अनुमान प्रमाण प्रत्यक्ष की भांति सीधा स्पष्ट नहीं है और यहां त्रुटियां होने की संभावना अधिक रहती है। परंतु प्रत्यक्ष की तुलना में इस का क्षेत्र बहुत ही व्यापक है क्योंकि हम प्रत्यक्ष बहुत ही अल्प वस्तुओं का तथा मात्र वर्तमान का ही कर पाते है परंतु व्यवहार में हमें पग पग पर प्रमाण की आवश्यकता रहती है और विषय मात्र वर्तमान के न हो कर भूतकाल अथवा भविष्य के भी होते है जहां अनुमान प्रमाण यही उपयोगी सिद्ध होता है। इन सब कारणों से इस शास्त्र का मुख्य विषय भी अनुमान प्रमाण ही है।
अनुमान प्रमाण के लक्षण अगले सूत्र में बताए गए है।
अथ तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमानम् पूर्ववच्छेषवत्सामान्यतो दृष्टं च। १.१.५
प्रत्यक्ष पूर्वक अनुमान प्रमाण तीन प्रकार का होता है। पूर्ववत् शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट।
अथ = इस के पश्चात (प्रत्यक्ष के पश्चात अनुमान का वर्णन किया जाता है)
तत्पूर्वकं = तत् (प्रत्यक्ष) पूर्वक। पहले आपने प्रत्यक्ष पूर्वक लिंग/धर्म (लक्षण) - लिंगी/धर्मी (धर्म जिसमें रहता है वह पदार्थ) का संबंध जाना हुआ है और फिर जब आप धर्म देखते हो और स्मृति में से उस संबंध के ज्ञान (व्याप्ति ज्ञान) के उभरने से अप्रत्यक्ष धर्मी का ज्ञान होता है।
वर्तमान में किया गया धर्म का प्रत्यक्ष ही अनुमान प्रमाण का हेतु बनेगा। जैसे धुआं प्रत्यक्ष होने पर अग्नि का ज्ञान होता है उसमें धुएं का प्रत्यक्ष ही हेतु है (जो अनुमान प्रमाण के पंचावयव का दूसरा अवयव है।)
त्रिविधम् = तीन प्रकार का
अनुमानम् = अनुमान प्रमाण होता है।
तत्पूर्वकं = तत् (प्रत्यक्ष) पूर्वक। पहले आपने प्रत्यक्ष पूर्वक लिंग/धर्म (लक्षण) - लिंगी/धर्मी (धर्म जिसमें रहता है वह पदार्थ) का संबंध जाना हुआ है और फिर जब आप धर्म देखते हो और स्मृति में से उस संबंध के ज्ञान (व्याप्ति ज्ञान) के उभरने से अप्रत्यक्ष धर्मी का ज्ञान होता है।
वर्तमान में किया गया धर्म का प्रत्यक्ष ही अनुमान प्रमाण का हेतु बनेगा। जैसे धुआं प्रत्यक्ष होने पर अग्नि का ज्ञान होता है उसमें धुएं का प्रत्यक्ष ही हेतु है (जो अनुमान प्रमाण के पंचावयव का दूसरा अवयव है।)
त्रिविधम् = तीन प्रकार का
अनुमानम् = अनुमान प्रमाण होता है।
(भाष्यकार पूर्ववत् शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट के दो दो अर्थ दे रहें है।)
पूर्ववत् = १) पूर्व वाला। कारण से कार्य का अनुमान २) पूर्व जैसा
शेषवत् = १) शेष वाला। कार्य से कारण का अनुमान। २) शेष (बाकि) बचा वह
सामान्यतोदृष्ट =सामान्य नियम के आधार पर अनुमान।
शेषवत् = १) शेष वाला। कार्य से कारण का अनुमान। २) शेष (बाकि) बचा वह
सामान्यतोदृष्ट =सामान्य नियम के आधार पर अनुमान।
पहले प्रथम अर्थ देखते है।
पूर्ववत् = पूर्व वाला। कारण से कार्य का अनुमान
जैसे उमड के आये हुए काले बादल (और वर्षा के अन्य चिन्ह) देखकर यह निश्चय हो जाता है की वर्षा आएगी।
शेषवत् = शेष वाला। कार्य से कारण का अनुमान।
जैसे नदी में अचानक आया हुआ बहुत पानी, उसका तेज वेग और पानी का मिट्टी पत्ते को लिए हुए होने से यह पता लगता है की ऊपर कहीं वर्षा हुई है।
सामान्यतोदृष्ट =सामान्य नियम के आधार पर अनुमान।
जैसे हमने हमेशा देखा है की यदि कोई वस्तु देशांतर को प्राप्त होती है तो ऐसा उसने गति करने पर ही होता है। अब हम कोई एक व्यक्ति को एक दिन एक जगह और अन्य दिन अन्य जगह देखते है तो हम यह जान लेते है की उसने गति की है। भले ही हमने उसे गति करते नहीं देखा।
ऐसे ही जब सूर्य किरण हम तक पहुंचती है तो यद्यपि हम उसे गति करते नहीं देख पाते पर वह सूर्य से निकल कर हम तक पहुंची है (देशांतर को प्राप्त हुई है) उससे हम जान सकते है की उसने गति की है।
अब इन का दूसरा अर्थ देखते है।
पूर्ववत् = पूर्व जैसा। हमने पूर्व में जो व्याप्तिज्ञान किया है उनमें से एक (जो दूसरे का निश्चय से बोध करता है) को देख कर दूसरे को अनुमान से जान लेंगे।
यदि व्याप्ति सम है जैसे जो उत्पन्न होता है वह नाश को भी प्राप्त होता है और जो नाश हुआ है वह उत्पन्न भी हुआ होगा। अर्थात् यदि दो में से कोई एक को देख कर दूसरे का निश्चय हो सकता है तब अनुमान दोनों और कर सकते है। यदि व्याप्ति विषम हो जैसे जहां धुआं होता है वहां आग होती है पर जहां आग हो वहां धुएं का होना अनिवार्य नहीं है। वहां हम व्याप्ति के अनुसार एक को देखकर दूसरे का अनुमान कर सकते है पर विपरीत नहीं।
यहां पूर्ववत् में प्रथम अर्थ के पूर्ववत् और शेषवत् दोनों का समावेश हो जायेगा।
शेषवत् = शेष बचा वह। जैसे मानो हमारे घर तीन मित्र आये थे। उनके जाने के बाद हमने देखा की उनमें से कोई चावीयों का गुच्छा भूल गया है। हम एक को फोन करके पूछते है पर गुच्छा उसका नहीं है। हम दूसरे को पूछते है पर वह उसका भी नहीं है। अब क्योंकि एक ही मित्र बचा है जिसका वह गुच्छा हो सकता है उसको बिना पूछे ही हम निश्चय कर लेंगे की वह उसका है।
सामान्यतोदृष्ट =सामान्य नियम के आधार पर अनुमान। जैसे हमें पता है की गुण हमेशा गुणी में ही रहता है। अब यह नियम के आधार पर जब हम कोई गुण देखते है पर गुणी का प्रत्यक्ष नहीं कर पाते है तब भी कोई न कोई गुणी तो होगा यह जान लेते है। जैसे इच्छा प्रयत्न आदि गुण को देखकर हम आत्मा (अथवा कोई न कोई यदि हम आत्मा न कहना चाहे) गुणी का अनुमान कर लेते है।
भाष्यकार सामान्यतोदृष्ट के इस अर्थ को प्रथम अर्थ से इस आधार पर अलग बताते है की वहां कार्य-कारण का सम्बन्ध था अथवा वहां जिसका अनुमान कर रहे है उस जैसी अन्य वस्तु/क्रियाएं हमने देख रखी है जब की यहां हम ऐसी वस्तु का अनुमान भी करते है जो हमने कभी भी प्रत्यक्ष नहीं की है।
मेरी टिप्पणी :-
भाष्यकार ने दो अर्थ दिए है पर दूसरे अर्थ में प्रथम अर्थ में समाविष्ट सारे प्रसंग पूरी तरह समाविष्ट हो जाते है और वह अधिक व्यापक है। तो मुझे प्रथम अर्थ की कोई प्रासंगिकता नहीं लगती। हो सकता है आगे ऐसी स्थिति में मैं अपनी Notes में एक ही लिखूं।
मेरी तत्पूर्वकं को ले कर कुछ टिप्पणियां है पर उनको जब अनुमान प्रमाण को विस्तार से आगे देखेंगे तब उठाऊंगी। पर संक्षिप्त में, 'प्रत्यक्ष प्रमाण पूर्वक' इसको व्याप्ति स्थापना से जोडना मुझे योग्य लगता है वह व्याप्ति स्थापना प्रमाण का उपयोग कर रहा है उसके द्वारा ही हुई हो, अर्थात् उसने ही व्याप्ति का प्रत्यक्ष किया हो यह कहना उचित नहीं लगता। और क्योंकि शब्द और अनुमान दोनों ही अंततः प्रत्यक्ष मूलक होते है हम उनके द्वारा स्थापित व्याप्ति आधारित अनुमान भी कर सकेंगे (हम करते तो है ही, पर ऐसा करने से तत्पूर्वकं खंडित नहीं होगा जब उसको व्याप्ति स्थापना के साथ जोड़ेंगे।)
भाष्यकार त्रिविधम् को ले कर प्रश्न उठाते है की जब तीन प्रकार का उल्लेख ही कर दिया है तो फिर त्रिविधम् भी क्यों कहा? वह तो बिना कहे भी कोई भी समझ सकता था। इसका कोई संतोष जनक उत्तर तो नहीं दिया है पर यह निर्देश किया है की सूत्रकार ने ऐसा ही तीन और सूत्र में भी आगे किया है। तो हम उसको सूत्रकार की शैली मान सकते है।
प्रश्न:-
१) जब प्रत्यक्ष प्रमाण को श्रेष्ठ माना गया है और वहां तक पहुंचे बिना जिज्ञासा पूर्ण शांत नहीं होती तो अनुमान प्रमाण को इस शास्त्र का मुख्य विषय क्यों माना गया है?
क) क्योंकि हम बहुत थोडी वस्तुओं का प्रत्यक्ष कर पाते है पर अनुमान का क्षेत्र अति व्यापक है इस दृष्टि से वह महत्वपूर्ण है।
ख) प्रत्यक्ष मात्र वर्तमान का होता है पर अनुमान भूत भविष्य का भी होता है इस दृष्टि से अनुमान व्यापक और महत्वपूर्ण है।
ग) प्रत्यक्ष सीधा स्पष्ट होता है अनुमान की तुलना में जहां गलतीयां होने की अनेक संभावनाएं रहती है इसलिए उसे विस्तार से समझना अति आवश्यक है।
घ) ऊपर के सारे कारणों से अनुमान को मुख्य विषय बनाया गया है।
ङ) प्रत्यक्ष प्रमाण ही शास्त्र का मुख्य विषय है क्योंकि वह सर्वश्रेष्ठ है।
२) सूत्रकार ने अनुमान प्रमाण कितने प्रकार का बताया है? कौन कौन से?
३) जब हमें कार्य कारण अथवा धर्म धर्मी की व्याप्ति का ज्ञान है और यदि उसमें से एक को देखकर दूसरे का अनुमान कर लेते है तो सूत्र में बताये गए किस प्रकार के अनुमान का हम प्रयोग कर रहे है?