शनिवार, 21 मई 2022

युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिंगम्। १.१.१६, १.१.१७ -१८

आगे सूत्रकार मन का लक्षण बताते है। यद्यपि सूत्रकार ने मन का एक लक्षण बताया है भाष्यकार ने मन के कुछ लक्षण और बताये है जैसे की,

स्मृति : जहाँ ज्ञान उभरता है पर बाह्य इन्द्रिय से कोई काम नहीं हो रहा है।

अनुमान : यहाँ लिंग का प्रत्यक्ष हो रहा है पर स्मृति और उस स्मृति को लिंग के प्रत्यक्ष से जोडकर नये ज्ञान की प्राप्ति होने में भी कोई बाह्य करण काम नहीं कर रहा है। यह भी अंतःकरण का लक्षण है।

शब्दप्रमाण : शब्दप्रमाण में भी किसी के कहे शब्दों को उन शब्दों के पहले से जाने हुए अर्थों को उभारकर, उनके साथ जोडकर नए ज्ञान की उत्पत्ति करना मन का लक्षण है।

संशय : जब कोई ऐसे सामान्य ज्ञान होने पर जो निर्णय पर पहुंचने के लिए अपर्याप्त हो, विशेष की अपेक्षा से अनिर्णय की स्थिति उत्पन्न करना अर्थात् संशय उत्पन्न करना भी मन का लक्षण है। 

ऐसे ही प्रतिभा (अचानक कोई ज्ञान का अंदर से उभर आना), स्वप्न, उह (तर्क), संकल्प आदि में भी बाह्य इन्द्रिय का कोई व्यापार (उपयोग) नहीं है और वह भी मन के लक्षण है। 

ऐसे ही सुख दुख का प्रत्यक्ष और इच्छा आदि भी मन के बिना संभव नहीं है। यहाँ प्रश्न हो सकता है की सुख दुःख (को अनुभव करने का सामर्थ्य) और इच्छा द्वेष प्रयत्न तो सूत्रकार ने आत्मा के लक्षण बताये थे। इसका समाधान यह है की इन के लिए आत्मा और मन दोनों ही आवश्यक है तो इन्हें देखकर दोनों का अनुमान हो सकता है। पर दोनों के कार्य में अंतर है।

सुख दुःख मन में उत्पन्न होते है और आत्मा उसको अनुभव करता है (इस लिए सुख दुःख आत्मा के गुण नहीं है पर सुख दुःख को अनुभव करने का सामर्थ्य आत्मा का गुण है) जब की इच्छा द्वेष जो आत्मा के गुण है वह आत्मा में सदा रहते है और निमित्त पा कर उद्भूत (प्रकट) होते है। यहाँ मन निमित्त को आत्मा तक पहुंचाने और इच्छा द्वेष के प्रकटीकरण का साधन बनता है।  

भाष्यकार के ऊपर बताए हुए लक्षणों से मन का पता लगता है पर सूत्रकार मन का एक ही सुगम लक्षण बताते है।

युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिंगम्। १.१.१६ 

एक साथ (युगपत्) अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति न करना यह मन का लक्षण है।

मन एक समय एक ही ज्ञान को ग्रहण करता है। बाह्य इन्द्रियां एक साथ अपने अपने विषयों से जुडी रहती है पर क्योंकि मन एक समय में एक ही ज्ञान उत्पन्न करता है वह इन में से कोई एक ही (अथवा एक भी नहीं यदि वह बाह्य इन्द्रियों से होने वाले प्रत्यक्ष के उपरांत की अन्य कोई अपनी वृत्ति उत्पन्न कर रहा है तब) मन से सन्निकर्ष स्थापित कर पायेगी और वह एक ज्ञान ही एक समय में आत्मा तक पहुंचेगा।


अब प्रवृत्ति का लक्षण देखेंगे। 

प्रवृत्तिर्वाग्बुद्धिशरीरारम्भः। १.१.१७ 

वाणी मन तथा शरीर से कार्यों को करना प्रवृत्ति है। 

इस सूत्र में आया हुआ बुद्धि शब्द मन के अर्थ में है। बुद्धि शब्द बोध (ज्ञान) के अर्थ में जो हमने पीछे प्रयोग किया था भी बनता है और बोध के करण अर्थात् मन के अर्थ में भी जो अर्थ यहाँ लेना है।

पीछे हमने १.१.२ सूत्र (दुःखजन्मप्रवृत्तिदोष...) में वाणी मन तथा शरीर से होने वाले १० - १० धर्म अधर्म (पुण्य पाप) जाने थे। प्रवृत्ति वही कार्य है। (अविद्या जनित दोष युक्त प्रवृत्ति से ही पुण्य पाप बनते है तत्वज्ञान जनित निष्काम कर्म से नहीं) 


दोष का लक्षण

प्रवर्तनालक्षणा दोषाः। १.१.१८ 

जो आत्मा को सकाम कर्मों में प्रेरित करते है वे (राग द्वेष मोह) दोष कहलाते है।
 
दोष तीन है राग द्वेष और मोह। राग अविद्या जनित फल की इच्छा है। यह रजस प्रधान है। जब की मोह में अविद्या जनित फल की कामना होने पर भी मूढ़ता ज्यादा है रजस नहीं। अर्थात् यह तमस प्रधान अवस्था है।

जहाँ अविद्या (मिथ्याज्ञान) है वहां राग द्वेष मोह है ही। 

अब राग द्वेष मोह को तो हम देख नहीं सकते पर जब मनुष्य उनसे प्रेरित हो कर प्रवृत्ति करता है तो उन प्रवृत्तियों को देखकर उनके पीछे विद्यमान दोष का पता लगता है।

दोष (संस्कार) से उत्पन्न प्रवृत्ति चित्त के दृष्ट धर्म है और संस्कार जिनको हम सीधे सीधे देख नहीं सकते है वह चित्त के अदृष्ट धर्म है।

जिज्ञासु : यह दोषों के बारे में तो प्रत्येक आत्मा जानता ही है तो इनका लक्षण प्रवृत्ति है बताने की क्या आवश्यकता थी?

उत्तर : जब रागयुक्त, द्वेषयुक्त अथवा मोहयुक्त मनुष्य कर्म करता है (मन, वाणी अथवा शरीर से) तब ही उन दोषों के होने की सिद्धि होती है। यदि कभी कोई दोषयुक्त प्रवृत्ति होती ही नहीं तो दोषों की सिद्धि नहीं होती।

यदि हमें स्वयं के दोषों (संस्कारों) को समझना है तो भी अपनी प्रवृत्तियों को ध्यान से देखने पर उनको समझ पाएंगे।