प्राप्यसमा, अप्राप्यसमा जाति
प्राप्य साध्यमप्राप्य वा हेतोः प्राप्त्याविशिष्टत्वादप्राप्त्यासाधकत्वाच्च प्राप्त्यप्राप्तिसमौ। ५.१.७
साध्य को सिद्ध करने के लिए दिया गया हेतु यदि उसे प्राप्त करता है (साथ में होता है/संबंध रखता है) तो दोनों समान हो जाते है कौन किसको सिद्ध करेगा और यदि वह साध्य के साथ दिखता ही नहीं/संबंध नहीं रखता तब तो उससे साध्य की सिद्धि का प्रश्न ही नहीं उठता ऐसे उत्तर क्रम से प्राप्यसमा और अप्राप्यसमा जाति कहलाते है।
इन के लिए दिया जाने योग्य उत्तर।
घटादिनिष्पत्तिदर्शनात्पीडने चाव्यभिचारादप्रतिषेधः। ५.१.८
घट आदि कार्य की निष्पत्ति कारणों से कैसे होती है यह देख पाने से (प्राप्यसमा का उत्तर), अभिचार से शत्रु को हानि पहुँचाने के समान (अप्राप्यसमा का उत्तर)।
इन दो जाति तथा उसके उत्तर पर पुस्तकों में बहुत अधिक कोई चर्चा नहीं है। संस्कृत भाष्य में अभिचार से शत्रु को हानि पहुँचाना ही लिखा है। अभिचार को खोल नहीं गया, न कोई अन्य अर्थ दिया गया है और हिन्दी भाष्यकारों ने अभिचार का अर्थ शत्रु को हानि पहुँचने के लिए किया गया तंत्र मंत्र / जादू टोना किया है। अभिचार को यहां जादू टोने/तंत्र मंत्र के अर्थ में लेने के बदले मैं नीचे की चर्चा में लेना चाहूँगी।
इन दो जाति तथा उसके उत्तर पर पुस्तकों में बहुत अधिक कोई चर्चा नहीं है। संस्कृत भाष्य में अभिचार से शत्रु को हानि पहुँचाना ही लिखा है। अभिचार को खोल नहीं गया, न कोई अन्य अर्थ दिया गया है और हिन्दी भाष्यकारों ने अभिचार का अर्थ शत्रु को हानि पहुँचने के लिए किया गया तंत्र मंत्र / जादू टोना किया है। अभिचार को यहां जादू टोने/तंत्र मंत्र के अर्थ में लेने के बदले मैं नीचे की चर्चा में लेना चाहूँगी।
ये दोनों जाति पुस्तकों से ज्यादा समझ नहीं आई थी और मैं भी संभवतः सूत्रकार ने ऐसी जाति क्यों गिनाई होगी ऐसा प्रश्न ले कर आगे निकल गई होती।
परंतु वर्तमान समय में इन दोनों जाति को समझाने के लिए बाहर का वह जगत जिसमें हम जी रहे है वह पर्याप्त है। वैसे भी न्याय व्यावहारिक शास्त्र है तो वह जैसे व्यवहार जगत को समझने में उपयोगी है ऐसे ही व्यवहार जगत भी उसे समझने में उपयोगी होना स्वाभाविक है।
प्राप्यसमा, अप्राप्यसमा जाति को समझने का मेरा प्रयास।
ये दोनों जाति को हम कारण कार्य को कैसे निष्पन्न करता है (Mechanism of action) इस जानकारी के अभाव को सिद्ध करने के तथा उस अभाव को वादी के खंडन के लिए प्रयोग करने के जातिवादी के प्रयास के रूप में देख सकते है।
प्राप्यसमा : यहां साधन साध्य की एक साथ प्राप्ति को जातिवादी भी अस्वीकार नहीं कर पाता तो उनके बीच की व्याप्ति को असिद्ध दिखाने लिए कार्य कारण संबंध की अप्राप्ति दिखाने का प्रयत्न करता है। ऐसा करने के लिए वह कारण से (अकेले अथवा अन्य कारणों से मिलकर) कार्य सम्पन्न कैसे होता है इस के बारे में ज्ञान के अभाव का आलंबन लेता है। यह कारण से कार्य निष्पन्न होने के ज्ञान का अभाव दिखाने का उसका प्रयत्न ऐसा ज्ञान स्पष्ट होते हुए भी हो सकता है और स्पष्ट न होते हुए भी। (प्राप्यसमा : Invoking "correlation is not causation" claiming that there is no mechanism of action and therefore cause-effect relationship doesn't exist (when it does exist))
उत्तर : घटादिनिष्पत्तिदर्शनात्
जहां साध्य तथा साधन का संबंध प्रत्यक्ष/ज्ञात है, जैसे घट आदि कार्य, वहां साधन साध्य को कैसे सिद्ध करता है/कारणों से कार्य की निष्पत्ति कैसे होती है वह भी देखा/समझा जाता है। तो वहां प्राप्यसमा जाति असत् उत्तर सिद्ध होती है और उससे वादी का खंडन नहीं हो पाता।
जहां साध्य तथा साधन का संबंध प्रत्यक्ष/ज्ञात है, जैसे घट आदि कार्य, वहां साधन साध्य को कैसे सिद्ध करता है/कारणों से कार्य की निष्पत्ति कैसे होती है वह भी देखा/समझा जाता है। तो वहां प्राप्यसमा जाति असत् उत्तर सिद्ध होती है और उससे वादी का खंडन नहीं हो पाता।
अप्राप्यसमा : यहां जातिवादी साधन साध्य एक साथ प्राप्त ही नहीं है, उनके बीच में संबंध ही नहीं है यह दिखाने का प्रयत्न करता है। और जब कार्य कारण में कोई संबंध ही नहीं होगा तो कारण कार्य को कैसे सिद्ध करेगा। (If Jativadi manages to claim lack of correlation itself, he wont have to invoke 'correlation is not causation', which is more difficult argument to win when two things are related and people can see it much more easily if correlation is not hidden.)
उत्तर :- पीडने अभिचारात्
जहां कार्य करने से पहले कार्य सिद्धि का उपाय सोचकर अत्यंत सुव्यवस्थित तैयारी करके* (और उस तैयारी/प्रक्रिया को सार्वजनिक न करते हुए/सब को समझ में आए ऐसी न होने पर भी) उसे किया जाता है तो वह जादू जैसा लगने पर भी कारण से सम्पन्न हुआ कार्य होता है। (cause-effect relationships can exist where link between cause and effect/mechanism of action stays unknown or are intentionally hidden by well thought out measures).
जहां कार्य करने से पहले कार्य सिद्धि का उपाय सोचकर अत्यंत सुव्यवस्थित तैयारी करके* (और उस तैयारी/प्रक्रिया को सार्वजनिक न करते हुए/सब को समझ में आए ऐसी न होने पर भी) उसे किया जाता है तो वह जादू जैसा लगने पर भी कारण से सम्पन्न हुआ कार्य होता है। (cause-effect relationships can exist where link between cause and effect/mechanism of action stays unknown or are intentionally hidden by well thought out measures).
जैसे गुप्तचर द्वारा दुश्मन को हानि पहुंचाना (जिसमें हानि तो दिखती है पर गुप्तचर नहीं जिसने शत्रु को प्राप्त करके हानि पहुंचाई है। और जिसने हानि पहुंचाने का संकल्प किया है वह भी शत्रु को प्राप्त करता हुआ नहीं दिखता। अर्थात् शत्रु को हानि पहुंचाने की इच्छा करने वाले और शत्रु की हानि होने के कार्य के बीच कोई संबंध ही नहीं दिखता)
कारण और कार्य का एक समय/स्थल पर साथ में न दिखना अथवा कारण से कार्य की निष्पत्ति की प्रक्रिया की जानकारी का अभाव मात्र यह सिद्ध नहीं कर सकता की कार्य कारण संबंध है ही नहीं और वादी का खंडन करने में मात्र यह उत्तर असमर्थ है और अप्राप्यसमा जाति सिद्ध होता है।
* अभिचार = पुरश्चरण = कार्य के पहले उसके उपाय को सोचकर अत्यंत सुव्यवस्थित तैयारी के साथ कार्य करना। वर्तमान में व्यवहार में यह शब्द तंत्र मंत्र से शत्रु हानि के लिए रूढ है पर किसी शब्द का वर्तमान में रूढ प्रयोग उसके यौगिक अर्थ को असिद्ध नहीं करता जब की यौगिक अर्थ उपयुक्त भी हो। और फिर कार्य के पहले उसके उपाय को सोचकर अत्यंत सुव्यवस्थित तैयारी कर गुप्त रूप से उस कार्य की सिद्धि करने का शत्रु हानि से अधिक उपयुक्त उदाहरण क्या हो सकता है। तो उस शब्द का शत्रुहानि के साथ हानिकर्ता की प्राप्ति न होने दे ऐसे कार्य के लिए रूढ होना भी यौगिक अर्थ से सुसंगत ही है।
वैसे जनसामान्य का ज्ञानस्तर जब अति निम्न हो जाए तब तो विशेष ज्ञान से किए गए कार्य जादू से कम नहीं लगते भले ही उनके पीछे के ज्ञान को छुपाने के लिये कोई प्रयत्न न किया गया हो (लोग उन्हें शब्द प्रमाण से जादू टोना अथवा विज्ञान मान लेते है फिर)।
"Any sufficiently advanced technology is indistinguishable from magic." - Clarke's third law
यदि वादी कार्य कारण संबंध जिससे साधन धर्म से साध्य धर्म की सिद्धि होती है वह स्वयं समझने में अथवा समझाने में अथवा कम से कम इतना समझाने में की कार्य निष्पत्ति की पूरी प्रक्रिया सामने न होने पर भी कारण से ही कार्य हो रहा है वह स्पष्ट है, निष्फल रहता है तो जातिवादी सफल रहता है।
कारण से कार्य की निष्पत्ति सिद्ध करना किन किन परिस्थितियों में कठिन रहता है उसे समझने का प्रयत्न करते है जिससे इस जाति का व्यवहार में कैसे उपयोग होता है वह समझने में सरलता रहे।
१) वह ज्ञान (mehcanism of action) तक अभी तक मनुष्य पहुँच ही नहीं पाया है / पूर्ण रूप से पहुँच नहीं पाया है। (परंतु अनुमान प्रमाण से कार्य कारण संबंध का होना ज्ञात होता है)
२) वह ज्ञान कुछ लोगों के पास है पर अभी वह अन्य तक पहुंचा नहीं है / उन्होंने अन्यों को नहीं बताया है। (जातिवादी इस आशा में है की उसका प्रतिवादी उन लोगों में से है जो कारण से कार्य कैसे निष्पन्न होता है वह नहीं समझ पाए है / नहीं समझा पाएंगे)
३) उस ज्ञान को प्रस्तुत करने में विविध प्रकार की बाधाएं खड़ी कर दी गई है। जिससे कार्य कारण संबंध को थोडा अथवा बहुत छुपाना संभव हो पाये।
४) उस ज्ञान तक कोई स्वयं पहुँच न पाए इस हेतु से उस प्रक्रिया से संलग्न विविध जानकारियों/प्रमाणों को दूषित करने का प्रयत्न किया गया है।
(सूत्र ५.१.८ में दिए गए दो उदाहरण mechanism of action के ज्ञात होने / न होने के दो छोर के उदाहरण है। घट आदि वह छोर का उदाहरण है जहां वह जन सामान्य को सहज प्रत्यक्ष है और अभिचार वह जहां उसे योजनाबद्ध रूप से प्रयत्नपूर्वक अप्रत्यक्ष किया गया है। इस के बीच में रहने वाली परिस्थितियाँ इन दो के उल्लेख से गृहीत हो जाती है ऐसा मुझे लगता है।)
इससे यह भी समझ में आता है की जब व्यवहार में जाति (अथवा हेत्वाभास/छल) का प्रयोग होता है तब वह प्रयोग एक विस्तृत रणनीति का एक भाग भी हो सकता है, उसी एक प्रयोग के बल पर जातिवादी (जल्प / वितंडा में प्रवृत्त पक्ष) विजय प्राप्ति की आशा लगाए रखा हो ऐसा नहीं।
प्रश्न यह उठ सकता है की यदि जूठ/बल से निर्णय प्रभावित हो सकता है तो फिर छल जाति हेत्वाभास की क्या आवश्यकता? परंतु मनुष्य स्वयं को सत्यग्राही देखना चाहता है तब भी जब उसकी प्रीति असत्य में हो। तब असत्य को छल जाति हेत्वाभास से उतना ढकने का प्रयत्न किया जाता है जिससे वह सत्य सा लगने लगे। और उनकी सहायता मिलने पर जूठ/बल प्रयोग पर कम मेहनत करनी पडे।
प्रारंभ में कहा गया "वैसे भी न्याय व्यावहारिक शास्त्र है तो वह जैसे व्यवहार जगत को समझने में उपयोगी है ऐसे ही व्यवहार जगत भी उसे समझने में उपयोगी होना स्वाभाविक है।" बाह्य व्यवहार जगत के लिए तो सत्य है ही पर हमारे आंतरिक जगत में भी लगभग ऐसी ही स्थितियाँ मिलती है (यथा ब्रह्मांडे तथा पिण्डे)।
हमारे अंदर भी हमारे दोष प्राप्त करने योग्य को छोडने योग्य और छोडने योग्य को प्राप्त करने योग्य सिद्ध करने के लिए जाति हेत्वाभास का प्रयोग करते ही रहते है तभी तो बाहरी तथ्य एक से होने पर भी हम सब अपने अपने दोषों के वैविध्य और न्यूनाधिकता के अनुसार भिन्न भिन्न विषयों में भिन्न भिन्न निर्णयों पर पहुंचते है। कोई व्यक्ति एक विषय का सत्य सरलता से देख पाता है तो दूसरा अन्य कोई विषय का। ऐसे ही हम त्रुटियाँ भी भिन्न भिन्न प्रकार की और भिन्न भिन्न मात्रा में करते है।
उन हेत्वाभासों, जातियों को, जो हम स्वयं के सामने ही प्रयोग करते है, उनको भी पकडकर उनपर विजय पाना न्यायशास्त्र हमें सिखा सकता है। और फिर किसी और के लिए सत्य सिद्ध करने से कहीं अधिक लाभदायक स्वयं सत्य जानना है क्योंकि जाति प्रयोगों में फंसकर हम स्वयं की हानि ही करते है यहां तक भी वह घातक भी हो सकता है।
