शनिवार, 16 अप्रैल 2022

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः। १.१.२

प्रथम सूत्र में सूत्रकार कहते है की सूत्र में निर्दिष्ट १६ पदार्थों के तत्वज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है। 

अब प्रश्न उठता है की क्या उनका तत्वज्ञान प्राप्त होते ही मोक्ष मिल जायेगा?

इस प्रश्न का उत्तर सूत्रकार दूसरे सूत्र में देते है।

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः। १.१.२ 

दुःख जन्म प्रवृत्ति दोष मिथ्याज्ञान के उत्तर उत्तर के (अगले अगले के) नष्ट हो जाने पर उसके अव्यवहित पूर्व के नाश हो जाने पर मोक्ष मिलता है।

जन्म प्रवृत्ति दोष मिथ्याज्ञान ये दुःख जन्म प्रवृत्ति दोष के कारण है और कारण के नाश होने पर कार्य का नाश होता जायेगा। 

प्रथम सूत्र में निर्दिष्ट पदार्थों के तत्वज्ञान से मिथ्याज्ञान का नाश होगा। 
मिथ्याज्ञान का नाश होने पर दोषों का नाश होगा। 
दोषों का नाश होने पर प्रवृत्ति हटेगी।
प्रवृत्ति के हटने पर जन्मचक्र का नाश होगा। 
जन्म के हटने पर दुखों से आत्यंतिक मुक्ति मिलेगी (जहां लेशमात्र भी दुःख शेष नहीं होगा) अर्थात् मोक्ष मिलेगा। 

दुःख के मूल में मिथ्याज्ञान है और जब तक मिथ्याज्ञान को पूर्णतया नहीं हटाएंगे तब तक दुःख पूर्ण रूप से नहीं मिटेगा। 

प्रथम सूत्र में आये प्रमेय के अंतर्गत सूत्रकार १२ प्रमेय दर्शाएंगे। उन १२ प्रमेयों के तत्वज्ञान से मुक्ति मिलेगी जो की इस शास्त्र का निःश्रेयस है। यहां भाष्यकार संकेत करते है की उन प्रमेयों के विषय में क्या क्या मिथ्याज्ञान होता है। जैसे की,

आत्मा होता ही नहीं है ऐसा मानना। जो आत्मा नहीं है उसको आत्मा मानना। सुख को दुःख, दुःख को सुख मानना। नित्य को अनित्य, अनित्य को नित्य मानना। जो अत्राण (रक्षा करने में असमर्थ है) है उसको त्राण (रक्षक) मानना। भयावह में निर्भयता की भावना करना। घृणित को स्वीकार्य मानना। त्याज्य को अत्याज्य मानना। यह सब आत्मा तथा तत्व संबंधी मिथ्याज्ञान है। 

प्रवृत्ति के विषय में, कर्म को न मानना (सब काम पूर्व निर्धारित अथवा आकस्मिक अथवा नैसर्गिक ही होते रहते है), कर्मफल को न मानना, यह मिथ्याज्ञान है। यह संसार दोष निमित्तक नहीं है और न ही आत्मा इसमें दोष के कारण आता है (इस शास्त्र में दोष = राग द्वेष मोह)। यह दोष विषयक मिथ्याज्ञान है। 

मृत्यु के साथ सब समाप्त हो जाता है। बस देह ही था जो नष्ट हो गया और ऐसा कुछ नहीं है जो एक देह को छोडकर दूसरे को प्राप्त करेगा। कोई चेतन आत्मा नहीं है जिसके देह से संयोग को जन्म और वियोग को मृत्यु कहते है। अथवा मृत्यु के बाद जन्म है भी तो वह अनिमित्तक / आकस्मिक / कर्म से अतिरिक्त कोई निमित्त से हो जाता है। यह प्रेत्यभाव के बारे में मिथ्याज्ञान है। प्रेत्य =प्रकर्ष रूप से गया हुआ, भाव = होना, प्रेत्यभाव = प्रकर्ष रूप से जा कर फिर से होना।
(प्रेत शब्द "जिसमें से प्रकर्ष रूप से जाया जा चूका है" अर्थात् वह शरीर जिसमें से आत्मा निकल गया है उसके लिए भी कहा जाता है।)

मोक्ष अत्यंत भयंकर वस्तु है। उसमें सर्व प्रियजन, सुख के साधन, कल्याणकारी सर्व वस्तु से वियोग हो जाता है। ऐसा कौन बुद्धिमान होगा के जो सर्व कल्याणकारी वस्तुओं के वियोग रूप भयजनक मोक्ष की कामना करेगा। ऐसा मानना अपवर्ग के बारे में मिथ्याज्ञान है।
अपवर्ग = अप +वर्ग। अप = दूर, वर्ग = छोडना वृजीँ (वृज् ) वर्जने धातु से, अपवर्ग = दुःखों को दूर छोडना
मोक्ष, मुक्ति का अर्थ भी (दुःखों को) छोडना है। मुच् (मुचँ) प्रमोचने मोदने च, मुच् (मुचॢँ) मोक्षणे धातु से।  

ऐसे सब मिथ्याज्ञानों से जो जो वस्तु हमें अनुकूल प्रतीत होती है उसमें हम राग कर लेते है और जो जो प्रतिकूल लगती है वहां द्वेष कर लेते है। 

याद रहें की जो जो प्राप्त करने अथवा छोड़ने की इच्छाएं हमें तत्वज्ञान से होती है (मिथ्याज्ञान से नहीं) वह राग द्वेष नहीं है।

(कुछ लोग कहते है की मुक्ति पाने के लिए सभी इच्छाएं छोडनी पडेगी, मुक्ति की इच्छा भी। पर उनसे यदि पूछा जाए की मुक्ति की इच्छा क्यों छोडनी है तो जवाब मिलेगा ऐसा नहीं करने पर मुक्ति नहीं मिलेगी)

मिथ्याज्ञान से उत्पन्न दोष (राग, द्वेष, मोह) के कारण मनुष्य असत्य, ईर्ष्या, असूया (गुण में दोष देखना), लोभ से युक्त प्रवृत्ति करता है।

शरीर, वाणी तथा मन से होने वाली धर्म अधर्म (पुण्य पाप)  प्रवृत्तियां इस प्रकार है। दोष से मात्र पापात्मक ही नहीं पुण्यात्मक प्रवृत्ति भी होती है। और मोक्ष में पाप के साथ साथ पुण्य भी बाधक होता है। (सकाम पुण्य जो पुण्य के फल को साध्य मान कर किया गया है वह बाधक होता है। निष्काम धर्माचरण जहां उसके फल को साध्य नहीं माना है उसका फल आत्मा को मोक्ष की दिशा में आगे बढने के लिए साधन जुटाने में हेतु बनता है।)

अशुभ / अधर्म / पापात्मिका प्रवृत्तियां 

शरीर : हिंसा, चोरी, प्रतिषिद्ध मैथुन
वाणी : असत्य, कठोर वचन, चुगली(अयथार्थ कथन, जिसको बात नहीं कहनी चाहिए उससे कहना), प्रलाप (असम्बद्ध कथन)
मन : परद्रोह भावना, परद्रव्य अभीप्सा, नास्तिकता

शुभ / धर्म / पुण्यात्मिका प्रवृत्तियां 

शरीर : दान, परित्राण(रक्षण), परिचर्या(सेवा)
वाणी : सत्य, हितकर, प्रिय, स्वाध्याय (योगदर्शन में स्वाध्याय का अर्थ मोक्ष दिलाने वाले शास्त्रों का अध्ययन यह किया गया है।)
मन : दया, अस्पृहा, श्रद्धा
श्रद्धा = श्रत् (सत्य) +धा (धारण करना). सत्य को धारण करना और यदि हमें कोई सत्य पहले नहीं पता था पर अब पता चला है तो उसको स्वीकार करके धारण करना। (यहां यह अन्तर्भावित है की यदि हमें पहले कोई असत्य ज्ञान था और बाद में पता चला की वह असत्य है तो उसको छोड देना।)

यहां प्रवृत्ति को जन्म का कारण बताया गया है। और दोष को प्रवृत्ति का कारण। अर्थात् मात्र दोष जनित प्रवृत्ति (धर्माधर्म) ही जन्म का कारण है। दोष रहित प्रवृत्ति नहीं। दोष सहित धर्म अधर्म रूपी प्रवृत्ति सकाम कर्म है। इससे विपरीत निष्काम कर्म जो तत्वज्ञान पर आधारित है वह बंधन का कारण नहीं बनते। जब तक शरीर है तब तक कर्म न करना तो संभव ही नहीं है इस लिए न तो यह समझना चाहिए की अकर्मण्यता मुक्ति का मार्ग है न ही निष्काम कर्म (जो तत्वज्ञान से प्रेरित हो) को त्यागने योग्य समझना चाहिए।

सूत्र में आया हुआ प्रवृत्ति शब्द प्रवृत्ति से उत्पन्न होने वाले धर्म अधर्म के लिए है। प्रवृत्ति है साधन जिनका।

हम अन्य प्रसंगों में भी कार्य के लिए कारण का शब्द प्रयोग देखते है। जैसे की "अन्न प्राणीयों का प्राण है। यहां अन्न कारण और प्राण कार्य होते हुए भी कार्य कारण में अभेद शब्द प्रयोग होता है। ऐसे ही यहां प्रवृत्ति शब्द प्रवृत्ति के कार्य के लिए प्रयोग हुआ है। 

यह प्रवृत्ति(धर्म/अधर्म) अच्छे/बुरे जन्म का कारण बनते है। 
जन्म = शरीर, इंद्रिय, बुद्धि के समूहविशेष के साथ आत्मा का संयोग

और जब तक जन्म रहेगा तब तक कोई न कोई दुःख तो रहेगा ही। 
दुःख = प्रतिकूल संवेदना, पीडा, ताप, बाधना

इस प्रकार मिथ्याज्ञान से लेकर दुःख तक की श्रृंखला टूटेगी नहीं और जन्म मरण का चक्र चलता ही रहेगा। यह मात्र तत्वज्ञान से ही टूटेगा। 

तत्वज्ञान से मिथ्याज्ञान का नाश होगा। मिथ्याज्ञान के नाश से दोष का, दोष के नाश से प्रवृत्ति का, प्रवृत्ति से जन्म का और जन्म के नाश से दुःख का नाश होगा अर्थात अपवर्ग की प्राप्ति होगी। 


प्रश्न :-

१) दुख की गहरी जड में क्या है?

२) मिथ्याज्ञान के दूर होने से उससे तुरंत बाद क्या हटता है?

३) पुण्य भी मुक्ति में बाधा बनता है जिससे वह पाप जितना ही हानिकारक और त्यागने योग्य है। सही/गलत? क्यों?

४) प्राप्त करने अथवा छोडने की प्रत्येक इच्छा अंततः मोक्ष में बाधा बनती है। सही/गलत?