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तृतीय सूत्र में प्रमाणों के विभाग कहने के उपरांत सूत्रकार प्रथम विभाग प्रत्यक्ष के लक्षण चतुर्थ सूत्र में बताते है।
इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्। १.१.४
इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न हुआ वह ज्ञान जो अव्यपदेश्य (जिसका शब्द द्वारा बोध न कराया जा सके), अव्यभिचारी (बदल जाने वाला / खंडित होने वाला न हो) तथा व्यवसायात्मक (संदेह रहित) हो उसको प्रत्यक्ष कहते है।
सूत्र ३ के भाष्य में हमने देखा था की वृत्ति (प्रमाण) इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष अथवा उससे उत्पन्न हुए ज्ञान दोनों को कहते है। पर ध्यान रहे की इस सूत्र में सूत्रकार मात्र सन्निकर्ष से उत्पन्न हुए ज्ञान को प्रमाण बताते है। (अन्य भाष्यकार यहां यतः (जिससे) पद को अध्याहार मानकर जिस सन्निकर्ष से ज्ञान उत्पन्न होता है यह अर्थ भी करते है। पृष्ठ २६, सन्दर्भ ५)
इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न हुआ प्रत्येक ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं कहलायेगा। सूत्रकार कुछ विशेषताएं बताते है जिनके होने पर ही उस ज्ञान को प्रत्यक्ष कहा जाता है।
१) अव्यपदेश्य : व्यपदेश का अर्थ है कथन, शब्द द्वारा किसी वस्तु का बोध कराना। व्यपदेश्य = कथन करने योग्य। अव्यपदेश्य का अर्थ है वह ज्ञान जिसका शब्द द्वारा बोध न कराया जा सके।
ऐसा ज्ञान जो किसी के कहने से उत्पन्न हुआ हो वह प्रत्यक्ष नहीं कहा जा सकता।
जब हम किसी की कही हुई बात सुनते/पढते है तब इन्द्रिय का अर्थवाचक शब्द से (श्रोत्र/चक्षु/त्वचा का शब्द के ध्वनि/रूप/स्पर्श के साथ) सन्निकर्ष होता है। पर ऐसे ज्ञान को प्रत्यक्ष नहीं कहेंगे। वहां इन्द्रिय का सन्निकर्ष अर्थ के साथ नहीं हुआ है मात्र अर्थ के वाचक शब्दों के साथ हुआ है। अर्थ का ज्ञान वहां हमें जब मन उन वाचक शब्दों के अर्थ को स्मृति / संस्कार में से उभारकर आत्मा को अर्थ का ज्ञान कराता है तब होता है।
जो ज्ञान इन्द्रिय के अर्थ से सन्निकर्ष से उत्पन्न होता है वह शब्द से नहीं दिया जा सकता। १) शब्द से वह अनुभूति उत्पन्न नहीं हो सकती २) शब्द अनुभूति को वर्णित करने में हमेशा अपर्याप्त रहते है इस लिए उस ज्ञान का बोध शब्दों द्वारा हो ही नहीं सकता।
अर्थ के नामधेय (=नाम, संज्ञा) होते है जिससे व्यवहार चलता है। जैसे केले के स्वाद को हम मीठा कहते है पर न तो केले के मीठेपन का अनुभव करने के लिए हमारा 'मीठा' शब्द जानना पर्याप्त है न ही यदि कोई केला खाए तो उसकी स्वाद अनुभूति में जिसको मीठा शब्द ज्ञात है या नहीं उससे कोई अंतर आएगा।
२) अव्यभिचारी : अ (निषेधात्मक) +वि (उपसर्ग, विरुद्ध रूप से) +अभि (चारों ओर) +चारि (चर् धातु से गति करने वाला).
व्यभिचारी = इधर उधर गति करने वाला। अव्यभिचारी =जिसमें स्थिरता हो, जो डिगे नहीं। अर्थात् वह ज्ञान जो बदल जाने वाला/खंडित होने वाला न हो। जैसे तपती धूप में हमने पानी देखा (मृगजल) पर निकट जाने पर वह नहीं था। ऐसे ज्ञान को भी प्रत्यक्ष नहीं कहेंगे। (भाष्यकार ने न्यायदर्शन की भूमिका में प्रमाण के बारे में कहा था प्रमाणतोऽर्थप्रतिपत्तौ प्रवृत्तिसामर्थ्यात् अर्थवत् प्रमाणम्)
३) व्यवसायात्मक : =निश्चयात्मक। प्रत्यक्ष ज्ञान संदेह रहित होना चाहिए। जैसे यदि हम कोई वस्तु को देखते है (चक्षु इन्द्रिय का वस्तु के साथ सन्निकर्ष होता है) परंतु हमें निश्चय नहीं हो पा रहा है की वह सांप है या रज्जु तो ऐसे में उसको प्रत्यक्ष नहीं कहा जायेगा।
अब भाष्यकार पूर्वपक्षी का एक प्रश्न ले कर उसका उत्तर देते है।
प्रश्न : तो क्या प्रत्यक्ष में मात्र इन्द्रिय का अर्थ से ही सन्निकर्ष होता है? इन्द्रिय का मन से तथा मन का आत्मा के साथ सन्निकर्ष नहीं होता? इनके बगैर प्रत्यक्ष हो जायेगा? यदि यह सन्निकर्ष भी होते है तो सूत्र में क्यों नहीं बताये?
उत्तर : यह सूत्र प्रत्यक्ष के सारे कारणों का अवधारण (निश्चय) नहीं करता। प्रत्यक्ष के पीछे इतने ही कारण है यह कहना सूत्र का प्रयोजन नहीं है अपितु प्रत्यक्ष के विशेष (भेदक) कारणों (लक्षण) को बताना इसका प्रयोजन है। आत्मा का मन से सन्नीकर्ष प्रत्येक प्रमाण में होता है और वह सब में सामान्य होने से प्रत्यक्ष का विशेष लक्षण नहीं बनेगा।
(आत्मा सदैव मन को ही देखता रहता है। कोई भी ज्ञान आत्मा तक मन ही पहुंचाता है। जो भी वस्तु मन जानता है उसको आत्मा को जनाता है। मन जो जड है चेतन नहीं उसका काम आत्मा का उपकार करना है और वह आत्मा की इच्छा (और उन इच्छाओं से बने संस्कार) के अनुसार काम करता है।)
इन्द्रिय और मन का सन्निकर्ष इस लिए नहीं कहा की
१) उस की भेदकता विषय और इन्द्रिय के सन्निकर्ष के समान ही है, एक सन्निकर्ष को कहने से ही लक्षण पूर्ण हो जायेगा और दूसरे को कहने से भेदकता में अंतर नहीं आएगा इस लिए नहीं कहा।
अथवा (जो मुझे थोडा भी तर्कसंगत नहीं लगता)
२) विषय इन्द्रिय सन्निकर्ष में प्रत्येक इन्द्रिय के अपने अपने विषय है जिससे हर एक इन्द्रिय के प्रत्यक्ष में भिन्नता है पर इन्द्रिय मन सन्निकर्ष में मन प्रत्येक इन्द्रिय के सामने एक ही होने से ऐसी भिन्नता नहीं है इस लिए उसे लक्षण नहीं बनाया।
(इन्द्रिय मन सन्निकर्ष के उत्तर को ले कर मेरी शंका : इसका उत्तर यह क्यों नहीं दिया गया? -> अतीन्द्रिय विषय (वह विषय जो बाह्य इन्द्रियों से ग्राह्य नहीं है) में मन (अंतःकरण) का सन्निकर्ष सीधा अर्थ के साथ होता है वहां फिर इन्द्रिय (मन) का सन्निकर्ष मन के साथ ऐसा कहना वह दोनों एक ही होने से नहीं बनता। ऐसे में यदि इन्द्रिय मन सन्निकर्ष को लक्षण बनाएंगे तो उस लक्षण की वहां अव्याप्ति हो जाएगी और यदि यह कहे की अव्याप्ति नहीं होगी क्योंकि वस्तु का स्वयं से सन्निकर्ष तो रहता ही है तब भी ऊपर (१) तर्क के अनुसार इसका पृथक वचन व्यर्थ है। और यदि इस सन्निकर्ष का फल अर्थ का मन तक पहुंचना ऐसा लेंगे तो यह भी मन आत्मा के सन्निकर्ष की भांति सब प्रमाणों में सामान्य हो जायेगा और लक्षण नहीं बनेगा। )
हम विषय शब्द का अनेक बार उपयोग करते है तो इस शब्द का अर्थ क्या है?
विषय शब्द वि (विशिष्ट) उपसर्ग पूर्वक सि (षिञ् बन्धने) धातु से बनता है जिसका अर्थ है जो विशिष्ट रूप से इन्द्रियों को बांध देता है वह।
प्रश्न :-
१) इनमें से कौन सा ज्ञान प्रत्यक्ष है? यदि नहीं है तो क्यों नहीं है?
क) आपके पडोसी उनकी बेटी जो जापान में रहती है वहां तीन महीने रहे कर आये है और अब जापान में सब कैसा है वह आपको सविस्तार सुना रहे है। उनके वर्णन से आपको जो ज्ञान हो रहा है क्या वह प्रत्यक्ष कहा जायेगा?
ख) वो वहां के कुछ videos भी लाये है और दिखाते है।
ग) उन्होंने वहां एक राष्ट्रीय उद्यान में कुछ पक्षीओं की ध्वनि रेकॉर्ड की थी वह भी आपको सुनाते है यद्यपि वहां कोई पक्षी दिखाई नहीं दे रहा है।
घ) वे वहां से आप के लिए कोई मिठाई ले आये है जो आप ने खायी पर उसका नाम आप को पता नहीं है।
२) आप कल टहलने गए थे और रास्ते में सांप है ऐसा दिखने पर डर कर रास्ता बदल कर वापस आ गए थे। आज जब उस रास्ते पर फिर से जाते है तो जहां कल सांप देखा समझे थे वहां रज्जु का टुकडा पडा हुआ देखकर समझ जाते है कल आप गलत समझे थे। आपने कल किस का प्रत्यक्ष किया था? सांप अथवा रज्जु का? और आज?
३) आपके समक्ष से कोई पसार हो गया और आप को दिखा भी पर क्यों की आप का ध्यान ट्विटर में था तो वह कौन था उस पर ध्यान नहीं गया बस उसने सफेद शर्ट पहनी थी उतना ध्यान गया। दूसरे दिन वह व्यक्ति आप को कहता है की कल आपने मुझे प्रत्यक्ष देखा तो था। क्या वो सही है?
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