शनिवार, 9 अप्रैल 2022

न्यायदर्शन १.१.१ (प्रयोजन, दृष्टांत)

प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः। १.१.१

प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अवयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास छल जाति और निग्रहस्थान इन के तत्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।

प्रयोजन
जिस अर्थ को प्राप्त करने की अथवा छोडने की इच्छा करते हुए कर्म किया जाता है वह अर्थ उस कर्म का प्रयोजन है।
सर्व मनुष्य तथा सर्व प्राणियों के कर्मों में प्रयोजन व्याप्त है। 
बिना प्रयोजन के कभी कोई प्रवृत्ति नहीं करता और न्याय की प्रवृत्ति भी प्रयोजन पर आश्रित है।

संशय : क्या वितंडा भी सप्रयोजन होती है?
इस संशय को समझने के लिए पहले यह जानते है की वितंडा क्या है फिर इसका उत्तर देखेंगे। 

न्याय प्रवृत्ति के अंतर्गत जब पक्ष प्रतिपक्ष में चर्चा* होती है वह तीन प्रकार में से एक की होती है। 
*चर्चा शब्द चर्च् अध्ययने से बनता है। अध्ययन = अधि अयन। किसी वस्तु को अंदर तक घुसकर उसको प्राप्त करना (समझना)
चर्चा को कथा भी कहते है। कथ वाक्यप्रबन्धे। प्रबंध = प्रकृष्ट रूप से बांधना। 

कथा तीन प्रकार की होती है। 
वाद : वाद में पक्ष प्रतिपक्ष तत्व का निर्णय करने के लिए चर्चा करते है। 
जल्प : यहां प्रयोजन तत्व तक पहुंचना नहीं अपितु हार जित का होता है। अर्थात स्वयं के पक्ष को किसी भी तरह से सिद्ध करना (यदि वह गलत हो फिर भी)
वितंडा : यहां वैतण्डिक अपने पक्ष की स्थापना ही नहीं करता। और उसका अपना कोई पक्ष ही नहीं होने पर भी वह सामने वाले की बातों पर प्रहार करता रहता है। (वितंडा शब्द तड् आघाते धातु से बनता है) 

वाद और जल्प के प्रयोजन तो स्पष्ट है पर क्या वितंडा का भी कोई प्रयोजन है?

भाष्यकार उत्तर देते कहते है की यदि कोई वैतण्डिक सिद्धान्ती के पक्ष पर प्रहार करता है तो उसे अपने पक्ष की स्थापना करने के लिए कहना चाहिए। यदि वह अपने पक्ष की स्थापना कर देता है तो वह कथा वाद अथवा जल्प बन जाएगी, यदि वो यह भी कहे की उसका कोई पक्ष नहीं है बस सिद्धान्ति के पक्ष का खंडन करना ही उसका प्रयोजन है तो भी यदि वह हेतु और दृष्टान्त से अपने पक्ष की स्थापना करता है (सिद्धान्ति के पक्ष का खंडन हो सके ऐसे हेतु और दृष्टान्त देता है) तो भी उसकी प्रवृत्ति सप्रयोजन सिद्ध हो जाएगी (और कथा जल्प बन जाएगी।) और यदि वह अपने पक्ष की स्थापना न करें (ये तो कह दे की सिद्धान्ति गलत है पर ये न समझाये की कैसे गलत है) तो फिर उसके शब्द प्रलाप मात्र बन कर रह जायेंगे और कथा का स्वरूप ही नष्ट हो जायेगा।

अर्थात वितंडा में भी प्रयोजन तो होता है वैतण्डिक का अपने पक्ष की स्थापना न करना मात्र उसकी रणनीति का भाग है। (और ऐसे लोग मिलने पर या तो उनसे उनके पक्ष की स्थापना करवानी चाहिए या ये सिद्ध करके के वह चर्चा करने योग्य नहीं है अपना समय नष्ट होने से बचाना चाहिए )

दृष्टान्त

न्याय क्या है? प्रमाणों से अर्थ का परीक्षण करना यह न्याय है। 
इन प्रमाणों में अनुमान प्रमाण (जो की प्रत्यक्ष तथा आगम पर आधारित है) वह मुख्य है. उसी को अन्वीक्षा कहते है। इस अनुमान प्रमाण के पांच अवयव है जिसमें से तीसरा दृष्टान्त है। (जब हम अनुमान प्रमाण का प्रयोग दूसरे के साथ चर्चा करते समय करते है तब यह पांचों अवयवों का उपयोग करना आवश्यक है। यह चर्चा हम आगे करेंगे)

दृष्टान्त ऐसा होता है जिसमें शास्त्रीय और लौकिक दोनों ज्ञान वाले का बुद्धिसाम्य हो और उसके पीछे प्रत्यक्ष का आधार हो।
दृष्टान्त = दृष्ट अंत = अंत तक (निश्चित रूप से) जाना हुआ। 

जैसे किसी ने कहा के 'वहां दूर पर्वत पर आग लगी है।' यह प्रथम अवयव अर्थात प्रतिज्ञा है। अब उसने वहां जा के आग को प्रत्यक्ष देखा नहीं है न ही किसी और व्यक्ति जिसने वहां जा के आग को देखा हो उसने बताया है फिर भी उसने यह अनुमान प्रमाण से जान लिया के वहां आग है।

यह कैसे सिद्ध होता है? तो सिद्धान्ति कहेगा 'क्यों की वहां धुआँ है।' इस वाक्य को हेतु कहा जाता है जो की अनुमान प्रमाण का दूसरा अवयव है। और 'जहाँ धुआँ होता है वहाँ आग होती ही है। जैसे रसोई के चूल्हे में और हवन में।' यह व्याप्ति सहित दृष्टान्त अर्थात तीसरा अवयव है।' दृष्टान्त के न होने पर प्रथम दो अवयव भी नहीं टिक पाते।

दृष्टान्त का उपयोग अपने पक्ष की सिद्धि और प्रतिपक्ष का खंडन (व्याप्ति में दोष दिखाकर) करने में दोनों में ही अनिवार्य है। 

दृष्टान्त ऐसा होना चाहिए जो दोनों पक्ष को मान्य हो। अर्थात् उन्हें उस बारे में पहले ही ज्ञान हो।

अब यदि किसी ने कभी धुआँ ही न देखा हो और उसे यह न पता हो की आग के बिना धुआँ नहीं उठता तो उसके साथ चर्चा में यह दृष्टान्त नहीं दे सकते। ऐसे ही यदि कोई दूर से उठने वाले धुँए को नहीं देख पा रहा हो (अथवा किसी के कहने से उस बात को नहीं जान पाया हो) उसको हमने जो हेतु दिया वह भी नहीं दे पाएंगे। अर्थात अनुमान प्रमाण स्वतंत्र नहीं होता। उसके पीछे अनुमान प्रमाण प्रयोग करने वाले को प्रत्यक्ष अथवा शब्द प्रमाण से प्राप्त ऐसा ज्ञान होना अनिवार्य है जिसके आधारित अनुमान किया जा सके। (कहते है पैसे पैसे को खींचता है। यहाँ यह देख सकते है की कैसे ज्ञान ज्ञान को बढाता है। जितना अधिक हम जानते है और अधिक जानना उतना ही संभव होता जाता है।)

अनुमान प्रमाण को विस्तार से हम आगे जानेंगे पर यहाँ ये उल्लेख कर ले की अनुमान से हमेशा (निश्चित, पर) सामान्य ज्ञान ही होता है विशेष नहीं। जैसे दूर से धुँए को देख कर हम आग का निश्चय अनुमान प्रमाण से कर सकते है पर उस आग की विशेषताएँ जैसे की उसका आकार विस्तार बिना आग को प्रत्यक्ष देखे नहीं जान सकते। 

अनुमान कभी यदि प्रत्यक्ष अथवा आगम से विरुद्ध जाता दिखता है तो वह अनुमान अमान्य हो जायेगा। ऐसा अनुमान न्यायाभास मात्र है न्याय नहीं। 

प्रश्न :-
१) इन में से कौन सा वाक्य गलत है ?
क) एक जैसी प्रवृत्ति हमेशा उसके साथ जुड़े हुए कोई एक निश्चित प्रयोजन से ही होती है। जैसे की नौकरी, व्यवसाय का प्रयोजन अर्थोपार्जन होता है।
ख) प्रयोजन वह अर्थ है जिसे प्रवृत्ति करने वाला प्राप्त करना अथवा छोडना चाहता है। 
ग) जल्प का प्रयोजन हार जित है, सत्य तक पहुंचना नहीं।  

२) दृष्टांत,
क) आगम और अनुमान प्रमाण का एक अवयव है। 
ख) प्रत्यक्ष प्रमाण पर आधारित होता है। 
ग) जिस दृष्टांत पर हमें पूर्ण विश्वास हो वह हम प्रयोग कर सकते है। प्रतिपक्ष का उस पर सहमत होना आवश्यक नहीं है।