकृत शास्त्र में कही गयी वस्तु शब्द प्रमाण है फिर भले ही वह अदृष्टार्थ हो। सही/गलत?
३) जब भाई मैक्समूलर हमें वेदो का अर्थ समझाते है तो वह हमारे लिए शब्द प्रमाण है क्यों की वेद में कही गयी बात ईश्वर का शब्द होने से शब्द प्रमाण है। सही/गलत? क्यों?
४) आप अपने मित्र को मिलने उसके घर जाते है। आंगन में उसका ४ साल का बच्चा खेल रहा है। वह आप को बताता है की पापा तो घर पर नहीं है और आप वापस आ जाते है। क्या यहां बच्चे द्वारा दी गयी जानकारी शब्द प्रमाण है?