शनिवार, 2 अप्रैल 2022

सामान्य परिचय तथा विषय प्रवेश

 न्यायदर्शन शब्द को खोला जाये तो,

दर्शन अर्थात जिसके द्वारा जाना जाता है वह (दृश्यते अनेन इति दर्शनम्) तथा न्याय* अर्थात उचित तत्वात्मक ज्ञान।

* न्याय शब्द के लिए अष्टाध्यायी में दो सूत्र आते है।
१. अध्यायन्यायोद्यावसंहाराधारावायाश्च (३.३.१२२) में न्याय निपातन दिया गया है जिसका अर्थ है जिसके द्वारा (जिस विषय को हम प्राप्त करना चाहते है वह) प्राप्त किया जाता है। नि उपसर्ग पूर्वक इण् धातु से। नीयते अनेन इति न्यायः
२. परिन्योर्नीणोर्द्यूताभ्रेषयोः (३.३.३७) यहां न्याय शब्द अभ्रेष अर्थ में है। भ्रेष अर्थात गति, चंचलता, स्थिरता का अभाव (संदेह) से विपरीत स्थिरता अर्थात तत्वात्मक ज्ञान।

न्यायदर्शन का मुख्य विषय प्रमाण है। जो ज्ञान प्राप्त करने के साधन को कहते है। प्रमाण के साथ तीन और वस्तु जुडी रेहती है। 
प्रमेय - जिसके बारे में ज्ञान प्राप्त किया जा रहा है वह
प्रमिति - वो ज्ञान जो प्राप्त किया गया है
प्रमाता - ज्ञान प्राप्त करने वाला

यही चार में सारा अर्थतत्व आ जाता है। 

यह शास्त्र मुख्यतः प्रमाण पर केंद्रित है तो भाष्यकार ने प्रथम सूत्र से पूर्व प्रमाण कब सार्थक होता है इस बात को खोला है। 

प्रमाणतोऽर्थप्रतिपत्तौ प्रवृत्तिसामर्थ्यात् अर्थवत् प्रमाणम् 

प्रमाण से अर्थ के ज्ञान होने पर तद् अनुसार की गयी प्रवृत्ति के सफल होने पर ही प्रमाण को सार्थक माना जाता है।

प्रमाणमन्तरेण नार्थप्रतिपत्तिः। नार्थप्रतिपत्तिमन्तरेण प्रवृत्तिसामर्थ्यम्।
बिना प्रमाण के अर्थ जाना नहीं जायेगा। बिना अर्थ जाने प्रवृत्ति नहीं कर सकते। 

प्रमाणेन खल्वयं ज्ञाताऽर्थमुपलभ्य तमर्थमभीप्सति जिहासति वा।   
प्रमाण द्वारा अर्थ को जानकर ज्ञाता उस अर्थ को प्राप्त करने अथवा छोडने की इच्छा करेगा।
अभीप्सा = प्राप्त करने की इच्छा
जिहासा =छोडने की इच्छा

तस्य ईप्सा जिहासा प्रयुक्तस्य समीहा प्रवृत्ति।
समीहा = सम्यक ईहा (ईह् चेष्टायाम्)
जाने हुए अर्थ को प्राप्त करने अथवा छोडने की इच्छा से की गयी वह प्रवृत्ति जो प्राप्त किये गये ज्ञान के अनुसार हो उस को प्रवृत्ति कहा है।

प्रवृत्ति के सफल होने पर ही प्रमाण को सार्थक माना जाता है। 

और प्रमाण के सार्थक होने पर ही प्रमाता, प्रमेय और प्रमिति भी सार्थक होते है। (इन चारों में से एक भी सार्थक न हो तो बाकी तीन भी सार्थक नहीं है।)

प्रमाता का अर्थ अब यह होगा।
प्रमाता = अर्थ का ज्ञान प्राप्त करके उसको प्राप्त करने / छोडने के लिए जाने हुए अर्थ के अनुसार प्रवृत्ति करने वाला। 


प्रश्न
भाग १:- बस स्टॉप पे खडा एक व्यक्ति आँख अथवा चश्मे के नंबर ठीक न होने पर बस का नंबर नहीं पढ पाता और वह अपनी बस कौनसी है वह निश्चित नहीं कर पाता।

१) यहां प्रमाता, प्रमेय, प्रमिति तथा प्रमाण क्या क्या है।
क) प्रमाता = व्यक्ति, प्रमेय =लिखा हुवा बस नंबर, प्रमिति = बस नंबर का ज्ञान, प्रमाण =नेत्र /+उपनेत्र
ख) प्रमाता = व्यक्ति, प्रमेय =बस, प्रमिति = बस का नंबर, प्रमाण =सही बस का निश्चित हो जाना।

२) यहाँ प्रमाता, प्रमेय, प्रमिति तथा प्रमाण में से कौन/क्या सार्थक हुवा और कौन/क्या नहीं और क्यूँ। 
क) चारों ही सार्थक नहीं हुए क्यों की बाकी तीन के सार्थक होने पर भी प्रमिति नहीं हो पायी तो बाकी तीन भी निरर्थक हो गए।
ख) प्रमाण सार्थक नहीं हुआ (नेत्र /उपनेत्र अर्थ का ज्ञान कराने में निष्फल रहे ) तो बाकि तीन भी सार्थक नहीं हुए।
ग) प्रमाण और प्रमिति सार्थक नहीं हुए पर प्रमाता और प्रमेय तो सार्थक ही है क्योंकि व्यक्ति और बस पर लिखा नंबर तो है ही।

भाग २:- व्यक्ति नेत्र विशेषज्ञ के पास उपनेत्र के सही नंबर जानने के लिए जाता है जिससे वो ठीक ठीक पढ पाए। वह विशेषज्ञ के दिए हुए सही नंबर के उपनेत्र बनवा लेता है। 
३) यहां प्रमाता, प्रमेय, प्रमिति तथा प्रमाण क्या क्या है।
क) प्रमाता = व्यक्ति, प्रमेय =व्यक्ति जो भी पढना चाहता है वह, प्रमिति = पढने से होने वाला ज्ञान, प्रमाण =नेत्र /+उपनेत्र
ख) प्रमाता = व्यक्ति, प्रमेय =उपनेत्र के सही नंबर, प्रमिति = उपनेत्र के सही नंबर का ज्ञान, प्रमाण =नेत्र विशेषज्ञ।

४) क्या हम यहाँ उपर के प्रमाता, प्रमेय, प्रमिति तथा प्रमाण को सार्थक कहेंगे।
क) अब तक व्यक्ति ने प्रमाण (विशेषज्ञ) द्वारा उपनेत्र के सही नंबर जान तो  लिया है पर अब जब वो उपनेत्र से ठीक ठीक पढ पायेगा तभी प्रमाण (और बाकि तीन) सार्थक कहे जाएंगे।
ख) जब विशेषज्ञ ने उपनेत्र के नंबर दे दिए तब चारों को सार्थक ही कहेंगे। आगे क्या होता है वह अलग विषय है।
ग) इनकी सार्थकता का प्रश्न ही नहीं उठता क्योंकि व्यक्ति का मूल प्रश्न तो बस का नंबर पढना है तो प्रमाण की सार्थकता की चर्चा उसी विषय में ही योग्य है। 
घ) निरर्थक कहेंगे

भाग ३:- व्यक्ति नए उपनेत्र लगाके अगली बार ठीक पढ के सही नंबर की बस में बैठ जाता है।
५) यहाँ कौन से प्रमाण सार्थक हुए।
क) (नेत्र+) उपनेत्र जिससे उसने बस के नंबर (प्रमेय) को जाना, विशेषज्ञ जिससे उसने उपनेत्र के सही नंबर (प्रमेय) को जाना। 
ख) बस पर लिखा हुआ नंबर जिससे उसने सही बस को जाना, उपनेत्र का नंबर जिससे उसने उस नंबर के उपनेत्र बनवाये। 
ग) यहाँ उसने कोई ज्ञान प्राप्त करने की क्रिया ही नहीं की तो कोई प्रमाण के सार्थक होने या न होने का प्रश्न ही नहीं उठता।

भाग ४:- व्यक्ति नए उपनेत्र लगाकर बस का नंबर पढ के वह उसको जो नंबर की बस पकडनी है वह नहीं है यह जानके बस छोड देता है। यहां कौन से प्रमाण सार्थक हुए और क्यूँ।
क) मात्र विशेषज्ञ प्रमाण सार्थक हुआ क्योंकि वो पढ तो पाया पर सही नंबर की बस में अभी तक बैठा नहीं। 
ख) कोई भी प्रमाण सार्थक नहीं होते क्योंकि वह अभी भी बस स्टॉप पे ही खडा है। 
ग) दोनों ही प्रमाण सार्थक है क्योंकि उसकी दोनों ही प्रवृत्ति (=प्रमाण के अनुसार अर्थ को पाने अथवा छोडने के लिए की गयी हुई प्रवृत्ति) सफल हुई। (गलत बस में न बैठ जाना भी बस नंबर को जान के की गयी सफल प्रवृत्ति है।)



भाष्यकार कहते है की प्रमाण से जानने योग्य समस्त अर्थतत्व इन चार में आ जाता है। सुख, सुख के हेतु, दुःख, दुःख के हेतु।

भाष्यकारने अर्थतत्व कहा है इसमें तत्व क्या है?
सत् (जो विद्यमान है, जिसकी सत्ता है उसको) को सत् के रूप में और असत् (जो नहीं है) के न होने को जानना यह तत्व ज्ञान है। 
जैसे मानो हम एक खंड में पुस्तक लेने गए। खंड में प्रकाश के अभाव से हमें पता नहीं चल पा रहा है की वहां पुस्तक है या नहीं। अब हम प्रकाश करके देखते है पर वहां पुस्तक है ही नहीं। इससे हमें पुस्तक के वहां न होने का ज्ञान हुआ जिसे हम तत्व कहेंगे क्योंकि हमने पुस्तक के अभाव को अभाव के रूप में जान लिया।

यहां प्रकाश (प्रमाण) हमें पुस्तक वहां होती तो उसका ज्ञान प्राप्त करने में भी सहायक होता और यदि पुस्तक वहां नहीं है तो उसके अभाव का ज्ञान कराने में भी सहायक होगा। अर्थात् प्रमाण से हम सत् और असत् दोनों का ज्ञान प्राप्त करते है। 

न्यायदर्शन के रचयिता ने सत् पदार्थो जिनके तत्वज्ञान से निःश्रेयस (निश्चित कल्याण) की प्राप्ति होती है उनका व्यूहन (विशेष संयोजन) १६ रूप में निर्दिष्ट किया है। 

प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अयवय तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास छल जाति और निग्रहस्थान
इन के तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।

न्यायदर्शन, जो की ५ अध्याय और प्रत्येक अध्याय में २ आह्निक (जो एक दिन में बना हुआ हो वो) में विभाजित है, उसका यह प्रथम सूत्र है। 

प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः।

प्रश्न:-
इन में से क्या तत्वज्ञान नहीं है।

क) विद्यमान के विद्यमान रुप को जानना।
ख) अविद्यमान के उस स्वरुप को जानना जो उसके विद्यमान होने पर होता। 
ग) अविद्यमान के अभाव को जानना।