शुक्रवार, 10 जून 2022

समानानेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः। १.१.२३

समानानेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः। १.१.२३

समान धर्म के ज्ञान से अथवा अनेक (*विशेष) धर्म के ज्ञान से अथवा परस्पर विरोधी ज्ञान से अथवा उपलब्धि की अव्यवस्था से अथवा अनुपलब्धि की अव्यवस्था से विशेष ज्ञान की अपेक्षा रखने वाला द्विकोटिक ज्ञान (विमर्श) संशय कहलाता है।

*एक शब्द का प्रयोग हम समान के लिए भी करते है। उस अर्थ को लेते हुए अनेक का अर्थ होगा जो समान नहीं है वह अर्थात् विशेष। 

यहां संशय का लक्षण बताने के लिए विमर्श शब्द का उपयोग हुआ है। विमर्श शब्द में वि उपसर्ग विरोध अर्थ में है और यह शब्द मृश् (मृशँ आमर्शने) धातु जिसका अर्थ स्पर्श करना (जानकारी के लिए किसी वस्तु तक पहुंचना) है उससे बना है। अर्थ होगा जो विरोधी अर्थों को छू रहा हो। अर्थात् ऐसा ज्ञान जो विरोधी धर्मों तक पहुंचता हो और इससे धर्मी का निश्चय नहीं हो सकता।

पर प्रत्येक ऐसी अवस्था में जहां किसी वस्तु का निश्चय न हो रहा हो वहां संशय उभरेगा यह नहीं कह सकते। यदि निश्चय करने की इच्छा भी हो तब संशय उभरेगा। जब वर्तमान ज्ञान से निश्चय नहीं हो पा रहा हो और निश्चय पर पहुंचने की इच्छा हो तब धर्मी (प्रमेय) के विशेष धर्म को जानने की इच्छा होगी जिससे निश्चय हो सके। इस लिए विशेष की अपेक्षा रखने वाला ज्ञान इसको विमर्श का विशेषण बनाया है।

जैसे मान लो किसी ने अलग अलग मत आत्मा के विषय में क्या कहते है वह पढा। उसका अपना न ही कोई आत्मा के बारे में मत/ज्ञान है न ही उसके विषय में विरुद्ध धर्मों को पढकर उसे यह जिज्ञासा हुई की इन में से कौन सही है और कौन गलत। उसने यह जाना की ये मत वाले ऐसा मानते है और वे मत वाले ऐसा मानते है और आगे बढ गया। यहां विरोधी धर्मों की प्राप्ति तो हुई पर संशय नहीं उभरा।

सूत्र में संशय उत्पन्न होने की पाँच अवस्था बतायी है।

१। समानधर्मोंपपत्ति अर्थात् दो भिन्न वस्तुओं के समान धर्मों का दिखना : हमारे सामने जो धर्मी है उसमें ऐसे लक्षणों का दिखना जो एक से अधिक धर्मी में होते है। अब उनको देखकर यह संशय उत्पन्न होगा की उन अनेक धर्मी जिनमें वो समान लक्षण होते है उन में से सामने वाला (जिसका विषय है वह) धर्मी कौन सा है।

जैसे संध्या के समय हम निर्जन स्थल से जा रहे है और कुछ दूर हमें ५-६ फिट की कोई आकृति दिखी और हमें संशय हुआ की वह कोई मनुष्य है (जो हमारे लिए भय का कारण बन सकता है) अथवा स्थाणु (ठूँठ, सूखे हुए वृक्ष का तना)। स्थाणु और मनुष्य की ऊंचाई चौडाई एक समान होने से और अपर्याप्त प्रकाश से वस्तु के विशेष गुण जैसे यदि मनुष्य हो तो उसके हाथ पैर सर और स्थाणु हो तो वृक्ष की आकृति न दिखने से यह संशय उत्पन्न हुआ जिसका निराकरण उन विशेष धर्मों को जानकर होगा।   

ध्यान रहे की यहां देखने वाले को दोनों धर्मी के समान गुणों के बारे में पहले से ज्ञान होना पडेगा तभी उसको संशय उत्पन्न होगा।

२। अनेकधर्मोंपपत्ति अर्थात् अनेक (विशेष) धर्म का दिखना : कोई ऐसा धर्म दिखना जो कहीं और नहीं दिख रहा हो और उस धर्म के आधार पर वस्तु का वर्गीकरण न हो पा रहा हो।

वैशेषिक दर्शन कहता है की कोई भी उत्पन्न पदार्थ द्रव्य गुण कर्म इन तीन में से एक होता है। अब किसी ने विभाग से शब्द को उत्पन्न होते हुए देखा (जैसे कपडा चीरने से शब्द उत्पन्न होता है, जैसे फटाका फूटते समय शब्द उत्पन्न होता है ) परंतु यह विशेष लक्षण की शब्द विभाग से उत्पन्न होता है उससे वह शब्द को द्रव्य गुण अथवा कर्म क्या माने वह वो निश्चय नहीं कर पा रहा  है अर्थात् उस विषय में उसे संशय उत्पन्न हुआ है जिसका निराकरण वह अब शब्द के अन्य विशेष लक्षणों को जानकार करने का प्रयत्न करेगा।

यहां धर्म और धर्मी दोनों प्रत्यक्ष है पर प्रत्यक्ष धर्म को देखकर देखने वाला धर्मी का यथायोग्य वर्गीकरण करने में असमर्थ है और संशय वहां उत्पन्न हुआ है।  

३। विप्रतिपत्ति अर्थात् विरोधी धर्मों का दिखना : वि = विरुद्ध, प्रतिपत्ति = ज्ञान। एक ही धर्मी के लिए एक साथ सच न हो सके ऐसी विरोधी बातों का सामने आना। जैसे किसी ने कहा की आज मंगलवार है और दूसरे ने कहा की बुधवार है अब यदि सुनने वाले को पता नहीं है की आज कौन सा दिन है तो यह संशय का कारण बन सकता है।

४। उपलब्धि अव्यवस्था : जहां वस्तु मिल रही है (उपलब्धि हो रही है) पर यह निश्चय नहीं हो पा रहा है की वह वहां होते हुए उपलब्ध हो रही है अथवा न होते हुए। उदाहरण : रण में जाते समय सामने पानी दिखने से यह संशय हो सकता यही की यह मृगमरीचिका है अथवा सच में पानी है। 

५। अनुपलब्धि अव्यवस्था : जहां वस्तु की उपलब्धि नहीं हो रही है पर यह निश्चय नहीं हो पा रहा है की वह वहां न होते हुए अनुपलब्ध हो रही है अथवा होते हुए। जैसे हमने अनेक उदाहरण देखें है जहां वस्तु होते हुए भी (प्रथम दृष्ट्या) नहीं दिखती। किसी स्थल पर तो हम न दिखती हुई वस्तु के होने के बारे में निश्चय से कह सकते है जैसे खडे हुए जीवित वृक्ष की जडें और कहीं जो नहीं दिख रहा है वह नहीं है वह भी निश्चय से कह सकते है जैसे हमारी हथेली पर (न दिखता हुआ) आंवला। पर कहीं कहीं वस्तु न दिख पाने पर भी यह संशय बना रहता है की वह है अथवा नहीं जैसे भूगर्भ जल। यह संशय अनुपलब्धि की अव्यवस्था के कारण उत्पन्न हुआ है क्योंकि जब वह होता है तब भी नहीं दिखता और नहीं होता है तब भी नहीं दिखता।


प्रश्न :-

नीचे के प्रसंग संशय उत्पन्न होने की कौन सी अवस्था का उदाहरण है। 

१। आप ने हमेशा देखा है की शरदी खांसी ऋतु परिवर्तन में प्रचुर मात्रा में दिखने को मिलते है और उनसे भयभीत होने का कोई कारण नहीं समझते थे। अब नया सायन्स कहेता है की यही लक्षण एक नए रोग में भी दिखते है जिससे भयभीत होना चाहिए। अब जब आप किसी को शरदी खांसी से ग्रसित देखते है तो आप को संशय होता है की यह हमेशा वाली शरदी खांसी है या नया रोग।

२। किसी ने एक स्तनधारी जीव देखा जिसके पंख भी थे। ऐसा उसने कहीं और नहीं देखा था न ही इस जीव के बारे में उसे कोई ज्ञान है। अब उसे संशय हो सकता है की यह जीव स्थलचर है या नभचर।

३। जीवाणु परीक्षा का परिणाम यदि यह कहता है की जीवाणु पाए गए है तब भी यह संशय रहता है की वह होते हुए प्राप्ति का परिणाम आया है अथवा न होते हुए। (True Positive / False Positive)

४। आप ट्विटर पर फॉलो करने योग्य हैन्डल ढूंढ रहे थे। अकस्मात @nyaynotes तक पहुंचते है। देखते है की इस हैन्डल के followers नहीं है पर आप को यह संशय बना रहता है की क्या यह हैन्डल फॉलो करने योग्य नहीं है इस लिए इसके फॉलोवर्स नहीं है अथवा फॉलो करने योग्य होते हुए भी ऐसा है।