साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानं जातिः। १.२.१८
(व्याप्ति के अभाव में भी) केवल कुछ साधर्म्य अथवा वैधर्म्य को लेकर जो प्रत्यवस्थान (दोष निरूपण) किया जाता है वह जाति है।
जैसे वादी ने यह कह कर अपने पक्ष की स्थापना की, "शब्द अनित्य है, उत्पत्ति धर्म वाला होने से, जो जो उत्पत्ति धर्म वाला होता है वह वह अनित्य होता है, जैसे स्थाली।" यहां वादी ने उत्पत्ति धर्म और नित्यत्व के बीच की व्याप्ति जो विद्यमान है उसके बल पर हेतु प्रस्तुत किया है और स्थाली को उदाहरण के रूप में इस लिए प्रस्तुत किया है क्योंकि वह इन दोनों धर्मों को लिए हुए है। अब यदि प्रतिवादी यह कहे की स्थाली को स्पर्श किया जा सकता है और वह अनित्य है तो शब्द जिसको स्पर्श नहीं किया जा सकता वह नित्य होना चाहिए तो यह जाति का प्रयोग होगा। उसने उदाहरण में से किसी धर्म को पकडा और उसे साध्य के साथ जोड दिया जब की उस धर्म की साध्य के साथ व्याप्ति बनती ही नहीं।
जाति क्योंकि गलत तरीके से किए गए खंडन का नाम है इस लिए वह हमेशा उत्तर देने के समय ही होगी। (मान लो कोई पक्ष स्थापना के समय स्थाली के स्पर्श धर्म से शब्द को नित्य सिद्ध करने का प्रयास कर रहा होता तब उसे जाति नहीं कहते परंतु वह हेत्वाभास कहा जाता।)
नव्य में असत् उत्तर को जाति कहा गया है।
विप्रतिपत्तिरप्रतिपत्तिश्च निग्रहस्थानम्। १.२.१९
(विप्रतिपत्ति) विरुद्धज्ञान से कथन कर देना (अनुचित/गलत/नियम विरुद्ध कथन करना) अथवा (अप्रतिपत्ति) अज्ञानता वश चुप रह जाना (बात को समझ न पाना/ समझा न पाना) निग्रहस्थान है।
निग्रहस्थान पराजय के स्थान है। जहां पहुंचकर निंदा और हार का सामना करना पडे अर्थात् जिस स्थान पर प्रतिपक्षी दूसरे पक्ष को निश्चित रूप से पकड में ले लेता है वह निग्रहस्थान है। स्वयं के पक्ष में दिखाए गए दोषों के उद्धार में निष्फलता अथवा प्रतिपक्षी के स्थापित पक्ष का खंडन कर पाने की असमर्थता (अप्रतिपत्ति) निग्रहस्थान में पहुंचाते है।
पूर्व के दो सूत्र में न्यायदर्शनकारने जाति तथा निग्रहस्थान के लक्षण बताए है पर विभाग नहीं। तो क्या इनके विभाग है ही नहीं (जैसे दृष्टांत के विभाग नहीं थे) अथवा है? इसका उत्तर सूत्रकार अगले सूत्र में देते है।
तद्विकल्पाज्जातिनिग्रहस्थानबहुत्वम्। १.२.२०
(तद्विकल्पात्) उनके (साधर्म्य,वैधर्म्य से खंडन के, विप्रतिपत्ति, अप्रतिपत्ति के) अनेक प्रकार होने से (जातिनिग्रहस्थानबहुत्वम्) जाति तथा निग्रहस्थान के अनेक भेद हो जाते है।
साधर्म्य तथा वैधर्म्य के विकल्प से जाति के २४ विभाग हो जाते है और विप्रतिपत्ति तथा अप्रतिपत्ति के विकल्प से निग्रहस्थान के २२।
न्यायदर्शन में वैसे तो पदार्थों को उद्देश लक्षण तथा परीक्षा क्रम से लिया गया है परंतु जाति तथा निग्रहस्थान के लिए ऊपर के एक एक उनके लक्षण के सामान्य सूत्र ही दिए गए है, अन्यों की भांति विभाग तथा उनके लक्षण यहां प्रथम अध्याय में नहीं दिए गए। इस के बाद द्वितीय अध्याय में परीक्षा प्रकरण प्रारंभ हो जाएगा और इन दोनों के विभागों को अंत में पाँचवें अध्याय में लिया गया है।
इस के साथ प्रथम अध्याय का द्वितीय आह्निक समाप्त होता है।
[मैं यहां से आगे क्रम तोडते हुए प्रथम अध्याय के पश्चात पाँचवें अध्याय को लेने का विचार रखती हूँ जिससे हम सारे सोलह पदार्थ को एक बार एक स्तर पर जान ले। वैसे भी भले ही वाद में प्रवृत्त तत्वज्ञानप्राप्ति के लिए प्रयासरत समूह के लिए जाति, निग्रहस्थान अल्प महत्व रखते है परंतु आज के परिप्रेक्ष्य में जहां हमारे चारों तरफ जल्प वितंडा अधिक और वाद कम ही दिखाई देता है, हमारे लिए इन की जानकारी इतना अल्प महत्व नहीं रखती सो उनको अंत में न लेते हुए, प्रथम १४ पदार्थ जिनके लक्षण हमने देख लिए है, उनके तुरंत बाद ही हम आगे देखेंगे।]