प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः। १.१.१
प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अवयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास छल जाति और निग्रहस्थान इन के तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।
सिद्धांत
"यह ऐसा है" ऐसा कहकर जो अर्थ जनाया जा रहा है वही सिद्धांत है।
दृष्टान्त के बारे में बात करते समय लिए गए वाक्यसमूह में प्रथम वाक्य अर्थात प्रतिज्ञा 'पर्वत पर आग है।' सिद्धांत है।
दो पक्षों में सिद्धांत की जब भिन्नता होती है तभी चर्चा (वाद जल्प वितंडा) होती है इस लिए सिद्धांत एक महत्वपूर्ण प्रमेय (जिसको जाना जाता है) है। इस लिए इसको भी मुख्य १६ पदार्थों में जगह मिली है।
अवयव
(अनुमान प्रमाण में) साधनीय अर्थ की सिद्धि जिस पूरे वाक्यसमूह से होती है उस वाक्यसमूह के पांच अवयव है। वाक्यसमूह स्वयं इन पांच अवयव का अवयवी कहलायेगा।
यह पांच अवयव इस प्रकार है।
१) प्रतिज्ञा : दोनों पक्ष अपने अपने सिद्धांत को रखेंगे जिसे प्रतिज्ञा कहा जाता है। इस को (अपनी अपनी तरफ से, सिद्ध हो चूका हो उस अर्थ में नहीं) आगम भी कहा जाता है।
हमारे पहले के उदाहरण में पर्वत पर आग है यह प्रथम पक्ष की प्रतिज्ञा थी।
२) हेतु : यह अनुमान प्रमाण का मुख्य आधारभूत अवयव है। यहां दोनों पक्ष यह बतायेंगे की उनकी प्रतिज्ञा किस आधार पर सिद्ध होती है। इस अवयव को अनुमान भी कहते है और यह अवयव वाक्यसमूह में सबसे महत्वपूर्ण होने से सम्पूर्ण वाक्यसमूह को भी इसी के नाम से अनुमान प्रमाण कहा जाता है।
हमारे पहले के उदाहरण में 'पर्वत पर धुआं होने से।' यह प्रथम पक्ष का हेतु था।
३) दृष्टान्त : यह ऐसा उदाहरण है जो दोनों पक्ष ने पहले प्रत्यक्ष किया हुआ है और जिसके बारे में दोनों पक्ष का ज्ञान एक समान है। जहाँ धुआँ होता है वहाँ आग होती ही है। जैसे रसोई के चूल्हे में और हवन में। यह हमारा व्याप्ति सहित दृष्टान्त अर्थात तीसरा अवयव था।
जैसे प्रतिज्ञा में आगम, हेतु में अनुमान ऐसे दृष्टान्त में प्रत्यक्ष प्रमाण अंतर्भावित है।
जब हम अनुमान प्रमाण का उपयोग स्वार्थ में करते है (स्वयं किसी निर्णय पर पहुंचने के लिए) तब ऊपर के तीन अवयवों से हमारे उद्देश्य की पूर्ति हो जाती है। परन्तु यदि हम अनुमान प्रमाण किसी के साथ चर्चा करते समय प्रयोग में लाते है तो दो और अवयव जो कथा का तरीके से उपसंहार करके निर्णय प्रस्तुत करेंगे वह भी आवश्यक है।
४) उपनय : 'जैसा वह ऐसा यह' कहकर उदाहरण और साध्य में साम्य दिखाना यह उपनय है। जैसे रसोई में धुआं होता है ऐसे ही पर्वत पर भी धुआं है। यह वाक्य उपनय अवयव बनेगा। इसमें उपमान प्रमाण अन्तर्निहित है।
५) निगमन : ऊपर के तीन अवयवों से जो हमने प्रतिज्ञा वाक्य में कहा है वह सिद्ध होता है यह कहना निगमन है। 'इस से सिद्ध होता है की पर्वत पर अग्नि है' यह निगमन अवयव बनेगा।
प्रश्न :-
१) सिद्धांत के विषय में इन में से क्या सही है?
क) पंचावयवों में से प्रथम अवयव प्रतिज्ञा सिद्धांत है।
ख) पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों के हेतु अलग अलग है पर सिद्धांत एक ही होता है।
ग) यदि प्रतिपक्ष अपना सिद्धांत ही नहीं बता रहा है तो वह वैतंडिक कहलाएगा (वितंडा करने वाला)।
घ) अपना सिद्धांत बताने से अपने पक्ष की स्थापना हो जाती है।
२) अनुमान प्रमाण जब स्वार्थ में उपयोग करते है तो कौन कौन से अवयव की आवश्यकता नहीं?
३) अनुमान प्रमाण के किस अवयव को अनुमान कहा जाता है? उदाहरण (दृष्टांत) किस प्रमाण पर आधारित है?