इन्द्रियों के लक्षण
घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्राणीन्द्रियाणि भूतेभ्यः। १.१.१२
घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्राणीन्द्रियाणि भूतेभ्यः। १.१.१२
घ्राण रसना चक्षु त्वक् तथा श्रोत्र ये पाँच ज्ञानेंद्रियाँ पांच भूतों के सहयोग से कार्य करती है तथा इनके गोलक पञ्चभूतों से उत्पन्न होते है।
यह लक्षण सूत्र है पर सूत्रकार ने मात्र इन्द्रियों के नाम बताये है। ऐसा इसलिए की इनके नाम में ही इनके लक्षण अंतर्निहित है जो इनके निर्वचन से स्पष्ट होता है।
यह लक्षण सूत्र है पर सूत्रकार ने मात्र इन्द्रियों के नाम बताये है। ऐसा इसलिए की इनके नाम में ही इनके लक्षण अंतर्निहित है जो इनके निर्वचन से स्पष्ट होता है।
घ्राण का निर्वचन है जिघ्रति अनेन इति घ्राणम्। जिससे सूंघता है, गंध को ग्रहण करने का साधन।
रसन = रासयति अनेन इति रसनम्। चखता है जिससे वह रसन (रसना) है।
चक्षु = चष्टे अनेन इति चक्षुः। देखता है जिसके द्वारा वह इन्द्रिय चक्षु है।
त्वक् =बाकी इन्द्रियों की तरह त्वक् में निर्वचन नहीं हो पायेगा।
त्वक् (=त्वचा) शब्द त्वच संवरणे (संवरण = अच्छी तरह से ढक लेना) धातु से जो अच्छी तरह से ढक लेता है अर्थ में होता है। यह शब्द तनु विस्तारे से भी बन सकता है जिसका अर्थ फैला हुआ होगा। दोनों निर्वचन का तात्पर्य समान है। जिसने शरीर को ढका हुआ है अथवा सम्पूर्ण शरीर पर फैला हुआ है। यहाँ इन्द्रिय त्वक् में रहती है तो उसे त्वक् इन्द्रिय कह दिया जाता है। उसको स्पर्शन इन्द्रिय भी कहा जाता है। छूता है जिस इन्द्रिय के द्वारा।
श्रोत्र = शृणोति अनेन इति श्रोत्रम्। सुनता है जिसके द्वारा वह इन्द्रिय श्रोत्र है।
अपने अपने विषय को ग्रहण करना प्रत्येक इन्द्रिय का लक्षण (उसकी पहचान) है।
सूत्रमें भूतेभ्यः का अर्थ है इन्द्रियां भूतों (पाँच महाभूतों) से सम्बद्ध है। इनसे उत्पन्न हुई है और उनके गुणों का ग्रहण कराती है।
यह भूत कौन से है यह अगला सूत्र बताता है।
पृथिव्यापस्तेजो वायुरकाशमिति भूतानि। १.१.१३
पृथ्वी जल अग्नि वायु तथा आकाश ये पाँच स्थूलभूत या महाभूत कहे जाते है।
अर्थ के लक्षण
गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः पृथिव्यादिगुणास्तदर्थाः। १.१.१४
गन्ध रस रूप स्पर्श शब्द यथाक्रम पृथ्वी आदि के गुण है तथा घ्राणादि इंद्रियों के विषय है। (यह बाह्य इन्द्रियों से गृहीत होने वाले अर्थ है।)
घ्राण पृथ्वी से (उसकी प्रधानता से) उत्पन्न होती है और गंध जो को पृथ्वी का गुण है उसको ग्रहण कराती है। ऐसे ही रसना चक्षु त्वक् तथा श्रोत्र में जल अग्नि वायु तथा आकाश की प्रधानता है और वह उनके गुण रस रूप स्पर्श तथा शब्द का ग्रहण कराती है।
बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानमित्यनर्थान्तरम्। १.१.१५
बुद्धि उपलब्धि और ज्ञान ये तीनों पद समानार्थक है।
अन्य शास्त्रों में बुद्धि शब्द को मन के समानार्थक के रूप में प्रयोग किया गया है (जैसे योगदर्शन) पर यहाँ इस शास्त्र में बुद्धि को ज्ञान अर्थ में लिया गया है।