शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

न्यायदर्शन १.१.१

प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः। १.१.१

प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अवयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास छल जाति और निग्रहस्थान इन के तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।*
*इस सूत्र के अंत में हम इस अर्थ को फिर से देखेंगे। 

यह प्रथम सूत्र में सम्पूर्ण न्यायदर्शन में आने वाली हर एक वस्तु समाविष्ट कर ली गयी है। अर्थात् हमारा न्यायदर्शन अध्ययन इन्हीं १६ पदार्थ जो की सारे सत्तात्मक (विद्यमान) है उनका अध्ययन होगा। 

इसके पहले की हम इन १६ पदार्थ का संक्षिप्त परिचय जाने, इस पहले सूत्र पर एक आक्षेप किया गया वह और उसका उत्तर देखते है। (हमारे शास्त्रों में बात को अन्य पक्ष के आक्षेप और जिज्ञासु की शंकाओं का समाधान करते हुए आगे बढा जाता है।)

आक्षेप यह है की जब जिसके विषय में ज्ञान प्राप्त करना है उसको प्रमेय कहते है तो सूत्रकार यहां संशय आदि १४ पदार्थ को प्रमेय से भिन्न क्यों लिखते है? वह भी तो जानने योग्य होने से प्रमेय के अंतर्गत ही आ जाएंगे। और यह शास्त्र मुख्यतः प्रमाण पर केंद्रित है तो यह कह देते के प्रमाण और प्रमेय के तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।

उत्तर- इन को अलग निर्दिष्ट न करने पर यह अध्यात्म विद्या में गिना जा सकता था जैसे की उपनिषद् जब की यह आन्वीक्षिकी विद्या है। 

विद्याओं को चार प्रकार में विभाजित किया गया है। 
१. त्रयी - अध्यात्म विद्या (यहां तीन प्रकार के मन्त्र होने से इसको त्रयी कहा गया है। ऋक् - जिसमें अर्थ के अनुसार पद हो, साम - जिन मंत्रो को गाया जा सके, यजु - बाकी के मन्त्र। ध्यान रहे के वेद चार है ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद तथा अथर्ववेद। इन चार वेदों में तीन प्रकार के मंत्र है।)

२. वार्ताः - व्यापार वाणिज्य का ज्ञान 

३. दण्डनीति - शासन व्यवस्था का ज्ञान

४. आन्वीक्षिकी - विशेष ज्ञान प्राप्त करने का ज्ञान देने वाली विद्या। न्याय।
आन्वीक्षिकी अन्वीक्षा* से बनता है। अन्वीक्षा = अनु ईक्षा (ईक्ष दर्शने) = नैमित्तिक ज्ञान (वो ज्ञान जो हमें स्वाभाविक रूप से ही प्राप्त नहीं है पर हमने बाद में प्राप्त किया है) प्राप्त करना। 

*आगे हम जब प्रमाण के विषय में विस्तृत चर्चा करेंगे तो देखेंगे की प्रमाण चार प्रकार के है। प्रत्यक्ष, शब्द अथवा आगम, अनुमान तथा उपमान (अथवा तीन जो उपमान को अलग न गिनो तो) पर इसमें अनुमान का क्षेत्र सबसे बडा है। यह अनुमान जो प्रत्यक्ष तथा आगम पर आधारित है, एक तरह से यही इस शास्त्र का मुख्य विषय है और इसी को अन्वीक्षा कहते है। 

संशय आदि १४ पदार्थों का पृथक उल्लेख न करने पर यह शास्त्र अध्यात्म विद्या जिसमें संशय जल्प वाद आदि प्रक्रिया नहीं अपितु सीधा तत्वज्ञान होता है उसमें गिना जा सकता था। इन पदार्थों का पृथक उल्लेख करने से यह स्पष्ट होता है की यह अध्यात्म विद्या नहीं अपितु आन्वीक्षिकी विद्या है।

हम प्रमाण और प्रमेय शब्द से परिचित है। अब संशय आदि पदार्थों की व्याख्या तथा उन्हें यहां सम्मिलित करने का संक्षिप्त हेतु समझते है। 

संशय
इन में से पहला संशय है। जिज्ञासु संशय के बारे में संशय करते हुए प्रश्न उठा सकता है की संशय की क्या आवश्यकता है? संशय कोई इच्छनीय वस्तु तो नहीं है। क्या संशयात्मा विनश्यति यह नहीं कहा गया है?

उत्तर - न्याय की प्रवृत्ति दो स्थितियों में होती ही नहीं है। एक जब किसी वस्तु का निर्णय हो गया हो और दूसरा जब विषय निर्णय के लिए उपलब्ध ही न हो। अर्थात् जब कोई उपलब्ध विषय पर अनिर्णय की स्थिति, संशय हो तब ही न्याय की प्रवृत्ति होती है।

संशय = विमर्श =कोई वस्तु का सामान्य ज्ञान (विशिष्ट ज्ञान नहीं).
कोई वस्तु का सामान्य ज्ञान तो हुआ है (अर्थात् विषय की उपलब्धि हुई है) जैसे की अंधेरे में थोडी दूर एक वस्तु देख के हमें जब संशय होता है की यह रस्सी है या सांप है तो हमें उस वस्तु के उन गुणों के बारे में सामान्य ज्ञान हुआ है जो रस्सी और सांप दोनों में होते है जैसे लम्बाई मोटाई पर उस वस्तु के विशिष्ट गुण नहीं जानने से वह वास्तव में रस्सी है या सांप यह निर्णय पर नहीं पहुंच पाए है। 

जब संशय होगा तो पक्ष विपक्ष बनेंगे और परीक्षा करके निर्णय पर पहुंचा जायेगा।


प्रश्न:-
१)
प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः। १.१.१

इस प्रथम सूत्र में आने वाले पदार्थ,
क) सत्तात्मक है  
ख) इनमें से कुछ सत्तात्मक है और कुछ असत्तात्मक (अभावात्मक)
ग) इन पर सत्तात्मक अथवा असत्तात्मक का वर्गीकरण लागू नहीं होता। 

२) इन में से कौन सा विकल्प सही है। 
क) प्रथम सूत्र हमें प्रथम अध्याय में आने वाली सम्पूर्ण विषयवस्तु की रूपरेखा देता है। 
ख) प्रथम सूत्र हमें सम्पूर्ण न्यायदर्शन में आने वाली विषयवस्तु की रूपरेखा देता है। 
ग) ऊपर के दोनों ही विकल्प गलत है। 

३) प्रथम सूत्र में सूत्रकर्ता हमें क्या विश्वास दिलाते है। 
क) सूत्र में बताये गए पदार्थों का अध्ययन प्रारम्भ करने से पुण्य मिलेगा। 
ख) सूत्र में बताये गए पदार्थों का तत्वज्ञान प्राप्त करने के पश्चात और कोई शास्त्र का अध्ययन करने की आवश्यकता नहीं रहेगी। 
ग) सूत्र में बताये गए पदार्थों का तत्वज्ञान प्राप्त करने से निश्चित कल्याण होगा। 

४) चार विद्याएं त्रयी, वार्ताः, दंडनीति और आन्वीक्षिकी के क्षेत्र अनुक्रम से क्या है।
क) अध्यात्म विद्या, वाणिज्य विद्या, शासन विद्या, विशेष ज्ञान प्राप्त करने का ज्ञान देने वाली विद्या।
ख) चार वेद, शासन विद्या, वाणिज्य विद्या, विशेष ज्ञान प्राप्त करने का ज्ञान देने वाली विद्या।
ग) चार वेद, वाणिज्य विद्या, शासन विद्या, अध्यात्म विद्या।

५) न्याय की प्रक्रिया इन में से कौन सी परिस्थिति में संभव है। 
क) जब हमें कोई वस्तु का तत्वज्ञान हो जाए। 
ख) जब हमें कोई विषय की उपलब्धि न हो। 
ग) क और ख दोनों में ही संभव है यदि हमने न्यायदर्शन का अध्ययन कर लिया है। 
घ) संशय होने पर।