आर्षं धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राऽविरोधिना ।
यस्तर्केणानुसंधत्ते स धर्मं वेद नेतरः ॥
मनुस्मृति १२-१०६
जो धर्मशास्त्र का वेदशास्त्र से अविरोधी तर्क के द्वारा अनुसंधान करता है वही धर्म के तत्व को समझ पाता है अन्य नहीं।
भूमिका
वेदों को समझने में सरलता हो इस लिए जो शास्त्र बनाये गये है उनको वेदों के अंग तथा उपांग के नाम से जाना जाता है।
छह अंग:
१. व्याकरण : व्याकरण को वेदों का मुख कहा गया है।
२. छंद : पाद
३. कल्प : हस्त
४. ज्योतिष : चक्षु (ज्योतिष = खगोल काल गणना, फलादेश नहीं)
५. निरुक्त : श्रोत्र
६. शिक्षा : घ्राण
छह उपांग
१. न्यायदर्शन
२. वैशेषिकदर्शन
३. सांख्यदर्शन
४. योगदर्शन
५. (पूर्व) मीमांसा
६. उत्तर मीमांसा / वेदांत / ब्रह्मसूत्र
यह छह दर्शन एक दूसरे के पूरक है। जैसे कोई बडा कार्य को करने के लिए अनेक व्यक्ति मिलकर प्रयत्न करते है ऐसे ही यह शास्त्र अपना अपना अधिकार क्षेत्र व्याख्यायित करके उसके अंतर्गत कार्य करते है। यह बडा कार्य है दुःखों से निवृत्ति पाना (मोक्ष) जो ज्ञान से ही संभव है।
न्यायदर्शन
प्रमाण का कैसे उपयोग करे, प्रमाणों का उपयोग करके अर्थ तक कैसे पहुंचा जाये यह न्यायदर्शन का विषय है।
प्रमाण क्या है?
जिसके द्वारा हम कुछ नया जानते है वह प्रमाण है।*
* योगदर्शन में चित्त की ६ वृत्तियां बतायी गयी है।
प्रमाण नया यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना
विकल्प जो नहीं है उसका होना समझना
विपर्यय जो है उसको कुछ और समझना
स्मृति पूर्व प्राप्त किया ज्ञान उभारना
निद्रा उपर में से कोई भी वृत्ति नहीं मूढ़ता की स्थिति
(अर्थात स्मृति को प्रमाण नहीं कहा जा सकता। क्योंकि वहां हम कुछ नया नहीं जान रहे।)
प्रसंगानुसार प्रमाण शब्द का उपयोग प्रमाण के साधन (इंद्रियां), प्रमाण की प्रक्रिया अथवा प्राप्त किये गये ज्ञान के लिए भी होता है।
वैसे तो मनुष्य ही नहीं परन्तु जीवमात्र कुछ न कुछ जानता ही रहता है। एक चींटी भी गुड की डली तक पहुंचने पर वह खाद्य पदार्थ है वह जान लेती है तथा कंपन होने पर असुरक्षा का निश्चय कर लेती है। यहां वह इन्द्रियों का उपयोग करके अर्थ (खाद्य पदार्थ/भय) का निश्चय करके उसे प्राप्त करने या उससे बचने का प्रयत्न करती है। मनुष्य भी जन्म से ले के कुछ न कुछ जानने की प्रक्रिया अनिवार्य रूप से करता ही रहता है। परन्तु हम यह नहीं कह सकते की जो भी हम या अन्य लोग जानते है वह सब सम्पूर्ण सत्य है। हमारे ज्ञान में कई त्रुटियां रह जाती है। हम यह भी देखते है की हर एक की जानने समझने की क्षमता भिन्न है तथा वह उसकी बुद्धि और पुरुषार्थ पर निर्भर है।
न्यायदर्शन हमें हमारे ज्ञान में त्रुटियां न रहे उसके लिए क्या करना चाहिए यह सिखाता है। प्रश्न हो सकता है की क्या यह हम स्वयं नहीं जान सकते। अवश्य जान सकते है पर जहां हम अत्यधिक समय तथा पुरुषार्थ से पहुंच सकते है वह ज्ञान हमारे ऋषिओं ने हमें सुव्यवस्थित तरीके से उस प्रकार दिया है की हम अल्प समय में उसे जान सके। और एक बार यदि हम इसे आत्मसात कर लेते है तो जैसे जिसको तैरना आता है वह डूबता नहीं है हम भी ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया में होने वाली त्रुटियों से स्वाभाविक रूप से ही बचने लगेंगे। इसके साथ ही हम अन्य व्यवहार भी दक्षता से कर पाएंगे जैसे की,
- दूसरों को हमारी बात समझाना
- दूसरों को उनकी त्रुटियां समझाना
- उलझी हुई बात को सुलझाना (त्रुटिपूर्ण तर्क विवाद का कारण बन सकते है वहीं कुतर्कों की त्रुटियां मिटाने से सत्य तक पहुंचने में सरलता होती है।)
- सही प्रश्न करना
- अन्य के प्रश्न को सही समझना
- अपने कुतर्कों को देख पाना
- निर्णय पर अल्प समय में पहुंचना (आत्मा की प्रवृत्ति निर्णय पर पहुंचने की है, अनिर्णय की स्थिति उसके लिए तनाव उत्पन्न करती है। अतः निर्णय क्षमता बढने पर हम तनाव से बच सकते है।)
न्यायदर्शन के रचयिता ऋषि गौतम तथा भाष्यकार वात्स्यायन है।
गौतम गोत्रनाम है। उनके गोत्र में पहले कोई गोतम नामक व्यक्ति हुए होंगे उनसे।
गोतम = गोभिः ध्वस्तं तमो यस्य अर्थात जिसने इन्द्रियों का उपयोग करके अज्ञान को समाप्त किया है। गो = इंद्रिया तम =अज्ञान
उनका निज नाम मेधातिथि तथा अन्य नाम अक्षपाद भी था।
अक्षपाद = जिसके पैर में आँखे है अर्थात जो अपनी हर एक क्रिया ज्ञानपूर्वक करता हो।
वात्स्यायन भी गोत्रनाम है। वत्स के कुल में उत्पन्न होने से।
यह शास्त्र में पांच अध्याय और प्रत्येक अध्याय में दो आह्निक है।
आह्निक = जो एक दिन में बना हो।
उसके उपरांत भाष्यकार वात्स्यायन के वार्तिक (उनके रचे हुवे वार्तिक तथा उन वार्तिकों की उन्हीके द्वारा की गई व्याख्या भी) इस अध्ययन का भाग रहेंगे।
हर एक पाठ के पश्चात कुछ प्रश्न रहेंगे। मेरा योगदान प्रश्न तक ही रहेगा। अन्य सभी जवाब देने तथा और चर्चा के लिए आमंत्रित है।
प्रश्न :-
१. इनमें से कौन सा दृष्टांत छह दर्शनों का पारस्परिक सम्बन्ध समझाने लिए उपयुक्त है।
क) जैसे भिन्न भिन्न कवियों की रचना जिनका एक दूसरे से कोई संबंध नहीं।
ख) एक अंतिम सत्य के बारे में दिये गए भिन्न भिन्न दर्शन जैसे की बौद्ध, जैन, चार्वाक आदि
ग) पदार्थ विज्ञान के संबंधित कोई पाठ्यक्रम के भिन्न भिन्न विषय जैसे गणित, भौतिक शास्त्र आदि
घ) भिन्न भिन्न स्वर्णालंकार जो है तो भिन्न भिन्न पर अंततः स्वर्ण ही है।
वैसे तो इस प्रश्न का उत्तर हम आगे जानेंगे पर फिर भी यदि आप को उत्तर अभी देना है तो वह क्या होगा?
२. ऊपर कहा गया है की "एक बार यदि हम इसे आत्मसात कर लेते है तो जैसे जिसको तैरना आता है वह डूबता नहीं है हम भी ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया में होने वाली त्रुटियों से स्वाभाविक रूप से ही बचने लगेंगे"
अब यदि कोई ये कहे की अनेक परिस्थितियों में जिसको तैरना आता है वह भी ड़ूब सकता है इस लिए यह दृष्टांत का मूल आधार ही गलत है तो क्या यह तर्क सही है?
क) हां सही है।
ख) नहीं।