गुरुवार, 14 अप्रैल 2022

न्यायदर्शन १.१.१ (तर्क - निग्रहस्थान)

प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः। १.१.१


प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अवयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास छल जाति और निग्रहस्थान इन के तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।


तर्क

तर्क को प्रमाण नहीं कहा जा सकता पर फिर वह प्रमाण से भिन्न भी नहीं है। वह प्रमाणों का सहायक है।

एक उदाहरण देखते है।
मान लो किसी को यह प्रश्न हुआ के हमारा जो ये जन्म है उसका कारण क्या है? (जन्म = जन्म मरण का क्रम)
क्या वह कारण नित्य है के उत्पन्न हुआ हो ऐसा है?
के फिर उसके पीछे कोई कारण ही नहीं है? बस आकस्मिक जन्म हो गया।

इस प्रश्न से उसके मन में ऊह चली (तर्क को ऊह भी कहते है। उह वितर्के)
यदि जन्म का कारण उत्पन्न हुआ है तब तो वह नष्ट भी हो सकता है (जो वस्तु उत्पन्न होती है वह नष्ट भी होती है यह एक सिद्धांत है। ऐसे ही यह भी सिद्धांत है की जो वस्तु उत्पन्न नहीं हुई अर्थात् नित्य है वह नष्ट भी नहीं होती।)। अर्थात् उस कारण को नष्ट करके हम जन्म (जन्म मरण के चक्र से ) छूट सकते है।

पर यदि जन्म का हेतु नित्य है तो उसका उच्छेद अशक्य होने से जन्म के क्रम का उच्छेद भी अशक्य है। और ऐसे में मोक्ष के लिए कोई भी प्रयास करना व्यर्थ है। ऐसे ही यदि हमारा जन्म कोई निश्चित कारण से नहीं अपितु आकस्मिक ही हुआ है तो भी हमारा प्रयास करना व्यर्थ है। वह जैसे आकस्मिक शुरू हुआ है ऐसे ही कभी आकस्मिक अंत भी हो सकता है या फिर नहीं भी हो सकता।

अब यह तर्क हमें इससे आगे ले जाने में समर्थ नहीं है। हमें अब प्रमाण की आवश्यकता होगी। जब हम प्रमाण खोज ने जायेंगे तो हमें शास्त्र से शब्द प्रमाण मिलता है की जन्म कर्म निमित्तक है। (कर्म = अविद्या जनित कर्म। विस्तार से आगे देखेंगे।) कर्म उत्पन्न होता है इसलिए हम इसे नष्ट करने के प्रयास भी कर सकते है।

इस तरह उपस्थित हुए हुए प्रमाण (जिसको हम ने तर्क के कारण ढूंढा था), जिसकी शंका की निवृत्ति के लिए आवश्यकता पडी थी उसको तर्क अनुगृहीत कराता है। अनु = फिर से/बाद में +गृहीत

तर्क प्रमाण तक पहुंचाता है इस तरह से वह भी तत्वज्ञान का एक अंग है। वाद में प्रमाण सहित तर्क अपने पक्ष की सिद्धि और प्रतिपक्ष का खंडन करने में सहायता करता है। (प्रमाण रहित मात्र तर्क कुछ सिद्ध नहीं कर पाता).

निर्णय
निर्णय ही तत्वज्ञान है।
निर्णय = निश्चित रूप से प्राप्त करना। नी (णीञ् प्रापणे) धातु से प्राप्त करना अर्थ में,  निर् = निश्चित रूप से।
यह प्रमाणों का फल है। निर्णय होने पर अर्थात् तत्वज्ञान की प्राप्ति होने पर वाद की समाप्ति होती है। कभी कभी इसकी (निर्णय = तत्वज्ञान की) रक्षा के लिए जल्प और वितंडा का प्रयोग भी करना स्वीकार्य होता है।

तर्क और निर्णय से ही लोक व्यवहार चलता है।  इनकी महत्ता के कारण इन्हें प्रथम सूत्र में पृथक उल्लिखित किया गया है।

वाद
अपने अपने सिद्धांतों की रक्षा करते वाक्यसमूह जो दोनों में से एक पक्ष की सिद्धि होने पर समाप्त हो जाते है उनको (उन दोनों पक्ष के वाक्यसमूहों को) वाद कहते है। इसका उद्देश्य तत्वज्ञान है, हार जीत नहीं। इस लिए यदि वाद में प्रतिपक्ष से कोई गलती भी हो जाती है तो तुरंत उस गलती को पकड के प्रतिपक्ष को निग्रहस्थान में लाने (हारा हुआ घोषित करने) के बदले गलती दिखाकर प्रतिपक्ष को उसे सुधारने का अवसर देते है।

जल्प, वितंडा
वाद से विशेष (अलग/भिन्न) जल्प और वितंडा है। विशेष शब्द में शेष धातु है अर्थात् जो बाकी बचा वह। विशेष का अर्थ वाद से अच्छा ऐसा नहीं लेना है।

जल्प में मुख्य प्रयोजन हार जीत रहता है और अपने स्थापित पक्ष की किसी भी प्रकार से सिद्धि करने का प्रयत्न किया जाता है, अपना पक्ष तत्व के विपरीत हो तो भी। वितंडा में तो वैतंडिक अपने पक्ष की स्थापना ही नहीं कराता और दूसरे के पक्ष पर प्रहार किए जाता है। पक्ष की स्थापना न करने का अर्थ है या तो वह अपनी प्रतिज्ञा ही नहीं बताएगा या फिर अपनी प्रतिज्ञा की हेतु और उदाहरण दे के स्थापना नहीं करेगा।

इनका उपयोग तत्व की रक्षा के लिए भी हो सकता है। जब समय अथवा अन्य कारणों से वाद शक्य न हो तब प्रतिपक्ष तत्व की हानि न कर पाए इस हेतु से सिद्धांती भी जल्प/वितंडा का प्रयोग कर सकता है। (यह हम आगे सूत्र में देखेंगे।)

हेत्वाभास

हेतु वह होता है जिसमें साध्य को सिद्ध करने का सामर्थ्य होता है। हेत्वाभास वह है जो हेतु जैसा लगता तो हो पर हो नहीं। मात्र हेतु के समान आभास-प्रतीत हो रहा हो और इस कारण से वह प्रतिज्ञा को सिद्ध नहीं कर पाएगा। जब ऐसा हेतु दिया जाता है तब उसको हेत्वाभास कहते है, जो उपयोग करने वाले को निग्रहस्थान में ले जाएगा।

निग्रहस्थान (हार के स्थान) में होते हुए भी हेत्वाभास को अलग से प्रथम सूत्र में उल्लिखित क्यों किया गया है?

वाद में यदि प्रतिपक्ष गलती करता है तो उसको तुरंत निग्रहस्थान में न लाकर उसको उसकी गलती दिखाकर उसे सुधारने का अवसर देते है। यहां हेत्वाभास को समझकर प्रतिपक्ष को समझना भी पडता है और हम स्वयं भी हेत्वाभास का प्रयोग न करें इसकी सावधानी रखनी पडती है। इस का ज्ञान इस कारण से महत्व रखता है जो उसे प्रथम सूत्र में लेने का कारण है। 


छल जाती निग्रहस्थान

छल : प्रतिपक्ष के वक्तव्य का जिस अर्थ में वह किया गया है उससे अन्य अथवा विपरीत अर्थ में उसका अर्थघटन करना छल है।

जाति : जाति इस शास्त्र का एक पारिभाषिक शब्द है। (जिस धर्म की चर्चा नहीं हो रही हो उससे) साधर्म्य और वैधर्म्य द्वारा प्रतिपक्ष का खंडन करना यह जाति है। (इसका विस्तार आगे देखेंगे)

निग्रहस्थान : निग्रहस्थान वह है जहां निग्रहस्थान में पहुँचने वाला पकड में आ जाता है। (निश्चित गृहीत हो जाता है) अर्थात् हार जाता है। विपरीत समझना अथवा समझ न पाना यह निग्रहस्थान है। अलग अलग निग्रहस्थानों को हम बाद में विस्तार से देखेंगे।

हेत्वाभास की ही तरह इनका ज्ञान प्रतिपक्ष की गलती को समझने तथा स्वयं गलती न करने के हेतु महत्वपूर्ण है। और यदि हमें तत्व की रक्षा के लिए जल्प वितंडा का आलंबन लेना पडा है तब भी प्रतिपक्ष यदि छल जाति का उपयोग करता है तब उसको पकड के उसको निग्रहस्थान में लाने के लिए हमें इसका ज्ञान होना आवश्यक है। 


हमने प्रथम सूत्र में आए हुए १६ पदार्थों का प्राथमिक परिचय किया। आगे इन सब को विस्तृत रूप से जानेंगे।

१५ पदार्थों के कारण आन्वीक्षिकी विद्या विशिष्ट है। इसकी महत्ता दर्शाने कौटिल्य अर्थशास्त्र के विघोद्देश प्रकरण में न्याय विद्या के बारे में कहा गया है

    प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम्।
    आश्रयः सर्वधर्माणां विघोद्देशे प्रकीर्तिता।।

यह विद्या सर्व विद्याओं के स्वरूप को प्रकाशित करता हुआ दीपक, सर्व कर्मों का उपाय और सर्व धर्मों का आश्रय है।

प्रथम सूत्र में कहा गया है की इन १६ पदार्थों के तत्वज्ञान से हमें निःश्रेयस की प्राप्ति होती है। अब प्रमाणों का उपयोग हम हर समय हर क्षेत्र हर विद्या में करते है। उस दृष्टि से तत्वज्ञान और निःश्रेयस का अर्थ हम जिन जिन विद्याओं में न्याय का प्रयोग करते है उन उन के अनुरूप होगा। जैसे की आयुर्वेद में तत्वज्ञान शरीर और औषध का ज्ञान और निःश्रेयस स्वास्थ्य होगा, वाणिज्य में वाणिज्य संबंधी ज्ञान और सफलता होगा।

परन्तु न्यायशास्त्र का (आन्वीक्षिकी विद्या होने पर भी) अपना विषय अध्यात्म है। इसका तत्वज्ञान जो प्रमेय के अंतर्गत आत्मा आदि १२ प्रमेय गिनाये गए है उनका तत्वज्ञान और इसका निःश्रेयस आत्यंतिक दुःख निवृत्ति रूप अपवर्ग अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति है। प्रथम सूत्र का अर्थ अब यह होगा।

प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अवयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास छल जाति और निग्रहस्थान इन के तत्वज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है।


प्रश्न :-
१) तर्क,
क) प्रमाणों का अनुग्राहक है।
ख) प्रमाणों में से एक है क्योंकि वह हमें तत्वज्ञान कराता है। 
ग) हमें अध्यात्म से विमुख करता है। 
घ) लोक व्यवहार में बाधा उत्पन्न करता है।

२) वाद में,
क) प्रयोजन हार जीत नहीं अपितु तत्वज्ञान होता है इस लिए निर्णय का वाद में स्थान नहीं है।
ख) यदि प्रतिपक्ष गलती करें तो उसे गलती दिखाकर सुधारने का अवसर दिया जाता है।
ग) वाद समान विचार वाले व्यक्ति के बीच चल रही कथा को कहते है।

३) जल्प वितंडा,
क) का प्रयोग तत्व की रक्षा के लिए भी हो सकता है।
ख) का ज्ञान उन्हीं के लिए उपयोगी है जिनका तत्वज्ञान से कुछ लेना देना नहीं है मात्र और मात्र हार जित ही जिनका लक्ष्य है।
ग) में यदि प्रतिपक्ष गलती करें तो उसे उसको सुधारने का अवसर दिया जाता है।

४) इन में से कौन से वाक्य सही है।
क) हेत्वाभास निग्रहस्थान में से एक है
ख) हेत्वाभास का प्रयोग तत्व की रक्षा के लिए भी हो सकता है।
ग) छल जाती निग्रहस्थान में आते है।

५) इन में से कौन से वाक्य सही और कौन से गलत है। 
क) न्यायशास्त्र में दिए गए प्रमेय अध्यात्म विषयक है।
ख) न्याय विद्या का प्रयोग अध्यात्म में ही होता है।
ख) न्याय विद्या का प्रयोग अध्यात्म को छोडकर बाकी विषयों में होता है क्यों की अध्यात्म श्रद्धा का विषय है जिसमें संशय तर्क वाद सब वर्ज्य है।
ग) न्याय विद्या का प्रयोग सभी क्षेत्र में होता है और उन उन क्षेत्र के तत्वज्ञान को पाकर भी हम अपवर्ग अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति कर सकते है।