शुक्रवार, 22 अप्रैल 2022

प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि। १.१.३

सूत्रकर्ता ने न्यायशास्त्र में पदार्थों के उपपादन का क्रम इस प्रकार रखा है।   
 
१) उद्देश २) लक्षण ३) परीक्षा 

उद्देश : नाममात्र से पदार्थ का उल्लेख करना वह उद्देश है। जैसे प्रथम सूत्र में १६ पदार्थों का नाम मात्र ले कर उद्देश किया गया है।
 
लक्षण : उद्दिष्ट पदार्थ का स्वरूप कथन, उसको अन्य पदार्थ से भिन्न स्पष्ट कर देने वाला धर्म लक्षण है। जैसे की यदि अनेक गायों में से आप किसी को कोई एक गाय बताना चाहते है तो उसको काली गाय/छोटी बछडी ऐसे कोई विशिष्ट लक्षण जो उस गाय में ही घटते हो उससे दिखाएंगे। 

परीक्षा : उद्दिष्ट पदार्थ के जो लक्षण कहे गए है वह उसके वास्तविक स्वरूप को स्पष्ट करता है की नहीं यह प्रमाणों से निश्चित करना परीक्षा है। लक्षण करने में अनेक त्रुटियां हो जाती है। जैसे की लक्षण लक्षित वस्तु पर यथार्थ घटता ही न हो (अव्याप्ति) अथवा वह अन्य वस्तुओं पर भी घटता हो (अतिव्याप्ति) अथवा लक्षण ऐसा हो की जिसका होना ही संभव न हो (असंभव)। परीक्षा से ऐसी कोई त्रुटि तो नहीं रह गयी है यह निश्चित करते है।

इस शास्त्र में दो पद्धतियां देखने को मिलती है। 
१) पदार्थ का उद्देश किया जाये (जैसे प्रथम सूत्र में 'प्रमाण') -> उसके विभाग बताये जाये (जैसे तृतीय सूत्र में प्रमाण कितने प्रकार के होते है वह बताया गया है) -> प्रत्येक विभाग के लक्षण
२) पदार्थ का उद्देश किया जाये (जैसे प्रथम सूत्र में 'छल') -> उसके लक्षण बताये जाये -> उसके विभाग बताये जाये 

तृतीय सूत्र में सूत्रकार सर्वप्रथम उद्दिष्ट पदार्थ प्रमाण के विभाग बताते है। 

प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि। १.१.३ 

प्रत्यक्ष अनुमान उपमान शब्द प्रमाण है। 

तृतीय सूत्र के प्रत्येक शब्द की व्याख्या करते हुए भाष्यकार कहते है,

प्रत्यक्ष : अक्षस्य अक्षस्य प्रतिविषयं वृत्तिः प्रत्यक्षम् 
अक्ष = इन्द्रिय, अक्षस्य अक्षस्य दो बार कहने से अर्थ होगा प्रत्येक इंद्रिय का
प्रतिविषय =अपने अपने विषय के साथ (आँख का रूप, श्रोत्र का शब्द, रसना का रस, त्वचा से स्पर्श, घ्राण का गंध (अथवा अंतःकरण का बाह्य करणों से ग्राह्य न हो ऐसे सूक्ष्म विषय जैसे आत्मा) के साथ)
वृत्ति =सन्निकर्ष, ज्ञान (यह दोनों अर्थ ले सकते है)

वृत्ति का अर्थ जब सन्निकर्ष लेंगे तब वस्तु का अर्थ/ज्ञान प्रमिति बनेगा। जैसे हमने आँख से देखकर यह पीने का पानी है यह निश्चय किया तो यहाँ पानी के रूप के साथ चक्षु इन्द्रिय के सन्निकर्ष को वृत्ति (=प्रमाण = जिससे कुछ जाना जाता है) मानेंगे तो प्रमिति "यह पीने का पानी है" उस ज्ञान को कहेंगे।
यदि हम "यह पीने का पानी है" इस ज्ञान को वृत्ति (=प्रमाण) कहेंगे तब प्रमिति उस पानी को ग्रहण करने अथवा छोडने/उपेक्षा (न पीने) की इच्छा को कहेंगे। 


अनुमान : मितेन लिंगेन अर्थस्य पश्चान्मानमनुमानम्
अनु + मान = पश्चात् + ज्ञान
मितेन = जाने हुए, लिंगेन = लक्षण से
जिस अर्थ को जानना है उसका कोई लक्षण पहले ज्ञात हो जाये उसके पश्चात् जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह अनुमान है। 
जैसे हमें पता है की धुआं आग का लक्षण है। अब जब हम धुएं को जानकर उसके आधार पर अग्नि के होने को जान लेते है वह अनुमान है। 

उपमान : सारूप्य ज्ञान, समान धर्मों का बोध
जैसे किसी ने नीलगाय नहीं देखी। उसको बताया गया की वह कुछ कुछ गाय जैसी होती है। अब जब वो नीलगाय को देखकर यह जान लेता है की यह नीलगाय है तब उसने उपमान प्रमाण का उपयोग किया है।

शब्द : जिसके द्वारा अर्थ की अभिव्यक्ति होती है।

भाष्यकार आगे बताते है की प्रमाण उपलब्धि (= बुद्धि =ज्ञान *) के साधन है और यह उसकी समाख्या (उसके निर्वचन) से ही पता लगता है।
*इस शास्त्र में बुद्धि उपलब्धि और ज्ञान समानार्थी के रूप में प्रयोग किए गए है। 
समाख्या =सम्यक रूप से आख्यान जिसके द्वारा =संज्ञा = नाम 
निर्वचन =निश्चित रूप से कथन करना =व्युत्पत्ति (शब्द किस धातु प्रत्यय से बना है यह जानना)
प्रमाण शब्द प्र उपसर्ग पूर्वक मा (माङ् माने) धातु से करण अर्थ में ल्युट् प्रत्यय से निष्पन्न हुआ है = प्रकर्ष रूप से जाना जाता है जिससे। 

हमारे शब्दों की यह विशेषता है की उनका अर्थ जानने के लिए हमें कहीं और नहीं जाना पडता, वह अपने अर्थ को स्वयं बताते है। 
जैसे मनुष्य शब्द का क्या अर्थ है यह जानना हो तो हम यह देखेंगे की मनुष्य शब्द किस धातु से बना है। मन् (मनुँ अवबोधने) धातु से यह शब्द बना है। उसका अर्थ है जो जानता है वह मनुष्य। 

और ऐसे ही प्रमाण के चारों विभाग के नाम भी अपने अर्थ को स्वयं ही बताते है जो हमने ऊपर उनका अर्थ करते समय देखा।

आगे भाष्यकार एक जिज्ञासा का उत्तर देते है। 
जिज्ञासा यह है की क्या कोई एक अर्थ को जनाने के लिए सारें प्रमाण आते है या किसी प्रमेय के लिए कोई प्रमाण और किसी और प्रमेय के लिए कोई प्रमाण ऐसी व्यवस्था है?

उत्तर : दोनों प्रकार देखे जाते है। उदाहरण के लिए मानो आप कहीं अंदर बैठे है और किसी ने आपको बताया की बहार कुछ दूर आग लगी है। यहां आप ने आग को शब्द प्रमाण से जाना। पर आपकी जिज्ञासा शांत नहीं हुई। आप बहार निकलकर देखते है तो दूर से उठता धुआं दिखाई देता है। अब आपको अनुमान प्रमाण से भी पता लग गया की आग लगी है। आप की जिज्ञासा लेकिन अभी भी पूरी शांत नहीं हुई और आप उस दिशा में जा कर आग को प्रत्यक्ष देखते है। इस तरह यहां शब्द अनुमान और प्रत्यक्ष सारे प्रमाणों का उपयोग एक ही प्रमेय के लिए हुआ। 

ऐसा ही अन्य प्रमेय जैसे आत्मा में भी है। शास्त्र से हमें शब्द प्रमाण मिलता है की आत्मा है। हम उस शब्द प्रमाण पर विश्वास करते हुए भी आत्मा के लक्षण (सुख, दुःख, प्रयत्न, ज्ञान) देखकर आत्मा को अनुमान प्रमाण से जानने का प्रयत्न भी करते है। तथापि हमारी जिज्ञासा का सम्पूर्ण समाधान तब ही हो सकता है जब हम आत्मा का प्रत्यक्ष कर ले। (जो योगसमाधि में आत्मा और मन के संयोगविशेष से योगी कर सकता है।) (यहाँ प्रमाता और प्रमेय दोनों एक ही है।)

इस प्रकार से जब एक प्रमेय को जनाने सारे प्रमाण आते है उसको अभिसंप्लव कहते है। परन्तु कुछ प्रमेय ऐसे है जहां कोई एक प्रमाण ही आता है। जैसे हाथ में रखा हुआ आंवला। यहां यह सीधा सीधा प्रत्यक्ष ही हो रहा है और हमें कोई और प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। तो कहीं मानो आप खंड में अंदर बैठे है और बिजली कडकने की ध्वनि सुनाई दी। यहां आप अनुमान प्रमाण से जान लेंगे की बाहर बिजली हुई है पर न तो यह जनाने के लिए शब्द प्रमाण है न ही उसका प्रत्यक्ष संभव है।

ऐसे ही कहा जाता है की स्वर्ग की इच्छा करने वाला अग्निहोत्र करें।  अब स्वर्ग का कोई प्रत्यक्ष नहीं कर सकता और जिसका प्रत्यक्ष असंभव हो उसका अनुमान भी नहीं करा जा सकता (उसके कोई लक्षण प्रत्यक्ष न होने पर) तो उसमें मात्र शब्द प्रमाण ही रहे जाता है। ऐसे एक प्रमेय के लिए जब एक प्रमाण आता है तो उसको व्यवस्था कहते है। 

इन सब प्रमाणों से होने वाली प्रमिति में प्रत्यक्ष प्रमाण को प्रधानता है। क्योंकि शब्द प्रमाण से जानी हुई वस्तु के भी लक्षण जानने की इच्छा रहती है और लक्षण जान कर भी उसको प्रत्यक्ष करके, पूर्ण रूप से जान कर ही आत्मा की जानने की भूख मिटती है।

प्रश्न :-

१) इन में से लक्षण के लिए कौन सा कथन सही है?
क) कोई वस्तु का प्रत्येक धर्म जो हमेशा उस में रहता हो वह उसका लक्षण कहा जायेगा।
ख) कोई वस्तु का प्रत्येक धर्म जो यदि कभी भी उस में रहता हो वह उसका लक्षण कहा जायेगा।
ग) कोई वस्तु के वह धर्म जो उसमें विशेष हो अर्थात् उसको दूसरी वस्तुओं से पृथक करने में सहायक हो वह उसके लक्षण कहे जायेंगे।

२) लक्षण करने में होने वाली कुछ त्रुटिओं के नाम हमने जाने। क्या नीचे दिए गए उदाहरणों में उन में से कोई त्रुटि है? यदि है तो कौन सी?

क) आपने रेलवे स्टेशन पर आने वाले अपने मित्र को लेने के लिए किसी को भेजा। लेने जाने वाले को आपने अपने मित्र की पहचान के लिए उसके लक्षण बताये की उसके दो हाथ दो पैर और दो आँखे है। (अधिक जानकारी : गाड़ी सामान्य ही थी - यदि किसी का एक्स्ट्रा चतुराई का मूड बन रहा हो तो।)
ख) आप अपने प्रिय महानुभाव के लक्षण किसी को बता रहे है। की वह तो त्रिकालदर्शी है और इतने बलवान की १००० व्यक्ति उन पर एक साथ हमला कर दे तो भी वह निहत्थे ही उन्हें परास्त कर सकते है।
ग) जो पढे लिखे लोग होते है उनका लक्षण है की उनको अंग्रेजी आती है। 
 
३. न्यायदर्शन में कितने प्रमाण माने जाते है? सारूप्य ज्ञान, समान धर्मों को जानकर किसी वस्तु को जान लेना कौन सा प्रमाण है?

४. किसी वस्तु का कोई लक्षण प्रत्यक्ष करना संभव न हो तो उस वस्तु को अनुमान तथा शब्द प्रमाण से ही जाना जा सकता है। सही/गलत?

५. प्रमाणों में कौन सा प्रमाण प्रधान माना जाता है? क्यों?

६. प्रमाण वह है जिससे कुछ जाना जाता है। तो यदि हम किसी वस्तु के अर्थ को प्रमाण कहे तब उससे हम क्या जानते है? (या फिर हम किसी वस्तु के अर्थ को प्रमाण नहीं कह सकते?)